मालिक ने लौटी हुई संपत्ति को शीशे के सामने बाँधकर पुराने निशान मिटाए, ठंडे पानी से नहलाया और अगली बार औरतों के हवाले करने का नया फैसला सुना दिया।
तीसरे दिन सुबह रुद्रक्ष के कमरे में अनन्या फिर घुटनों के बल बैठी थी। शरीर पर पिछले वारों के निशान अभी भी काले-बैंगनी थे। निप्पल सूजे हुए। गुदा हल्की-हल्की जल रही थी। कॉलर की चेन फर्श से बंधी हुई थी।
रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठा अखबार पढ़ रहा था। काली पजामा, नंगे पैर। उसके जूते अनन्या के ठीक सामने रखे थे।
“शुरू कर।”
अनन्या झुकी। जीभ निकाली और पहले दाएँ जूते के तलवे पर फेरने लगी। धूल, पुरानी मिट्टी और उसके अपने पसीने का स्वाद। वह दोनों जूते पूरी तरह चाट चुकी थी जब रुद्रक्ष ने अखबार बंद किया।
“अब अगला।”
उसने पजामा का नाड़ा खोला। मोटा लंड बाहर निकल आया। अनन्या ने मुँह खोला। रुद्रक्ष ने सिर पकड़कर गले तक धकेल दिया। बिना पानी के, बिना नहाए, जैसे की थी वैसे। अनन्या की आँखों से पानी बहने लगा। लार ठोड़ी से टपक रही थी। रुद्रक्ष ने दो मिनट तक पकड़े रखा फिर निकाला।
“आज तू जाने वाली है।”
अनन्या की आँखें उठो। डर साफ दिख रहा था।
रुद्रक्ष ने ठंडी आवाज में बताया, “मेरा पार्टनर विक्रम सेठ। बंबई। तीन दिन। वह तुझे अपने फार्म हाउस ले जाएगा। वहाँ उसके दो और दोस्त भी रहेंगे। तू उनकी रहेगी। जैसे वे चाहें। लौटकर मुझे एक-एक बात बतानी होगी। कहाँ छुआ, कहाँ भरा, कितनी बार, क्या-क्या बोला। एक भी बात छिपाई तो मैं तेरी जीभ काट लूँगा। समझी?”
अनन्या ने काँपते हुए सिर हिलाया।
“जवाब दो।”
“समझ गई… रुद्रक्ष सर।”
रुद्रक्ष उठा। उसने अनन्या को खड़ा किया। नहाने की इजाजत नहीं दी। बस एक काली साड़ी का पल्लू उसके शरीर पर लपेट दिया। नीचे कुछ नहीं। कॉलर वैसा ही। चेन उसके हाथ में।
गाडी एयरपोर्ट तक गई। प्राइवेट जेट में अनन्या को फर्श पर बैठाया गया। उड़ान के दो घंटे वह चुपचाप बैठी रही। शरीर में वह खालीपन फिर से उभर रहा था।
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बंबई के फार्म हाउस में विक्रम सेठ खुद गेट पर खड़ा था। पैंतालीस साल का, भारी शरीर, छोटी मूँछें, ठंडी मुस्कान। उसके पीछे दो और पुरुष—एक दुबला लंबा, एक मोटा गंजा।
रुद्रक्ष ने चेन विक्रम के हाथ में थमा दी।
“तीन दिन। जैसे चाहो इस्तेमाल करो।
बस चेहरा और जीभ मत काटना। बाकी आजादी तुम्हारी।”
विक्रम ने अनन्या को सर से लेकर पैर तक देखा। “ठीक है रुद्रक्ष। लौटाते समय बताऊँगा कैसी रही।”
रुद्रक्ष चला गया। गाडी की आवाज दूर हुई। अनन्या अकेली रह गई तीन अजनबियों के बीच।
विक्रम ने चेन खींची। “अंदर चल।”
बड़े हॉल में ले जाकर उसने साड़ी का पल्लू खींचकर फेंक दिया। अनन्या नंगी खड़ी थी। तीनों ने घेर लिया।
विक्रम ने पहले निप्पल पकड़कर मरोड़े। “सूजे हुए हैं। रुद्रक्ष ने अच्छा काम किया।” फिर उसने अनन्या को फर्श पर धकेल दिया। “मुँह खोल।”
दुबले वाले ने पहले लंड निकाला और गले तक ठूंस दिया। मोटे वाले ने पीछे से चूत में उंगलियाँ घुसा दीं। विक्रम खुद कुर्सी पर बैठकर देख रहा था।
“आज रात तीनों एक साथ लेंगे। मुँह, चूत, गाँड। बारी-बारी नहीं। एक साथ।”
अनन्या की आँखें फटी रह गईं। दुबला वाला मुँह में जोर-जोर से पेल रहा था। मोटा वाला चूत में तीन उंगलियाँ फैला रहा था। विक्रम ने उठकर प्लग जैसा मोटा खिलौना निकाला और गुदा में धकेल दिया। अनन्या की चीख लंड में दब गई।
रात भर यही चला। कभी फर्श पर, कभी सोफे पर, कभी टेबल पर लिटाकर। तीनों बारी-बारी से और फिर एक साथ। अनन्या का शरीर उनके वजन से दब रहा था। मुँह में एक, चूत में दूसरा, गाँड में तीसरा। हर बार जब कोई झड़ता तो दूसरा उसकी जगह ले लेता। शरीर पर उनके नाखूनों के निशान, दांतों के निशान, थप्पड़ों के निशान पड़ गए।
दूसरे दिन सुबह विक्रम ने अनन्या को बगीचे में नंगी घुमाया। माली और चौकीदार देख रहे थे। उसने अनन्या को पेड़ से बाँध दिया और तीनों ने बारी-बारी से कोड़े मारे। पीठ, नितंब, जांघें। खून की लकीरें बहने लगीं। फिर उसी हालत में तीनों ने फिर से भरा।
तीसरे दिन विक्रम ने अनन्या को अपने बेडरूम में ले जाकर बिस्तर से बाँध दिया। पूरे दिन वह कभी सोने नहीं दिया। हर घंटे कोई न कोई आता और इस्तेमाल करता। कभी सिर्फ उंगलियों से, कभी लंड से, कभी खिलौनों से। अनन्या की आवाज अब सिर्फ सिसकियों में रह गई थी। शरीर सुन्न पड़ने लगा था। लेकिन अंदर वह खालीपन और गहरा हो रहा था।
तीसरे दिन शाम को रुद्रक्ष खुद आने वाला था। विक्रम ने अनन्या को नहलाया नहीं। बस एक तौलिया दिया। शरीर पर सूखे हुए पानी, खून के धब्बे, नाखूनों के निशान सब वैसे ही थे।
जब रुद्रक्ष अंदर आया तो अनन्या फर्श पर घुटनों के बल बैठी थी। सिर नीचे। चेन विक्रम के हाथ में।
रुद्रक्ष ने ठंडी आँखों से देखा। “कैसी रही?”
विक्रम हँसा। “बढ़िया संपत्ति है तेरी। तीन दिन में पैंतीस बार भरी गई। मुँह में बारह, चूत में चौदह, गाँड में नौ। कोड़े के निशान भी अच्छे पड़े। लौटा रहा हूँ।”
रुद्रक्ष ने चेन लिया। अनन्या को खींचकर अपने पास किया। उसके बाल पकड़कर मुँह ऊपर उठाया।
“अब बता। एक-एक बात। कहाँ-कहाँ छुआ। कैसे भरा। क्या-क्या बोला। सब।”
अनन्या की आवाज काँप रही थी। वह बताने लगी। विस्तार से। कैसे दुबले वाले ने गले तक ठूंसा, कैसे मोटे वाले ने एक साथ दो उंगलियाँ और लंड डालने की कोशिश की, कैसे विक्रम ने पेड़ से बाँधकर कोड़े मारे और फिर उसी हालत में गाँड में झड़ा। हर बात। हर विवरण।
रुद्रक्ष सुनता रहा। चेहरे पर कोई भाव नहीं। जब अनन्या खत्म हुई तो उसने धीरे से कहा।
“अच्छी। अब घर चल।”
गाडी में अनन्या फिर फर्श पर बैठी। रुद्रक्ष ऊपर सीट पर। रास्ते भर वह चुप रहा। घर पहुँचकर उसने अनन्या को सीधे अपने कमरे में ले जाया। ढांचे पर बाँध दिया।
“तीन दिन किसी और ने इस्तेमाल किया। अब मैं साफ करूँगा।”
उसने मोटी छड़ी उठाई। बिना गिने वार शुरू कर दिए। पीठ पर, नितंबों पर, जांघों पर। हर वार के साथ अनन्या चीख रही थी। खून की नई धारें पुराने निशानों पर बहने लगीं। बीस, तीस, चालीस। रुद्रक्ष रुका नहीं।
फिर उसने अनन्या की चूत और गाँड दोनों में बारी-बारी से अपना लंड धकेला। जोर से। गहराई तक। जैसे वह किसी और के निशान मिटा रहा हो। अनन्या का शरीर ढांचे पर झूल रहा था। आवाज टूट चुकी थी।
अंत में रुद्रक्ष अंदर ही झड़ गया। पहले गाँड में, फिर चूत में। उसने लंड निकालकर अनन्या के मुँह में ठूंस दिया।
“चाट। साफ कर। अब तू फिर से सिर्फ मेरी है।”
अनन्या ने चाटा। स्वाद मुँह में फैल गया।
रुद्रक्ष ने बंधन खोले। अनन्या फर्श पर गिर पड़ी। वह कुर्सी पर बैठकर सिगार जलाने लगा। धुआँ उठ रहा था।
“अगला नियम। आज से तू रोज़ रात मुझे बताएगी कि दिन भर तेरे शरीर ने क्या महसूस किया। दर्द कहाँ था, गर्मी कहाँ थी, कब गिरने का मन हुआ। एक भी बात छिपाई तो अगली बार विक्रम के पास एक हफ्ते के लिए भेज दूँगा।”
अनन्या फर्श पर पड़ी हांफ रही थी। शरीर जल रहा था। लेकिन अंदर वह खालीपन अब और गहरा हो चुका था। तीन दिन की यादें, कुत्तों की रात, जूतों का स्वाद, और अब यह नया हुक्म।
रुद्रक्ष ने आखिरी कश लिया। ठंडी आवाज गूँजी।
“सो जा। कल सुबह जूते और लंड दोनों तैयार रखना। और हाँ… अगले महीने मैं तुझे एक और जगह ले जाऊँगा। जहाँ सिर्फ पुरुष नहीं, औरतें भी होंगी। वे तुझे अपने तरीके से तोड़ेंगी। मैं सिर्फ देखूँगा।”
अनन्या की आँखें अंधेरे में खुली रह गईं। नया डर। नई भूख। चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अभी भी जारी था। और अगला चक्र और काला होने वाला था।
अनन्या फर्श पर पड़ी-पड़ी काँप रही थी। शरीर पर विक्रम और उसके दोस्तों के नाखूनों के निशान, दांतों के निशान और रुद्रक्ष की छड़ी के ताजे लाल-बैंगनी निशान एक साथ चमक रहे थे। चूत और गाँड दोनों से रुद्रक्ष का गाढ़ा पानी अभी भी धीरे-धीरे रिस रहा था। गर्दन का कॉलर हर सांस के साथ काँटे चुभा रहा था।
रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठा सिगार पी रहा था। धुएँ के घेरे में उसकी ठंडी आँखें अनन्या को देख रही थीं। वह कुछ देर चुप रहा। फिर बोला,
“रात अभी बाकी है। तीन दिन किसी और ने तुझे भरा। अब मैं तुझे याद दिलाऊँगा कि असली मालिक कौन है।”
उसने सिगार ऐशट्रे में दबाई। उठा। अनन्या के बालों को मुट्ठी में जकड़कर खींचा। वह दर्द से सिसकी लेकिन आवाज दबा ली। रुद्रक्ष उसे घसीटते हुए कमरे के कोने में लगे बड़े शीशे वाले अलमारी के पास ले गया। अलमारी का दरवाजा खोला। अंदर काले चमड़े के औजार, धातु की छड़ें, तेज नोक वाले क्लैंप और एक लंबी मोटी रस्सी रखी थी।
“आज मैं तुझे पूरा खोलूँगा।”
उसने अनन्या को शीशे के सामने खड़ा किया। दोनों हाथ ऊपर खींचकर छत की रिंग से बाँध दिए। पैर फैलाकर टखनों में भारी वजन बाँध दिए ताकि वह बंद न कर सके। अब अनन्या की पूरी नंगी काया शीशे में साफ दिख रही थी—सूजे निप्पल, खून के धब्बे, चिपचिपी जांघें।
रुद्रक्ष ने पीछे से आकर उसके कान में फुसफुसाया, “देख खुद को। तीन दिन में कितनी गंदी हो गई। अब मैं साफ करूँगा।”
उसने पहले दोनों निप्पलों पर नए, और सख्त क्लैंप लगाए। स्प्रिंग इतने तगड़े थे कि अनन्या की आँखें फट गईं। फिर उन क्लैंप से पतली चेन निकालकर उसके कॉलर से जोड़ दी। हर बार सांस लेने पर निप्पल खिंचते।
फिर उसने एक लंबी धातु की छड़ ली जिसके सिरे पर छोटी-छोटी काँटेदार गाँठें थीं। बिना किसी चेतावनी के नितंबों पर वार शुरू कर दिए। एक… दो… तीन… गाँठें मांस में धँसतीं। खून की ताजी धारें बहने लगीं। अनन्या चीख रही थी लेकिन शीशे में अपनी ही चीखती सूरत देखकर और तड़प रही थी।
पचास वार बाद रुद्रक्ष रुका। नितंबों का मांस सूजकर फटने को था। उसने छड़ नीचे रखी और दोनों हाथों से नितंब फैलाए। गुदा का छेद काँप रहा था। उसने थूकने की जगह सीधे अपना लंड रखा और एक ही जोरदार धक्के में जड़ तक धकेल दिया। अनन्या की चीख शीशे से टकराकर लौटी।
रुद्रक्ष ने कमर पकड़कर पागलों की तरह पेलना शुरू किया। हर धक्का इतना गहरा था कि अनन्या का पेट शीशे से टकरा रहा था। निप्पल क्लैंप खिंच-खिंचकर खून की बूँदें गिरा रहे थे।
“बोल। तीन दिन में कितनों ने भरा?”
“तीन… ने…”
“जोर से। गिनती बता।”
“पैंतीस बार… मुँह में बारह… चूत में चौदह… गाँड में नौ…”
रुद्रक्ष और तेज हो गया। एक हाथ से उसने अनन्या के बाल खींचे तो दूसरा हाथ आगे जाकर उसकी चूत में तीन उंगलियाँ घुसा दीं। उंगलियाँ और लंड दोनों एक साथ काम कर रहे थे। अनन्या का शरीर शीशे पर रगड़ खा रहा था। आवाज अब सिर्फ अस्पष्ट रोने जैसी रह गई थी।
अचानक रुद्रक्ष रुका। लंड अंदर ही रखा। उंगलियाँ भी अंदर। उसने अनन्या के कान में कहा,
“गिर। अभी। शीशे में देखती हुई गिर।”
अनन्या ने सिर हिलाया। आँसू बह रहे थे। रुद्रक्ष ने उंगलियाँ और जोर से मोड़ीं। साथ में लंड पूरा अंदर धकेला। अनन्या का शरीर अकड़ गया। एक लंबी फटी चीख निकली। चूत धड़कने लगी। पानी उंगलियों पर और जांघों पर बहने लगा। वह गिर गई। शीशे में अपनी काँपती सूरत देखती हुई।
रुद्रक्ष ने मुस्कुराते हुए पेलना जारी रखा। अनन्या की संवेदनशीलता चरम पर थी। हर धक्का बिजली जैसा लग रहा था। वह रो रही थी लेकिन शरीर खुद पीछे की तरफ धकेल रहा था। रुद्रक्ष ने आखिरी दस धक्के और क्रूरता से दिए फिर गाँड में ही झड़ गया। गर्म धार अंदर भर गई।
उसने लंड निकाला। पानी रिसने लगा। रुद्रक्ष ने उंगलियों से उसे चुपड़ा और अनन्या के मुँह में ठूंस दिया।
“निगल। तीन दिन का और मेरा दोनों।”
अनन्या ने निगल लिया। स्वाद मुँह में फैल गया।
रुद्रक्ष ने बंधन नहीं खोले। वह पीछे हटकर कुर्सी पर बैठ गया। नई सिगार जलाई। धुआँ उठ रहा था। अनन्या शीशे के सामने बाँधी हुई काँप रही थी। खून और पानी दोनों टपक रहे थे।
“रात अभी खत्म नहीं हुई।”
उसने एक नौकर को बुलाया। नौकर ने एक बाल्टी ठंडा पानी और एक मोटा रस्सी का फंदा लेकर आया। रुद्रक्ष ने अनन्या के बालों को फंदे में कसकर छत की दूसरी रिंग से बाँध दिया। अब सिर और ऊपर खिंच गया। फिर बाल्टी का पूरा ठंडा पानी उसके शरीर पर उड़ेल दिया। खून मिला पानी फर्श पर फैल गया। अनन्या काँप उठी। ठंड और दर्द एक साथ।
रुद्रक्ष उठा। उसने फिर छड़ी उठाई। इस बार जांघों के अंदरूनी हिस्से पर वार किए। संवेदनशील जगह। हर वार के साथ अनन्या की चीख और तेज होती गई। जब दोनों जांघें लाल-बैंगनी हो गईं तब उसने छड़ी फेंकी।
अब वह अनन्या के सामने खड़ा हो गया। लंड फिर से सख्त हो चुका था। उसने अनन्या के मुँह में धकेल दिया। गले तक। बालों के फंदे की वजह से अनन्या पीछे नहीं हट सकती थी। रुद्रक्ष ने सिर पकड़कर जोर-जोर से पेलना शुरू किया। लार और आँसू मुखौटे की जगह अब सीधे चेहरे पर बह रहे थे।
जब वह करीब आया तो निकाला और अनन्या के चेहरे पर ही झड़ गया। गर्म पानी आँखों, नाक, मुँह पर लगा। रुद्रक्ष ने उंगलियों से उसे मल दिया।
“ऐसे ही रह। सुबह तक। शीशे के सामने। अपने गंदे चेहरे को देखती रह।”
उसने कमरे की लाइट मंद कर दी। खुद बिस्तर पर लेट गया। अनन्या बाँधी हुई खड़ी रही। गर्दन और बाल दोनों खिंचे। पैरों के वजन भारी। खून और पानी टपकता रहा। शरीर काँपता रहा।
सुबह की पहली रोशनी जब आई तो रुद्रक्ष उठा। उसने अनन्या के बंधन खोले। वह ढेर हो गई। रुद्रक्ष ने उसके बालों से खींचकर घुटनों के बल बैठाया। अपने जूते सामने रख दिए।
“शुरू कर। जूते। फिर लंड। बिना पानी के।”
अनन्या ने काँपती जीभ से जूते चाटे। तलवा, किनारे, ऊपर। गंदा स्वाद। फिर रुद्रक्ष का लंड मुँह में लिया। गले तक। रुद्रक्ष ने दो मिनट तक पकड़े रखा। निकाला। अनन्या लार से सनी हुई बैठी रही।
रुद्रक्ष ने उसके गाल पर थप्पड़ मारा। “अच्छी। अब सुन नई बात।”
वह कुर्सी पर बैठ गया। अनन्या अभी भी घुटनों पर थी।
“अगले महीने मैं तुझे एक खास जगह ले जाऊँगा। वहाँ सिर्फ अमीर औरतें होंगी। वे तुझे खरीदेंगी एक रात के लिए। मैं कीमत लूँगा। वे तुझे अपने तरीके से तोड़ेंगी—नाखून से, सिगरेट से, अपनी चूत से, अपनी मुट्ठी से। तू सब सहेगी। लौटकर मुझे हर विवरण बताना होगा। और उस रात के बाद तू खुद माँगेगी कि मैं तुझे फिर से वहाँ भेजूँ। समझी?”
अनन्या की आँखों में नया अंधेरा छा गया। शरीर काँप रहा था। लेकिन चूत हल्की सी भींच गई। वह खालीपन फिर से जाग उठा।
रुद्रक्ष ने ठंडी मुस्कान दी। “अब जाकर कोने में लेट जा। दो घंटे बाद मैं फिर से आने वाला हूँ। और तब मैं तुझे और गहराई में ले जाऊँगा। आज सिर्फ शरीर नहीं, तेरी याददाश्त भी तोड़नी है।”
अनन्या रेंगकर कोने में चली गई। फर्श ठंडा था। शरीर जल रहा था। दिमाग में विक्रम के तीन दिन, कुत्तों की रात, जूतों का स्वाद और अब औरतों वाली रात की तस्वीरें घूम रही थीं।
चेन हल्की सी खनकी। कमरे में सिर्फ उसकी भारी साँसें गूँज रही थीं। तोड़ना अभी भी जारी था। और अगला चक्र पहले से कहीं ज्यादा काला और गहरा होने वाला था।
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