अकेली चाची ने भतीजे को रस्सियों से कसकर बाँधा, ठंडे पानी से नहलाया और सूखे दर्द के साथ उसकी हर सांस छीन ली। हर धक्के में खरोंच, हर कराह में नया घाव, सुबह तक शरीर सिर्फ कांपता हुआ मांस रह गया।
मेरा नाम रोहित है। उम्र 24 साल। मैं मुंबई से लौटा था। कॉलेज खत्म हो चुका था। घर पर अचानक बुलावा आया था—चाची के घर की मरम्मत का काम। चाची का नाम मीरा है। उम्र 36। वे दिल्ली के पास गाजियाबाद के एक छोटे से कॉलोनी में अकेली रहती हैं। चाचा विदेश में काम करते हैं, साल में एक बार आते हैं।
मीरा चाची का जिस्म देखकर किसी की भी साँसें अटक जाएँ। गोरा, चिकना, भरा हुआ शरीर। 40 इंच के भारी, गोल, लटकते स्तन। कमर 32, और पीछे 44 इंच की मोटी, हिलती-डुलती गांड। जाँघें मोटी और नरम। चूत के बाल घने और काले। वे अक्सर टाइट साड़ी या छोटी नाइटी पहनती थीं।
मैं घर पहुँचा तो अंदर सन्नाटा था। सिर्फ बाथरूम से पानी की आवाज़ आ रही थी। दरवाज़ा अधखुला था। मैं चुपके से अंदर गया। चाची नंगी थीं। पानी उनके बड़े स्तनों पर गिर रहा था। वे दोनों हाथों से अपने स्तनों को मसल रही थीं। उँगलियाँ निप्पलों को दबा-दबा कर घुमा रही थीं। पानी की धार उनकी गांड की दरार में बह रही थी। वे धीरे-धीरे गुनगुना रही थीं।
मेरा लंड तुरंत कड़ा हो गया। 9 इंच का मोटा, काला, नसों वाला लंड। मैंने अपने शॉर्ट्स के ऊपर से ही उसे दबाया। चाची ने अचानक मुड़कर देखा। उनकी आँखों में कोई शर्म नहीं थी। सिर्फ एक क्रूर, भूखी मुस्कान।
“आ गया तू?” उनकी आवाज़ में ठंडक थी। “देखता रह। या अंदर आ।”
मैं अंदर घुस गया। दरवाज़ा बंद कर दिया। चाची ने पानी बंद किया। नंगी खड़ी रहीं। पानी की बूँदें उनके स्तनों से टपक रही थीं। उन्होंने मेरी ओर इशारा किया।
“कपड़े उतार। अभी।”
मैंने उतारे। मेरा लंड बाहर निकला। चाची ने देखा और हँसी।
“बड़ा हो गया है। पहले छोटा था। अब इसे चाची की चूत में घुसाने लायक बना दिया।”
उन्होंने मुझे दीवार से लगा दिया। दोनों हाथ मेरे सिर के ऊपर दबा दिए। उनके गीले स्तन मेरे सीने से चिपक गए। उन्होंने मेरे कान में फुसफुसाया—
“आज तू सिर्फ देखने नहीं आया। आज तू चाची की कुतिया बनेगा। समझा?”
मैंने सिर हिलाया। चाची ने मेरे लंड को पकड़ा। कसकर। नाखून गड़ा दिए। दर्द हुआ। फिर उन्होंने मेरे मुँह में अपनी उँगलियाँ ठूँस दीं।
“चाट। अच्छी तरह।”
मैंने चाटा। चाची की उँगलियाँ मेरी जीभ पर घूमती रहीं। फिर उन्होंने मुझे घुटनों पर बिठा दिया। उनकी गांड मेरे चेहरे के सामने थी। उन्होंने दोनों हाथों से अपनी गांड के गाल फैलाए।
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“चाट। गहराई तक। जीभ अंदर डाल।”
मैंने चाटा। गांड की दरार में जीभ डाली। स्वाद नमकीन और तीखा था। चाची कराह उठीं। उन्होंने मेरे बाल पकड़कर अपना चेहरा और अंदर दबाया। मैं साँस नहीं ले पा रहा था। वे हिल-हिल कर मेरी जीभ पर बैठ रही थीं।
“और जोर से। कुतिया की तरह चाट।”
मैंने और जोर लगाया। चाची की चूत भी गीली हो चुकी थी। पानी टपक रहा था। उन्होंने अचानक मुझे खींचकर उठाया और बेडरूम में घसीट लिया। बिस्तर पर धकेल दिया।
चाची ने दराज खोला। अंदर से चमड़े की पट्टियाँ, रस्सियाँ, एक मोटा डिल्डो और एक पतली बेंत निकाली।
“आज सिर्फ चुदाई नहीं होगी। आज सजा भी मिलेगी।”
उन्होंने मेरे हाथ-पैर बाँध दिए। रस्सियाँ कस दीं। मैं बिस्तर पर फैला पड़ा था। लंड सीधा खड़ा। चाची ने बेंत उठाई।
“गिन।”
पहली चोट मेरी जाँघ पर पड़ी। जलन हुई। दूसरी चोट गांड पर। तीसरी लंड के पास। मैं चिल्लाया। चाची हँसीं।
“चिल्ला। और जोर से। चाची को मज़ा आता है।”
दस चोटें पड़ीं। मेरी त्वचा लाल हो गई। जल रही थी। चाची ने फिर मेरे मुँह में अपना स्तन ठूँस दिया।
“चूस। दोनों।”
मैंने चूसा। जोर से। दाँत लगाए। चाची कराह उठीं और मेरे बाल खींचे।
“काट मत। सिर्फ चूस। दूध निकालने की कोशिश कर।”
फिर उन्होंने अपना चेहरा मेरे लंड पर बैठाया। मुँह में पूरा लंड ले लिया। गले तक। मैं हाँफने लगा। चाची ने सिर ऊपर-नीचे किया। गहरी। क्रूर। उनके दाँत कभी-कभी छू जाते थे। दर्द और मज़ा एक साथ।
वे उठ खड़ी हुईं। मेरे ऊपर सवार हो गईं। अपनी चूत मेरे मुँह पर दबा दी।
“चाट। पूरा। अंदर तक।”
मैंने चाटा। चाची की चूत गर्म और गीली थी। उन्होंने मेरे सिर को दोनों जाँघों के बीच दबा रखा था। मैं साँस नहीं ले पा रहा था। वे हिल रहीं थीं। अपनी चूत मेरे चेहरे पर रगड़ रही थीं।
“अभी अंदर लेगा। बिना रुके।”
चाची ने अपना शरीर नीचे सरकाया। मेरे लंड को अपनी चूत के मुँह पर रखा। फिर एक झटके में पूरा बैठ गईं। 9 इंच एक साथ अंदर। मैं चीख पड़ा। चाची की चूत बहुत टाइट थी। उन्होंने दोनों हाथ मेरे सीने पर दबाए और जोर-जोर से उछलने लगीं।
“चोद। जोर से। चाची की चूत फाड़ दे।”
मैंने नीचे से धक्के मारे। चाची और तेज़ हो गईं। उनके स्तन मेरे चेहरे पर बार-बार लग रहे थे। उन्होंने मेरे गले में हाथ डालकर दबाया। साँस रुकने लगी। फिर छोड़ा। फिर दबाया।
“मार। और गहरा। आज रात चाची की गांड भी लेनी है।”
उन्होंने रुका। लंड निकाला। मुड़ गईं। चारों हाथ-पैरों पर आ गईं। गांड फैला दी।
“थूक लगा। और घुसा।”
मैंने थूक लगाया। फिर लंड उनकी गांड की दरार पर रखा। धीरे से धक्का दिया। चाची चिल्लाईं।
“जोर से! एक बार में पूरा!”
मैंने जोर लगाया। आधा घुस गया। चाची की गांड बहुत टाइट थी। उन्होंने पीछे हाथ बढ़ाकर मेरे कूल्हे पकड़े और खुद को और पीछे धकेला। पूरा लंड अंदर चला गया।
“अब हिल। बिना रुके। चाची की गांड फाड़।”
मैंने धक्के मारे। तेज़। क्रूर। चाची कराह रही थीं। कभी गाली दे रही थीं। कभी मेरे बाल खींच रही थीं। उनके शरीर से पसीना बह रहा था। मैंने उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। और जोर से चुदाई की।
चाची अचानक रुकीं। मुड़ीं। मेरे मुँह में थूक दिया।
“निगल। अब चाची का पेशाब पी।”
वे मेरे ऊपर बैठ गईं। चूत मेरे मुँह पर। गर्म धारा निकलने लगी। मैंने निगला। कड़वा। गर्म। चाची हँस रही थीं।
“अच्छा कुत्ता। अब और ले।”
रात भर चली। चाची ने मुझे कई बार बाँधा। बेंत से मारा। डिल्डो से मेरी गांड में घुसाया। खुद सवार होकर चुदाई की। फिर मुझे ऊपर बैठाया और अपनी चूत और गांड दोनों में बारी-बारी से लेना सिखाया। हर बार जब मैं झड़ने वाला होता, वे रोक देतीं। लंड को कसकर पकड़तीं।
“इजाजत के बिना नहीं। चाची कहेगी तब।”
सुबह चार बजे तक हम थक चुके थे। बिस्तर गीला था। पसीना, थूक, मल और वीर्य मिला हुआ। चाची मेरे ऊपर लेटी हुई थीं। उनका शरीर मेरे शरीर पर चिपका हुआ। उन्होंने मेरे कान में फुसफुसाया—
“अब से जब भी घर आएगा, यही होगा। और हर बार और क्रूर। समझा?”
मैंने सिर हिलाया। चाची ने मेरे लंड को फिर से पकड़ा। वह अभी भी आधा कड़ा था।
“अभी एक बार और। फिर सोने देंगे।”
उन्होंने फिर सवार होकर चुदाई शुरू कर दी। इस बार धीरे। लेकिन गहरा। हर धक्के के साथ उनके नाखून मेरी छाती पर गड़ रहे थे। खून की हल्की रेखाएँ बन गईं।
जब आखिरकार वे झड़ीं, तो उनके शरीर में कंपन आया। उन्होंने मेरे ऊपर अपना पूरा वजन डाल दिया। साँसें भारी थीं।
“अब तू चाची का है। पूरा। जब तक चाचा वापस नहीं आते… और शायद उसके बाद भी।”
मैंने उन्हें कसकर पकड़ा। बाहर सूरज निकल रहा था। कमरे में गंध तेज़ थी। शरीर जल रहे थे। लेकिन दोनों की आँखों में एक ही बात थी—यह सिर्फ शुरुआत है।
अगली रात और भी ज़्यादा क्रूर होने वाली थी। चाची ने वादा किया था। और मीरा चाची अपने वादे कभी नहीं तोड़तीं।
सूरज की हल्की किरणें खिड़की से अंदर आ रही थीं। कमरे में अभी भी पसीने, वीर्य और पेशाब की तेज़ गंध फैली हुई थी। मैं बिस्तर पर कराह रहा था। शरीर के हर हिस्से में दर्द था। जाँघों पर बेंत के निशान लाल और सूजे हुए थे। गांड जल रही थी। लंड अभी भी आधा कड़ा था, लेकिन थका हुआ।
मीरा चाची मेरे बगल में लेटी थीं। उनकी साँसें भारी थीं। अचानक उन्होंने आँखें खोलीं। मुस्कुराईं—वही क्रूर, भूखी मुस्कान।
“उठ। आज आराम नहीं मिलेगा।”
उन्होंने मुझे बालों से पकड़कर बिस्तर से खींच लिया। फर्श पर गिरा दिया। मेरे हाथ अभी भी थोड़े सुन्न थे। चाची नंगी ही रसोई की तरफ चली गईं। कुछ देर बाद वापस आईं। हाथ में एक लंबी चमड़े की बेल्ट, मोटी रस्सियाँ, और एक बड़ा काला डिल्डो था—लगभग 10 इंच का, मोटा और नसों वाला।
“आज पूरा दिन तेरा शरीर चाची का खिलौना बनेगा। कोई शिकायत नहीं। समझा?”
मैंने सिर हिलाया। चाची ने मुझे पेट के बल लिटा दिया। हाथ पीछे बाँध दिए। रस्सी इतनी कस दी कि कलाई में दर्द होने लगा। फिर उन्होंने मेरी टाँगें फैला दीं और टखनों को भी बाँध दिया। मैं बिल्कुल बेबस था।
चाची ने बेल्ट उठाई। पहली चोट मेरी गांड पर पड़ी। जोरदार। आवाज़ कमरे में गूँजी। मैं चिल्लाया। दूसरी चोट। तीसरी। लगातार दस चोटें। मेरी गांड जल रही थी। लाल हो चुकी थी। चाची हँस रही थीं।
“चिल्ला। और जोर से। पड़ोसी सुनें तो सुनें। आज कोई घर पर नहीं है।”
उन्होंने बेल्ट एक तरफ रखी। फिर डिल्डो पर थूक लगाया। मेरे गांड के छेद पर रखा। बिना किसी चेतावनी के एक झटके में आधा घुसा दिया। मैं चीख पड़ा। दर्द तेज़ था। चाची ने और जोर लगाया। पूरा डिल्डो अंदर चला गया। उन्होंने उसे घुमाना शुरू किया। अंदर-बाहर। तेजी से।
“यह तेरी गांड की सजा है। कल रात बहुत मज़े लिए थे। आज दर्द सह।”
वे डिल्डो को अंदर छोड़कर खड़ी हो गईं। मेरे मुँह के सामने अपनी चूत लाईं। गीली, सूजी हुई, बालों वाली।
“चाट। पूरा दिन यही करना है। जब तक चाची नहीं कहेगी, रुकना मना है।”
मैंने जीभ निकाली। चाची की चूत चाटी। वे मेरे सिर पर बैठ गईं। पूरा वजन। मैं साँस नहीं ले पा रहा था। चाची हिल रहीं थीं। अपनी चूत मेरे चेहरे पर रगड़ रही थीं। उनकी योनि से पानी टपक रहा था। मेरी नाक और मुँह में भर रहा था। वे कराह उठीं।
“और गहरा। जीभ अंदर डाल। चाची की चूत साफ कर।”
आधा घंटा इसी तरह चला। मेरी जीभ थक गई। जब वे उठीं तो मेरे चेहरे पर उनका रस चमक रहा था। चाची ने मुझे पलट दिया। लंड अभी भी कड़ा था। उन्होंने उसे पकड़ा और जोर से मसला। नाखून गड़ा दिए।
“अब इसे इस्तेमाल करेंगे।”
वे मेरे ऊपर सवार हो गईं। अपनी चूत में पूरा लंड एक झटके में बैठा लिया। फिर जोर-जोर से उछलने लगीं। उनके भारी स्तन मेरे चेहरे पर बार-बार लग रहे थे। उन्होंने दोनों निप्पलों को मेरे मुँह में ठूँस दिया।
“काट। जोर से काट। खून निकले तो निकले।”
मैंने दाँत गड़ाए। चाची चिल्लाईं लेकिन रुकीं नहीं। और तेज़ चुदाई करने लगीं। हर धक्के के साथ उनके नाखून मेरी छाती पर खरोंच रहे थे। खून की पतली रेखाएँ बन गईं। चाची ने मेरे गले में दोनों हाथ डाल दिए। दबाया। साँस रुक गई। चेहरा लाल हो गया। फिर छोड़ा। फिर दबाया।
“मरने वाला महसूस कर। लेकिन मरेगा नहीं। चाची अभी और इस्तेमाल करेगी।”
वे अचानक रुकीं। लंड निकाला। मुड़ गईं। चारों पर आ गईं। गांड फैला दी।
“अब गांड में। बिना थूक के। सूखा।”
मैंने हिचकिचाया। चाची ने पीछे मुड़कर देखा। आँखें गुस्से से भरी हुईं।
“हिचकिचाया तो और सजा मिलेगी। घुसा।”
मैंने लंड उनकी गांड पर रखा। धक्का दिया। सूखा होने के कारण बहुत मुश्किल था। आधा ही घुसा। चाची चिल्लाईं। फिर खुद को पीछे धकेला। पूरा अंदर चला गया। दर्द दोनों को हो रहा था। लेकिन चाची रुकीं नहीं।
“हिल। जोर से। चाची की गांड फाड़ दे आज।”
मैंने धक्के मारे। तेज़। क्रूर। हर धक्के के साथ चाची की गांड की मांसपेशियाँ कस रही थीं। उन्होंने अपने बाल खींचकर मेरे हाथ में दे दिए।
“खींच। और जोर से खींच।”
मैंने खींचा। चाची का सिर पीछे झुक गया। मैं और गहराई तक घुस रहा था। कमरे में मांस की आवाज़ गूँज रही थी। चाची की कराहें और गालियाँ।
“मादरचोद… और जोर… फाड़ दे… आज खून निकले तो निकले…”
अचानक चाची ने शरीर को आगे की तरफ झुकाया। उनके मुँह से लार टपकने लगी। वे झड़ने वाली थीं। मैंने और तेज़ किया। चाची का शरीर काँप उठा। उनकी गांड में तेज़ संकुचन हुआ। मैं भी रोक नहीं पाया। गर्म वीर्य उनकी गांड के अंदर फूट पड़ा। ढेर सारा। चाची चिल्लाईं और नीचे गिर पड़ीं।
कुछ देर दोनों हाँफते रहे। फिर चाची उठ बैठीं। उनके चेहरे पर मुस्कान थी।
“अभी खत्म नहीं हुआ। आज पूरा दिन बाकी है।”
उन्होंने मुझे बाथरूम में घसीटा। शावर चालू किया। ठंडा पानी। मेरे शरीर पर डाला। जलन बढ़ गई। फिर उन्होंने खुद को साफ किया। मेरे मुँह में अपना पेशाब किया। मैंने निगला। मना नहीं किया।
दोपहर तक चाची ने मुझे फिर से बाँध दिया। इस बार कुर्सी पर। हाथ ऊपर। टाँगें फैली हुईं। उन्होंने रसोई से लाल मिर्च का पाउडर और सरसों का तेल निकाला। मेरे लंड और गांड पर लगाया। जलन असहनीय हो गई। मैं चीख रहा था। चाची हँस रही थीं और मेरा लंड हिला रही थीं।
“जलन में भी खड़ा रहेगा। चाची का कुत्ता।”
शाम तक उन्होंने मुझे तीन बार और चोदा। एक बार चूत में, दो बार गांड में। हर बार वीर्य अंदर छोड़ने के बाद वे मुझे चाटने पर मजबूर करतीं। अपना और मेरा मिला हुआ रस।
रात होते-होते मेरा शरीर पूरी तरह टूट चुका था। निशान, खरोंच, सूजन हर जगह। चाची ने आखिरकार रस्सियाँ खोलीं। मुझे बिस्तर पर लिटा दिया। खुद मेरे ऊपर लेट गईं। उनके स्तन मेरे मुँह पर थे।
“सो जा। कल और नया खेल होगा। चाची ने एक नया खिलौना मंगवाया है। लोहे का। तेरी गांड और मुँह दोनों के लिए।”
मैं बोल नहीं पाया। सिर्फ साँस ले रहा था। चाची ने मेरे बाल सहलाए। फिर जोर से खींचे।
“तू अब सिर्फ चाची का है। शरीर, लंड, गांड, मुँह… सब। जब तक चाचा नहीं आते, और शायद उसके बाद भी। हर रात यही होगा। और हर रात और क्रूर।”
बाहर अँधेरा हो चुका था। कमरे में सिर्फ हमारी साँसें और शरीर की गंध थी। चाची ने लाइट बंद कर दी। लेकिन उनके हाथ मेरे लंड पर थे। धीरे-धीरे फिर से हिला रहे थे।
“सोने से पहले एक बार और… सूजा हुआ ही सही।”
वे फिर सवार हो गईं। इस बार धीरे। लेकिन गहरा। हर हरकत में दर्द और मज़ा मिला हुआ था। चाची के नाखून फिर से मेरी छाती में गड़ गए। खून की नई रेखाएँ बन गईं।
रात लंबी थी। और मीरा चाची के खेल अभी खत्म नहीं हुए थे। अगली सुबह और भी अंधेरा होने वाला था।