रात के अँधेरे में पड़ोस की गोरी मोटी आंटी को दीवार से सटाकर घसीटा, बाँधा, मारा और इतना कुचला कि उसकी साँसें अटक गईं। हर धक्के में शरीर तड़पा, आँखों से आँसू बहे, पर वह और माँगती रही। अगली सुबह तक वह चल भी न सकी।
शहर के पुराने मोहल्ले में, जहाँ गलियाँ संकरी थीं और घर एक-दूसरे से सटे हुए, 22 साल का विक्रम रहता था। वह कॉलेज का छात्र था, शरीर दुबला-पतला लेकिन मजबूत, आँखें तेज़ और मन हमेशा बेचैन। उस रात करीब 11 बजे वह अपने कमरे में अकेला बैठा था। लाइट मंद थी, फोन पर एक वीडियो चल रहा था जिसमें एक मोटे शरीर वाली औरत को रस्सियों से बाँधकर पीटा जा रहा था। साउंड म्यूट था। अचानक बाहर से माँ की आवाज़ आई।
“विक्रम बेटा, काव्या आंटी के घर चले जाओ। आज वो अकेली हैं। उनके घर में कोई नहीं।”
काव्या आंटी 47 साल की थीं। विक्रम की माँ की पुरानी सहेली। गोरी चमड़ी, भारी कूल्हे, मोटे स्तन जो साड़ी के नीचे दबे रहते, कमर थोड़ी मोटी लेकिन जाँघें मोटी और मुलायम। पति ट्रक ड्राइवर था, महीनों बाहर रहता। बेटा विदेश में पढ़ता था। विक्रम कभी उससे नहीं मिला था। माँ की बात मानकर विक्रम ने वीडियो बंद किया और पड़ोस के घर की ओर चला गया। मन में गुस्सा था। वीडियो अधूरा रह गया था।
काव्या आंटी दरवाजा खोलते ही मुस्कुराईं। साड़ी हल्की पीली थी, ब्लाउज टाइट। “आ गया बेटा। अच्छा हुआ। मुझे अकेला रहना अच्छा नहीं लगता। अंदर आ।”
विक्रम सोफे पर बैठ गया। टीवी पर कोई धारावाहिक चल रहा था। काव्या आंटी किचन से पानी लेकर आईं। “कुछ खाओगे?”
“नहीं आंटी।” विक्रम का जवाब रुखा था।
काव्या आंटी उसके पास बैठ गईं। “सुनो विक्रम, सच बताना। क्या मैं बहुत मोटी हो गई हूँ?”
विक्रम ने उनकी ओर देखा। “नहीं आंटी। आप मेरी माँ से ज्यादा जवान लगती हैं।”
काव्या आंटी ने आह भरी। “आज बाजार में दो लड़के मेरे पीछे-पीछे चल रहे थे। एक ने दूसरे से कहा—देखो इस मोटी आंटी की गांड कैसे हिल रही है। साड़ी के नीचे इतनी मोटी चूतड़। दोनों हँसे।” उनकी आवाज़ में नाराज़गी थी लेकिन आँखों में कुछ और।
विक्रम का लंड हिल गया। “वो बेवकूफ हैं आंटी। उनकी बात छोड़ो।”
join my telegram channel for leaked videos
काव्या आंटी खड़ी हो गईं। सोफे के पीछे घूमकर विक्रम के बिल्कुल करीब आ गईं। उनकी मोटी गांड उसकी पीठ से छू गई। फिर मुड़ीं। “सच बता। पीछे से मैं बहुत मोटी दिखती हूँ क्या?”
विक्रम ने पहली बार इतनी नज़दीक से देखा। साड़ी के नीचे भारी-भरकम गोल चूतड़। दो बड़े गोलाकार पहाड़। उसने याद किया वीडियो में एक औरत की नंगी गांड पर चाबुक पड़ रहा था। खून की धारें। उसका लंड सख्त हो गया।
“आंटी, आप पीछे से बहुत अच्छी लगती हैं। सही आकार है।”
काव्या आंटी ने दोनों हाथ पीछे ले जाकर अपनी गांड पर रखे और हल्के से थपथपाया। साड़ी में मांस हिला। “ये बहुत बड़ी तो नहीं लगती? साइज 42 है। आजकल के लड़के महिलाओं का सम्मान भूल गए हैं। गंदी-गंदी बातें करते हैं।”
विक्रम उत्तेजित हो रहा था। “नहीं आंटी। ये परफेक्ट है। ऐसी गांड किस्मत वालों को मिलती है।”
काव्या आंटी फिर सोफे पर बैठ गईं। “फिर भी शिष्टाचार होना चाहिए। मैं उनकी उम्र की हूँ। एक दिन साड़ी खरीदने गई थी। दर्पण में देख रही थी। बाहर कुछ लड़के खड़े थे। एक बोला—यार ये आंटी बिना साड़ी के और मस्त लगेंगी। साड़ी उतार दो तो पता चले।”
विक्रम हँसा। “हा हा… वो तो तारीफ थी आंटी।”
“तारीफ का तरीका होता है विक्रम। तुम बहुत शरारती हो लेकिन मेरी इज्जत करते हो। अगर तुम्हें मेरी तारीफ करनी होती तो कैसे बोलते?”
विक्रम ने सोचा। “वाह क्या फिगर है आंटी की। एक बार देख लो तो बार-बार देखने का मन करे। ऐसी मोटी गांड और भारी बूब्स देखकर लंड खड़ा हो जाए।”
काव्या आंटी की आँखें चमक उठीं। “अच्छा… ये तरीका है। अब देर हो गई। बिस्तर पर चलो। वहाँ बात करते हैं।”
वे बेडरूम में गए। काव्या आंटी ने साड़ी उतार दी। ब्लाउज और पेटीकोट में रह गईं। पेटीकोट सफेद, पतला। “लाइट ऑफ कर दो विक्रम।”
लाइट बुझ गई। अंधेरा। काव्या आंटी बिस्तर पर लेट गईं। “ये क्रीम ले। मेरे पैरों में लगा। बेटा जब घर होता था तो लगाता था। तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा?”
“नहीं आंटी।” विक्रम ने ट्यूब लिया। अंधेरे में हाथ पैरों पर फिरा। गोरी मुलायम त्वचा। क्रीम लगाते-लगाते घुटनों तक पहुँच गया। फिर जाँघों पर। पेटीकोट के अंदर हाथ डाल दिया। मोटी मांसल जाँघें। मलाई जैसी।
काव्या आंटी बोलीं, “आजकल के लड़के बहुत बदमाश हो गए हैं। एक दिन बाजार में एक ने कहा—दिल कर रहा है इस आंटी की साड़ी उठाकर खड़े-खड़े ही चोद दूँ।”
विक्रम के हाथ जाँघों पर रुक गए। उंगलियाँ अंदर सरक गईं। “क्या वो सच में आपकी साड़ी उठाकर खड़े-खड़े चोदना चाहते थे आंटी?”
काव्या आंटी ने साँस ली। “हाँ… दूसरा बोला—जल्दबाजी मत कर। इस मस्त माल को लिटाकर जी भर के चोदना चाहिए। पूरी रात।”
विक्रम का हाथ ऊपर सरक गया। पेट पर क्रीम। फिर ब्लाउज के नीचे। भारी बूब्स। बड़े, मुलायम, निप्पल सख्त। उसने दोनों हाथों से दबाया। मसला। “तो वो आपकी बूब्स की तारीफ कर रहे थे?”
काव्या आंटी की साँस तेज़ हो गई। “तमिज होनी चाहिए। तुम बताओ अगर तुम होते तो क्या कहते?”
विक्रम ने निप्पल को उंगलियों में लेकर मरोड़ा। जोर से। “कितनी मस्त सेक्सी बूब्स हैं आंटी की। एक बार छूने को मिल जाए तो जिंदगी बन जाए। चूसने को मिल जाए तो जन्नत। इनको चोद-चोद कर हिलाने में मज़ा आएगा।”
काव्या आंटी करवट बदल गईं। पेट के बल लेट गईं। “कमर भी दबा दे।”
विक्रम ने कमर दबाई। फिर हाथ नीचे ले गया। पेटीकोट ऊपर उठाया। नंगी गांड। कोई पैंटी नहीं। मोटी, गोल, नरम चूतड़। दोनों हाथों से फैलाया। बीच में गहरा गड्ढा। उसने एक थप्पड़ मारा। जोर का। मांस हिला। काव्या आंटी की चीख निकली लेकिन दबी हुई।
“ऐसी मस्त गांड मैंने कभी नहीं देखी,” विक्रम बोला। फिर दो और थप्पड़। लाल निशान पड़ गए। उसने उंगलियाँ गांड के छेद पर फिराईं। अंदर धकेल दीं। दो उंगलियाँ। काव्या आंटी कराह उठीं।
“एक बार बस में… भिड़भाड़ थी… तुम्हारी उम्र का लड़का मेरे पीछे खड़ा हो गया… मेरी गांड में उंगली करता रहा देर तक…”
विक्रम ने उंगलियाँ अंदर-बाहर कीं। तीसरी उंगली जोड़ दी। जोर से। “आपने डांटा नहीं?”
“क्या डांटती… अगर वो कह देता कि इतनी जवान लड़कियों के होते हुए इस बुढ़िया को क्यों छू रहा हूँ तो लोग मुझे ही गंदी समझते।”
विक्रम ने अपना पैंट उतार दिया। मोटा, लंबा, भारी लंड बाहर निकला। 8 इंच से ज्यादा। उसने काव्या आंटी की जाँघें फैलाईं। बीच में बैठ गया। हाथ चूत पर। हल्के बाल। गीली। उंगलियाँ अंदर घुसा दीं। तीन। जोर से धक्के।
“आप लड़की से ज्यादा सेक्सी लगती हैं आंटी। अगर किसी नंगी लड़की को एक तरफ रखो और आपको दूसरी तरफ… तो 1000 में से 999 आपकी चूत ही चुनेंगे।”
काव्या आंटी कराह रही थीं। “होली पर… दोस्त के घर… चार लड़के… उन्होंने मुझे कमरे में बुलाया… होली के बहाने पूरे शरीर को सहलाया… एक ने गिराकर ऊपर चढ़ गया…”
विक्रम रुक नहीं पाया। उसने लंड का मुँह काव्या आंटी की गीली चूत पर रखा। एक जोरदार धक्का। पूरा आधा अंदर। काव्या आंटी चीखीं—“ओई माँ… मार गई…”
विक्रम ने और धक्का मारा। पूरा अंदर। गांड तक। फिर बाहर निकाला और फिर से धकेल दिया। जोर-जोर से। बिस्तर चरमराया। उसने दोनों हाथों से उनकी मोटी गांड पकड़ी और खींचते हुए चोदा। हर धक्के में गांड हिलती। थप्पड़ पड़ते। लाल हो गईं चूतड़।
“बोल आंटी… वो चारों तुम्हें चोदना चाहते थे?” विक्रम ने पूछा। साँस फूली हुई।
काव्या आंटी रो रही थीं लेकिन मना नहीं कर रही थीं। “हाँ… एक ने बूब्स दबाए… दूसरे ने गांड में उंगली… तीसरे ने मुँह में लंड ठूँसा…”
विक्रम ने उनका बाल पकड़ लिया। सिर पीछे खींचा। लंड और गहरा घुसाया। “आज मैं अकेला हूँ। लेकिन तुम्हें याद दिलाऊँगा कि असली चोदाई क्या होती है।”
उसने बाहर निकाला। काव्या आंटी को उल्टा कर दिया। पेट के बल। घुटने मोड़े। गांड ऊपर। फिर से लंड चूत में। अब और तेज़। थप्पड़ पड़ते रहे। एक हाथ से गर्दन दबाई। साँस रोक दी थोड़ी देर। काव्या आंटी की आँखें फटीं। फिर छोड़ दिया। उन्होंने खांसते हुए साँस ली।
विक्रम ने क्रीम का ट्यूब लिया। गांड के छेद पर लगाया। उंगली अंदर। फिर दो। काव्या आंटी चीखीं। “नहीं… वहाँ नहीं…”
“चुप। आज सब जगह चोदूँगा।” विक्रम ने लंड को गांड के छेद पर रखा। जोर से धक्का। आधा अंदर। काव्या आंटी की चीख पूरे कमरे में गूँजी। उसने और धकेला। पूरा। फिर चोदने लगा। धीरे-धीरे पहले। फिर तेज़।
गांड फैल रही थी। खून की हल्की धार। लेकिन विक्रम रुका नहीं।
उसने काव्या आंटी को खींचकर बैठाया। गोद में। लंड चूत में फिर से। उनके भारी बूब्स मुँह में लिए। काटा। निप्पल चूसा। दाँत गड़ाए। काव्या आंटी रो रही थीं लेकिन कमर हिला रही थीं। विक्रम ने उनके गले में हाथ डालकर दबाया। “बोल… मैं तुम्हारा मालिक हूँ आज।”
“हाँ… मालिक…” काव्या आंटी ने फुसफुसाया।
विक्रम ने उन्हें बिस्तर से नीचे खींचा। फर्श पर। घुटनों के बल। मुँह में लंड ठूँस दिया। गला तक। काव्या आंटी ने खांसी। लार बहने लगी। विक्रम ने बाल पकड़कर सिर आगे-पीछे किया। गला चोदा। आँखों से आँसू। फिर बाहर निकाला और चेहरे पर थप्पड़ मारा। “चाट। साफ कर।”
काव्या आंटी ने चाटा। विक्रम ने उन्हें फिर बिस्तर पर लिटाया। टाँगें कंधों पर। लंड चूत में। अब बेरहमी से। हर धक्के में उनके मोटे शरीर को हिलाता। बूब्स उछलते। उसने उनके हाथ रस्सी से बाँध दिए। बिस्तर के खंभे से। फिर गांड पर चाबुक की तरह बेल्ट मारी। निशान पड़ गए। काव्या आंटी चीख रही थीं लेकिन विक्रम नहीं रुका।
“आज तुम्हें याद रहेगा कि असली मर्द कैसे चोदता है। वो लड़के सिर्फ बातें करते थे। मैं कर रहा हूँ।”
उसने तीन बार पानी गिराया। पहली बार चूत में। दूसरी बार गांड में। तीसरी बार मुँह में। काव्या आंटी ने निगल लिया। शरीर काँप रहा था। चूत और गांड दोनों लाल, सूजे हुए।
सुबह होने वाली थी। विक्रम ने रस्सी खोली। काव्या आंटी लेटी हुई थीं। शरीर पर निशान। आँखें बंद। विक्रम ने कपड़े पहने। “अब सो जाओ आंटी। कल फिर आऊँगा।”
काव्या आंटी ने आँखें खोलीं। धीमी आवाज़ में बोलीं, “आना… जरूर आना।”
विक्रम बाहर निकला। गली में अंधेरा था। उसके मन में वही दृश्य घूम रहे थे—मोटी गांड पर थप्पड़, चूत में लंड, गले में हाथ। वह मुस्कुराया। वीडियो अधूरा रह गया था। लेकिन आज असली चीज़ मिल गई थी। और यह सिर्फ शुरुआत थी।
अगली शाम करीब 10 बजे विक्रम फिर काव्या आंटी के घर पहुँचा। दरवाजा थपथपाया। काव्या आंटी ने खोला। आज साड़ी नहीं थी। सिर्फ एक ढीला नाइटी। नीचे कुछ नहीं। आँखों में इंतज़ार था। शरीर पर कल के थप्पड़ों और दाँतों के निशान अभी भी हल्के लाल थे।
“आ गया…” उन्होंने फुसफुसाया।
विक्रम अंदर घुसा। दरवाजा बंद किया। ताला लगाया। बिना एक शब्द कहे उसने काव्या आंटी के बाल पकड़कर खींचे और दीवार से सटा दिया। मुँह उनके मुँह पर दबा दिया। जीभ अंदर घुसाई। दाँत होंठ काटे। काव्या आंटी कराह उठीं। विक्रम ने नाइटी ऊपर से फाड़ दी। कपड़ा फटते ही उनके भारी बूब्स बाहर निकल आए। उसने एक निप्पल मुँह में लिया और जोर से चूसा, फिर दाँत गड़ा दिए। काव्या आंटी की चीख निकली।
“आज कोई नर्म बात नहीं होगी आंटी। कल तुमने कहा था आना। तो अब सहो।”
उसने काव्या आंटी को घसीटते हुए बेडरूम ले गया। बिस्तर के पास एक बैग रखा था जो उसने साथ लाया था। उसमें रस्सियाँ, बेल्ट, क्लिप्स, एक मोटी मोमबत्ती और एक बड़ा काला डिल्डो। काव्या आंटी की आँखें फैल गईं लेकिन उन्होंने मना नहीं किया।
विक्रम ने उन्हें नंगा किया। पूरी तरह। फिर हाथ पीछे बाँधे। रस्सी इतनी कस दी कि कलाई में निशान पड़ गए। फिर टाँगें फैलाकर टखनों को बिस्तर के दोनों खंभों से बाँध दिए। काव्या आंटी पेट के बल लेटी हुई थीं। गांड ऊपर उठी हुई। मोटी गोल चूतड़ अभी भी कल के निशानों से भरी।
विक्रम ने बेल्ट निकाली। दो बार हवा में लहराई फिर जोर से गांड पर मारी। “थप्प!” मांस हिला। लाल लकीर। काव्या आंटी चीखीं। दूसरी मार और जोर की। तीसरी। चौथी। पाँचवीं। गांड जलने लगी। विक्रम ने रुककर दोनों हाथों से चूतड़ फैलाईं और बीच में थूक दिया। फिर उंगलियाँ गांड के छेद में धकेल दीं। तीन उंगलियाँ एक साथ। अंदर-बाहर। जोर से।
“कल तुमने कहा था चार लड़के तुम्हें छूना चाहते थे। आज मैं अकेला हूँ लेकिन ऐसा चोदूँगा कि तुम्हें चारों याद आ जाएँ।”
उसने डिल्डो निकाला। मोटा, काला, नसों वाला। क्रीम लगाया। पहले चूत में घुसाया। पूरा। काव्या आंटी की कमर उछली। विक्रम ने डिल्डो को अंदर छोड़ दिया और खुद उनका मुँह खोला। अपना लंड गले तक ठूँस दिया। काव्या आंटी की आँखों से आँसू बहने लगे। लार टपकने लगी। विक्रम ने बाल पकड़कर सिर आगे-पीछे किया। गला चोदा। जब साँस फूलने लगी तो बाहर निकाला और उनके चेहरे पर थप्पड़ मारा।
“चाट। साफ कर। फिर से।”
काव्या आंटी ने चाटा। विक्रम ने फिर गले में ठूँसा। इस बार और गहरा। नाक बंद कर दी। काव्या आंटी तड़पने लगीं। जब लगभग बेहोश होने वाली थीं तभी छोड़ा। उन्होंने जोर-जोर से साँस ली। लार और आँसू से चेहरा भीगा हुआ।
विक्रम ने डिल्डो चूत से निकाला और गांड के छेद पर लगाया। बिना रुके धकेल दिया। काव्या आंटी की चीख घर में गूँजी। विक्रम ने रस्सी से उनके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया ताकि चीखें दब जाएँ। फिर डिल्डो को गांड में अंदर-बाहर करने लगा। जोर-जोर से। दूसरी हाथ से चूत में तीन उंगलियाँ। दोनों छेद एक साथ भरे।
थोड़ी देर बाद उसने डिल्डो निकालकर अपना लंड गांड में डाल दिया। पूरा। काव्या आंटी के शरीर में कंपन था। विक्रम ने उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और चोदने लगा। हर धक्के में गांड फैलती। उसने बेल्ट से फिर गांड पर मारा जबकि लंड अंदर ही था। दर्द और मजे का मिश्रण। काव्या आंटी की आँखें बंद थीं। आँसू बह रहे थे लेकिन कमर पीछे की ओर धकेल रही थीं।
विक्रम ने रस्सियाँ खोलीं। काव्या आंटी को उल्टा कर बिस्तर पर लिटाया। टाँगें कंधों पर चढ़ाईं। लंड चूत में। अब बेरहमी से पिस्टन की तरह। बिस्तर चरमरा रहा था। दीवारें थरथरा रही थीं। उसने उनके गले में दोनों हाथ डालकर दबाया। साँस रोक दी। काव्या आंटी का चेहरा लाल हो गया। आँखें फटीं। जब छोड़ता तो वे जोर से साँस लेतीं और फिर से दबा देता।
“बोल… तुम मेरी रंडी हो।”
काव्या आंटी ने मुश्किल से कहा, “हाँ… रंडी… तुम्हारी…”
विक्रम ने निप्पल्स पर क्लिप्स लगा दिए। छोटे मेटल वाले। कस दिए। काव्या आंटी तड़प उठीं। उसने क्लिप्स को खींचा। दर्द से उनकी कमर उछली। फिर लंड और तेज़ चलाया। पानी की आवाज़ आने लगी। चूत से रस बह रहा था।
उसने काव्या आंटी को खींचकर फर्श पर गिराया। घुटनों के बल। हाथ पीछे बाँधे। फिर से गला चोदा। इस बार इतना जोर कि काव्या आंटी की आँखें ऊपर पलटने लगीं। लार फर्श पर गिर रही थी। विक्रम ने बाहर निकालकर उनके चेहरे पर थूका। “निगल।”
काव्या आंटी ने निगला। विक्रम ने उन्हें फिर बिस्तर पर लिटाया। इस बार पेट के बल। हाथ और टाँगें चारों खंभों से बाँध दीं। पूरी तरह फैली हुई। फिर मोमबत्ती जलाई। मोम गलने लगा। उसने बूब्स पर टपकाया। गर्म मोम गिरते ही काव्या आंटी चीखीं। फिर पेट पर। फिर गांड पर। मोम जम गया। सफेद-सफेद धब्बे।
विक्रम ने लंड फिर गांड में डाला। अब और क्रूर। हर धक्के के साथ बेल्ट की मार। गांड लाल हो चुकी थी। जगह-जगह निशान। उसने एक हाथ से उनका मुँह दबा रखा था। दूसरे से बेल्ट चला रहा था। चोदते-चोदते उसने पहला पानी गांड में गिराया। गर्म। काव्या आंटी का शरीर काँप उठा।
लेकिन विक्रम रुका नहीं। लंड निकालकर चूत में डाल दिया। फिर से तेज़। दूसरा पानी चूत के अंदर। फिर मुँह में। काव्या आंटी ने निगल लिया। चेहरा थूक और वीर्य से चमक रहा था।
वह अभी भी बाँधी हुई थीं। विक्रम ने डिल्डो फिर से गांड में ठूँस दिया और वहीं छोड़ दिया। खुद नीचे जाकर उनकी चूत चाटने लगा। जीभ अंदर। दाँत क्लिट पर। काव्या आंटी तड़प रही थीं लेकिन रस्सियों की वजह से हिल नहीं पा रही थीं। विक्रम ने दो उंगलियाँ चूत में और जीभ क्लिट पर। जोर से चूसा। काव्या आंटी का शरीर अकड़ गया। पहला ऑर्गेज्म। वे काँप रही थीं। चूत से पानी की धार छूटी।
विक्रम मुस्कुराया। “अभी और बाकी है।”
उसने रस्सियाँ थोड़ी ढीली कीं लेकिन पूरी तरह नहीं खोलीं। काव्या आंटी को बैठाया। गोद में। लंड चूत में। उनके बूब्स मुँह में लिएऔर काटे। निप्पल पर दाँत गड़ाए इतने जोर से कि खून की बूंद निकली। काव्या आंटी रोईं लेकिन कमर हिलाती रहीं। विक्रम ने उनके गले में हडालकर फिर से दबाया। इस बार ज्यादा देर। काव्या आंटी की आँखें बंद होने लगीं तभी छोड़ा।
वह रात लंबी थी। विक्रम ने काव्या आंटी को हर पोजीशन में लिया। कभी कुत्ते की तरह, कभी उल्टी, कभी दीवार से सटाकर, कभी फर्श पर घसीटकर। रस्सियाँ, बेल्ट, क्लिप्स, डिल्डो—सब इस्तेमाल किए। गांड और चूत दोनों सूज गए। शरीर पर दर्जनों निशान। गले पर उंगलियों के निशान। निप्पल्स पर दाँतों के।
सुबह के 4 बज रहे थे जब विक्रम रुका। काव्या आंटी बिस्तर पर पड़ी थीं। शरीर काँप रहा था। आँखें आधी खुली। मुँह से लार बह रही थी। विक्रम ने उनके बाल सहलाए।
“अब सो जाओ। लेकिन याद रखना… अगली बार और ज्यादा होगा। मैं तुम्हें पूरी तरह तोड़ दूँगा। इतना कि तुम चल भी न पाओ।”
काव्या आंटी ने धीमी आवाज़ में कहा, “आना… तोड़ना… मुझे तुम्हारी रंडी बना दो हमेशा के लिए।”
विक्रम ने कपड़े पहने। बैग समेटा। दरवाजे पर जाकर मुड़ा। “कल रात 9 बजे। तैयार रहना। आज जो सहोगी उससे कहीं ज्यादा बुरा होगा।”
वह निकल गया। काव्या आंटी अकेली बिस्तर पर लेटी रहीं। शरीर दर्द से भरा हुआ। लेकिन अंदर एक अजीब सी आग जल रही थी। वे जानती थीं कि अगली रात और क्रूर होगी। और वे इंतज़ार करेंगी।
कहानी खत्म नहीं हुई थी। वह तो और गहराई में जाने वाली थी। अगली रात विक्रम और सामान लेकर आएगा। और काव्या आंटी की चीखें रात भर गूँजेंगी।
Pingback: mausi ki chudai story :- मौसी की चेन - Lustystories