पाँच दिन बिना रोशनी के बंद कमरे में संपत्ति ने अंधेरे में खुद को बार-बार खोला। लौटकर मालिक ने जाँच की और अगली रात महिलाओं के हवाले करने का नया फैसला सुना दिया।
सुबह के सात बजे रुद्रक्ष ने अनन्या को ऊँची इमारत की खुली बालकनी में ले जाकर खंभे से बाँध दिया। हाथ ऊपर। पैर फैलाए। वजन भारी। नंगी। सिर्फ कॉलर। नीचे सड़क पर लोग आने-जाने शुरू हो चुके थे। गाड़ियाँ, रिक्शे, पैदल चलने वाले। सूरज की रोशनी सीधे उसके शरीर पर पड़ रही थी। पुराने निशान, सूजे हुए निप्पल, जांघों पर खून के धब्बे सब साफ दिख रहे थे।
रुद्रक्ष ने उसके कान में कहा, “सुबह से शाम तक। तू गिनेगी। हर निगाह। मैं कभी आऊँगा, कभी नहीं। समझी?”
वह अंदर चला गया। दरवाजा बंद हो गया। अनन्या अकेली रह गई। हवा ठंडी थी। शरीर काँप रहा था। नीचे पहला आदमी रुका। निगाह ऊपर उठी। अनन्या की आवाज काँपी।
“एक…”
फिर एक और। “दो…”
दोपहर तक गिनती सत्तर पार कर चुकी थी। लोग रुक-रुककर देख रहे थे। कुछ हँस रहे थे। कुछ मोबाइल निकाल रहे थे। अनन्या की गर्दन दर्द करने लगी थी। कलाईयाँ जल रही थीं। प्यास से जीभ सूख गई थी। लेकिन गिनती जारी थी।
दोपहर के दो बजे दरवाजा खुला। रुद्रक्ष निकला। हाथ में छड़ी। बिना कुछ बोले नितंबों पर वार शुरू कर दिए।
हर वार के साथ अनन्या की चीख बालकनी से नीचे तक गूँज रही थी। लोग और रुक गए। गिनती टूट-टूटकर निकल रही थी। “इक्यासी… बयासी…” खून की धारें जांघों पर बहने लगीं। बीस वार बाद रुद्रक्ष रुका। उसने दोनों हाथों से नितंब फैलाए और मुट्ठी अंदर धकेल दी। अनन्या चिल्लाई। नीचे और भीड़ जमा हो गई। रुद्रक्ष ने मुट्ठी घुमाई। फिर निकाली और लंड गाँड में धँस गया। जोर से पेलने लगा। हर धक्के के साथ अनन्या का शरीर खंभे से टकरा रहा था। शहर की आँखें देख रही थीं।
“गिर। नीचे वालों के सामने गिर।”
रुद्रक्ष ने जोर से धकेला। अनन्या का शरीर अकड़ गया। पानी की धार निकल पड़ी। वह गिर गई। नीचे सीटियाँ और तालियाँ गूँजने लगीं। रुद्रक्ष अंदर ही झड़ गया। लंड निकालकर अनन्या के मुँह में ठूंस दिया।
“चाट। सबके सामने।”
अनन्या ने चाटा। रुद्रक्ष अंदर चला गया। दरवाजा फिर बंद। अनन्या खून और पानी से सनी लटकती रही। गिनती जारी रखी।
शाम के पाँच बजे तक गिनती दो सौ पार हो चुकी थी। शरीर सुन्न पड़ने लगा था। सूरज ढल रहा था। अचानक दरवाजा फिर खुला। रुद्रक्ष निकला। इस बार हाथ में कुछ नहीं। उसने अनन्या की चूत में लंड धकेल दिया। जोरदार धक्के। नीचे लोग फिर रुक गए। अनन्या की चीखें हवा में तैर रही थीं। दूसरी बार गिरने के बाद भी रुद्रक्ष नहीं रुका। तीसरी बार गिरने पर अंदर झड़ गया। फिर लंड निकालकर उसके चेहरे पर मल दिया।
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शाम के छह बजे रुद्रक्ष ने बंधन खोले। अनन्या ढेर हो गई। उसने उसे घसीटते हुए अंदर ले जाकर शीशे वाले कमरे में बाँध दिया।
“गिनती बता।”
अनन्या की आवाज पूरी तरह बैठ चुकी थी। “दो सौ पैंतीस…”
रुद्रक्ष ने सिर हिलाया। छड़ी उठाई। नए वार शुरू कर दिए। पुराने निशानों पर। खून फिर बहने लगा। फिर गाँड में लंड धकेलकर पेलने लगा। जैसे दिन भर की निगाहों के निशान मिटा रहा हो। अनन्या अब सिर्फ सिसक रही थी। वह अंदर झड़ गया। उंगलियों से पानी उसके मुँह में ठूंसा।
“निगल।”
अनन्या ने निगल लिया।
रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठ गया। सिगार जलाई।
“नया नियम। आज से तू रोज़ सुबह सात से शाम छह तक उसी बालकनी में खड़ी रहेगी। गिनती करेगी। मैं कभी आऊँगा कभी नहीं। शाम को हिसाब देना होगा। गलती हुई तो अगले दिन बारह घंटे की जगह चौदह घंटे बाँध दूँगा।”
अनन्या फर्श पर पड़ी काँप रही थी। शरीर जल रहा था। लेकिन अंदर वह खालीपन अब सड़क की निगाहों की भूख बन चुका था।
रुद्रक्ष ने आखिरी कश लिया। आवाज और ठंडी हो गई।
“अगले हफ्ते मैं तुझे एक रात के लिए अपने सबसे बड़े दुश्मन के घर भेज दूँगा। अकेली। वह और उसके चार आदमी तुझे जैसे चाहें इस्तेमाल करेंगे। सुबह मैं लेने आऊँगा। लौटकर हर पल का हिसाब देना होगा। एक भी बात छिपाई तो फिर से बालकनी में तीन दिन लगातार बाँध दूँगा।”
अनन्या की आँखें अंधेरे में खुली रह गईं। नया डर। नई भूख। चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ बालकनी और शहर की निगाहों का नहीं, दुश्मन के घर की पूरी रात का भी होने वाला था। और अगली रात पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक और गहरी होने वाली थी।
अनन्या फर्श पर पड़ी रही। शरीर पर दिन भर की बालकनी की धूल, खून और रुद्रक्ष का पानी सूखकर चिपक गया था। कलाईयों पर गहरे निशान। निप्पल जल रहे थे। जांघों के अंदरूनी हिस्से छड़ी के वार से फटे हुए थे। रुद्रक्ष की आखिरी बात कानों में गूँज रही थी—दुश्मन के घर की पूरी रात।
तीसरे दिन शाम को रुद्रक्ष ने अनन्या को नहलाया नहीं। बस एक काली चादर ओढ़ाकर गाड़ी में फर्श पर लिटा दिया। एक घंटे बाद गाड़ी बड़े लोहे के गेट के अंदर रुकी। अंदर विशाल बंगला। रुद्रक्ष ने चेन दुश्मन के हाथ में थमा दी।
“पूरी रात। सुबह आठ बजे मैं लेने आऊँगा। चेहरा और जीभ छोड़कर बाकी सब आजाद।”
दुश्मन—लम्बा, भारी शरीर, छोटी दाढ़ी—ने अनन्या को सर से पैर तक देखा। मुस्कुराया। “ठीक है रुद्रक्ष। सुबह तक मजा ले लेंगे।”
रुद्रक्ष चला गया। गेट बंद हो गया। अनन्या अकेली रह गई पाँच पुरुषों के बीच। दुश्मन और उसके चार आदमी।
उन्होंने चादर खींचकर फेंक दी। अनन्या नंगी खड़ी थी। पहले उन्होंने उसे बीच के हॉल में खंभे से बाँध दिया। हाथ ऊपर। पैर फैलाए। फिर बारी-बारी छड़ी चलाने लगे। नितंब, जांघें, पीठ, स्तन। हर वार के साथ अनन्या की चीख हॉल में गूँज रही थी। खून की लकीरें बहने लगीं। जब पीठ पूरी लाल हो गई तो उन्होंने छड़ी रख दी।
दुश्मन ने पहले मुँह में लंड ठूंसा। गले तक। दो आदमी दोनों तरफ से निप्पल मरोड़ने लगे। तीसरे ने गाँड में तीन उंगलियाँ घुसा दीं। चौथे ने चूत में। अनन्या का शरीर चारों तरफ से खुल रहा था। दुश्मन ने मुँह में ही झड़ दिया। अनन्या ने निगल लिया क्योंकि बाल पकड़े हुए थे।
फिर उन्हें मेज पर लिटा दिया गया। एक ने चूत में लंड धकेला, दूसरे ने गाँड में, तीसरे ने मुँह में। तीनों एक साथ पेलने लगे। मेज खनक रही थी। अनन्या की आवाज दब रही थी। जब वे झड़ गए तो जगह दूसरे ले लेते। रात भर यही सिलसिला चला। कभी फर्श पर, कभी सोफे पर, कभी खंभे से बाँधकर। कभी मुट्ठी, कभी दो लंड एक साथ एक छेद में डालने की कोशिश। अनन्या का शरीर उनके नाखूनों, दांतों और थप्पड़ों से भर गया। खून, थूक और पानी की परत चढ़ गई।
आधी रात को दुश्मन ने अनन्या को अपने बेडरूम में ले जाकर बिस्तर से बाँध दिया। बाकी चार भी आ गए। उन्होंने बारी-बारी और फिर एक साथ भरा। अनन्या की आवाज अब सिर्फ सिसकियों में रह गई थी। शरीर सुन्न पड़ने लगा था। लेकिन वे रुके नहीं। कभी सिगरेट के दाग बनाए, कभी मोमबत्ती का मोम गिराया। निप्पलों पर, जांघों पर। अनन्या तड़पती रही।
सुबह के सात बजते-बजते अनन्या फर्श पर ढेर पड़ी थी। शरीर हिल नहीं रहा था। सिर्फ साँसें चल रही थीं। दुश्मन ने उसे बालों से खींचकर खड़ा किया। गेट के बाहर रुद्रक्ष खड़ा था। चेन वापस ली।
“कैसी रही?”
दुश्मन हँसा। “रात भर तीस बार से ज्यादा भरी। मुट्ठी भी खूब चली। लौटा रहा हूँ।”
रुद्रक्ष ने अनन्या को गाड़ी की फर्श पर लिटाया। घर पहुँचते ही शीशे वाले कमरे में बाँध दिया। शरीर पर दुश्मनों के सारे निशान धधक रहे थे। मोम के दाग, सिगरेट के गोल निशान, नाखूनों की लकीरें, सूजा हुआ मांस।
“अब बता। एक-एक पल। किसने क्या किया। कितनी बार। कहाँ। कैसे।”
अनन्या की आवाज पूरी तरह टूटी हुई थी। वह बताने लगी। दुश्मन ने पहले मुँह में झड़ा, फिर गाँड में मुट्ठी डाली… चार आदमियों ने बारी-बारी तीनों छेद भरे… मोमबत्ती कहाँ-कहाँ गिराई… सिगरेट के कितने दाग… हर विवरण। रुद्रक्ष सुनता रहा। कोई भाव नहीं।
जब वह खत्म हुई तो रुद्रक्ष ने छड़ी उठाई। पुराने निशानों पर नए वार शुरू कर दिए। खून फिर बहने लगा। फिर उसने गाँड में लंड धकेल दिया। जोर से। गहराई तक। जैसे रात भर के निशान मिटा रहा हो। अनन्या अब सिर्फ काँप रही थी। वह अंदर झड़ गया। फिर चूत में डालकर वहाँ भी झड़ गया। उंगलियों से पानी उसके मुँह में ठूंसा।
“निगल। उनके और मेरे दोनों।”
अनन्या ने निगल लिया।
रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठ गया। सिगार जलाई। धुआँ उठ रहा था।
“नया नियम। आज से तू रोज़ रात सोने से पहले मेरे सामने खड़ी होकर बताएगी कि रात भर तेरे शरीर ने किस छेद में सबसे ज्यादा दर्द और गर्मी महसूस की। मुँह, चूत या गाँड। झूठ बोली तो फिर से उसी दुश्मन के पास दो रात के लिए भेज दूँगा।”
अनन्या फर्श पर पड़ी हांफ रही थी। शरीर जल रहा था। लेकिन अंदर वह खालीपन अब और गहरा और काला हो चुका था। दुश्मन के घर की रात, मोम, सिगरेट, मुट्ठियाँ और रुद्रक्ष की ठंडी निगाह सब मिलकर उसे अंदर से खा रहे थे।
रुद्रक्ष ने आखिरी कश लिया। आवाज और ठंडी हो गई।
“अगले हफ्ते मैं तुझे एक बंद अंधेरे कमरे में पाँच दिन के लिए छोड़ दूँगा। अंदर सिर्फ पानी की एक बोतल होगी। कोई रोशनी नहीं। कोई आवाज नहीं। तू खुद तय करेगी कि कैसे अपने शरीर को अंधेरे में तोड़ना है। पाँचवें दिन मैं आकर देखूँगा। अगर तोड़ना कम लगा तो मैं तुझे फिर से बालकनी में एक हफ्ते के लिए बाँध दूँगा।”
अनन्या की आँखें अंधेरे में खुली रह गईं। नया डर। नई भूख। चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ दुश्मनों और बालकनी का नहीं, पाँच दिन के पूरा अंधेरे का भी होने वाला था।
अनन्या फर्श पर पड़ी रही। शरीर पर दुश्मन के घर की रात के सारे निशान धधक रहे थे—मोम के दाग, सिगरेट के गोल जले निशान, नाखूनों की लकीरें, सूजा हुआ मांस। रुद्रक्ष की आखिरी बात कानों में गूँज रही थी—पाँच दिन का पूरा अंधेरा।
तीसरे दिन सुबह रुद्रक्ष ने अनन्या को एक छोटे से बंद कमरे में धकेल दिया। अंदर बिल्कुल अंधेरा। कोई खिड़की नहीं, कोई रोशनी नहीं। फर्श ठंडा सीमेंट। एक कोने में सिर्फ पानी की एक छोटी बोतल। दरवाजा बाहर से बंद होते ही अंधेरा इतना गहरा हो गया कि अपनी उंगलियाँ भी नहीं दिख रही थीं।
पहले कुछ घंटे वह दीवार के सहारे बैठी रही। साँस की आवाज ही सिर्फ सुनाई दे रही थी। फिर प्यास लगी। बोतल खोजी। अंधेरे में हाथ फेरते हुए मिली। दो घूँट पी। बचाकर रख दी।
रात का अंदाजा नहीं लग रहा था। समय रुक सा गया था। अनन्या ने अपनी उंगलियाँ चूत में डालीं। धीरे-धीरे। अंधेरे में दर्द और भी तेज लग रहा था। तीन उंगलियाँ। फिर चार। शरीर काँपने लगा। वह रेंगकर दूसरी दीवार तक गई। वहाँ बैठकर मुट्ठी बनाने की कोशिश करने लगी। चूत में। आधा अंदर गया। चीख निकली। आवाज अंधेरे में गूँजकर लौटी। फिर और जोर से। पूरी मुट्ठी अंदर चली गई। वह अंधेरे में मुट्ठी घुमाती रही। जब गिरी तो फर्श पर लेटकर काँपती रही।
दूसरे दिन प्यास और भूख दोनों ने सताया। बोतल का पानी बचा था थोड़ा। उसने अपनी ही लार से उंगलियाँ गीली कीं और गाँड में दो उंगलियाँ डालने की कोशिश की। दर्द तेज था। आँखों से आँसू बहे लेकिन अंधेरे में दिखाई नहीं दिए। तीन उंगलियाँ। फिर चार। मुट्ठी। चीख निकल-निकलकर अंधेरे में खो जाती। वह बारी-बारी दोनों छेदों में मुट्ठी डालती रही। कभी निप्पल को मुँह में ले लेकर काटती। खून का स्वाद लेती। अंधेरा इतना गहरा था कि अपना खून भी नहीं दिख रहा था। सिर्फ स्वाद और गर्म धार का अहसास।
तीसरे दिन शरीर सुन्न पड़ने लगा। लेकिन अंदर की भूख और तेज हो गई। उसने फर्श पर लेटकर दोनों हाथों से अपनी चूत और गाँड एक साथ फैलानी शुरू की। चार उंगलियाँ एक में, तीन दूसरी में। फिर मुट्ठी दोनों जगह बारी-बारी। आवाज अब बैठने लगी थी। सिर्फ अस्पष्ट सिसकियाँ अंधेरे में तैर रही थीं। कभी वह दीवार से पीठ रगड़ती ताकि पुराने निशान फिर से खुल जाएँ। खून लग जाता। वह अपनी उंगलियों से खून को निप्पलों और होठों पर मलती। अंधेरे में खुद को महसूस करती।
चौथे दिन पानी खत्म हो गया। जीभ पूरी तरह सूख गई। शरीर काँप रहा था। फिर भी वह रुक नहीं पाई। अंधेरे में बैठकर मुट्ठी अंदर तक डाले रखती। घंटों। जब दर्द सहन नहीं होता तो निकाल लेती और फिर से डाल देती। कभी दोनों मुट्ठियाँ एक साथ आजमाने की कोशिश करती। चीख निकलती। शरीर काँपता। फिर शांत हो जाती। अंधेरा अब उसका हिस्सा बन चुका था।
पाँचवें दिन शाम को दरवाजे पर चाबी घूमने की आवाज आई। रोशनी की तेज किरण अंदर घुसी। अनन्या की आँखें सिकुड़ गईं। रुद्रक्ष खड़ा था। काली कमीज। ठंडी आँखें। उसने अनन्या को फर्श पर खून, पसीने और सूखे पानी में सना देखा। शरीर काँप रहा था। आँखें गड्ढों में धँस गई थीं।
“पाँच दिन। अंधेरे में। तूने खुद को कितनी बार तोड़ा?”
अनन्या की आवाज फटी हुई थी। “गिनती… खो गई… बहुत बार…”
रुद्रक्ष ने बालों से खींचकर खड़ा किया। शरीर लड़खड़ाया। वह खुद नहीं चल सकती थी। रुद्रक्ष ने उसे घसीटते हुए शीशे वाले कमरे में ले जाकर बाँध दिया। रोशनी में उसका शरीर और भयावह लग रहा था—सूखा, खून के धब्बे, नाखूनों के निशान, सूजे हुए छेद।
“अब मैं चेक करूँगा।”
उसने मुट्ठी चूत में धकेल दी। आसानी से चली गई। घुमाई। फिर गाँड में। और आसानी से। दोनों जगह मुट्ठी घुमाता रहा। अनन्या की चीखें कमजोर निकल रही थीं। शरीर अब पूरी तरह खुल चुका था।
“अब मेरी बारी।”
उसने लंड निकाला। पहले गाँड में जड़ तक धकेल दिया। जोर से पेलने लगा। एक हाथ से निप्पल मरोड़ता। दूसरा हाथ चूत में उंगलियाँ घुमाता। अनन्या शीशे में अपनी सूखी और खुली काया देख रही थी। रुद्रक्ष की लय तेज होती गई। जब अनन्या गिरी तो भी वह रुका नहीं। अंदर ही झड़ गया। फिर लंड निकालकर चूत में डाल दिया और वहाँ भी झड़ गया।
उंगलियों से पानी उठाकर अनन्या के मुँह में ठूंसा। “निगल। पाँच दिन का अपना और मेरा दोनों।”
अनन्या ने निगल लिया। स्वाद मुँह में फैल गया।
रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठ गया। सिगार जलाई। धुआँ उठ रहा था। अनन्या बंधी हुई काँप रही थी। शरीर अब लगभग जवाब नहीं दे रहा था।
“नया नियम। आज से तू रोज़ रात एक घंटा अंधेरे कमरे में बिताएगी। बिना पानी के। खुद को तोड़ने के नए तरीके खोजेगी। मैं दरवाजे के बाहर खड़ा सुनूँगा। अगर कोई दिन आवाज कम निकली या तोड़ना कम लगा तो फिर से पाँच दिन के लिए बंद कर दूँगा।”
अनन्या की साँसें तेज चल रही थीं। शरीर जल रहा था। लेकिन अंदर वह खालीपन अब अंधेरे की भूख बन चुका था।
रुद्रक्ष ने आखिरी कश लिया। आवाज और ठंडी हो गई।
“अगले हफ्ते मैं तुझे एक नए स्थान पर ले जाऊँगा। वहाँ सिर्फ महिलाएँ होंगी—मेरी पुरानी जानकारियाँ। वे तुझे खरीदेंगी एक पूरी रात के लिए। मैं कीमत लूँगा। वे तुझे अपने तरीके से तोड़ेंगी—नाखून, मोम, अपनी मुट्ठी, अपनी चूत, अपनी पेशाब। तू सब सहेगी। लौटकर हर महिला का नाम और हर हरकत का हिसाब देना होगा।”
अनन्या की आँखें शीशे में अपनी डरी हुई सूरत को देख रही थीं। नया डर। नई भूख। चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ अंधेरे और दुश्मनों का नहीं, महिलाओं की रात का भी होने वाला था। और अगली रात पहले से कहीं ज्यादा काली और गहरी होने वाली थी।
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