पीई टीचर ने करी मेरी खूब चुदाई

नोएडा की एक अध्यापिका की छुपी रातें, जहाँ दर्द और इच्छा एक दूसरे में मिल जाते हैं। हर मुलाकात शरीर पर नए निशान छोड़ जाती है और मन को और गहराई तक खींच लेती है class teacher porn stories ।

मेरा नाम प्रिया शर्मा है। उम्र 28 साल। मैं नोएडा सेक्टर-62 में रहती हूँ और ग्रेटर नोएडा के एक प्राइमरी स्कूल में टीचर हूँ। शादीशुदा हूँ। पति राकेश की नौकरी छह महीने पहले छूट गई थी। वह पूरे दिन घर में पड़ा रहता, डिप्रेशन में डूबा हुआ। रात को भी मुश्किल से एक बार हाथ लगाता। शरीर की भूख बढ़ती जा रही थी पर घर में सिर्फ चुप्पी और उदासी थी।

स्कूल में विक्रम नाम का एक आदमी था। उम्र करीब 34। शरीर गठीला, कंधे चौड़े, हाथ मजबूत। वह स्कूल का पीई टीचर था। धीरे-धीरे बातें बढ़ीं। वह मेरे पति की हालत जानता था। कभी-कभी चाय पिलाता, कभी किताबें ला देता। एक दिन उसने कहा, “प्रिया, मेरे छोटे भाई की सगाई है। घर पर आ जाओ। परिवार के साथ।” मैंने मना किया। पति घर पर अकेला था। पर विक्रम ने इतना जोर दिया कि मैं मान गई। शर्त रखी—सुबह 8 बजे पहुँचूँगी, 4 बजे निकल जाऊँगी। घर पर किसी को पता नहीं चलना चाहिए।

सगाई वाले दिन सुबह मैं विक्रम के फ्लैट पहुँची। नोएडा एक्सटेंशन का तीसरा फ्लोर। दरवाजा खोला तो अंदर सिर्फ वही था। घर खाली। उसने कहा, “सब लोग लड़की वालों के यहाँ चले गए। सगाई शाम की है। मैं भी 2 बजे निकलूँगा। तब तक तुम यहीं रहो।”
मैं सोफे पर बैठी। हरे रंग का सूट पहना था। ब्लाउज टाइट। विक्रम पास आया। उसके हाथ ने मेरे बालों को गर्दन पर से हटाया। उंगलियाँ गर्दन की नस पर फिर गईं। मैंने कुछ नहीं कहा। वह और पास आया। अचानक उसके होंठ मेरी गर्दन पर पड़ गए। हल्के दाँत गड़े। मैं सहम गई पर हटी नहीं। उसके हाथ मेरे कंधे पर से सरककर ब्लाउज के अंदर घुस गए। ब्रा के ऊपर से उसने स्तनों को जोर से दबाया। निप्पल तने हुए थे। वह उन्हें चुटकी काटकर खींचने लगा।

“प्रिया… आज तुम पूरी तरह मेरी हो।” उसकी आवाज भारी थी।
मैंने कुछ जवाब नहीं दिया। सिर्फ साँस तेज हो गई। उसने मेरे बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और गले पर जोर से चूसा। निशान पड़ गए। फिर उसने कुर्ता ऊपर कर दिया। ब्रा खोल दी। मेरे स्तन बाहर आ गए। वह दोनों को मुट्ठी में लेकर मसलने लगा। निप्पलों को दाँतों से काटता, जीभ से चाटता। दर्द और मजा दोनों एक साथ। मैं कराह उठी।

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उसने मुझे सोफे पर लिटा दिया। सलवार खींच ली। पैंटी गीली थी। उसने पैंटी को एक तरफ सरकाया और दो उंगलियाँ अंदर धकेल दीं। जोर-जोर से अंदर-बाहर करने लगा। तीसरी उंगली भी अंदर घुसा दी। मैंने कमर उठाई। वह हँसते हुए बोला, “इतनी गीली… पति कभी ऐसे नहीं करता ना?”
मैंने सिर हिलाया। उसने अचानक मेरी पैंटी फाड़ दी। फटी हुई पैंटी को मेरे मुँह में ठूँस दिया। “चुप रहो। चीखना मत।”

फिर उसने अपनी पैंट उतारी। लंड बाहर निकला—मोटा, कठोर, करीब 8 inch लंबा। उसने मेरे दोनों स्तनों को दबाकर उनके बीच अपना लंड रगड़ा। प्री-कम निकल रहा था। फिर उसने मेरे पैर फैलाए और एक झटके में पूरा अंदर धकेल दिया। मैं चीखने वाली थी पर मुँह में पैंटी थी। दर्द तेज था। वह रुकने वाला नहीं था। दोनों हाथों से मेरे कूल्हे पकड़कर जोर-जोर से धक्के लगाने लगा। हर धक्के के साथ मेरी कमर बिस्तर से उठती। स्तन हिल रहे थे। उसने एक हाथ से मेरा गला दबाया। साँस रुकने लगी। आँखों के आगे अँधेरा छाया। फिर उसने गला छोड़ा और और तेज गति से चोदने लगा।

पाँच-सात मिनट में वह अंदर ही झड़ गया। गर्म वीर्य भर गया। पर वह बाहर नहीं निकला। लंड अंदर ही रखा और मेरे क्लिट को अंगूठे से रगड़ने लगा। मैं काँपने लगी। एक के बाद एक झटके आने लगे। शरीर ऐंठ गया।
वह बाहर निकला तो वीर्य मेरी टाँगों पर बह रहा था। उसने मुझे उठाया और बेडरूम में ले गया। बिस्तर पर पटक दिया। अलमारी से रस्सी निकाली। मेरे दोनों हाथों को बिस्तर के हेडबोर्ड से बाँध दिया। टाँगें भी फैलाकर बाँध दीं। मैं पूरी तरह खुली पड़ी थी। उसने मेरी आँखों पर काला कपड़ा बाँध दिया।

अँधेरे में सिर्फ स्पर्श रह गया। उसके हाथ मेरे शरीर पर घूम रहे थे। कभी निप्पल को चुटकी काटकर खींचता, कभी जाँघों के अंदरूनी हिस्से पर दाँत गड़ाता। फिर मुझे लगा कि कोई ठंडी चीज मेरे निप्पल पर लग रही है। क्लिप। उसने दोनों निप्पलों पर क्लिप लगा दी। दर्द तेज था। मैं कराह उठी। उसने मेरा मुँह खोलकर अपनी उंगलियाँ अंदर डाल दीं। गले तक। मैंने उल्टी जैसी महसूस की पर वह हटा नहीं।

फिर उसने अपना लंड मेरे मुँह में ठूँस दिया। पूरा। नाक बंद हो गई। साँस के लिए तरसने लगी। वह मेरे बाल पकड़कर सिर आगे-पीछे करने लगा। गले में धक्के। आँखों से आँसू बह रहे थे। जब वह बाहर निकाला तो मैं हाँफ रही थी। लार और प्री-कम मुँह से बह रहा था।
“अब नीचे।” उसने मुझे घुमाया। पेट के बल लिटाया। रस्सियाँ अभी भी बँधी थीं। उसने मेरे कूल्हे ऊपर उठाए और एक जोरदार थप्पड़ मारा। गाँड लाल हो गई। फिर दूसरा, तीसरा। लगातार थप्पड़। दर्द जलन में बदल गया। फिर उसने दोनों हाथों से गाँड के गोल हिस्सों को फैलाया और जीभ अंदर डाल दी। चाटने लगा। उंगली भी घुसा दी। मैं सिसक रही थी।

फिर उसने लंड निकाला और गाँड में ठेलने लगा। मैं चीखी। “नहीं… धीरे…” पर उसने नहीं सुना। धीरे-धीरे पूरा अंदर घुसा दिया। दर्द असहनीय था। वह रुक-रुक कर धक्के लगाने लगा। एक हाथ से मेरे बाल खींच रहा था, दूसरे से निप्पल की क्लिप को घुमाता। हर धक्के के साथ मेरी साँस उखड़ रही थी।

थोड़ी देर बाद उसने गाँड से निकाला और फिर चूत में डाल दिया। अब गति पागलों जैसी थी। बिस्तर चरमरा रहा था। मेरे हाथ रस्सियों में कट रहे थे। उसने क्लिप हटाई तो खून जैसे दर्द हुआ। निप्पल सूज गए थे। वह उन्हें मुँह में लेकर चूसने लगा जबकि नीचे जोर-जोर से चोद रहा था।
मैं दो बार झर चुकी थी। शरीर काँप रहा था। वह रुका नहीं। उसने मुझे घोड़ी बना लिया। एक हाथ से गर्दन दबाई, दूसरे से बाल। और पीछे से इतनी ताकत से धक्के मारे कि मेरी हड्डियाँ हिल गईं। “बोल… कौन तेरा मालिक है?” उसने गुर्राकर पूछा।
“तुम… तुम हो…” मैंने सिसकते हुए कहा।

“जोर से बोल।”
“विक्रम… तुम मेरे मालिक हो…”
यह सुनते ही उसने और तेज कर दिया। अंत में वह मेरे अंदर ही झड़ गया। इतना कि वीर्य बाहर निकलने लगा।
रस्सियाँ खोलीं। आँखों का कपड़ा हटाया। मेरी आँखें लाल थीं। शरीर पर निशान, काटे के निशान, थप्पड़ों के लाल निशान। उसने मुझे नहाने ले गया। शावर के नीचे खड़ा करके खुद ही साबुन लगाया। उंगलियाँ फिर चूत और गाँड में घुसा दीं। निप्पलों को फिर से काटा। मैं दीवार के सहारे खड़ी काँप रही थी।

नहाते-नहाते उसने मुझे दीवार से लगा दिया और फिर से चोदने लगा। इस बार खड़े-खड़े। एक टाँग ऊपर उठाई। पूरा वजन मेरे ऊपर। पानी बह रहा था, वीर्य बह रहा था। मैं फिर झर गई। पैर काँप रहे थे।
बाहर आकर उसने मुझे बिस्तर पर लिटाया। अपने लंड को मेरे मुँह के पास लाया। “अब पूरा पीना है।” मैंने मुँह खोला। उसने धीरे-धीरे अंदर डाला। मैं चूसने लगी। उसके हाथ मेरे सिर पर थे। जब वह झड़ने वाला था तो और गहरा धकेल दिया। वीर्य सीधे गले में गया। मैंने निगला। कुछ बाहर निकला तो उसने उंगली से पोंछकर फिर मुँह में डाल दिया।

दो बज चुके थे। मैंने कपड़े पहने। शरीर दर्द कर रहा था। चलना भी मुश्किल। विक्रम ने मुझे गोद में बैठाया। चुपचाप किस करने लगा। स्तनों को सहला रहा था। “प्रिया, आज के बाद भी आना। जब चाहो। मैं तुम्हें और तोड़ूँगा।”
मैंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ सिर हिलाया। कैब बुक की। घर पहुँची तो पति सोफे पर लेटा था। उसने मुँह भी नहीं उठाया। मैं बाथरूम गई। शीशे में देखा—गर्दन पर काले निशान, स्तनों पर दाँतों के निशान, कलाई पर रस्सी के निशान। शरीर अभी भी काँप रहा था।

उस रात पति के पास लेटी तो लगा जैसे कोई और औरत हूँ। शरीर में विक्रम की गंध बाकी थी। दर्द बाकी था। और एक अजीब सी भूख भी। मैंने आँखें बंद कीं और सोचा—फिर कब जाऊँगी।
उस रात नींद नहीं आई। शरीर के हर हिस्से में दर्द था—कलाई पर रस्सी के गहरे निशान, गर्दन पर काले दाग, निप्पल सूजे हुए, गाँड में जलन। मैं बाथरूम में गई, शीशे के सामने खड़ी रही और अपनी उंगलियों से उन निशानों को छूती रही। हर स्पर्श पर शरीर काँप उठता। मन में विक्रम की आवाज गूँज रही थी—“मैं तुम्हें और तोड़ूँगा।”

अगले दिन स्कूल में वह मिला। स्टाफ रूम में अकेले। उसने मेरे कान में फुसफुसाया, “आज रात 9 बजे मेरे फ्लैट आना। पति को कुछ बहाना बना देना। देर तक रहना है।” मैंने सिर हिलाया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
रात 9 बजे मैं फिर उसी फ्लैट के दरवाजे पर खड़ी थी। विक्रम ने दरवाजा खोला। अंदर रोशनी कम थी। उसने मुझे अंदर खींचा और तुरंत बाल पकड़कर दीवार से लगा दिया। होंठों पर जोर से दाँत गड़ाए। खून का स्वाद आ गया। “कपड़े उतार। सब।”

मैंने काँपते हाथों से सूट उतारा। ब्रा, पैंटी—सब। वह मुझे नंगी देखता रहा। फिर अलमारी से काली चमड़े की पट्टियाँ निकालीं। मेरे दोनों हाथ पीछे बाँध दिए। टाँगें भी फैलाकर टखनों से बाँध दीं। मैं खड़ी-खड़ी बँधी हुई थी। उसने मेरी आँखों पर फिर काला कपड़ा बाँध दिया।
अँधेरे में सिर्फ उसकी साँसें सुनाई दे रही थीं। अचानक एक जोरदार थप्पड़ मेरे बाएँ गाल पर पड़ा। फिर दाएँ पर। गाल जल रहे थे। उसने मेरे निप्पलों को फिर से क्लिप लगा दी—इस बार धातु की, भारी। क्लिप के नीचे छोटे-छोटे काँटे थे जो मांस में धँस गए। मैं चीखने वाली थी पर उसने मेरा मुँह खोलकर एक मोटी गेंद ठूँस दी और पट्टे से बाँध दिया। आवाज बंद।

फिर वह नीचे झुका। मेरी चूत को दो उंगलियों से फैलाया और अंदर कुछ ठंडा घुसा दिया। मोटी, कठोर वस्तु—शायद कोई डिल्डो। उसने उसे जोर से अंदर धकेल दिया और बाहर निकालने लगा। हर बार और गहरा। मैं तड़प रही थी। रस्सियाँ कलाई में धँस रही थीं। उसने डिल्डो को अंदर ही छोड़ दिया और गाँड की तरफ मुड़ा। ठंडी जेली लगाई और एक उंगली अंदर घुसा दी। फिर दो। फिर तीन। मैं सिसक रही थी। गेंद मुँह में थी, आँसू बह रहे थे।

“आज तुम्हारी गाँड पूरी तरह मेरी होगी।” उसकी आवाज कठोर थी। उसने डिल्डो निकाला और अपना 8 inch का मोटा लंड गाँड में ठेलने लगा। दर्द इतना तेज था कि शरीर ऐंठ गया। वह रुका नहीं। पूरा अंदर घुसा दिया। दोनों हाथों से मेरे कूल्हे पकड़कर पागलों की तरह धक्के लगाने लगा। हर धक्के के साथ मेरी साँस रुक जाती। निप्पल की क्लिप हिल रही थीं, काँटे और गहरा धँस रहे थे।
थोड़ी देर बाद उसने गाँड से निकाला। वीर्य नहीं निकला था। वह अभी खड़ा था। उसने मुझे उठाया और बिस्तर पर पेट के बल पटक दिया। हाथ-पैर अभी भी बँधे। उसने मेरे बाल पकड़कर सिर ऊपर उठाया और गेंद निकाली। “अब चाटो।”

मैंने जीभ निकाली। उसने अपना लंड, जो गाँड की गंध से भरा था, मेरे मुँह में ठूँस दिया। पूरा गले तक। मैंने उल्टी जैसी महसूस की पर वह बाल पकड़कर सिर आगे-पीछे करने लगा। गले में धक्के। लार बह रही थी, आँखों से आँसू। जब वह बाहर निकाला तो मैं हाँफ रही थी।
फिर उसने मुझे घुमाया। पीठ के बल। टाँगें फैला दीं। उसने एक पतली बेंत निकाली। हवा में सनसनाहट हुई और बेंत मेरी जाँघ के अंदरूनी हिस्से पर पड़ी। जलन। फिर दूसरी। चूत के पास। मैं चीखी। उसने बेंत से मेरे निप्पलों को भी मारा। क्लिप हिल गईं, दर्द असहनीय हो गया। फिर उसने बेंत को चूत पर रख दिया और हल्के-हल्के मारने लगा। हर वार पर शरीर उछल रहा था।

जब शरीर लाल हो गया तो उसने बेंत रखी और अपना लंड चूत में धकेल दिया। इस बार कोई धीरे-धीरे नहीं। एक झटके में पूरा। वह मेरे ऊपर लेट गया। पूरा वजन। गला दबाया। साँस लगभग बंद। आँखों के आगे अँधेरा घूमने लगा। फिर उसने गला छोड़ा और पागल गति से चोदने लगा। बिस्तर चरमरा रहा था। मेरे बँधे हाथ-पैर तड़प रहे थे। उसने एक क्लिप खींचकर हटाई। निप्पल से खून की बूँद निकली। उसने जीभ से चाट लिया।

मैं दो बार झर चुकी थी। शरीर काँप रहा था। वह रुका नहीं। उसने पोजीशन बदली। मुझे घोड़ी बनाया। बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और पीछे से इतनी ताकत से धक्के मारे कि मेरी हड्डियाँ हिल गईं। “बोल… तू क्या है?”
“तुम्हारी… तुम्हारी रंडी…” मैंने सिसकते हुए कहा।
“जोर से।”
“मैं तुम्हारी रंडी हूँ… तोड़ो मुझे…”
यह सुनते ही उसने और क्रूरता से चोदना शुरू किया। एक हाथ से गर्दन दबाई, दूसरे से निप्पल मसलने लगा। अंत में वह अंदर ही झड़ गया। इतना कि वीर्य बाहर निकलकर जाँघों पर बहने लगा।

रस्सियाँ खोलीं। मैं बिस्तर पर ढेर हो गई। शरीर हिल नहीं रहा था। विक्रम बाथरूम गया, पानी का गिलास लाया और मेरे मुँह में उड़ेल दिया। फिर उसने मुझे उठाया और शावर के नीचे ले गया। ठंडा पानी। उसने खुद साबुन लगाया—हर जगह। उंगलियाँ फिर चूत और गाँड में घुसा दीं। निप्पलों को दाँतों से काटा। मैं दीवार के सहारे खड़ी काँप रही थी।
नहाते-नहाते उसने मुझे फिर से चोदा। खड़े-खड़े। एक टाँग कंधे पर। पानी और वीर्य मिलकर बह रहे थे। मैं फिर झर गई। पैर काँपकर मुड़े जा रहे थे।

बाहर आकर उसने मुझे बिस्तर पर लिटाया। अपने लंड को मेरे चेहरे पर रगड़ा। “अब पूरा निगलना है। एक बूँद भी बाहर नहीं।” मैंने मुँह खोला। उसने धीरे-धीरे अंदर डाला। मैं चूसने लगी। उसके हाथ मेरे सिर पर थे, दबाव डाल रहे थे। जब वह झड़ने वाला था तो और गहरा धकेल दिया। वीर्य सीधे गले में गया। मैंने निगला। कुछ बाहर निकला तो उसने उंगली से पोंछकर फिर मुँह में डाल दिया और निगलने को मजबूर किया।

रात के 1 बज चुके थे। शरीर पूरी तरह टूटा हुआ था। विक्रम मेरे पास लेट गया। उसके हाथ मेरे सूजे निप्पलों पर थे। “कल फिर आना। अगली बार और कुछ नया होगा। तुम्हें और नीचे ले जाऊँगा।”
मैंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ आँखें बंद कीं। शरीर दर्द से काँप रहा था पर मन में एक अजीब सी भूख जाग रही थी। घर लौटते समय टैक्सी में बैठे-बैठे मैंने सोचा—पति के पास जाकर कैसे लेटूँगी। शरीर पर इतने निशान। पर अंदर कुछ टूट चुका था। और कुछ नया जन्म ले रहा था।

अगली सुबह स्कूल में वह फिर मिला। मेरे कान में फुसफुसाया, “आज रात रस्सियाँ नहीं। चेन होंगी। और एक नई चीज।” मैंने सिर हिलाया। दिल जोर से धड़क रहा था। दर्द अभी भी बाकी था। पर मैं फिर जाने वाली थी। क्योंकि अब मैं जान गई थी—यह दर्द ही मेरी असली भूख थी।
और वह भूख अब और गहराई तक जाने को बेताब थी।

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