फरीदाबाद के ऑफिस में नई अनन्या को सीनियर विक्रम ने घर बुलाया। नशे के बाद बंधी कलाईयाँ, फटी चूत, रोते हुए अंग और बार-बार टूटती सीमाएँ। दर्द में डूबी वह हर बार और गहराई तक गिरती गई।
दोस्तों, मेरा नाम विक्रम सिंह है। मैं गुरुग्राम से हूँ। इस वक्त मेरी उम्र 34 साल है। शरीर से मजबूत हूँ, कंधे चौड़े, सीना मोटा और लंड का साइज भी औसतन से काफी बड़ा – करीब 8 इंच लंबा और मोटा। देखने में आकर्षक हूँ, दाढ़ी हल्की रखता हूँ और ऑफिस में हमेशा फॉर्मल ड्रेस में रहता हूँ।
ये कहानी आज से करीब 8 महीने पहले की है। मैं उस वक्त एक बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी के प्रोडक्ट डिज़ाइन डिपार्टमेंट में सीनियर इंजीनियर था। कंपनी फरीदाबाद में थी। एक सोमवार की सुबह मेरे सेक्शन में एक नई लड़की जॉइन करने आई। नाम था अनन्या वर्मा। उम्र 24 साल। लखनऊ से आई थी और फरीदाबाद के एक पीजी में रहती थी। पीजी में लड़कियों के अलावा कोई मर्द अंदर नहीं जा सकता था, लेकिन बाहर आने-जाने की आजादी पूरी थी।
अनन्या पहली नजर में ही मेरी साँसों को रोक देने वाली थी। गोरी नहीं, गेहुँआ रंग की, लेकिन चमकदार त्वचा। बाल कमर तक लंबे काले। आँखें बड़ी और काली। होंठ मोटे। बदन पतला नहीं, बल्कि भरा-भरा। चूचियाँ मध्यम साइज की लेकिन गोल और सख्त दिखती थीं। कमर पतली, कूल्हे चौड़े और जाँघें मोटी-मोटी। उस दिन उसने काली टाइट जींस और सफेद फॉर्मल शर्ट पहनी थी। शर्ट के बटन इतने टाइट थे कि चूचियों का उभार साफ नजर आ रहा था। गांड गोल और उठी हुई। मैं उसे देखते ही लंड हिल गया।
मैंने उससे पूछा, “आपका नाम?”
वह थोड़ी नर्वस हुई, “अनन्या वर्मा।”
“मेरा नाम विक्रम सिंह। आज से यहीं काम करोगी?”
“हाँ सर, डिज़ाइन सेक्शन में।”
बॉस आ गया। उसने अनन्या से कहा, “ये मिस्टर विक्रम हैं। आज से तुम इनके अंडर में काम करोगी। रिपोर्टिंग इनको ही होगी। ये बहुत अनुभवी हैं।” बॉस मुझसे बोला, “विक्रम, इन्हें सारा काम समझा देना। हेल्प करना।” और चला गया।
मैं अनन्या को देखता रह गया। मन में ख्याल आया – साली की ये जाँघें और ये गांड… एक बार पकड़ूँ तो छोड़ूँ नहीं। उसके बाद पूरा दिन मैं उसे ताड़ता रहा। वह जब भी मेरे पास काम पूछने आती, मेरी नजरें उसके बदन पर घूम जातीं। कभी चूचियों पर, कभी जाँघों पर, कभी गांड पर। वह महसूस कर रही थी। कभी-कभी तिरछी नजर से देख लेती, लेकिन कुछ नहीं बोलती।
अगले 15 दिन ऐसे ही बीते। हम दोनों करीब आ गए। वह मुझे सब बताने लगी – परिवार लखनऊ में, यहाँ पीजी में आजादी, पार्टनर नहीं है, सेक्स का अनुभव भी नहीं। एक दिन काम बताते हुए मेरा हाथ उसकी जाँघ पर लग गया। मुलायम और गरम। मेरा लंड तुरंत खड़ा हो गया। मैंने कंट्रोल किया। फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ा। कभी हाथ से जाँघ छूना, कभी बाजू से चूची को हल्का सा स्पर्श। वह कुछ नहीं बोलती थी। सिर्फ साँसें तेज हो जातीं।
एक शनिवार को काम के दौरान मैंने जानबूझकर अपना हाथ उसकी जाँघ पर रखकर धीरे से दबाने लगा। वह घबरा गई, हाथ हटाया और बाहर चली गई। मैंने सोचा अब बिगड़ गया। आधे घंटे बाद वह वापस आई। मैंने माफी मांगी। वह बोली, “एक शर्त पर माफ करूँगी। आज शाम अपने फ्लैट पर डिनर पर बुलाओ। मैं खुद बनाऊँगी।”
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मैंने तुरंत हाँ कर दी। शाम 8 बजे हम मेरे फ्लैट पहुँचे। मैंने पहले से ही शराब का इंतजाम कर रखा था – व्हिस्की की दो बोतलें और बीयर। अनन्या खाना बनाने लगी। मैंने व्हिस्की खोली। उसने भी गिलास मांगा। तीन-तीन पेग हो गए तो उसका नशा चढ़ने लगा। आँखें लाल, होंठ गीले, साँसें भारी। उसने स्कर्ट और डीप नेक टॉप पहना था। स्कर्ट जाँघ के बीच तक। टॉप से चूचियाँ लगभग आधी बाहर।
मैंने अपना हाथ उसकी जाँघ पर रखा। वह नहीं हटी। हाथ ऊपर सरकाया। स्कर्ट के अंदर। जाँघ की नरम मांस को मसलने लगा। दूसरा हाथ उसकी चूची पर। टॉप के ऊपर से ही जोर से दबाया। वह कराह उठी, “अह्ह… धीरे…” लेकिन हाथ नहीं हटाया। मैंने टॉप ऊपर किया। ब्रा खोल दी। चूचियाँ बाहर निकल आईं – गोल, सख्त, निप्पल काले और कड़े। मैंने एक चूची मुँह में ले ली और जोर से चूसने लगा। दाँत से निप्पल काटा। वह चिल्लाई, लेकिन मेरे सर को और जोर से अपनी छाती पर दबाने लगी।
मैंने स्कर्ट और पैंटी एक साथ खींचकर उतार दी। वह पूरी नंगी हो गई। चूत पर बाल कम थे, गुलाबी और बंद। मैंने उंगली अंदर डाली। बहुत टाइट। कुंवारी। खून की एक बूँद भी नहीं निकली थी अभी तक। मैंने कहा, “तुम्हारी चूत तो बिलकुल नई है।” वह बोली, “हाँ… पहली बार… प्लीज प्यार से…”
मैंने कहा, “प्यार से नहीं। आज तुम्हें दर्द सहना पड़ेगा।” मैंने उसे बेड पर धक्का दिया। हाथ ऊपर करके तकिए से बाँध दिए। पैर फैलाए। लंड निकालकर उसके मुँह के सामने ले गया। “चूसो।” वह झिझकी। मैंने बाल पकड़कर मुँह में ठूंस दिया। वह गैग करने लगी, आँखों से आँसू निकले, लेकिन मैंने और गहरा धकेला। गला तक। फिर निकाला और चूत पर लगाया।
तेल नहीं लगाया। सूखा ही। एक जोरदार धक्का मारा। सुपारा अंदर घुस गया। वह चीखी। दूसरा धक्का – आधा लंड। खून निकलने लगा। तीसरा धक्का – पूरा 8 इंच अंदर। उसकी चूत फट गई। खून बेड शीट पर फैल गया। वह रोने लगी, “निकालो… दर्द हो रहा है… बहुत दर्द…” मैंने मुँह पर हाथ रख दिया। “चुप। सहो।” फिर बिना रुके धक्के मारने लगा। तेज, गहरे, बेरहम। हर धक्के पर उसकी चीख दब जाती। चूत से खून और रस मिलाकर गीली हो गई थी। मैंने उसके गले पर हाथ रखा और हल्का दबाया। साँसें रुकने लगीं तो छोड़ दिया। फिर दोबारा दबाया।
15 मिनट तक मैंने उसे ऐसे ही कुचला। वह झड़ गई। शरीर कांप रहा था। मैंने लंड बाहर निकाला। खून लगा हुआ। फिर से मुँह में ठूंस दिया। “चाटो अपना खून।” वह रोते-रोते चाटने लगी। मैंने फिर चूत में डाल दिया। इस बार और जोर से। पोजिशन बदली – उसे घोड़ी बना दिया। बाल पकड़कर पीछे खींचा और गांड पर जोर-जोर से थप्पड़ मारे। लाल हो गई। फिर चूत में धक्के। एक हाथ से चूची मसलता, दूसरे से गांड पर थप्पड़। वह चिल्ला रही थी, “और जोर से… चोदो… फाड़ दो…”
मैंने करीब 40 मिनट तक बिना रुके चोदा। वह तीन बार झड़ चुकी थी। तब जाकर मैंने अपना पानी उसकी चूत के अंदर छोड़ दिया। गरम गाढ़ा वीर्य। वह ढेर हो गई। मैंने बाँध खोला। वह रो रही थी, लेकिन आँखों में वासना बाकी थी। मैंने पानी पिलाया। फिर दोबारा शुरू किया।
दूसरी बार मैंने उसकी गांड ली। तेल लगाया इस बार। उंगली से फैलाया। फिर लंड लगाया। धीरे-धीरे अंदर किया। वह चीखी। पूरा घुसते ही वह कांपने लगी। मैंने बाल पकड़कर जोर से पेलना शुरू किया। गांड की दीवारें टाइट थीं। हर धक्के पर थप्पड़। कभी गला दबाता, कभी निप्पल काटता। वह बोल रही थी, “मारो… और मारो… मेरी गांड फाड़ दो…” मैंने 25 मिनट तक गांड चोदी। आखिर में वीर्य गांड के अंदर छोड़ दिया।
रात भर मैंने उसे चार बार लिया। दो बार चूत, दो बार गांड। बीच-बीच में मुँह में। कभी उसे घुटनों के बल बैठाकर लंड चूसवाया, कभी उसके मुँह पर बैठकर चूत चाटी और फिर से पेल दिया। उसने कई बार कहा कि अब और नहीं होगा, लेकिन मैंने नहीं माना। दर्द के बावजूद वह हर बार गीली हो जाती थी। सुबह तक उसकी चूत और गांड दोनों सूज चुकी थीं, लाल और खून के निशान।
सुबह मैंने उसे नहलाया। खुद हाथ से साबुन लगाया। चूचियाँ, चूत, गांड सब। फिर नाश्ता खिलाया। वह पूरे दिन सोती रही। शाम को जब उठी तो बोली, “तुम बहुत क्रूर हो… लेकिन… मुझे मजा भी आया।” रात को फिर शराब पी। इस बार उसने खुद लंड निकाला और मुँह में लिया। फिर खुद चूत पर बैठी और ऊपर-नीचे होने लगी। मैंने उसे पलटा और फिर से बेरहमी से पेलना शुरू किया। इस बार रस्सी से हाथ-पैर बाँधे। आँखों पर पट्टी। मुँह में कपड़ा। सिर्फ धक्के और थप्पड़ और चुभन। वह बार-बार झड़ रही थी।
अगले हफ्ते से ऑफिस में भी खेल शुरू हो गया। लंच के समय स्टोर रूम में ले जाता। मुँह में ठूंसता, चूत में उंगली करता, कभी खड़ा करके पीछे से पेल देता। वह कभी मना नहीं करती। बल्कि खुद मौका ढूंढती। एक दिन मैंने उसे ऑफिस के बाथरूम में ले जाकर दीवार से लगाकर चोदा। हाथ उसके मुँह पर, ताकि आवाज बाहर न जाए। खून फिर निकला क्योंकि मैंने सूखा ही डाला था।
अब अनन्या पूरी तरह मेरी हो चुकी थी। हर हफ्ते कम से कम तीन रात मेरे फ्लैट पर गुजारती। हर बार नया तरीका। कभी चेन से बाँधना, कभी मोमबत्ती का मोम चूचियों पर गिराना, कभी बेल्ट से गांड पर मारना जब तक लाल न हो जाए। वह रोती, गालियाँ देती, लेकिन अंत में खुद leg फैलाकर मांगती, “और अंदर… और जोर से… मुझे तोड़ दो।”
एक रात मैंने उसे पूरा नंगा करके फर्श पर लिटाया। पैर कंधों तक मोड़े। लंड चूत में डालकर इतनी तेजी से पेलने लगा कि बेड नहीं, फर्श पर ही उसके शरीर के निशान पड़ गए। वह चीख-चीखकर रोई। आँसू बह रहे थे। लेकिन जब मैंने वीर्य अंदर छोड़ा तो वह कांपते हुए बोली, “फिर से… गांड में भी डालो।” मैंने डाला। इस बार बिना तेल के। वह पागलों की तरह चिल्लाई। खून निकला। लेकिन झड़ भी गई।
महीनों बीत गए। अनन्या अब कुंवारी नहीं रही थी। उसकी चूत और गांड दोनों मेरे लंड की आदी हो चुकी थीं। लेकिन मैंने कभी नरमी नहीं दिखाई। हर बार दर्द, हर बार जोर, हर बार नियंत्रण। वह ऑफिस में मेरे सामने बैठती तो जाँघें भींच लेती क्योंकि रात की याद से गीली हो जाती। कभी-कभी मैं डेस्क के नीचे उसका हाथ पकड़कर लंड पर रख देता। वह चुपचाप हिलाती रहती।
आज भी जब कभी वह मेरे फ्लैट आती है तो दरवाजा बंद होते ही कपड़े उतार देती है और घुटनों के बल बैठ जाती है। मुँह खोलती है। मैं बाल पकड़कर गले तक ठूंसता हूँ। फिर बेड पर फेंकता हूँ। बाँधता हूँ। और फिर शुरू होता है वह खेल जो दर्द और मजे का मिश्रण है। चूत फाड़ना, गांड फाड़ना, चूचियाँ मसलना, गला दबाना, थप्पड़ मारना – सब कुछ।
दोस्तों, जहाँ कहानी छूटी थी वहीं से आगे बढ़ाता हूँ। अनन्या अब पूरी तरह मेरी संपत्ति बन चुकी थी। शरीर, मन, यहाँ तक कि उसकी साँसें भी मेरे इशारे पर चलती थीं। ऑफिस में वह मेरे सामने बैठती तो जाँघें भींचकर बैठी रहती क्योंकि रात की याद से उसकी चूत खुद-ब-खुद गीली हो जाती। कभी-कभी मैं डेस्क के नीचे उसका हाथ पकड़कर अपने लंड पर रख देता। वह बिना एक शब्द कहे हिलाती रहती, आँखें नीचे झुकाए, होंठ काटे हुए।
एक शुक्रवार की शाम को ऑफिस खत्म होने के बाद मैंने उसे अपने केबिन में बुलाया। दरवाजा लॉक कर दिया। अनन्या खड़ी थी, साँसें तेज। मैंने कहा, “कपड़े उतारो। सब।” उसने झट से शर्ट, ब्रा, जींस, पैंटी सब उतार दिए। नंगी खड़ी हो गई। मैंने अपनी बेल्ट निकाली। “दीवार से लग जा। हाथ ऊपर।” वह लग गई। मैंने बेल्ट से उसकी गांड पर पहला जोरदार थप्पड़ मारा। आवाज गूंजी। लाल निशान पड़ गया।
दूसरा, तीसरा, चौथा – लगातार। वह दांत भींचकर सह रही थी, लेकिन आँसू निकल आए। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और कान में बोला, “ गिनती कर। हर थप्पड़ की।” वह गिनने लगी – “एक… दो… तीन…” जब बीस हो गए तो उसकी गांड जल रही थी, सूज चुकी थी। मैंने उंगली उसकी चूत में डाली। पूरी तरह भीगी हुई। “साली, मार खाने से ही गीली हो जाती है तू।”
मैंने उसे घुटनों के बल बैठाया। अपना लंड निकालकर मुँह में ठूंस दिया। बाल पकड़कर गले तक धकेला। वह गैग करने लगी, लार टपकने लगी, आँखों से पानी। मैंने और जोर लगाया। नाक बंद करके साँस रोक दी। जब वह बेचैन होकर हाथ-पैर मारने लगी तब छोड़ा। लंड बाहर निकाला, थूक और लार से सना। फिर से ठूंस दिया। इस बार दस मिनट तक लगातार। उसका गला लाल हो गया, आवाज बैठ गई। मैंने कहा, “अब से ऑफिस में भी जब बोलूँगी तो मुँह खोलकर तैयार रहना।”
रात को फ्लैट पर ले गया। इस बार तैयारी अलग थी। मैंने पहले से रस्सियाँ, अंधे पट्टी, मोमबत्ती और एक छोटी सी चमड़े की चाबुक रखी हुई थी। अनन्या ने देखते ही आँखें फाड़ लीं लेकिन कुछ नहीं बोली। मैंने उसे नंगा किया। हाथ पीछे बाँधे। आँखों पर पट्टी बाँधी। मुँह में कपड़ा ठूंसकर गग किया। फिर बेड पर पेट के बल लिटाया। पैर फैलाकर टखनों से बाँध दिए। अब वह बिलकुल बेबस थी। मैंने मोमबत्ती जलाई।
पहली बूँद उसकी पीठ पर गिरी। वह तड़प उठी। दूसरी चूची पर, तीसरी निप्पल पर। मोम जम गया। मैंने चाबुक उठाया। गांड पर पहली मार। आवाज तेज। वह चीखना चाहती थी लेकिन गग की वजह से सिर्फ गुर्राहट निकली। दस मार लगातार। गांड लाल हो गई, कुछ जगहों पर हल्के घाव। मैंने उंगली घाव पर फेरते हुए बोला, “दर्द हो रहा है ना? अच्छा लग रहा है।”
फिर मैंने उसका मुँह का गग हटाया। “बोल, क्या चाहिए?” वह रोते हुए बोली, “लंड… चूत में डालो… प्लीज…” मैंने नहीं डाला। बल्कि चाबुक से उसकी चूत पर हल्के-हल्के मारने लगा। वह पागलों की तरह तड़पने लगी। “और… जोर से… फाड़ दो…” तब जाकर मैंने लंड निकाला और एक झटके में चूत में पूरा घुसा दिया। कोई तैयारी नहीं, कोई तेल नहीं। खून की एक लकीर निकली। मैंने बाल पकड़कर पीछे खींचा और ऐसी रफ्तार से पेलने लगा जैसे कोई मशीन हो। हर धक्के पर उसकी चूत की आवाज आ रही थी – थप-थप-थप। मैंने गला दबाया।
साँसें उखड़ने लगीं तो छोड़ा, फिर दबाया। वह झड़ गई लेकिन मैं रुका नहीं। दूसरा ऑर्गैज्म, तीसरा। उसकी टाँगें कांप रही थीं, शरीर पसीने से तर। मैंने लंड बाहर निकाला और गांड में डाल दिया। सूखा। वह चीखी। “आह्ह… फट गई… निकालो…” मैंने और जोर लगाया। पूरा अंदर। फिर बिना रुके बीस मिनट तक गांड चोदी। बीच-बीच में चाबुक से पीठ और जाँघों पर मारता रहा। आखिर में वीर्य गांड के अंदर छोड़ दिया। इतना कि बाहर निकलकर जाँघों तक बह गया।
पट्टी और रस्सियाँ खोलीं तो वह कांप रही थी। आँसू, लार, खून, वीर्य – सब मिला हुआ। मैंने पानी पिलाया। फिर कहा, “अब मेरे लंड को साफ कर।” वह घुटनों के बल बैठकर लंड चाटने लगी – चूत का रस, गांड का मैल, खून, वीर्य सब। मैंने उसके बाल पकड़कर फिर से मुँह में ठूंस दिया और गले तक हिलाया। दूसरा राउंड शुरू हो गया।
इस बार मैंने उसे कुर्सी पर बैठाया। हाथ पीछे बाँधे। पैर कुर्सी के पायों से बाँधे। चूत पूरी तरह खुली। मैंने दो उंगलियाँ अंदर डालीं और तेजी से हिलाने लगा। वह चिल्लाने लगी। तीन उंगलियाँ। फिर चार। मेरी मुट्ठी लगभग अंदर जाने को थी। वह रो रही थी, “बस… फट जाएगी…” लेकिन मैंने नहीं सुना। उंगलियों से उसकी चूत को फैलाते हुए लंड डाल दिया। अब चूत और भी ढीली लग रही थी लेकिन मैंने और जोर लगाया।
एक हाथ से निप्पल मोड़ता, दूसरे से गला दबाता। वह लगातार झड़ रही थी। एक के बाद एक। शरीर में ऐंठन होने लगी। मैंने तब जाकर अपना पानी उसकी चूत के अंदर छोड़ दिया। इतना गहरा कि वह महसूस कर रही थी।
सुबह चार बजे तक मैंने उसे छह बार लिया। चूत, गांड, मुँह – तीनों छेद। कभी फर्श पर घसीटा, कभी दीवार से लगाकर उठा-उठाकर पेल, कभी बेड के किनारे सिर नीचे लटकाकर। उसकी चूत और गांड दोनों सूजकर लाल हो चुके थे। चलने में दर्द हो रहा था। फिर भी जब मैंने सुबह कहा, “आज रविवार है। पूरे दिन यहीं रहोगी।” तो उसने सिर हिलाया।
दोपहर में मैंने नया खेल खेला। उसे नंगा करके बालकनी में खड़ा किया। नीचे सड़क पर लोग जा रहे थे। मैंने पीछे से लंड चूत में डाल दिया और धीरे-धीरे पेलने लगा। एक हाथ से मुँह बंद किए रखा। “अगर चिल्लाई तो सब देख लेंगे।” वह कांप रही थी। डर और उत्तेजना दोनों। मैंने दस मिनट तक वहीं चोदा। फिर अंदर ही वीर्य छोड़ दिया। वह बालकनी की रेलिंग पकड़कर खड़ी रही, टाँगें कांपती हुई।
शाम को मैंने उसे बाथरूम में ले जाकर शॉवर के नीचे खड़ा किया। ठंडा पानी। फिर गरम। बीच-बीच में चाबुक से मारता रहा। पानी और खून मिलकर फर्श पर बह रहा था। फिर शॉवर बंद किया और वहीं फर्श पर लिटाकर गांड में फिर से घुस गया। इस बार मैंने उसका सिर शौचालय की तरफ दबाया। “चाट।” वह हिचकिचाई। मैंने बाल पकड़कर जोर से दबाया। उसने चाटा। मैंने पीछे से और जोर से पेलना शुरू किया। हर धक्के पर उसका चेहरा और नीचे जा रहा था। अंत में मैंने वीर्य उसकी पीठ पर छोड़ दिया और कहा, “अब इसे चाट के साफ कर।” वह मुड़ी और जीभ से अपनी पीठ चाटने लगी।
रात को सोने से पहले मैंने उसे एक बार और बाँधा। इस बार हाथ-पैर चारों दिशाओं में फैलाकर। आँखें खुलीं रखीं। मैंने मोमबत्ती की मोम उसकी चूत के ऊपर गिराया। वह तड़प उठी। फिर लंड डालकर धीरे-धीरे हिलाने लगा। बीच-बीच में मोम गिराता रहा। निप्पल पर, पेट पर, चूत के ऊपर। वह रो रही थी लेकिन ऑर्गैज्म भी आ रहा था। मैंने आखिरी बार उसकी चूत में इतनी गहराई तक पेल कि वह चीखते हुए बेहोश सी हो गई। वीर्य छोड़कर मैं उसके ऊपर गिर गया।
सुबह जब वह जागी तो शरीर पर जगह-जगह लाल-नीले निशान थे। गांड पर चाबुक के निशान, कलाई और टखनों पर रस्सी के निशान, गर्दन पर अंगुलियों के निशान, चूचियों पर दाँतों के निशान। वह आईने में खुद को देखती रही। फिर मुझसे बोली, “अगली बार… और बुरा करना। जितना बुरा कर सकते हो।”
मैंने उसके बाल सहलाते हुए कहा, “अगली बार तुझे इतना तोड़ूँगा कि तू हफ्ते भर चल न सके। ऑफिस में भी कुर्सी पर बैठते समय दर्द हो। हर कोई पूछेगा क्या हुआ, और तू कुछ नहीं बता पाएगी।” वह मेरी छाती से चिपक गई। उसकी चूत अभी भी गीली थी। मैंने उंगली अंदर डाली तो वह हल्के से कराह उठी। “और अंदर…”
अब हमारी जिंदगी ऐसी ही चलने लगी। ऑफिस में जोखिम भरे खेल, घर पर बेरोकटोक क्रूरता। कभी मैं उसे दोस्तों के सामने ले जाकर छुपकर छूता, कभी कार में हाईवे पर ले जाकर पीछे की सीट पर चोदता। एक बार मैंने उसे अपने एक पुराने दोस्त के फ्लैट पर ले जाकर वहाँ बाँधा और चोदा जबकि दोस्त दूसरे कमरे में था। अनन्या की आँखों में डर था लेकिन चूत और भी गीली हो गई थी।
हर बार दर्द बढ़ता गया, हर बार सीमाएँ टूटती गईं। और हर बार अनन्या और गहरी गिरती गई मेरी वासना में। वह अब सिर्फ चुदने वाली लड़की नहीं रही थी। वह मेरी टूटी हुई, रौंदी हुई, पूरी तरह से कब्जे में ली हुई चीज बन चुकी थी। और मैं… मैं उसका मालिक। जितना चाहूँ तोड़ने वाला। जितना चाहूँ इस्तेमाल करने वाला।
और ये सिलसिला अभी रुका नहीं है। अगली बार जब वह मेरे फ्लैट का दरवाजा खोलेगी, तो मैं उसे और नीचे ले जाऊँगा। जहाँ दर्द और मजा एक दूसरे में घुलकर कुछ ऐसा बना दें जो सिर्फ हम दोनों समझ सकें।
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