रिश्ते की दूर की चचेरी बहन

दूर की बहन को शादी में देखकर जग गई वह भूख, जो दर्द और गुलामी की आग में पलती गई। हर रात नई सजा, हर साँस पर कब्जा, जब तक वो खुद टूटकर उसकी संपत्ति न बन जाए।

ये कहानी है रोहन की। रोहन 25 साल का जवान मर्द था। शरीर जिम से कसा हुआ, कंधे चौड़े, छाती सख्त और जाँघें फौलादी। उसका लंड 8.5 इंच लंबा और 3.5 इंच मोटा था—नसों से भरा, काला-सा सिर वाला, जो एक बार अंदर घुस जाए तो बाहर निकलने का नाम नहीं लेता। वो दिल्ली के साउथ में रहता था, अपना फ्लैट था, और रिश्तेदारों के बीच उसकी छवि साफ-सुथरी थी। लेकिन अंदर की भूख कुछ और ही थी।

उसकी रिश्तेदार थी कव्या। कव्या 23 साल की थी। पिता की तरफ से दूर की चचेरी बहन—दादा के छोटे भाई की पोती। दोनों परिवार साल में एक-दो बार ही मिलते थे। कव्या का शरीर कम उम्र में ही महिलाओं वाला हो चुका था। 34 साइज के भारी स्तन, पतली कमर, गोल-गोल कूल्हे और चिकनी गोरी त्वचा। बाल लंबे, आँखें तीखी, और होंठ मोटे। वो हमेशा साड़ी या जींस में रहती, लेकिन उसके अंदर की गर्मी किसी से छुपी नहीं थी।

शुरुआत हुई जयपुर की एक शादी से। रिश्तेदारों की बड़ी शादी थी—कव्या के मामा के बेटे की। पूरा परिवार इकट्ठा हो गया था। होटल के बैंक्वेट हॉल में लाइट्स जल रही थीं, संगीत बज रहा था, लेकिन रोहन का ध्यान सिर्फ कव्या पर था। वो लाल साड़ी में खड़ी थी, ब्लाउज इतना टाइट कि स्तन बाहर आने को बेताब लग रहे थे। जब वो मुड़ी तो साड़ी की पल्लू खिसकी और उसकी कमर की नाली साफ दिख गई।
रोहन बाहर गार्डन में खड़ा सिगरेट पी रहा था। कव्या भी बाहर आ गई। अकेली। रोहन ने आवाज लगाई, “इधर आ।”
कव्या मुस्कुराई, “क्या हुआ?”

“तू अकेली क्यों घूम रही है? अंदर मज़ा नहीं आ रहा?”
बातें शुरू हुईं। पहले हल्की-फुल्की, फिर धीरे-धीरे गंदी। रोहन ने सीधा पूछा, “तेरा कोई है?”
कव्या ने सिर हिलाया, “नहीं।”
रोहन के अंदर की आग भड़क उठी। उसने झूठ बोला, “मेरा भी कोई नहीं। तू जैसी लड़की अभी तक नहीं मिली।”
कव्या की आँखों में चमक आई। “क्या मतलब?”

रोहन ने करीब आकर उसके कान में फुसफुसाया, “तेरे ये मोटे-मोटे स्तन… मन करता है इन्हें दबा-दबा कर दूध निकाल दूँ। और नीचे वाली चीज़… लगता है अभी तक कोई छूने भी नहीं आया।”
कव्या का चेहरा लाल हो गया, लेकिन वो पीछे नहीं हटी। बल्कि और करीब आ गई। “तो फिर क्या सोच रहा है? यहाँ सब लोग हैं।”
रोहन ने उसका हाथ पकड़ा। “ऊपर तीसरी मंजिल पर एक खाली रूम है। ताला नहीं है। दस मिनट में आ।”
कव्या ने धीरे से सिर हिलाया। “मैं बहाना बनाकर आती हूँ।”

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रोहन पहले पहुँच गया। रूम अंधेरा था, सिर्फ खिड़की से शहर की लाइटें आ रही थीं। कव्या आई तो उसने दरवाजा बंद कर दिया और तुरंत उसके होंठों पर हमला कर दिया। चुंबन नरमी से शुरू नहीं हुआ। रोहन ने उसके होंठ काट लिए, जीभ अंदर घुसेड़ दी, और बाल पकड़कर सिर पीछे झुका दिया। कव्या की साँस फूल गई। “आह… धीरे…”

“धीरे नहीं होगा आज,” रोहन ने गुर्राया। उसने साड़ी का पल्लू खींचकर फर्श पर फेंक दिया, ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। ब्रा भी उतार दी। 34 साइज के स्तन बाहर निकल आए—भारी, गोल, गुलाबी निप्पल खड़े। रोहन ने दोनों हाथों से पकड़कर जोर से दबाया। कव्या चीखी। उसने एक निप्पल मुँह में लिया और दाँतों से काटने लगा। दूसरी तरफ उंगलियों से निचोड़ रहा था।

“साली… कितनी गरम है तू,” रोहन ने कहा और एक हाथ उसकी साड़ी के अंदर घुसा दिया। पैंटी गीली थी। उसने पैंटी फाड़ दी। कव्या की चूत चिकनी, गुलाबी, और पहले से ही पानी छोड़ रही थी। रोहन ने दो उंगलियाँ अंदर ठूँस दीं। कव्या की कमर ऐंठ गई। “उफ्फ… दर्द हो रहा है…”
“दर्द तो अभी शुरू हुआ है,” रोहन ने कहा और उसे दीवार से सटा दिया। उसने अपने पैंट के बटन खोले। 8.5 इंच का मोटा लंड बाहर निकला—नसों से फूला हुआ, सिर चमकता हुआ। कव्या की आँखें फटी रह गईं। “इतना… बड़ा…”
रोहन ने उसके बाल पकड़कर नीचे घुटनों पर बिठा दिया। “मुँह खोल। पूरा अंदर ले।”
कव्या ने मना किया, “नहीं… कोई आ जाएगा…”

रोहन ने बाल और जोर से खींचे। “खोल वरना और बुरा होगा।”
कव्या का मुँह खुला। रोहन ने लंड का आधा हिस्सा उसके गले तक ठूँस दिया। कव्या की आँखों से आँसू निकल आए, लेकिन रोहन रुकने वाला नहीं था। उसने सिर पकड़कर आगे-पीछे करने लगा। गले की दीवार से टकराते हुए लंड की आवाज आ रही थी। कव्या हांफ रही थी, लार बह रही थी। दस मिनट बाद रोहन ने उसके मुँह में झड़ दिया। गाढ़ा माल उसके गले में चला गया। कव्या ने खांसते हुए थूकने की कोशिश की तो रोहन ने ठोड़ी पकड़कर कहा, “पी जा। एक बूँद बाहर नहीं निकलेगी।”

कव्या ने निगल लिया। रोहन ने उसे उठाया और बिस्तर पर पटक दिया। उसने उसकी टाँगें फैलाईं और मुँह चूत पर लगा दिया। जीभ अंदर-बाहर, क्लिट पर दाँत, और उंगलियाँ एक साथ। कव्या की सिसकारियाँ कमरे में गूंज रही थीं। “आह… आह… रुको… बहुत जोर से…”
रोहन ने नहीं सुना। उसने दो उंगलियाँ चूत में और एक उंगली उसकी गांड में घुसेड़ दी। कव्या चीख पड़ी। शरीर अकड़ गया और वो जोर से झड़ गई। पानी रोहन के चेहरे पर लग गया। उसने चाट लिया।
अब असली खेल शुरू हुआ। रोहन ने लंड को उसकी चूत पर रखा। सिर से रगड़ते हुए कहा, “अब फाड़ने वाला हूँ।”
कव्या ने सिर हिलाया, “धीरे… पहली बार है…”

रोहन मुस्कुराया और एक जोरदार धक्का मारा। पूरा लंड एक बार में अंदर चला गया। कव्या की चीख इतनी तेज थी कि रोहन ने तुरंत हाथ उसके मुँह पर रख दिया। खून निकला। सील टूट गई। आँसू बह रहे थे। रोहन रुका नहीं। उसने दोनों हाथों से उसके कूल्हे पकड़े और पूरी ताकत से पेलना शुरू किया। बिस्तर चरमरा रहा था। कव्या की आवाज दबी हुई थी—उफ्फ… मादरचोद… निकाल… दर्द…
लेकिन कुछ देर बाद दर्द में मजा मिलने लगा। कव्या खुद कमर उठाने लगी। रोहन ने स्पीड बढ़ा दी। थप्पड़ उसके गाल पर, स्तनों पर, जाँघों पर। लाल निशान पड़ गए। उसने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और कान में कहा, “अब तू मेरी रांड है। जब चाहूँगा तब चोदूँगा।”

कव्या ने हाँ में सिर हिलाया। रोहन ने उसे घोड़ी बना दिया। पीछे से और जोर से पेलने लगा। एक हाथ से उसकी गांड थपथपा रहा था, दूसरे से स्तन निचोड़ रहा था। कव्या लगातार झड़ रही थी। पानी बिस्तर पर फैल गया। आखिर में रोहन ने उसके बाल और कसकर पकड़े और अंदर ही झड़ गया। गाढ़ा माल उसकी छोटी चूत में भर गया।
दोनों हाँफ रहे थे। कव्या के शरीर पर काटने के निशान, थप्पड़ों के लाल दाग। रोहन ने उससे कहा, “कल मेरे फ्लैट आ। घर पर कोई नहीं होगा। पूरा दिन निकालूँगा।”

अगले दिन कव्या आई। रोहन ने दरवाजा खोला तो वो सिर्फ कोट में थी। अंदर आकर कोट उतारा—नीचे कुछ नहीं। नंगी। रोहन ने उसे घसीटकर बेडरूम में ले गया। पहले उसे बेड के पाये से रस्सी से बाँध दिया। हाथ ऊपर, टाँगें फैली हुई। फिर मोमबत्ती जलाई और उसके स्तनों पर गरम मोम टपकाया। कव्या चीखी, लेकिन रोहन ने मुँह में कपड़ा ठूँस दिया।

मोम के बाद उसने बेल्ट निकाली और उसकी जाँघों और गांड पर जोर-जोर से मारी। लाल धारियाँ पड़ गईं। फिर लंड उसके मुँह में ठूँसा, गले तक। जब कव्या की साँस फूलने लगी तब निकाला और सीधा चूत में घुसेड़ दिया। इस बार बिना किसी रुकावट के। पूरा दिन चला। अलग-अलग पोजीशन—घोड़ी, मिशनरी, दीवार के साथ, कुर्सी पर। रोहन ने उसकी गांड भी फाड़ी। पहले उंगली, फिर पूरा लंड। खून मिला पानी। कव्या रो रही थी, लेकिन मना नहीं कर रही थी। बल्कि खुद कह रही थी, “और जोर से… फाड़ दे…”

शाम तक कव्या का शरीर निशानों से भरा था। गर्दन पर काटने के दाग, स्तनों पर दांत, जाँघों पर बेल्ट के निशान, चूत और गांड दोनों सूजी हुई। रोहन ने आखिरी बार उसके मुँह में झड़ने के बाद कहा, “अब से तू सिर्फ मेरी है। जब बोलूँगा तभी आएगी। और अगर किसी और से बात की तो और बुरा होगा।”
कव्या ने आँखों में आँसू और मजे का मिश्रण लिए हुए सिर हिलाया। “हाँ… मैं तुम्हारी हूँ।”

उसके बाद ये सिलसिला चलता रहा। कभी होटल में, कभी रोहन के फ्लैट में, कभी गाड़ी में। रोहन ने कव्या को पूरी तरह तोड़ दिया। उसके शरीर पर स्थायी निशान छोड़ दिए। कभी चेन से बाँधता, कभी आँखों पर पट्टी बाँधकर घंटों तड़पाता, कभी उसके स्तनों को क्लिप से दबाता। कव्या अब खुद मांगने लगी थी। “आज और बेरहम होना… मुझे रांड की तरह इस्तेमाल कर।”

एक दिन रोहन ने उसे अपने ऑफिस के स्टोर रूम में बुलाया। दोपहर के समय। कव्या आई तो रोहन ने दरवाजा लॉक किया और बिना बात किए उसके कपड़े फाड़ दिए। टेबल पर लिटाया, टाँगें कंधों पर रखीं और पूरा लंड एक झटके में अंदर ठोक दिया। कव्या की चीखें स्टोर रूम में गूंज रही थीं। रोहन ने उसका मुँह दबाया और बिना रुके पेलता रहा। जब झड़ा तो माल उसके पेट तक भर गया।
रात को फ्लैट में और लंबा सेशन हुआ। रोहन ने कव्या को फर्श पर घुटनों के बल बिठाया, बाल पकड़कर लंड चूसाया। फिर घोड़ी बनाकर गांड में पूरा घुसेड़ दिया। कव्या की आवाज अब दर्द और मजे दोनों की थी। “आह… रोहन… और गहरा… मार… मुझे तोड़ दे…”

रोहन ने उसकी गर्दन दबाई, साँस रोकी, और उसी समय झड़ गया। कव्या का शरीर काँप रहा था। जब रोहन ने छोड़ दिया तो वो फर्श पर गिर गई, हाँफती हुई, शरीर से पानी और माल बहता हुआ।
अब कव्या पूरी तरह रोहन की गुलाम बन चुकी थी। वो जब भी मिलती, उसके शरीर पर पिछले बार के निशान होते। कभी-कभी वो खुद रस्सी और बेल्ट लेकर आती। कहती, “आज मुझे इतना मारना कि चल भी न पाऊँ।”
रोहन ने एक बार उसे पूरे वीकेंड के लिए बाँध रखा। बिस्तर से चेन से जकड़ा हुआ। खाना भी उसी पोजीशन में खिलाया। बीच-बीच में आता, चूत या गांड में लंड ठोकता, मुँह में झड़ता, और चला जाता। कव्या की आँखों में अब सिर्फ भूख थी। दर्द की भूख, इस्तेमाल होने की भूख।

कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। समय के साथ रोहन ने कव्या को और क्रूर खेलों में धकेला। कभी सार्वजनिक जगहों पर—पार्क की अंधेरी बेंच पर, सिनेमा हॉल के लास्ट रो में। कभी उसके घर पर, जब परिवार सो रहा होता। कव्या अब खुद पहल करने लगी थी। रोहन के फ्लैट का चाबी उसके पास था। कभी-कभी वो नंगी ही दरवाजे पर खड़ी मिलती।
एक रात रोहन ने उसे आईने के सामने खड़ा किया। पीछे से पकड़ा, बाल खींचे, और आईने में देखते हुए चोदा। “देख… कैसी लग रही है तू। मेरी निजी रांड।” कव्या की आँखों में आँसू थे, लेकिन मुस्कान भी। “हाँ… सिर्फ तुम्हारी…”

रोहन का लंड अब कव्या की दोनों छेदों का आदी हो चुका था। वो जितना जोर से मारता, कव्या उतना ही और मांगती। शरीर पर निशान स्थायी हो गए थे—कमर पर बेल्ट के, स्तनों पर दाँतों के, गर्दन पर उंगलियों के। लेकिन कव्या को इन निशानों पर गर्व था।
आखिरी बार जब दोनों मिले तो रोहन ने कव्या को पूरी रात बांधे रखा। सुबह जब छोड़ा तो कव्या मुश्किल से चल पा रही थी। शरीर दर्द से भरा, लेकिन चेहरे पर संतुष्टि। उसने रोहन के लंड को चूमा और कहा, “अगली बार और बुरा करना… मुझे तोड़ना मत छोड़ना।”

रोहन ने उसके गाल थपथपाया। “तू अब मेरी संपत्ति है। जब तक चाहूँगा इस्तेमाल करता रहूँगा।”
कव्या ने सिर झुकाया। “जैसी आपकी मर्जी।”
रोहन ने कव्या को उस सुबह छोड़ा तो वो लंगड़ाती हुई निकली। शरीर पर चेन के निशान गहरे थे, गर्दन पर उंगलियों के दाग बैंगनी हो चुके थे, जाँघों के अंदरूनी हिस्से में काटने के घाव अभी भी खून की पतली रेखाएँ छोड़ रहे थे। लेकिन कव्या की आँखों में डर नहीं, बल्कि और गहरी प्यास थी।

दो दिन बाद रात के बारह बजे रोहन के फ्लैट का दरवाजा खुला। कव्या काले कोट में खड़ी थी। अंदर आकर कोट गिराया तो नीचे कुछ नहीं था—सिर्फ कमर में एक पतली चेन और स्तनों पर मेटल क्लिप्स लगे हुए। निप्पल पहले से ही सूजे और लाल थे। रोहन ने बिना कुछ कहे उसके बाल पकड़े और घसीटकर बेडरूम ले गया।

उसने कव्या को चारपोई के लोहे के पाये से रस्सियों से बाँध दिया—हाथ ऊपर, टाँगें जितनी फैल सकती थीं उतनी फैला दीं। फिर बेल्ट निकाली। पहली चोट उसकी जाँघ पर पड़ी। कव्या की चीख दबी हुई निकली क्योंकि रोहन ने पहले ही उसके मुँह में कपड़ा ठूँस रखा था। दूसरी चोट गांड पर, तीसरी स्तनों के नीचे। बेल्ट की धारियाँ तुरंत फूल गईं। रोहन ने बीच-बीच में रुककर उसकी चूत में तीन उंगलियाँ ठूँस दीं और तेजी से मथने लगा। कव्या का शरीर ऐंठ रहा था, पानी फर्श पर टपक रहा था।

फिर मोमबत्ती आई। गरम मोम उसके निप्पलों पर, क्लिट पर, गांड के छेद पर टपकाया गया। कव्या की आँखें फटी हुई थीं, आँसू बह रहे थे, लेकिन वो सिर नहीं हिला रही थी। रोहन ने मोम ठंडा होने के बाद क्लिप्स और कस दिए। निप्पल काले पड़ने लगे। फिर उसने अपना 8.5 इंच का लंड निकाला और सीधे उसके गले में ठोक दिया। कव्या की साँस रुक गई। रोहन ने सिर पकड़कर पूरा अंदर दबाया, दस सेकंड तक रोके रखा, फिर निकाला। कव्या ने खांसते हुए लार और माल थूका तो रोहन ने फिर से ठूँस दिया। इस बार जब झड़ा तो पूरा गला भर दिया।

उसके बाद असली सजा शुरू हुई। रोहन ने कव्या को घोड़ी की पोजीशन में बाँधा—हाथ पीछे, गर्दन में चेन, चेन को छत के हुक से बाँध दिया ताकि वो सिर ऊपर नहीं कर सके। फिर पीछे से उसकी गांड में बिना किसी तैयारी के पूरा लंड घुसेड़ दिया। कव्या की चीख इस बार कपड़े के बावजूद गूँजी। खून निकला। रोहन रुका नहीं। उसने दोनों हाथों से उसके कूल्हे जकड़े और पूरी ताकत से पेलने लगा। हर धक्के पर कव्या का शरीर आगे झटकता, चेन खनकती। रोहन ने एक हाथ से उसके बाल पकड़े और दूसरे से बेल्ट उसकी पीठ पर मारता रहा।

आधे घंटे बाद जब कव्या की गांड पूरी तरह सूज गई और खून मिला पानी बहने लगा, तब रोहन ने लंड निकाला और चूत में डाल दिया। अब दोनों छेद एक साथ इस्तेमाल हो रहे थे—एक में लंड, दूसरे में मोटी मोमबत्ती। कव्या लगातार झड़ रही थी, शरीर काँप रहा था, लेकिन रोहन ने उसे आराम नहीं दिया। जब वो बेहोशी की हालत में पहुँची तो उसने उसके गाल पर जोरदार थप्पड़ मारा और फिर से पेलना शुरू किया।

रात भर यही सिलसिला चला। कभी मुँह में, कभी चूत में, कभी गांड में। कभी क्लिप्स और कस दिए जाते, कभी बेल्ट की नई धारियाँ पड़तीं। सुबह चार बजे जब रोहन आखिरी बार उसके मुँह में झड़ा तो कव्या का शरीर बुरी तरह काँप रहा था। आँखें आधी खुली थीं, होंठ सूजे हुए, पूरे शरीर पर नीले-लाल निशान।

रोहन ने रस्सियाँ खोलीं। कव्या फर्श पर गिर गई। रोहन ने उसका मुँह उठाया और कहा, “अब से हर रात आना। अगर एक दिन भी नहीं आई तो अगली सजा इससे दस गुना बुरी होगी।”
कव्या ने फुसफुसाते हुए जवाब दिया, “आऊँगी… और बुरा करना… मुझे पूरी तरह तोड़ दो।”
रोहन ने उसके बाल सहलाए, फिर जोर से खींचे। “तू अब सिर्फ एक चीज है—मेरी निजी रांड। जब चाहूँगा इस्तेमाल करूँगा, जितना चाहूँगा तोड़ूँगा। तेरी मर्जी की कोई कीमत नहीं।”

कव्या की आँखों में आँसू थे, लेकिन होंठ मुस्कुरा रहे थे। उसने रोहन के लंड को चूमा और धीरे से कहा, “जैसी आपकी मर्जी… मैं आपकी संपत्ति हूँ।”
उस रात के बाद कव्या की जिंदगी सिर्फ रोहन के फ्लैट और उसके क्रूर खेलों के इर्द-गिर्द सिमट गई। हर मुलाकात पिछले से ज्यादा बेरहम होती। कभी वो उसे घंटों अंधेरे में बाँधकर छोड़ देता, कभी उसके शरीर पर सिगरेट के जलाने के निशान बनाता, कभी सार्वजनिक जगहों पर छिपकर इस्तेमाल करता। कव्या अब खुद नए तरीके लेकर आने लगी थी—नई चेन, नए क्लिप्स, नई रस्सियाँ। उसकी प्यास अब दर्द की आदि हो चुकी थी।
और रोहन हर बार उससे एक ही वादा करता—अगली बार और बुरा होगा।

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