गाँव की शादीशुदा औरत की चुदाई

गाँव के एक युवक ने शादीशुदा औरत के जिस्म को रस्सियों, चेन और गर्म मोम से इस कदर चीर दिया कि दर्द की चीखें भी कामुक हो उठीं। हर साँस में टूटती सीमाएँ, बहता खून और बेकाबू हवस की ऐसी दास्तान जो पढ़ते ही अंदर तक झकझोर दे शादीशुदा औरत की चुदाई ।

नमस्कार दोस्तों। मेरा नाम विक्रम सिंह है। मैं करनाल के पास एक छोटे से गाँव में रहता हूँ। उम्र हो गई है 32 साल, पर शादी अभी तक नहीं हुई। घर वाले रोज तंग करते हैं कि कब तक ऐसे घूमेगा, पर मुझे अपनी मर्जी से जीना पसंद है। मुझे खास तौर पर उम्रदराज औरतों से खेलना बहुत भाता है। खासकर वो जो शादीशुदा हों, जिनके जिस्म में अनुभव हो और जो चुपचाप दर्द सह लें। लड़कियाँ नखरे करती हैं, पर ये औरतें मजे देती हैं।

हमारे गाँव में एक परिवार रहता था थोड़ी दूर। घर का मुखिया हरपाल सिंह, उम्र करीब 48 साल। उसकी पत्नी की उम्र 42 साल थी। नाम मैं नहीं बताऊँगा, बस भाभी कहूँगा। उनके दो बच्चे शहर में पढ़ते थे। घर में सिर्फ भाभी और हरपाल ही रहते थे। खेती-बाड़ी का काम था, दो भैंसें और कुछ खेत। भाभी गोरी तो नहीं थी, सांवली थी, पर जिस्म मोटा-ताजा। छातियाँ भारी-भरकम, पेट थोड़ा निकला हुआ, और गाँड़ इतनी बड़ी और गोल कि देखकर लंड सीधा खड़ा हो जाए। जांघें मोटी, चूत के बाल घने और काले।

मुझे उनसे दूध लेने जाना पड़ता था। रोज शाम को। हरपाल ज्यादातर खेत में रहता। भाभी अकेली मिलती। पहले तो सिर्फ राम-राम होती। फिर धीरे-धीरे नजरें मिलने लगीं। मैं जानबूझकर उनके पीछे खड़ा होकर उनकी गाँड़ घूरता। जब वो झुककर बर्तन में दूध डालती, तो उनकी मोटी गाँड़ मेरे चेहरे के सामने आ जाती। जी करता था कि वहीं से कपड़े फाड़कर लंड घुसा दूँ।
एक दिन मैंने हिम्मत की। दूध लेते वक्त उनका हाथ पकड़ लिया। बोला – भाभी, तुम्हारी ये मोटी गाँड़ मुझे रात-रात भर सताती है। एक बार मुझे आजमाने दो।

भाभी का चेहरा लाल हो गया। बोली – पागल हो गया है क्या? हाथ छोड़। अगर किसी ने सुन लिया तो दोनों की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी।
मैंने हाथ नहीं छोड़ा। बल्कि और जोर से दबाया। बोला – तुम भी चाहती हो। बता।
भाभी चुप रही। फिर धीरे से बोली – जा अब। कल आना। हरपाल खेत में होगा।
अगले दिन दोपहर को मैं पहुँचा। दरवाजा खुला था। भाभी आँगन में कपड़े सुखा रही थीं। मैं चुपके से पीछे गया और दोनों हाथों से उनकी मोटी गाँड़ थाम ली। भाभी चौंक गईं, पर चिल्लाई नहीं। बस फुसफुसाईं – पागल, अंदर चल। कोई देख लेगा।

कमरे में घुसते ही मैंने दरवाजा बंद कर दिया और कुंडी लगा दी। भाभी की साड़ी का पल्लू खींचकर फेंक दिया। उनके भारी स्तन बाहर निकल आए। मैंने दोनों हाथों से पकड़कर जोर से मसला। भाभी कराह उठीं। मैंने एक स्तन मुँह में ले लिया और काटने लगा। दाँत गड़ा दिए। भाभी दर्द से सिसकने लगीं, पर दूर नहीं हटीं।

मैंने उनकी साड़ी और ब्लाउज फाड़ दिए। पूरा नंगा कर दिया। भाभी की चूत घनी बालों से ढकी हुई थी। मैंने उन्हें बिस्तर पर धक्का देकर गिराया। दोनों टाँगें फैला दीं। घुटनों को मोड़कर छाती से सटा दिया। चूत पूरी खुली हो गई। मैंने थूक लगाकर दो उंगलियाँ अंदर घुसा दीं। भाभी चीखने को हुईं, पर मैंने दूसरा हाथ उनके मुँह पर रख दिया।
– चुप। आवाज निकाली तो आज खून निकाल दूँगा।

उंगलियाँ अंदर-बाहर करने लगा। जोर-जोर से। भाभी की आँखों से आँसू निकलने लगे, पर चूत गीली हो रही थी। मैंने तीन उंगलियाँ कर दीं। फिर चार। भाभी की चूत फैलने लगी। मैंने उंगलियाँ निकालकर उनके मुँह में ठूंस दीं।
– चाट। अपना पानी चाट।

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भाभी ने आँखें बंद करके चाटना शुरू कर दिया। मैंने लंड बाहर निकाला। 8 इंच का मोटा लंड। भाभी की आँखें फटी की फटी रह गईं। मैंने उनके बाल पकड़कर सिर उठाया और लंड उनके मुँह में ठूंस दिया। गले तक। भाभी हांफने लगीं, आँसू बहने लगे, पर मैंने बालों को और जोर से पकड़ रखा। धक्के मारने लगा। गले में लंड अटक रहा था। लार बह रही थी। मैंने दोनों हाथों से उनका सिर पकड़कर जोर-जोर से मुँह चोदना शुरू कर दिया।

जब भाभी का दम घुटने लगा तो निकाला। लंड उनके चेहरे पर पटक दिया। बोला – अब गाँड़ दिखा।
भाभी घबरा गईं। बोलीं – नहीं… वहाँ मत… दर्द होगा।
मैंने उनकी पीठ पर एक तमाचा जड़ा। जोर का। भाभी चीखीं। फिर एक और। फिर तीसरा। उनकी मोटी गाँड़ लाल हो गई। मैंने उन्हें घोड़ी बना दिया। दोनों हाथ पीछे करके रुमाल से बाँध दिए। फिर उनकी गाँड़ के दोनों भाग फैलाए। छेद सिकुड़ा हुआ था। मैंने थूक लगाकर एक उंगली घुसाई। भाभी दर्द से काँपने लगीं। मैंने दूसरी उंगली भी डाल दी। दोनों उंगलियों से फैलाते हुए बोला – आज ये छेद खोलूंगा। चाहे खून निकल जाए।

भाभी रोने लगीं। – मत करो… बहुत दर्द हो रहा है।
मैंने उनकी पीठ पर और थप्पड़ जड़े। फिर लंड को गाँड़ के छेद पर रखा और एक जोरदार धक्का मारा। आधा लंड अंदर घुस गया। भाभी ने जोर से चीख मारी। मैंने मुँह पर तकिया दबा दिया। पूरा लंड अंदर ठूंस दिया। गाँड़ की दीवारें फटती हुई महसूस हो रही थीं। मैंने बिना रुके धक्के लगाने शुरू कर दिए। जोर-जोर से। हर धक्के के साथ भाभी की आवाज तकिए में दब जाती।

मैंने उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। – बोल, मजा आ रहा है?
भाभी सिसकते हुए बोलीं – दर्द… बहुत दर्द…
– और होगा।
मैंने और तेज गति से चोदना शुरू कर दिया। लंड पूरा अंदर-बाहर हो रहा था। कभी-कभी निकालकर फिर एक झटके में पूरा घुसा देता। भाभी की गाँड़ से खून की हल्की धार निकलने लगी। मैंने देखा और और जोश में आ गया। हाथ आगे बढ़ाकर उनके भारी स्तन मसलने लगा। निपल्स को मोड़ दिया। काटने जैसा दर्द।

थोड़ी देर बाद मैंने लंड निकाला और उन्हें उलटा कर दिया। पीठ के बल। टाँगें उनके कंधों तक मोड़ दीं। अब चूत पूरी खुली थी। मैंने लंड चूत में घुसाया और पूरी ताकत से धक्के मारने लगा। इतनी जोर से कि बिस्तर चरमरा रहा था। भाभी की आँखें ऊपर पलट रही थीं। मैंने उनके गले पर हाथ रखा और हल्का दबाव डाला। साँस रुकने लगी। फिर छोड़ा। फिर दबाया।
– आज तुझे अपना कुत्ता बनाऊँगा।

मैंने उन्हें फर्श पर उतार दिया। चारों पैरों पर। रस्सी से गर्दन में फंदा बनाकर बाँध दिया। दूसरे सिरे को अपने हाथ में लिया। अब जैसे कुत्ते को घुमाते हैं, वैसे ही उन्हें कमरे में घुमाने लगा। बीच-बीच में रुककर गाँड़ या चूत में लंड ठूंस देता। भाभी रो रही थीं, पर विरोध नहीं कर रही थीं। उनका जिस्म पसीने से तर था। स्तन झूल रहे थे। गाँड़ लाल और सूजी हुई।

मैंने उन्हें फिर बिस्तर पर लिटाया। इस बार हाथ-पैर चारों को अलग-अलग बाँध दिए। पूरा फैला दिया। फिर उनकी चूत पर थप्पड़ जड़ने लगा। जोर-जोर से। चूत सूजने लगी। फिर मैंने लंड चूत में डाला और बिना दया के चोदने लगा। हर धक्के के साथ उनकी मोटी जांघें काँप रही थीं। मैंने दोनों निपल्स को मुँह में लेकर काटना शुरू कर दिया। दाँत गड़ाए रखे। भाभी दर्द से तड़प रही थीं।

जब मुझे लगा कि अब निकालने वाला हूँ, तो लंड निकालकर उनके मुँह में ठूंस दिया। पूरा पानी उनके गले में उड़ेल दिया। भाभी खाँसने लगीं, पानी नाक से भी निकल आया। मैंने बाकी बचा हुआ उनके चेहरे और स्तनों पर गिरा दिया।

उसके बाद मैं चुपचाप उनके बंधे हुए जिस्म को देखता रहा। भाभी की आँखें बंद थीं। साँस तेज चल रही थी। गाँड़ और चूत दोनों से पानी और खून मिला हुआ पदार्थ बह रहा था। मैंने रुमाल खोलकर उनके हाथ-पैर आजाद किए। भाभी करवट लेकर लेट गईं। बोलीं – आज बहुत बर्बर हो गया तू…
मैंने उनके बाल सहलाते हुए कहा – ये तो शुरुआत है। अगली बार और कठोर खेल खेलेंगे।

भाभी ने आँखें खोलीं। उनमें डर भी था और चाहत भी। बोलीं – हरपाल शाम को आएगा। अब जा।
मैंने कपड़े पहने। जाते-जाते उनकी सूजी हुई गाँड़ पर एक जोर का थप्पड़ और जड़ दिया। भाभी सिसक उठीं।
उस दिन के बाद मैं जब भी मौका पाता, उनके घर पहुँच जाता। कभी खेत में बुलातीं, कभी घर में। हर बार खेल और क्रूर होता गया। कभी मैं उन्हें घंटों बाँधकर छोड़ देता। कभी उनकी चूत में सब्जियाँ ठूंस देता। कभी उनकी गाँड़ में मोमबत्ती जलाकर मोम गिराता। भाभी हर बार रोतीं, पर अगली बार फिर बुला लेतीं।

एक दिन मैंने उन्हें पूरा दिन नंगा बाँधकर रखा। मुँह में कपड़ा ठूंस दिया था। हर घंटे जाकर या तो चोदता या थप्पड़ जड़ता। शाम को जब छोड़ा तो भाभी मुश्किल से चल पा रही थीं। उनके जिस्म पर नीले निशान थे। स्तनों पर दाँतों के निशान। गाँड़ पूरी लाल और सूजी हुई।
अब तक मैं उन्हें पंद्रह बार से ज्यादा चोद चुका हूँ। हर बार नया अत्याचार। भाभी अब खुद कहने लगी हैं – आज और जोर से मार। आज और दर्द दे।

गाँव का माहौल है। कोई पता नहीं चलना चाहिए। पर मुझे पता है कि ये खेल अभी और गहरा होगा। अगली बार मैं उनकी गाँड़ में पूरा हाथ घुसाने की कोशिश करूँगा। या फिर उन्हें खेत में ले जाकर पेड़ से बाँधकर चोदूँगा।
अगले हफ्ते मैंने तय कर लिया था कि अब साधारण चुदाई से काम नहीं चलेगा। भाभी की सीमाएँ तोड़नी थीं। हरपाल सुबह ही खेत की तरफ चला गया था। भाभी ने फोन पर सिर्फ दो शब्द कहे थे – आ जा।

मैं उनके घर पहुँचा तो दरवाजा अंदर से खुला था। कमरे में घुसते ही देखा कि भाभी नंगी बिस्तर पर लेटी हुई थीं। उनके हाथ-पैर पहले से ही रस्सी से बाँधे हुए थे। चारों कोने में बाँधकर पूरा फैला दिया था। चूत और गाँड खुली पड़ी थीं। स्तनों पर पिछले बार के दाँतों के निशान अभी भी काले पड़े थे।

मैंने दरवाजा बंद किया और कुंडी लगा दी। धीरे-धीरे कपड़े उतारे। लंड पहले से ही तना हुआ था। मैं उनके पास गया और बिना कुछ बोले उनकी मोटी जांघ पर जोर का थप्पड़ जड़ा। फिर दूसरा। फिर तीसरा। जांघ लाल हो गई। भाभी की आँखें खुल गईं।
– आज और बर्बर होना है, बोला मैं।

मैंने कमरे से एक मोटी रस्सी निकाली। उनके गर्दन में फंदा डाला और कस दिया। इतना कि साँस लेना मुश्किल हो जाए। फिर उसी रस्सी को बिस्तर के सिरहाने से बाँध दिया। अब उनका सिर पीछे की तरफ खिंचा हुआ था। गला पूरा तना हुआ।
मैंने उनकी चूत पर थूक का एक बड़ा थप्पड़ मारा। फिर दोनों हाथों से चूत के होंठ फैलाए और अपनी जीभ अंदर तक घुसा दी। भाभी कराह उठीं। मैंने जीभ निकालकर उनके दाने को दाँतों से काटना शुरू कर दिया। हल्का नहीं, जोर से। इतना कि दाने से खून की बूंद निकल आए। भाभी चीखीं, पर गले में फंदा होने की वजह से आवाज दब गई।

मैं उठा और उनकी गाँड की तरफ गया। पिछले बार का खून अभी सूखा नहीं था। मैंने दोनों हाथों से गाँड के भाग फैलाए और एक मोटी उंगली अंदर घुसा दी। फिर दूसरी। फिर तीसरी। तीन उंगलियाँ एक साथ। भाभी तड़पने लगीं। मैंने उंगलियाँ अंदर घुमाते हुए फैलाया। छेद खुल रहा था।

– आज पूरा हाथ जाएगा, बोला मैं।
भाभी की आँखों में आँसू थे। उन्होंने सिर हिलाया, पर मैंने सुना नहीं। मैंने चार उंगलियाँ एक साथ ठूंस दीं। फिर अंगूठा भी। धीरे-धीरे पूरा हाथ अंदर धकेलने लगा। गाँड की दीवारें फटती हुई महसूस हो रही थीं। भाभी के शरीर में ऐंठन चल रही थी। मैंने हाथ को कलाई तक अंदर घुसा दिया। फिर मुट्ठी बाँध ली।

मुट्ठी बाँधकर अंदर-बाहर करने लगा। हर बार मुट्ठी पूरी अंदर जाती और निकालते वक्त गाँड से खून और पानी का मिश्रण बह निकलता। भाभी की साँसें रुक-रुककर चल रही थीं। गर्दन का फंदा और कस गया था। उनका चेहरा लाल हो चुका था।
मैंने मुट्ठी निकाली। गाँड का छेद अब इतना खुला था कि अंदर तक दिख रहा था। मैंने लंड को वहाँ रखा और एक झटके में पूरा घुसा दिया। गाँड में लंड अटक गया। मैंने दोनों हाथ उनके कूल्हों पर रखे और पूरी ताकत से धक्के मारने शुरू कर दिए। हर धक्के के साथ बिस्तर हिल रहा था। भाभी की आवाज गले में फंसी हुई थी। सिर्फ घरघराहट निकल रही थी।

मैंने उनकी पीठ पर थूक लगाया और थप्पड़ जड़ने लगा। एक के बाद एक। गाँड और पीठ दोनों लाल हो गए। बीच-बीच में लंड निकालकर फिर एक जोरदार धक्के में पूरा अंदर ठूंस देता। गाँड से खून की धार बह रही थी। वो मेरे लंड पर भी लग रही थी।
थोड़ी देर बाद मैंने लंड निकाला। भाभी की आँखें आधी बंद थीं। मैंने गर्दन का फंदा ढीला किया ताकि वो साँस ले सकें। फिर तुरंत उनके मुँह में लंड ठूंस दिया। खून और गाँड का स्वाद उनके मुँह में भर गया। मैंने बाल पकड़कर सिर हिलाते हुए मुँह चोदना शुरू कर दिया। गले तक। लार और खून मिलाकर उनके चेहरे पर बह रहा था।

जब मेरा मन भरा तो लंड निकाला और उनकी चूत में घुसा दिया। चूत पहले से गीली थी। मैंने दोनों टाँगें उनके कंधों तक मोड़ दीं और पूरी ताकत से धक्के मारने लगा। इतनी जोर से कि उनकी गर्दन बार-बार बिस्तर से टकरा रही थी। मैंने एक हाथ उनके गले पर रखा और दबाया। साँस रोक दी। दस सेकंड। बीस सेकंड। भाभी की आँखें फटी हुई थीं। फिर छोड़ा। फिर दबाया।
– आज तुझे मरते-मरते जिलाऊँगा, बोला मैं।

मैंने लंड निकालकर उनकी छाती पर पटक दिया। दोनों स्तनों को जोर से मसला। निपल्स को मुड़ते हुए काटा। एक निपल से खून निकल आया। मैंने वो खून चाट लिया और फिर उनके मुँह में थूक दिया।
अब मैंने उन्हें खोल दिया। रस्सियाँ काट दीं। भाभी मुश्किल से हिल पा रही थीं। मैंने उन्हें फर्श पर खींच लिया। पेट के बल लिटा दिया। फिर उनकी दोनों बाँहें पीछे करके मोटी रस्सी से बाँध दीं। टाँगें भी घुटनों से मोड़कर बाँध दीं। अब वो पूरी तरह असहाय थीं।

मैंने कमरे से एक पतली बेंत निकाली। पहले उनकी मोटी गाँड पर एक जोर का प्रहार किया। बेंत की आवाज कमरे में गूँजी। लाल निशान पड़ गया। दूसरा प्रहार। तीसरा। दस प्रहार। बीस प्रहार। गाँड पर जगह-जगह लाल और बैंगनी निशान पड़ गए। भाभी रो रही थीं, पर आवाज नहीं निकाल पा रही थीं। गला सूख चुका था।

मैंने बेंत नीचे रखा और उनकी गाँड के छेद में फिर से लंड घुसा दिया। इस बार और जोर से। खून की वजह से फिसल रहा था। मैंने उनकी बाँधी हुई बाँहों को पकड़कर खींचा और धक्के मारने लगा। हर धक्के के साथ उनका चेहरा फर्श पर रगड़ खा रहा था।
मैंने महसूस किया कि अब निकलने वाला हूँ। लंड निकालकर उनके खुले हुए मुँह में ठूंस दिया। पूरा पानी उनके गले में उड़ेल दिया। भाभी खाँसने लगीं। पानी नाक और मुँह दोनों से निकल रहा था। मैंने बाकी बचा हुआ उनके बालों में और पीठ पर गिरा दिया।

उसके बाद मैं उनके पास बैठ गया। भाभी की साँसें तेज चल रही थीं। शरीर काँप रहा था। गाँड से खून अभी भी रिस रहा था। चूत सूजी हुई थी। स्तनों पर नए काटने के निशान थे।
मैंने उनके कान के पास झुककर कहा – अगली बार और कठिन होगा। आज तो सिर्फ हाथ और बेंत से खेला। अगली बार लोहे की चेन और मोमबत्तियाँ होंगी। और शायद खेत में रात को ले जाऊँगा। वहाँ पेड़ से बाँधकर कुत्तों की तरह चोदूँगा।

भाभी ने आँखें खोलीं। उनमें दर्द था, डर था, पर इनकार नहीं था। उन्होंने सिर्फ इतना कहा – हरपाल शाम को आएगा… अब जा…
मैंने कपड़े पहने। जाते वक्त उनकी सूजी हुई गाँड पर एक आखिरी जोर का थप्पड़ जड़ा। भाभी सिसक उठीं।
घर लौटते हुए मेरे मन में अगला प्लान बन रहा था। अगली मुलाकात में मैं उन्हें पूरा दिन बंधक बनाकर रखूँगा। मुँह में बड़ा गैग ठूसूँगा। चूत और गाँड दोनों में मोटी मोमबत्तियाँ जलाकर मोम गिराऊँगा। निपल्स पर क्लैंप लगाऊँगा। और जब वो तड़पेंगी तो लंड से दोनों छेद बारी-बारी से फाड़ता रहूँगा।

अब ये खेल सिर्फ चुदाई नहीं रह गया था। ये उनकी पूरी इज्जत, दर्द और सीमाओं को तोड़ने का खेल बन चुका था। और मैं रुकने वाला नहीं था।
दो हफ्ते बाद फिर मौका मिला। हरपाल तीन दिन के लिए शहर गया था। भाभी ने खुद फोन किया – तीन दिन हैं… जो करना है कर ले।
मैं पहुँचा तो उनके हाथ में एक काली पॉलीथीन की थैली थी। अंदर चेन, क्लैंप, मोटी मोमबत्तियाँ और एक बड़ा रबर का गैग था। भाभी खुद लाई थीं।

उस दिन से खेल नई ऊँचाई पर पहुँच गया।
मैंने उन्हें नंगा किया। गैग मुँह में ठूंसकर कस दिया। चेन से दोनों हाथ ऊपर बाँधकर छत के हुक से लटका दिया। पैर जमीन से ठीक छू रहे थे। फिर निपल्स पर क्लैंप लगाए और चेन से खींच दिया। दर्द से उनके शरीर में ऐंठन दौड़ गई।
मैंने मोमबत्ती जलाई और उनकी गाँड के खुले छेद पर गर्म मोम गिराना शुरू किया। बूंद-बूंद करके। मोम जम रहा था। फिर चूत पर। फिर स्तनों पर। भाभी तड़प रही थीं, पर गैग की वजह से सिर्फ गुर्राहट निकल रही थी।

फिर मैंने उनकी लटकी हुई देह को पकड़कर गाँड में लंड घुसा दिया। हवा में लटकते हुए उन्हें चोदने लगा। हर धक्के के साथ चेन खनक रही थी। क्लैंप निपल्स को और खींच रहे थे। मोम टूट-टूटकर गिर रहा था।
मैंने तीन बार निकाला उस दिन। एक बार गाँड में, एक बार चूत में, और आखिरी बार उनके बालों में और चेहरे पर। गैग हटाकर उनके मुँह में बाकी पानी ठूंस दिया।

रात को मैंने उन्हें फर्श पर ही बाँधकर छोड़ दिया। सुबह उठकर फिर से शुरू किया। तीन दिन तक यही सिलसिला चला। हर दिन नया अत्याचार। हर दिन नई सीमा।
तीसरे दिन जब हरपाल आने वाला था, मैंने उन्हें खोला। भाभी मुश्किल से खड़ी हो पा रही थीं। पूरे शरीर पर निशान थे। गाँड और चूत दोनों से खून और मोम मिला हुआ पदार्थ बह रहा था। निपल्स सूजे हुए और काले पड़ चुके थे।

मैंने उनके कान में कहा – अगली बार और लंबा होगा। शायद एक हफ्ता।
भाभी ने सिर्फ सिर हिलाया। आँखों में अब डर के साथ एक अजीब सी भूख भी थी।
मैं निकल आया। गाँव की धूल भरी सड़क पर चलते हुए मुझे पता था कि ये खेल अब कभी खत्म नहीं होगा। भाभी की हर साँस, हर दर्द, हर चीख अब मेरी हो चुकी थी। और मैं उसे और गहराई तक ले जाने वाला था।

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