शीशे के सामने अर्जुन ईशिता के निप्पलों में हुक धँसाकर उसके फूलते पेट को चाबुक से फाड़ता है। पानी का दबाव, दोहरी रॉड और खुद की बर्बादी माँगती आवाज़ उसे अपनी हार की गहरी लत में धकेल देती है sex series ।
ट्रेन सुरंग में घुस चुकी थी। काला अँधेरा वैगन को निगल गया। खिड़कियों के बाहर सिर्फ घना अँधेरा दौड़ रहा था। कोई रोशनी नहीं। सिर्फ पटरियों की भारी कराह और ईशिता की दबी हुई साँसें।
पिंजरे के अंदर उसका सिर धातु के छोटे पिंजरे में फँसा हुआ था। गर्दन हिल नहीं सकती थी। आँखें खुली थीं लेकिन कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। योनि के अंदर धातु की गेंदें हर छोटी हलचल पर उसकी दीवारों को कुचल रही थीं। निप्पल क्लैंप अभी भी जकड़े हुए थे। चेन ढीली पड़ चुकी थी लेकिन दर्द बाकी था। अर्जुन का वीर्य उसकी गुदा से सूखकर चिपक गया था। जाँघें चिपक रही थीं।
अचानक लाइट जल गई। तेज़ सफेद रोशनी। ईशिता की पलकें झपक गईं। अर्जुन पिंजरे के सामने खड़ा था। काला कोट उतारे हुए। सिर्फ काली पतलून। उसका शरीर ठंडा और शक्तिशाली लग रहा था। हाथों में एक लंबी काली चमड़े की रस्सी और एक पतली धातु की छड़।
उसने ताला खोला। पिंजरे का दरवाज़ा चरमराया। ईशिता रेंगते हुए बाहर आई। सिर का पिंजरा अभी भी लगा हुआ था। अर्जुन ने उसके बालों को पकड़कर खींचा। वह घुटनों के बल खड़ी हो गई।
“सुरंग लंबी है। कोई आवाज़ बाहर नहीं जाएगी। आज तुम्हारा दिमाग भी मेरा होगा।”
उसने सिर का पिंजरा खोला। ईशिता की गर्दन आज़ाद हुई लेकिन दर्द से जकड़ी रही। अर्जुन ने उसे खींचकर वैगन के बीच ले गया। वहाँ एक नया फ्रेम खड़ा था—लोहे का, उलटा टी आकार। उसने ईशिता के हाथ ऊपर बाँध दिए। पैर फैलाकर एड़ियों को फर्श से ऊपर लटका दिया। पूरा शरीर हवा में तन गया। पेट नीचे। कमर ऊपर। योनि और गुदा पूरी तरह खुली।
अर्जुन ने धातु की गेंदें निकालीं। एक-एक करके। हर गेंद निकलते समय ईशिता की योनि सिकुड़ी। खून की पतली लकीर बह निकली। अर्जुन ने उंगलियों से उसके अंदर घुसकर साफ किया। फिर धातु की छड़ ली। छड़ के सिरे पर छोटे काँटे थे। उसने छड़ को योनि के मुहाने पर रखा और धीरे-धीरे अंदर धकेला। काँटे दीवारों को चीरते गए। ईशिता की चीख फूट पड़ी। अर्जुन रुका नहीं। छड़ पूरी अंदर चली गई। फिर उसने स्विच दबाया। छड़ कंपन करने लगी—तेज़, तेज़, और तेज़।
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“अब तुम गिनोगी। हर बार जब दर्द बढ़ेगा तो बोलोगी ‘मालिक का धन्यवाद’।”
उसने चाबुक उठाया। पहली मार जाँघ के अंदरूनी हिस्से पर पड़ी। चमड़ी फटी। दूसरी मार। तीसरी। चौथी। पाँचवीं। जाँघें लाल हो गईं। खून की धारियाँ बहने लगीं। ईशिता ने दाँत भींचे। अर्जुन ने चाबुक को योनि पर लाया। कंपन करती छड़ के ठीक ऊपर एक जोरदार मार। ईशिता चिल्लाई।
“बोल।”
“मालिक… का… धन्यवाद…”
अर्जुन ने और मारा। बार-बार। योनि के मुलायम मांस पर। हर मार के साथ छड़ और गहरा धँसती। ईशिता का शरीर हिल रहा था। आँसू फर्श पर गिर रहे थे। अर्जुन ने चाबुक फेंका और अपने लिंग को बाहर निकाला। सख्त। मोटा। उसने ईशिता के मुँह के सामने लाया।
“खोल। और इस बार दाँत नहीं लगेंगे।”
ईशिता ने होंठ खोले। अर्जुन ने पूरा अंदर ठूँस दिया। गला। एक झटके में। उसने उसके सिर को दोनों हाथों से पकड़कर जोर-जोर से धकेला। गला भर गया। साँस रुक गई। लार बहने लगी। अर्जुन ने तीस तक गिना। फिर निकाला। ईशिता खाँस रही थी। उसने फिर ठूँसा। और गहरा। इस बार उसने उसके गले को बाहर से दबाया। साँस पूरी तरह बंद। ईशिता का शरीर काँपने लगा। चेहरा लाल हो गया। अर्जुन ने दस सेकंड और रोके रखा। फिर निकाला।
“अब तुम समझ रही हो। तुम्हारी साँस भी मेरी है।”
उसने ईशिता को घुमाया। पीछे की तरफ। छड़ अभी भी योनि में कंपन कर रही थी। अर्जुन ने अपनी उंगलियों से उसकी गुदा खोली। थूक लगाकर। फिर बिना रुके पूरा लिंग अंदर धकेल दिया। एक ही झटके में। ईशिता की चीख दब गई। अर्जुन ने उसके कूल्हों को जकड़ लिया और जोर-जोर से धकेलना शुरू किया। हर धक्का छड़ को और अंदर धकेलता। हर धक्का उसके शरीर को आगे धकेलता। फ्रेम चरमरा रहा था।
“देखो कैसे तुम्हारी गुदा मुझे निगल रही है। देखो कैसे तुम्हारा शरीर खुद खुल रहा है।”
उसने एक हाथ आगे बढ़ाकर उसके गले को फिर दबाया। साँस रुक गई। धक्के जारी रहे। ईशिता की आँखें उलटी जा रही थीं। दर्द और घुटन एक हो गए थे। अर्जुन ने अचानक साँस छोड़ दी। ईशिता ने जोर से साँस ली। फिर उसने फिर दबाया। इस बार लंबा। ईशिता का शरीर काँप उठा। एक जबरदस्ती का ऑर्गैज्म उसके अंदर फूट पड़ा। योनि सिकुड़ी। गुदा सिकुड़ी। अर्जुन मुस्कुराया नहीं। उसने और तेज़ धकेला।
“यह तुम्हारी मर्जी नहीं। यह मैंने तुम्हें दिया। अब तुम बिना इसके अधूरी हो।”
वह बाहर निकला। वीर्य अभी नहीं गिरा था। उसने छड़ निकाली। योनि से खून और पानी बह रहा था। अर्जुन ने एक मोटी काली मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम ईशिता की पीठ पर गिरा। फिर कमर पर। फिर जाँघों पर। हर बूँद पर शरीर काँपा। अर्जुन ने मोम को योनि के ठीक ऊपर गिराया। फिर गुदा पर। मोम ठंडा होकर सख्त हो गया। उसने उंगली से छीलकर हटाया और फिर से गिराया।
फिर उसने ईशिता के बालों को पकड़कर सिर पीछे खींचा।
कान में फुसफुसाया—
“आज से एक नया नियम। जब भी मैं तुम्हें छूऊँगा तो तुम खुद मांगोगी कि और तोड़ो। बोलो।”
ईशिता की आवाज़ काँप रही थी। “मालिक… और तोड़ो…”
अर्जुन ने उसके मुँह में लिंग ठूँस दिया। फिर निकाला। फिर योनि में घुसा। पूरा। एक झटके में। छड़ की जगह अब उसका लिंग था। वह धकेलता रहा। जोर से। निर्दयी। हर धक्के के साथ ईशिता का शरीर हिल रहा था। अर्जुन ने उसके निप्पल क्लैंप को पकड़कर खींचा। स्तन खिंच गए। दर्द तेज़ हो गया। उसने क्लैंप को और कस दिया। फिर एक हाथ से उसके गले को दबाया। साँस रुक गई। धक्के जारी। ईशिता का शरीर काँप उठा। दूसरा ऑर्गैज्म। जबरदस्ती। अर्जुन रुका नहीं।
वह बाहर निकला। गुदा में घुसा। फिर योनि में। बारी-बारी। दोनों छेद अब ढीले और लाल थे। खून और लार और पानी मिलकर फर्श पर गिर रहे थे। अर्जुन ने आखिरकार ईशिता के मुँह में लिंग ठूँस दिया और फट पड़ा। गर्म वीर्य उसके गले में भर गया। उसने सिर दबाए रखा। “निगल। सब।”
ईशिता ने निगला। गला जल रहा था। अर्जुन ने लिंग निकाला। वीर्य उसके होठों और ठुड्डी पर चमक रहा था। उसने ईशिता को फ्रेम से खोला। शरीर ढेर की तरह गिर पड़ा। अर्जुन ने उसे बालों से खींचकर पिंजरे की तरफ घसीटा। इस बार पिंजरे के अंदर एक नई चीज़ थी—एक छोटी धातु की सीट। सीट के बीच में एक मोटी खड़ी रॉड लगी थी। अर्जुन ने ईशिता को सीट पर बैठाया। रॉड उसकी योनि में धँस गई। पूरा। फिर उसने उसके हाथ पीछे बाँध दिए। गर्दन में एक चमड़े का पट्टा कस दिया जो पिंजरे की छत से बँधा था। अब वह हिल नहीं सकती थी। रॉड अंदर धँसी हुई। हर साँस के साथ रॉड उसकी दीवारों को कुचलती।
अर्जुन ने पिंजरे का दरवाज़ा बंद किया। ताला लगाया। फिर फर्श पर बैठ गया। ईशिता की आँखों में देखता रहा।
“सुरंग खत्म होने वाली है। लेकिन तुम्हारी सुरंग अभी शुरू हुई है। कल सुबह जब रोशनी आएगी तो मैं तुम्हें एक नया आदेश दूँगा। तुम खुद अपने मुँह से कहोगी कि तुम्हें और कितना नष्ट होना है। क्योंकि अब तुम्हारा शरीर मुझे याद रखने लगा है। दर्द को तरसने लगा है।”
उसने पिंजरे की सलाखों को छुआ।
“सो जा। रॉड अंदर। वीर्य गले में। खून जाँघों पर। और याद रखना—तुम अब सिर्फ मेरी प्रॉपर्टी नहीं। तुम मेरी भूख हो। और भूख कभी नहीं मरती।”
ट्रेन सुरंग से निकल चुकी थी। हल्की सुबह की रोशनी खिड़कियों से घुस रही थी लेकिन वैगन के अंदर अभी भी आधा अँधेरा था। पिंजरे के अंदर ईशिता धातु की सीट पर बैठी थी। मोटी रॉड उसकी योनि में पूरी धँसी हुई। हर छोटी साँस के साथ रॉड उसकी दीवारों को चीर रही थी। गर्दन का पट्टा छत से बँधा हुआ था। सिर ऊपर नहीं उठ सकता था। हाथ पीछे जकड़े हुए। जाँघें काँप रही थीं। खून और सूखा वीर्य उसकी त्वचा पर चमक रहा था।
अर्जुन कुर्सी पर बैठा सिगरेट पी रहा था। उसकी आँखें पिंजरे पर टिकी थीं। कोई जल्दबाजी नहीं। वह बस देख रहा था कि उसकी प्रॉपर्टी कैसे अपने ही वजन से खुद को और चोट पहुँचा रही है।
एक घंटा बीता। फिर दो। ईशिता की जाँघें सुन्न पड़ने लगीं। रॉड अब सिर्फ दर्द नहीं दे रही थी। वह उसके अंदर एक लगातार जलन पैदा कर रही थी जो दिमाग तक पहुँच रही थी। अचानक अर्जुन उठा। चाबी घुमाई। पिंजरे का दरवाज़ा खुला।
उसने गर्दन का पट्टा खोला। ईशिता का सिर आगे झुक गया। अर्जुन ने उसके बालों को मुट्ठी में जकड़ा और खींचकर खड़ा किया। रॉड उसकी योनि से निकलते समय एक गीली आवाज़ हुई। खून की ताज़ी लकीर बह निकली। ईशिता लड़खड़ाई। अर्जुन ने उसे पकड़े रखा।
“आज तुम खुद अपने मुँह से मांगोगी। और सिर्फ मांगोगी नहीं। तुम दिखाओगी कि तुम कितनी टूटी हुई हो।”
उसने ईशिता को वैगन के बीच खींच लिया। वहाँ एक बड़ा शीशा लगा था। फर्श से छत तक। शीशे के सामने एक लोहे का चौकोर फ्रेम। अर्जुन ने ईशिता के हाथ ऊपर बाँध दिए। पैर फैलाए। एड़ियाँ फर्श से दो इंच ऊपर। पूरा शरीर तना हुआ। शीशे में उसकी नंगी, खून से सनी तस्वीर साफ दिख रही थी।
अर्जुन उसके पीछे खड़ा हो गया। उसने एक पतली धातु की चेन निकाली। चेन के दोनों सिरों पर नुकीले हुक थे। उसने एक हुक ईशिता के बाएँ निप्पल में धँसाया। ईशिता चीखी। दूसरा हुक दाएँ निप्पल में। फिर चेन को नीचे खींचकर उसके पेट की बेल्ट से बाँध दिया। हर साँस के साथ निप्पल खिंचते। खून की छोटी बूँदें टपकने लगीं।
“शीशे में देखो। यह तुम हो। मेरी चीज़।”
अर्जुन ने एक लंबा काला चाबुक उठाया। पहली मार उसकी पीठ पर पड़ी। चमड़ी फटी। दूसरी। तीसरी। चौथी। पाँचवीं। पीठ लाल हो गई। खून की धारियाँ कमर तक बहने लगीं। अर्जुन ने चाबुक को जाँघों पर फेरते हुए मारा। अंदरूनी हिस्से पर। बार-बार। ईशिता का शरीर हिल रहा था लेकिन फ्रेम ने उसे जगह नहीं दी।
फिर चाबुक योनि पर आया। एक जोरदार मार। फिर दूसरी। तीसरी। योनि के मुलायम मांस पर सीधी चोट। ईशिता की चीख फूट पड़ी। अर्जुन रुका नहीं। उसने चाबुक को गुदा पर भी मारा। दो बार। तीन बार। खून और दर्द मिल गए।
“अब बोलो। क्या चाहती हो?”
ईशिता की आवाज़ टूटी हुई थी। “मालिक… और तोड़ो…”
अर्जुन ने चाबुक फेंका। उसने अपनी पतलून खोली। लिंग सख्त बाहर निकला। उसने ईशिता के बालों को पकड़कर सिर पीछे खींचा और उसके मुँह में पूरा ठूँस दिया। गला। एक झटके में। उसने सिर को दोनों हाथों से पकड़कर जोर-जोर से धकेला। गला भर गया। साँस रुक गई। लार और आँसू उसके चेहरे पर फैल गए। अर्जुन ने चालीस तक गिना। फिर निकाला। ईशिता खाँस रही थी। वीर्य जैसी गाढ़ी लार उसके मुँह से टपक रही थी।
“फिर से।”
उसने फिर ठूँसा। इस बार और गहरा। गले के पार। ईशिता का शरीर काँपने लगा। चेहरा बैंगनी पड़ने लगा। अर्जुन ने उसके गले को बाहर से दबाया। साँस पूरी तरह बंद। धक्के जारी। बीस सेकंड। तीस सेकंड। ईशिता की आँखें सफेद पड़ गईं। अर्जुन ने निकाला। ईशिता ने जोर से साँस ली। मुँह से लार और पित्त जैसा तरल निकला।
अर्जुन ने उसे शीशे से सटा दिया। छाती शीशे से चिपक गई। ठंडक से निप्पल और खिंच गए। हुक और गहरे धँस गए। अर्जुन ने उसके पैर और फैलाए। फिर एक झटके में उसकी योनि में घुस गया। पूरा। बिना रुके। ईशिता की चीख शीशे से टकराई। अर्जुन ने उसके कूल्हों को जकड़ लिया और जोर-जोर से धकेलना शुरू किया। हर धक्का उसके शरीर को शीशे से टकराता। हर धक्का निप्पल के हुक को खींचता। खून की बूँदें शीशे पर चिपक रही थीं।
“देखो अपने आप को। देखो कैसे तुम्हारा छेद मुझे निगल रहा है। देखो कैसे तुम्हारे निप्पल खुद खून दे रहे हैं।”
उसने एक हाथ से उसके गले को दबाया। साँस रुक गई। धक्के तेज़ हो गए। ईशिता का शरीर काँप उठा। एक जबरदस्ती का ऑर्गैज्म फूट पड़ा। योनि सिकुड़ी। अर्जुन रुका नहीं। उसने और तेज़ धकेला। दूसरा ऑर्गैज्म। तीसरा। ईशिता रो रही थी लेकिन उसका शरीर बार-बार सिकुड़ रहा था।
अर्जुन बाहर निकला। योनि से खून और पानी बह रहा था। उसने तुरंत गुदा में घुस गया। एक झटके में। ईशिता की चीख दब गई। अर्जुन ने दोनों हाथों से उसके कूल्हों को इतना जोर से पकड़ा कि नाखून गड़ गए। धक्के निर्दयी थे। हर धक्का गहरा। हर धक्का उसकी आंतों तक पहुँचता। अर्जुन ने उसके बालों को पकड़कर सिर पीछे खींचा और कान में कहा—
“अब तुम खुद बोलो कि तुम्हें क्या चाहिए।”
ईशिता की आवाज़ काँप रही थी। “मालिक… गुदा तोड़ो… और जोर से… मुझे और नष्ट करो…”
अर्जुन ने और तेज़ किया। शरीर टकरा रहे थे। खून की आवाज़ आ रही थी। अर्जुन ने एक हाथ नीचे ले जाकर उसके क्लिटोरिस को जोर से मसला। दर्द और जबरदस्ती का सुख एक साथ। ईशिता का शरीर काँप उठा। चौथा ऑर्गैज्म। अर्जुन मुस्कुराया नहीं। उसने आखिरी धक्कों में गहराई तक गया और अंदर ही फट पड़ा। गर्म वीर्य उसकी गुदा में भर गया। वह कुछ पल रुका। फिर धीरे-धीरे बाहर निकला। वीर्य टपकने लगा।
उसने ईशिता को फ्रेम से खोला। शरीर ढेर की तरह गिर पड़ा। अर्जुन ने उसे बालों से खींचकर फर्श पर घसीटा। शीशे के ठीक नीचे। उसने एक नई चीज़ निकाली—एक लंबी मोटी रबर की नली जिसके एक सिरे पर फुलाया जा सकने वाला बैग था। उसने नली का सिरा ईशिता की गुदा में धकेल दिया। गहरा। फिर बैग को पानी से भरना शुरू किया। ठंडा पानी। धीरे-धीरे। ईशिता का पेट फूलने लगा। दबाव बढ़ रहा था। अर्जुन ने और भरा। और भरा। जब तक कि ईशिता का पेट तनकर गोल न हो गया।
“अब रोकोगी। एक बूँद भी बाहर नहीं निकलेगी जब तक मैं न कहूँ।”
उसने नली निकाल दी और एक मोटा प्लग उसकी गुदा में ठूँस दिया। प्लग ने पानी को अंदर बंद कर दिया। ईशिता का पेट फूल रहा था। दर्द तेज़ था। अर्जुन ने उसे फिर से फ्रेम पर बाँध दिया। इस बार पेट नीचे नहीं। सीधा। पैर फैलाए। हाथ ऊपर। फूलता हुआ पेट साफ दिख रहा था।
अर्जुन ने चाबुक फिर उठाया। अब मार पेट पर पड़ने लगी। हर मार के साथ पानी अंदर हिलता। दर्द दोहरा हो गया। ईशिता चिल्ला रही थी। अर्जुन ने दस मार लगाईं। बीस। तीस। पेट लाल हो गया। फिर उसने चाबुक योनि पर मारा। बार-बार। खून फिर बहने लगा।
“बोलो। क्या महसूस हो रहा है?”
ईशिता की आवाज़ टूटी हुई थी। “मालिक… पेट फटने वाला है… लेकिन… और चाहिए… और तोड़ो…”
अर्जुन ने प्लग खींच लिया। पानी और वीर्य और खून एक साथ बह निकले। ईशिता का शरीर काँप उठा। अर्जुन ने तुरंत अपना लिंग उसकी योनि में ठूँस दिया। पानी और खून के बीच। वह धकेलता रहा। जोर से। निर्दयी। हर धक्के के साथ ईशिता का शरीर हिल रहा था। अर्जुन ने उसके निप्पल के हुक पकड़कर खींचे। स्तन खिंच गए। खून की धारियाँ बढ़ गईं। उसने गले को दबाया। साँस रुक गई। धक्के जारी। ईशिता का पाँचवाँ ऑर्गैज्म फूट पड़ा। शरीर बेकाबू काँप रहा था।
अर्जुन बाहर निकला। उसने ईशिता के मुँह में लिंग ठूँस दिया और फट पड़ा। वीर्य उसके गले में भर गया। उसने सिर दबाए रखा। “निगल। सब। एक बूँद भी बर्बाद नहीं।”
ईशिता ने निगला। गला जल रहा था। अर्जुन ने लिंग निकाला। वीर्य उसके होठों पर चमक रहा था। उसने ईशिता को फ्रेम से खोला। शरीर बिल्कुल ढीला पड़ चुका था। अर्जुन ने उसे बालों से खींचकर पिंजरे की तरफ घसीटा। इस बार पिंजरे के अंदर दो रॉड थीं। एक योनि के लिए। एक गुदा के लिए। अर्जुन ने ईशिता को उन पर बैठा दिया। दोनों रॉड एक साथ धँस गईं। पूरा। फिर गर्दन का पट्टा कस दिया। हाथ बाँध दिए।
पिंजरे का दरवाज़ा बंद हुआ। ताला लगा। अर्जुन फर्श पर बैठ गया। ईशिता की आँखों में देखता रहा।
“आज तुमने खुद मांगा। कल तुम और आगे जाओगी। तुम खुद अपने हाथों से अपने शरीर पर निशान बनाओगी। और फिर मुझसे कहोगी कि उन निशानों को और गहरा करूँ। क्योंकि अब तुम्हारा दिमाग भी मेरी लत में डूब चुका है।”
उसने सलाखों को छुआ।
“सो जा। दोनों रॉड अंदर। पेट खाली। गला भरा। और याद रखना—तुम अब सिर्फ टूट नहीं रही। तुम खुद को तोड़ने के लिए तरस रही हो।”
ट्रेन की पटरियाँ कराहती रहीं। रोशनी तेज़ होती गई। लेकिन पिंजरे के अंदर ईशिता रॉय—अर्जुन खन्ना की पूरी तरह से खुली हुई प्रॉपर्टी—दोनों रॉड पर बैठी काँप रही थी। उसके शरीर के हर हिस्से में दर्द था। लेकिन उसके दिमाग में सिर्फ एक आवाज़ गूँज रही थी। और तोड़ो। और नष्ट करो। और कभी मत छोड़ो।
अर्जुन उठ खड़ा हुआ। लाइट आधी कर दी। अँधेरा लौट आया। और पिंजरे के अंदर एक लड़की अपनी ही बर्बादी की अगली काली परत का इंतज़ार करने लगी।
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