चलती निजी ट्रेन में अर्जुन खन्ना ईशिता को पिंजरे में कैद कर उसके शरीर के हर छिपे कोने को खोलता है। शीशे के सामने जबरन टूटन, धातु की गेंदें और साँस रोकने वाला कब्जा उसे अपनी बर्बादी की लत में धकेल देता है। अगली सुरंग का इंतज़ार।
रेल की पटरियाँ लगातार कराह रही थीं। काँच की खिड़कियों से बाहर अँधेरी रात भाग रही थी, लेकिन अंदर के वैगन में समय ठहरा हुआ था। अर्जुन खन्ना का निजी लक्जरी ट्रेन—बारह डिब्बे, सोने के हैंडल, मखमल के पर्दे, और एक पूरा वैगन सिर्फ उसके खेल के लिए। कोई स्टाफ नहीं। कोई आवाज़ नहीं। सिर्फ लोहे की धड़कन और एक लड़की की साँसें।
ईशिता रॉय फर्श पर घुटनों के बल बैठी थी। उसके हाथ पीछे बँधे थे—मोटी चमड़े की पट्टियाँ जो कलाई को हड्डी तक काट रही थीं। नंगी। पूरी तरह। उसके लंबे काले बाल बिखरे हुए उसके पीठ पर लटके थे, और उसके गोरे शरीर पर पहले से ही लाल निशान चमक रहे थे। अर्जुन ने कल रात उसके जाँघों पर चाबुक चलाया था। आज वे निशान और गहरे हो गए थे।
अर्जुन खन्ना कुर्सी पर बैठा था। काला शर्ट, काली पतलून। उसकी ठंडी आँखें ईशिता को घूर रही थीं जैसे कोई जानवर को तौल रहा हो। उसने एक सिगरेट सुलगाई। धुआँ उसके चेहरे के आसपास घूमा।
“सिर उठा।”
ईशिता ने सिर उठाया। उसकी आँखें सूजी हुई थीं। रात भर रोई थी। फिर भी उसने आवाज़ नहीं निकाली। अर्जुन ने सिगरेट की राख फर्श पर गिराई।
“तुम मेरी प्रॉपर्टी हो। याद है?”
ईशिता ने धीरे से सिर हिलाया।
“बोल।”
“जी… मैं आपकी प्रॉपर्टी हूँ।” उसकी आवाज़ काँप रही थी।
अर्जुन उठ खड़ा हुआ। उसके जूते की आवाज़ फर्श पर गूँजी। वह ईशिता के पास आया और उसके बालों को मुट्ठी में जकड़ लिया। जोर से खींचा। ईशिता की गर्दन पीछे मुड़ी। दर्द से उसकी आँखें भर आईं।
“प्रॉपर्टी बोलती है ‘मालिक’। फिर से बोल।”
“मैं आपकी प्रॉपर्टी हूँ… मालिक।”
अर्जुन ने उसके मुँह में दो उंगलियाँ ठूँस दीं। गहरा। गले तक। ईशिता ने खाँसा। लार उसकी ठुड्डी से टपकने लगी। अर्जुन ने उंगलियाँ अंदर-बाहर कीं—तेज़, निर्दयी। फिर अचानक निकाल लीं और उसके गाल पर जोर से थप्पड़ मारा।
“आज तुम्हें कुछ नया सिखाना है।”
उसने ईशिता को बालों से खींचकर खड़ा किया और वैगन के बीच में ले गया। वहाँ एक लोहे का फ्रेम लगा था—हाथ और पैर बाँधने के लिए। अर्जुन ने उसकी पट्टियाँ खोलीं, फिर उसे फ्रेम पर खड़ा करके दोनों कलाई ऊपर बाँध दीं। पैर फैलाए। एड़ियाँ फर्श से दो इंच ऊपर। पूरा शरीर तना हुआ।
join my telegram channel for leaked videos
अर्जुन ने एक काला बक्सा खोला। अंदर चाबुक, क्लैंप, मोमबत्तियाँ, और एक मोटी चमड़े की बेल्ट। उसने बेल्ट निकाली और ईशिता के पेट पर कसकर बाँधी। साँस लेना मुश्किल हो गया।
“आज तुम्हारा शरीर मेरे लिए खुलेगा। पूरी तरह। कोई छिपाने की जगह नहीं बचेगी।”
उसने क्लैंप निकाले। छोटे, दाँतेदार। पहले एक क्लैंप ईशिता के बाएँ निप्पल पर लगाया। जोर से दबाया। ईशिता चीखी। आवाज़ वैगन में गूँज गई। अर्जुन ने दूसरा क्लैंप दाएँ निप्पल पर जकड़ दिया। फिर दोनों को चेन से जोड़ दिया और चेन को नीचे खींचकर उसके पेट की बेल्ट से बाँध दिया। हर साँस के साथ निप्पल खिंचते थे।
“देखो कैसे तुम्हारे शरीर का हिस्सा खुद तुम्हें सज़ा दे रहा है।”
अर्जुन ने चाबुक उठाया। लंबा, पतला, चमड़े का। उसने ईशिता की जाँघ के अंदरूनी हिस्से पर पहली मार लगाई। तेज़। चमड़ी फट गई। खून की पतली लकीर बह निकली। ईशिता ने दाँत भींचे। दूसरी मार। तीसरी। चौथी। जाँघें जल रही थीं। अर्जुन ने चाबुक को उसके योनि के ऊपर फेरते हुए कहा—
“यहाँ भी मारूँगा। जब तक तुम खुद नहीं मांगोगी।”
उसने चाबुक को नीचे लाया और योनि के मुलायम मांस पर एक हल्की, फिर एक जोरदार मार लगाई। ईशिता की चीख फूट पड़ी। शरीर झटका खाकर आगे झुका। निप्पल और खिंच गए। दर्द की लहरें एक-दूसरे से टकरा रही थीं।
अर्जुन मुस्कुराया नहीं। उसकी आँखें ठंडी रहीं। उसने चाबुक फेंका और मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम ईशिता के कंधे पर गिरा। फिर स्तनों पर। फिर पेट पर। हर बूँद पर ईशिता का शरीर काँपा। मोम ठंडा होकर सख्त हो गया। अर्जुन ने उंगली से उसे छीलकर हटाया और फिर से गिराया—इस बार योनि के ठीक ऊपर।
“तुम्हारा शरीर सीख रहा है। दर्द अब सिर्फ दर्द नहीं रहा। वह तुम्हारे अंदर घुस रहा है।”
उसने अपनी पतलून खोली। उसका लिंग सख्त, मोटा, नसों से भरा हुआ बाहर निकला। उसने ईशिता के बालों को फिर पकड़ा और उसके मुँह के सामने लाया।
“खोल।”
ईशिता ने होंठ खोले। अर्जुन ने पूरा अंदर ठूँस दिया। गला। एक झटके में। ईशिता की आँखों से आँसू बह निकले। अर्जुन ने उसके सिर को दोनों हाथों से पकड़कर जोर-जोर से धकेला। गला भर गया। साँस रुक गई। फिर निकाला। फिर ठूँसा। लार और आँसू उसके चेहरे पर फैल गए। अर्जुन ने उसे गले तक दबाए रखा जब तक कि ईशिता का शरीर काँपने लगा। फिर निकाला।
“अब नीचे।”
उसने ईशिता के पैर और फैलाए। अपनी उंगलियाँ उसकी योनि में घुसा दीं—तीन एक साथ। सूखी। दर्दनाक। अंदर घुमाया। फिर चौथी। ईशिता चिल्लाई। अर्जुन ने उंगलियाँ निकालीं और अपने लिंग को उसके मुँह में फिर से ठूँस दिया—लार से गीला करके। फिर एक झटके में उसकी योनि में घुसा दिया।
पूरा। एक बार में।
ईशिता की चीख टूट गई। अर्जुन रुका नहीं। उसने उसके कूल्हों को पकड़कर जोर-जोर से धकेला। हर धक्का निप्पल के क्लैंप को खींचता। हर धक्का उसकी दीवारों को चीरता। अर्जुन की साँसें भारी थीं, लेकिन आवाज़ ठंडी।
“तुम सिर्फ एक छेद हो। मेरा छेद। मैं जब चाहूँ इस्तेमाल करूँ। जब चाहूँ तोड़ दूँ।”
उसने और तेज़ किया। शरीर टकरा रहे थे। खून और लार मिल रहे थे। अर्जुन ने एक हाथ से उसके गले को दबाया। साँस लगभग बंद। फिर ढीला किया। फिर दबाया। ईशिता की आँखें उलटी जा रही थीं। दर्द और घुटन एक हो गए थे।
अर्जुन बाहर निकला। ईशिता के शरीर से खून की पतली लकीर बह रही थी। उसने उसे घुमाया—पीछे की तरफ। और एक झटके में उसकी गुदा में घुस गया।
ईशिता ने जोर से चीखा। आवाज़ फटी हुई। अर्जुन ने और गहरा धकेला। कोई तैयारी नहीं। सिर्फ बल। उसने उसके बालों को पकड़कर सिर पीछे खींचा और कान में फुसफुसाया—
“आज से यह भी मेरा है। दोनों छेद। दोनों हमेशा खुले रहेंगे मेरे लिए।”
वह धकेलता रहा। धीरे-धीरे, फिर तेज़। ईशिता का शरीर हिल रहा था। आँसू फर्श पर गिर रहे थे। अर्जुन ने एक हाथ नीचे ले जाकर उसके क्लिटोरिस को जोर से मसला। दर्द और जबरदस्ती का सुख एक साथ। ईशिता का शरीर काँप उठा। वह रो रही थी, लेकिन उसके अंदर कुछ टूट रहा था।
अर्जुन ने और जोर लगाया। आखिरी धक्कों में वह गहराई तक गया और अंदर ही फट पड़ा। गर्म वीर्य उसकी गुदा में भर गया। अर्जुन कुछ पल रुका। फिर धीरे-धीरे बाहर निकला। वीर्य टपकने लगा।
उसने ईशिता को फ्रेम से खोला। वह ढेर की तरह फर्श पर गिर पड़ी। शरीर काँप रहा था। अर्जुन ने उसे बालों से उठाया और वैगन के कोने में एक छोटे से लोहे के पिंजरे की तरफ घसीटा। पिंजरा इतना छोटा था कि अंदर सिर्फ घुटनों के बल ही बैठा जा सकता था। उसने ईशिता को अंदर धकेला। दरवाज़ा बंद किया। ताला लगाया।
पिंजरे के ऊपर एक छोटी चेन लटकी थी। अर्जुन ने उस चेन को ईशिता के निप्पल क्लैंप से जोड़ दिया। अब हर हिलने पर निप्पल खिंचते।
अर्जुन नीचे बैठ गया। ईशिता की आँखों में देखता रहा।
“आज रात तुम यहीं सोओगी। वीर्य अंदर। खून बाहर। और सुबह जब ट्रेन रुकने के करीब होगी… मैं तुम्हें एक नया नियम दूँगा।”
उसने पिंजरे के बार को छुआ।
“तुम खुद मांगोगी कि मैं तुम्हें और तोड़ूँ। क्योंकि अब तुम्हारा शरीर मुझे याद रखने लगा है। दर्द को याद रखने लगा है। और जल्द ही… तुम बिना दर्द के जी नहीं पाओगी।”
पिंजरे की सलाखें ठंडी थीं। ईशिता का शरीर अंदर सिकुड़ा हुआ था। घुटने छाती से सटे। निप्पल क्लैंप चेन से बँधे हुए। हर साँस के साथ चेन खिंचती और उसके स्तनों पर आग जैसी चुभन दौड़ जाती। अर्जुन का वीर्य उसकी गुदा से धीरे-धीरे रिस रहा था। जाँघों के अंदरूनी हिस्से पर खून की सूखी धारियाँ चमक रही थीं। ट्रेन की पटरियाँ लगातार धड़क रही थीं—एक नीरस, निर्दयी लय जो उसके शरीर के दर्द से मिलकर एक ही आवाज़ बन गई थी।
अर्जुन वैगन के दूसरे सिरे पर बैठा था। उसने सिगरेट का आखिरी कश लिया और ठूँठ को फर्श पर रगड़ दिया। उसकी आँखें पिंजरे पर टिकी थीं। कोई जल्दबाजी नहीं। कोई दया नहीं। वह बस देख रहा था कि उसकी प्रॉपर्टी कैसे काँप रही है।
कुछ घंटे बीते। अँधेरा और गहरा हो गया। ईशिता की पलकों पर नींद का बोझ था, लेकिन दर्द ने उसे जगाए रखा। अचानक अर्जुन उठा। उसके जूतों की आवाज़ फर्श पर गूँजी। वह पिंजरे के पास आया। चाबी घुमाई। दरवाज़ा खुला।
“बाहर।”
ईशिता ने शरीर को खिसकाया। चेन खिंच गई। निप्पल से खून की छोटी बूँदें टपकीं। वह रेंगते हुए बाहर आई। फर्श ठंडा था। अर्जुन ने उसके बालों को मुट्ठी में जकड़ा और खींचकर खड़ा किया। उसके घुटने लड़खड़ाए।
“आज रात तुम्हारा दिमाग भी टूटेगा। शरीर तो पहले ही मेरा हो चुका है।”
उसने ईशिता को वैगन के बीच में खींच लिया। वहाँ एक नया सामान रखा था—लोहे का एक तिकोना फ्रेम। उसके ऊपर चमड़े की मोटी पट्टियाँ और एक लंबी धातु की रॉड। अर्जुन ने ईशिता के हाथ पीछे बाँधे। फिर उसे फ्रेम पर झुकाया। पेट नीचे। कमर ऊपर। पैर फैलाए। एड़ियाँ फर्श से ऊपर। पूरा शरीर एक धनुष की तरह तन गया। निप्पल क्लैंप अभी भी लगे थे। चेन अब फ्रेम से बँध गई थी। हर हिलने पर स्तन खिंचते।
अर्जुन ने एक काला दस्ताना पहना। फिर एक लंबी, पतली धातु की रॉड निकाली। उसके सिरे पर छोटे-छोटे काँटे थे। उसने रॉड को ईशिता की योनि के मुलायम मांस पर फेरना शुरू किया। धीरे-धीरे। ऊपर से नीचे। क्लिटोरिस पर रुककर जोर से दबाया। ईशिता की साँस अटक गई।
“चिल्ला मत। सिर्फ महसूस कर।”
रॉड अंदर घुसी। काँटे दीवारों को खरोंचते हुए। अर्जुन ने धीरे-धीरे अंदर-बाहर किया। हर बार थोड़ा और गहरा। ईशिता का शरीर काँप रहा था। आँसू फर्श पर गिर रहे थे। अर्जुन ने रॉड को अंदर छोड़ दिया और एक और चीज़ निकाली—मोटी, काली, रबर की एक मोटी डिल्डो। उसके आधार पर कंपन का स्विच था। उसने उसे ईशिता की योनि में धकेल दिया। पूरा। एक झटके में। फिर स्विच ऑन किया। तेज़ कंपन।
ईशिता की चीख फूट पड़ी। कंपन उसके पूरे निचले शरीर में दौड़ रहा था। अर्जुन ने डिल्डो को और अंदर धकेला। फिर एक पतली चेन से उसे उसके पेट की बेल्ट से बाँध दिया ताकि वह बाहर न निकल सके। अब योनि लगातार कंपन कर रही थी। दर्द और जबरदस्ती का सुख एक साथ।
अर्जुन उसके पीछे खड़ा हो गया। उसने अपनी पतलून खोली। लिंग पहले से सख्त था। उसने ईशिता की गुदा पर थूका। फिर बिना किसी और तैयारी के पूरा अंदर ठूँस दिया। एक ही धक्के में। ईशिता की चीख दब गई। अर्जुन ने उसके कूल्हों को दोनों हाथों से जकड़ लिया और जोर-जोर से धकेलना शुरू किया। हर धक्का डिल्डो को और गहरा धकेलता। हर धक्का निप्पल क्लैंप को खींचता। शरीर एक मशीन की तरह हिल रहा था।
“तुम सिर्फ मांस हो। मेरे इस्तेमाल के लिए। देखो कैसे तुम्हारी गुदा मेरे लिंग को निगल रही है। देखो कैसे तुम्हारी योनि खुद कंपन मांग रही है।”
उसने और तेज़ किया। थप्पड़ की आवाज़ गूँज रही थी—मांस पर मांस। अर्जुन ने एक हाथ आगे बढ़ाकर ईशिता के गले को दबाया। साँस लगभग बंद। फिर ढीला किया। फिर दबाया। ईशिता की आँखें सफेद पड़ रही थीं। दर्द की लहरें उसके दिमाग को सुन्न कर रही थीं।
अर्जुन अचानक बाहर निकला। वीर्य अभी नहीं गिरा था। उसने ईशिता को फ्रेम से खोला। शरीर ढेर की तरह गिर पड़ा। अर्जुन ने उसे बालों से खींचकर एक बड़े शीशे के सामने घसीटा। शीशा फर्श से छत तक था। ईशिता को अपने सामने खड़ा किया। उसके हाथ अभी भी पीछे बँधे थे। डिल्डो अभी भी अंदर कंपन कर रहा था।
“देख अपने आप को।”
अर्जुन ने उसके बालों को और पीछे खींचा। ईशिता की आँखें शीशे में मिलीं। उसका चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ। स्तनों पर क्लैंप। पेट पर बेल्ट। जाँघों पर खून। योनि से डिल्डो की नली बाहर निकली हुई। अर्जुन उसके पीछे खड़ा था। उसका लिंग ईशिता की पीठ से छू रहा था।
“यह तुम हो। मेरी प्रॉपर्टी। अब तुम खुद को देखोगी जब मैं तुम्हें तोड़ूँगा।”
उसने ईशिता को शीशे से सटा दिया। छाती शीशे से चिपक गई। ठंडक से निप्पल और सिकुड़ गए। अर्जुन ने उसके पैर और फैलाए। फिर एक झटके में उसकी योनि में घुस गया—डिल्डो के साथ। दोनों एक साथ। योनि फैल गई। दर्द तेज़ हो गया। अर्जुन ने डिल्डो को अंदर ही छोड़ रखा था। अब उसका लिंग और डिल्डो दोनों उसकी दीवारों को चीर रहे थे। कंपन जारी था। अर्जुन धकेल रहा था। जोर से। निर्दयी।
“देख। देख कैसे तुम्हारा शरीर मुझे ले रहा है। देख कैसे तुम्हारी आँखें डर रही हैं। लेकिन तुम्हारा छेद खुल रहा है।”
हर धक्के के साथ ईशिता का चेहरा शीशे से टकरा रहा था। आँसू शीशे पर चिपक रहे थे। अर्जुन ने उसके गले को पीछे से दबाया। साँस रुक गई। फिर ढीला किया। फिर दबाया। ईशिता का शरीर काँप उठा। एक जबरदस्ती का ऑर्गैज्म उसके अंदर फूट पड़ा। योनि सिकुड़ी। अर्जुन मुस्कुराया नहीं। उसने और तेज़ धकेला।
“यह तुम्हारी मर्जी से नहीं हुआ। यह मैंने तुम्हें दिया। याद रखना।”
वह बाहर निकला। फिर गुदा में घुसा। फिर योनि में। बारी-बारी। दोनों छेद अब ढीले पड़ रहे थे। खून और वीर्य और लार मिलकर उसकी जाँघों पर बह रहे थे। अर्जुन ने आखिरकार ईशिता के मुँह में लिंग ठूँस दिया। गहरा। गले तक। और फट पड़ा। गर्म वीर्य उसके गले में भर गया। ईशिता ने खाँसा। वीर्य उसके मुँह से बाहर निकला। अर्जुन ने उसके सिर को पकड़कर और अंदर दबाया।
“निगल। सब। एक बूँद भी बाहर नहीं।”
ईशिता ने निगला। गला जल रहा था। अर्जुन ने लिंग निकाला। वीर्य उसके होठों पर चमक रहा था। उसने ईशिता को फर्श पर धकेल दिया। फिर एक नया सामान निकाला—एक लंबी, मोटी चमड़े की पट्टी जिसमें कई छोटी धातु की गेंदें लगी थीं। उसने पट्टी को ईशिता की योनि में ठूँसना शुरू किया। एक-एक गेंद। अंदर। गहरा। जब तक कि पूरी पट्टी अंदर न चली गई। सिर्फ एक छोटी रस्सी बाहर निकली हुई थी।
“यह रात भर अंदर रहेगी। हर हिलने पर गेंदें तुम्हारी दीवारों को कुचलेंगी।”
अर्जुन ने ईशिता को फिर पिंजरे की तरफ घसीटा। इस बार पिंजरे के अंदर एक और चीज़ रखी थी—एक छोटा धातु का पिंजरा जो सिर्फ उसके सिर के लिए था। अर्जुन ने ईशिता के सिर को उसमें फँसाया। ताला लगाया। अब वह सिर नहीं हिला सकती थी। सिर्फ आँखें। सिर्फ साँस।
उसने पिंजरे का बड़ा दरवाज़ा बंद किया। ताला लगाया। फिर फर्श पर बैठ गया। ईशिता की आँखों में देखता रहा।
“कल सुबह ट्रेन एक लंबी सुरंग से गुजरेगी। अँधेरा होगा। उस अँधेरे में मैं तुम्हारे शरीर का अगला हिस्सा खोलूँगा। एक ऐसा हिस्सा जो अभी तक बचा हुआ है।”
उसने पिंजरे की सलाखों को छुआ।
“तुम खुद मांगोगी। क्योंकि अब तुम्हारा शरीर बिना मेरे दर्द के अधूरा महसूस कर रहा है। देखो कैसे तुम्हारी योनि गेंदों को भींच रही है। देखो कैसे तुम्हारे निप्पल अभी भी खिंचने को तरस रहे हैं।”
ईशिता पिंजरे के अंदर काँप रही थी। गेंदें अंदर कुचल रही थीं। डिल्डो का कंपन बंद हो चुका था लेकिन उसका असर बाकी था। सिर पिंजरे में फँसा हुआ। आँखों से आँसू बह रहे थे। लेकिन आँसुओं के नीचे कुछ और था—एक काली, भूखी सी चीज़ जो उसके दिमाग में घुस रही थी। दर्द की लत। अपमान की भूख।
अर्जुन उठ खड़ा हुआ। उसने लाइट बंद कर दी। वैगन अँधेरे में डूब गया। सिर्फ ट्रेन की पटरियों की आवाज़ बाकी थी। और पिंजरे के अंदर एक लड़की की दबी हुई साँसें।
अँधेरे में अर्जुन की आवाज़ आई—ठंडी, साफ।
“सो जा। कल तुम्हारा दिमाग भी मेरा हो जाएगा। और उसके बाद… तुम खुद मुझे बताओगी कि तुम्हें और कितना नष्ट होना है। क्योंकि अब तुम सिर्फ मेरी प्रॉपर्टी नहीं रही। तुम मेरी लत बन चुकी हो। और लत को कभी छोड़ा नहीं जाता।”
पटरियाँ कराहती रहीं। अँधेरा गहराता गया। और पिंजरे के अंदर ईशिता रॉय—अर्जुन खन्ना की टूटी हुई चीज़—अपने ही विनाश की अगली परत का इंतज़ार करने लगी। उसके शरीर के हर हिस्से में दर्द था। लेकिन उसके दिमाग में एक नई भूख जाग रही थी। एक ऐसी भूख जो सिर्फ और दर्द मांग रही थी। और अर्जुन जानता था। वह हमेशा जानता था।
ट्रेन की उस रात ने मुझे तोड़ दिया
दिल्ली के फ्लैट में दो बहनों की रात