ट्यूशन वाले कमरे में रस्सी, मोम और थप्पड़ों ने एक लड़के को पूरी तरह तोड़ दिया। दर्द में भी लंड तनता रहा। अब वो रो-रोकर और माँगता है।
मेरा नाम कबीर है। उम्र बाईस साल। दिल्ली के एक छोटे से इलाके में रहकर मैं एम.कॉम की पढ़ाई कर रहा था। घर की हालत ठीक नहीं थी इसलिए ट्यूशन लेकर गुज़ारा चलाना पड़ता था। उसी ट्यूशन की वजह से मेरी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई।
ट्यूशन सर का नाम था प्रोफेसर राकेश। उम्र लगभग पैंतालीस। घर उनका साउथ दिल्ली के एक शांत कॉलोनी में था। वहाँ मैं सुबह आठ से नौ तक क्लास लेता था। बैच में दस लड़कियाँ और मैं अकेला लड़का। उनमें से एक लड़की थी जो पहले मुझे बहुत भाती थी, लेकिन फिर सब कुछ बदल गया।
प्रोफेसर की पत्नी का नाम था निशा। उम्र तैंतीस। गोरी, लंबी, भारी स्तन, पतली कमर और गोल मांसल गांड। जब पहली बार मैंने उन्हें दरवाज़े पर देखा तो मेरा दिल धड़कना बंद हो गया। काली साड़ी में उनका बदन इस कदर उभर रहा था कि मेरा आठ इंच लंबा मोटा लंड पतलून के अंदर तनकर दर्द करने लगा।
निशा ने मुझे देखा और मुस्कुराई। उस मुस्कान में कुछ ऐसा था जो सिर्फ आकर्षण नहीं, भूख थी। मैं अंदर घुसा और क्लास में बैठ गया, लेकिन दिमाग में सिर्फ वही चेहरा घूम रहा था।
अगले कुछ दिनों में मैं रोज़ आने लगा। निशा दरवाज़ा खोलतीं, मेरी आँखों में देखतीं और धीरे से कहतीं, “आ जाओ कबीर।” उनकी आवाज़ में एक नरम हुक्म होता था। मैं “गुड मॉर्निंग मैडम” कहता तो वे बस सिर हिला देतीं। लेकिन उनकी नज़रें मेरी पैंट पर ठहर जातीं।
एक दिन प्रोफेसर ने क्लास शुरू करने से पहले कहा, “आज मुझे जल्दी बाहर जाना है। निशा, तुम कबीर को अकेला छोड़ देना, बाकी लड़कियाँ नहीं आईं।” फिर बाइक लेकर निकल गए।
कमरा सूना पड़ गया। सिर्फ मैं और निशा। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। निशा ने दरवाज़ा बंद किया, ताला लगाया और मेरी तरफ मुड़ी। उनकी आँखों में अब मुस्कान नहीं, एक ठंडी चमक थी।
“उठ,” उन्होंने हुक्म दिया।
मैं उठ खड़ा हुआ। निशा मेरे पास आईं। उनके हाथ ने मेरी पैंट के ऊपर से मेरे तने हुए लंड को जोर से दबाया।
“इतना सख्त… और इतना मोटा। हर दिन यही देखती हूँ। आज सह नहीं पा रही।”
उन्होंने मेरी पैंट का बटन खोला और झटके से नीचे खींच दी। मेरा आठ इंच का मोटा, नसों से भरा लंड बाहर निकल आया। निशा ने घुटनों के बल बैठकर उसे अपनी हथेली में लिया और जोर से दबाया।
“इसे मैं अपनी चूत में पूरा लेना चाहती हूँ। और गांड में भी। आज तुम सिर्फ चुदने नहीं आए हो कबीर। आज तुम मेरी इच्छाओं का शिकार बनने आए हो।”
उन्होंने अपना मुँह खोला और मेरे लंड को एक झटके में गले तक ले गईं। मैं हांफने लगा। निशा ने बालों को पीछे बांध लिया और दोनों हाथों से मेरे कूल्हों को पकड़कर जोर-जोर से मुँह में धकेलने लगीं। उनकी आँखों से आँसू निकल रहे थे लेकिन वे रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। गला घुट रहा था, फिर भी वे और गहराई तक ले जा रही थीं।
मैंने उनके बाल पकड़ लिए और खुद धक्के लगाने शुरू कर दिए। निशा की आँखें सफेद पड़ गईं लेकिन वे विरोध नहीं कर रही थीं। बल्कि और ज़ोर से चूस रही थीं। जब मैं लगभग फटने वाला था तो उन्होंने लंड बाहर निकाला और मेरी जाँघ पर थूक दिया।
“अभी नहीं। पहले मुझे चोदो।”
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निशा ने अपनी साड़ी और ब्लाउज़ फेंक दिए। नंगी खड़ी होकर उन्होंने मेज़ साफ की और खुद को उस पर लिटा दिया। पैर फैलाए। उनकी चूत पहले से ही गीली चमक रही थी। उन्होंने दोनों हाथों से अपनी चूत के होंठ खोले और कहा,
“आओ। पूरा अंदर डालो। धीरे नहीं। एक ही झटके में।”
मैं उनके ऊपर चढ़ा। लंड के सिरे को उनकी गीली चूत पर रखा और एक जोरदार धक्के में पूरा आठ इंच अंदर घुसा दिया। निशा की चीख कमरे में गूँज उठी।
“आह्ह… माँ चोद… इतना मोटा… पूरा अंदर है…!”
मैंने बिना रुके धक्के लगाने शुरू कर दिए। मेज़ हिल रही थी। निशा के स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। मैंने उनके गले को पकड़ लिया और हल्का दबाया। उनकी आँखें बड़ी हो गईं लेकिन उन्होंने सिर हिलाकर कहा,
“और ज़ोर से दबा। आज मुझे साँस नहीं लेनी। आज मुझे सिर्फ चुदना है।”
मैंने गला और कस दिया। निशा का चेहरा लाल होने लगा। मैं तेज़ी से चोद रहा था। हर धक्के के साथ उनकी चूत से पानी निकल रहा था। बीस मिनट तक मैंने उन्हें इसी तरह दबाकर चोदा। जब उन्होंने अंगुलियों से मेरी पीठ नोचनी शुरू की तो मैंने गला छोड़ दिया। निशा ने जोर से साँस ली और चीखी,
“अब गांड मारो। अभी। बिना तेल के।”
मैंने उन्हें पलट दिया। निशा ने खुद अपने दोनों हाथों से अपनी गांड के गोल हिस्से को फैलाया। छोटी सी गुलाबी गांड की सूराख सिकुड़ रही थी। मैंने थूक लगाया और लंड का सिरा वहाँ रखा।
“एक झटके में पूरा डाल दो कबीर। दर्द हो तो भी मत रुकना।”
मैंने दोनों हाथों से उनके कूल्हे पकड़े और एक क्रूर धक्के में आधा लंड अंदर घुसा दिया। निशा की चीख इतनी तेज़ थी कि दीवारें काँप गईं।
“आह्ह… फट गई… माँ…!”
मैंने रुका नहीं। दूसरा धक्का। पूरा आठ इंच उनकी गांड में समा गया। निशा का शरीर काँप रहा था। आँसू बह रहे थे लेकिन वे पीछे हटने की कोशिश नहीं कर रही थीं। बल्कि और जोर से धक्के माँग रही थीं।
“चोदो… गांड फाड़ दो… आज मैं तुम्हारी रखैल हूँ… जो मर्जी करो…!”
मैंने उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और गांड में जोर-जोर से धक्के लगाने लगा। हर धक्के के साथ निशा की आवाज़ बदल रही थी—दर्द से चीख, फिर सिसकारी, फिर गहरी कराह। मैंने उनके गाल पर जोर से थप्पड़ मारा।
“बोलो कि तुम किसकी हो।”
“तुम्हारी… कबीर की… तुम्हारी चुदाई की प्यासी कुतिया…!”
मैंने और तेज़ चोदना शुरू किया। पैंतीस मिनट तक उनकी गांड में धक्के लगाता रहा। निशा का शरीर पसीने से चमक रहा था। उनकी चूत से पानी टपक रहा था। जब मैं फटने वाला था तो उन्होंने कहा,
“अंदर डाल दो। गांड में ही।”
मैंने आखिरी कुछ जोरदार धक्के लगाए और अपना पूरा वीर्य उनकी गांड के अंदर उड़ेल दिया। निशा का शरीर ऐंठ गया। वे जोर से काँपने लगीं और अपनी चूत में उंगलियाँ घुसाकर खुद को भी चरम पर पहुँचा लिया।
हम दोनों मेज़ पर गिरे पड़े थे। साँसें तेज़ चल रही थीं। निशा ने धीरे से मेरा लंड अपनी गांड से बाहर निकाला। वीर्य की मोटी धार उनकी जाँघों पर बहने लगी। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,
“कल फिर आना। अगली बार मैं तुम्हें बाँधकर चोदूंगी। और तुम्हारा लंड अपनी चूत में तब तक रखूंगी जब तक तुम रोने न लगो।”
मैंने कपड़े पहने। निशा अभी भी नंगी मेज़ पर लेटी हुई थीं। उनके शरीर पर मेरे नाखूनों के निशान और थप्पड़ों के लाल निशान चमक रहे थे। दरवाज़े का ताला खोला और मैं बाहर निकल आया।
घर जाते हुए मेरा शरीर थका हुआ था लेकिन दिमाग में सिर्फ एक बात घूम रही थी—कल फिर वही कमरा, वही मेज़, और निशा की वह भूखी आवाज़।
उस दिन के बाद मेरी ज़िंदगी बदल गई। ट्यूशन अब सिर्फ पढ़ाई के लिए नहीं था। हर सुबह जब मैं उनके घर के दरवाज़े पर खड़ा होता, तो जानता था कि आज फिर कोई नई सज़ा, कोई नई बेइज़्ज़ती और कोई नई चुदाई होने वाली है।
अगले दिन सुबह सात बजकर पैंतालीस मिनट पर मैं फिर उसी दरवाज़े के सामने खड़ा था। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। हाथ काँप रहे थे। कल की रात नींद नहीं आई थी। बार-बार वही चीखें, वही गला दबाने का अहसास और निशा की वह आखिरी बात दिमाग में घूम रही थी—“अगली बार मैं तुम्हें बाँधकर चोदूंगी।”
दरवाज़ा खोला तो निशा काली साड़ी में खड़ी थीं। बाल खुले हुए, आँखों में वही ठंडी चमक। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस अंदर आने का इशारा किया। प्रोफेसर घर पर नहीं थे। निशा ने ताला लगाया और मेरे कंधे पर हाथ रखकर सीधे उस कमरे में ले गईं जहाँ कल हमने चुदाई की थी।
मेज़ हटा दी गई थी। कमरे के बीच में एक भारी लकड़ी की कुर्सी रखी थी। कुर्सी के पीछे और पैरों पर मोटी रस्सियाँ बंधी हुई थीं। निशा ने मेरी तरफ मुड़कर कहा,
“कपड़े उतारो। सब।”
मैंने उतारे। निशा ने मेरे नंगे शरीर को ऊपर से नीचे तक देखा। फिर उन्होंने खुद की साड़ी फेंक दी। नंगी खड़ी होकर उन्होंने एक छोटी सी चमड़े की पट्टी निकाली और मेरे मुँह में ठूंस दी।
“आज तुम चुप रहोगे। सिर्फ सिसकना और रोना है।”
उन्होंने मुझे कुर्सी पर बैठाया। दोनों हाथों को पीछे की ओर मोड़कर रस्सी से कसकर बाँध दिया। पैरों को भी कुर्सी के पैरों से बाँध दिया। रस्सी इतनी कसी थी कि खून का बहाव लगभग रुक गया था। निशा ने मेरे आठ इंच के मोटे लंड को अपनी हथेली में लिया और जोर से दबाया।
“कल तुमने मेरी गांड फाड़ी थी। आज मैं तुम्हारा सब कुछ लूंगी।”
वे मेरे सामने घुटनों के बल बैठ गईं और मेरे लंड को मुँह में ले लिया। लेकिन इस बार चूसना नहीं था। वे दांतों से हल्के-हल्के काट रही थीं। दर्द की लहरें मेरे शरीर में दौड़ रही थीं। मैं चीखना चाहता था लेकिन मुँह में पट्टी थी। सिर्फ गले से अजीब सी आवाज़ निकल रही थी।
निशा ने लंड को छोड़ दिया और खड़ी हो गईं। उन्होंने एक पतली बेल्ट निकाली। चमड़े की। उन्होंने उसे हवा में घुमाया और मेरे बाएँ जाँघ पर जोर से पटका। दर्द इतना तेज़ था कि मेरी आँखों से आँसू निकल आए। फिर दाएँ जाँघ पर। फिर पेट पर। फिर सीने पर। हर वार के साथ मेरा शरीर ऐंठ रहा था। लंड और भी सख्त हो रहा था। दर्द और उत्तेजना एक साथ मिलकर मुझे पागल बना रहे थे।
निशा मुस्कुरा रही थीं।
“देखो, तुम्हारा लंड दर्द में और तन रहा है। तुम दर्द के बिना चुद नहीं सकते।”
उन्होंने बेल्ट फेंकी और मेरे ऊपर सवार हो गईं। उनकी गीली चूत ने मेरे लंड को एक झटके में निगल लिया। पूरा आठ इंच अंदर। उन्होंने मेरे बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और जोर-जोर से कूदने लगीं। हर बार उनके भारी स्तन मेरे चेहरे पर मार रहे थे। वे मेरे गाल पर थप्पड़ मार रही थीं—एक, दो, तीन… लगातार।
“बोलो कि तुम क्या हो।”
मैं पट्टी की वजह से बोल नहीं पा रहा था। सिर्फ गुनगुना रहा था। निशा ने पट्टी खींचकर निकाल दी और जोर से पूछा,
“बोलो!”
“मैं… आपकी कुत्ता हूँ… आपकी चुदाई की गुलाम…!”
निशा की आँखें चमक उठीं। उन्होंने और तेज़ी से अपनी चूत मेरे लंड पर पटकनी शुरू कर दी। कमरा सिसकारियों और थप्पड़ों की आवाज़ से गूँज रहा था। जब वे चरम पर पहुँचीं तो उनकी चूत इतनी जोर से सिकुड़ी कि मुझे लगा मेरा लंड टूट जाएगा। उन्होंने अपना पानी मेरे लंड और जाँघों पर उतार दिया।
लेकिन रुकीं नहीं।
उन्होंने मुझे कुर्सी से खोला। मेरे हाथ अभी भी पीछे बंधे थे। उन्होंने मुझे फर्श पर घुटनों के बल बैठाया और खुद मेरे सामने लेट गईं। पैर फैलाए।
“अब जीभ से चाटो। गांड और चूत दोनों। जब तक मैं कहूँ, मत रुको।”
मैंने सिर झुकाया और उनकी चूत पर जीभ फेरने लगा। निशा ने मेरे बाल पकड़कर और जोर से दबाया। मेरी नाक उनकी चूत में धँस गई। वे मेरे सिर को आगे-पीछे हिला रही थीं जैसे कोई खिलौना हो। जब मेरी जीभ उनकी गांड की सूराख पर पहुँची तो उन्होंने और जोर से दबाया।
“अंदर डालो जीभ। पूरा।”
मैंने डाली। निशा की कराहें तेज़ हो गईं। वे अपने नखों से मेरी पीठ नोच रही थीं। खून की पतली लकीरें निकल आईं। दर्द हो रहा था लेकिन मेरा लंड फर्श पर तना हुआ था, टपक रहा था।
आधा घंटा चाटने के बाद निशा उठीं। उन्होंने मुझे फिर कुर्सी पर बैठाया और हाथ बाँध दिए। इस बार उन्होंने एक मोटी मोमबत्ती जलाई। मोम की पहली बूँद मेरे सीने पर गिरी तो मैं चीख पड़ा।
“आह्ह…!”
निशा ने मुस्कुराते हुए और मोम गिराया—लंड पर, अंडकोष पर, जाँघों पर। हर बूँद जलन पैदा कर रही थी। मेरे शरीर पर सफेद मोम की धारें जम रही थीं। निशा ने मोमबत्ती फेंकी और मेरे लंड को अपनी चूत में फिर से बैठा लिया।
इस बार वे धीरे-धीरे हिल रही थीं। हर बार पूरा लंड अंदर ले जाकर कुछ सेकंड रुक जातीं। फिर बाहर निकालतीं। फिर अंदर। यह सज़ा थी। वे जानबूझकर मुझे चरम पर नहीं पहुँचने दे रही थीं। जब मैं फटने वाला होता तो वे रुक जातीं और मेरे गाल पर थप्पड़ मारतीं।
“इजाज़त नहीं दी मैंने। रोओ।”
मैं रो रहा था। असली आँसू। दर्द, जलन, बेचैनी और वासना सब मिलकर मुझे तोड़ रहे थे। निशा ने आखिरकार दया दिखाई। उन्होंने तेज़ी से कूदना शुरू किया। उनकी चूत की दीवारें मेरे लंड को निचोड़ रही थीं। मैं चिल्लाया और अपना वीर्य उनकी चूत के अंदर उड़ेल दिया। इतना जोर से कि मेरा शरीर काँप गया।
निशा उतर गईं। वीर्य उनकी जाँघों पर बह रहा था। उन्होंने उंगली से उसे उठाया और मेरे मुँह में ठूंस दिया।
“खाओ। अपनी ही गंदगी।”
मैंने निगल लिया।
उसके बाद निशा ने मुझे फर्श पर लिटा दिया। हाथ अभी भी बंधे थे। वे मेरे ऊपर आ गईं और अपनी गांड मेरे चेहरे पर बैठा दीं।
“अब साँस मत लो। जब तक मैं कहूँ।”
उनकी गांड ने मेरे मुँह और नाक को पूरी तरह ढक लिया। मैं हाँफ रहा था। साँस नहीं आ रही थी। निशा हिल रही थीं, अपनी गांड मेरे चेहरे पर रगड़ रही थीं। मेरा चेहरा उनके पसीने और कल के वीर्य से गीला हो रहा था। जब मेरी आँखें सफेद पड़ने लगीं तभी उन्होंने उठाया।
मैंने जोर से साँस ली। निशा हँस रही थीं।
“अच्छा कुत्ता। अब आखिरी दौर।”
उन्होंने एक पतली लोहे की चेन निकाली। उसे मेरे अंडकोष के चारों ओर लपेटकर कस दिया। फिर चेन को खींचकर मेरे लंड को नीचे की ओर खींचा। दर्द इतना तेज़ था कि मैं फिर से रोने लगा। निशा ने मेरे लंड को अपनी गांड में डाल लिया और चेन को अपने हाथ में पकड़कर जोर-जोर से हिलने लगीं। हर बार जब वे ऊपर उठतीं तो चेन खिंचती और मेरे अंडकोष पर दबाव बढ़ जाता।
“चिल्लाओ। आज तुम्हारी चीख सुननी है मुझे।”
मैं चिल्ला रहा था। असली दर्द की चीख। निशा और तेज़ हो गईं। उनकी गांड मेरे लंड को निगल रही थी। चेन खिंच रही थी। मेरा दिमाग सुन्न पड़ रहा था। जब वे चरम पर पहुँचीं तो उन्होंने चेन और कस दी। मैं भी उसी पल फट गया। वीर्य उनकी गांड में जा रहा था लेकिन दर्द इतना था कि मज़ा और पीड़ा एक हो गए थे।
निशा उतर गईं। उन्होंने रस्सियाँ खोलीं। मेरे हाथ-पैर सुन्न थे। शरीर पर बेल्ट के निशान, मोम के दाग, नाखूनों के खून के निशान और थप्पड़ों के लाल निशान फैले हुए थे। निशा मेरे पास बैठ गईं और मेरे बाल सहलाते हुए बोलीं,
“कल फिर आना। अगली बार मैं तुम्हें छत से बाँधकर लटकाऊँगी। और तुम्हारे लंड में सुई चुभाऊँगी। तब देखूँगी कितना रोते हो।”
मैं कुछ बोल नहीं पाया। सिर्फ साँस ले रहा था। निशा ने मेरे कपड़े फेंके और दरवाज़ा खोला।
“जाओ। प्रोफेसर आने वाले हैं।”
मैं लड़खड़ाते हुए बाहर निकला। गली में धूप चमक रही थी लेकिन मेरे शरीर में सिर्फ जलन और दर्द था। फिर भी एक अजीब सी भूख बनी हुई थी। कल फिर उसी दरवाज़े पर खड़ा होना था। और मैं जानता था कि मैं ज़रूर खड़ा हूँगा।
क्योंकि निशा ने मुझे सिर्फ चुदाई नहीं सिखाई थी। उन्होंने मुझे दर्द में मज़ा लेना सिखा दिया था। और अब मैं उनका गुलाम बन चुका था—पूरी तरह, हमेशा के लिए।
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