देवर अर्जुन को भाभी काव्या ने कॉलर पहनाकर अपना कुत्ता बना लिया। चाबुक, मोम, डिल्डो और पिंजरे की क्रूर सजाओं में डूबी वह रातें, जहाँ दर्द ही सबसे बड़ा मजा बन जाता है।
मेरा नाम अर्जुन राठौर है। मैं उदयपुर का रहने वाला हूँ। उम्र 26 साल। शरीर कसा हुआ, कद 5 फीट 11 इंच, और जो चीज़ महिलाओं को रातों की नींद उड़ा देती है वह है मेरा लंड—9 इंच लंबा और 4 इंच मोटा, नसों से भरा हुआ, सिर पर हल्का झुकाव लिए हुए। मैंने अब तक 17 विवाहित महिलाओं को चोदा है, जिनमें से ज़्यादातर अपनी सहेलियों के ज़रिए आईं। लेकिन जो कहानी आज सुनाने जा रहा हूँ, वह बाकी सब से अलग है। वह क्रूर थी, गंदी थी, दर्द और मज़े की सीमाओं को पार कर गई थी।
दो साल पहले की बात है। मैं कॉलेज खत्म करके उदयपुर में एक छोटी सी कंपनी में जॉब कर रहा था। पैसा कम था। एक दिन फेसबुक पर एक बंद ग्रुप मिला—‘राजस्थान हॉट वाइव्स सर्विस’। उसमें लिखा था कि विवाहित औरतें पैसे देकर जवान लड़कों से रात भर की सर्विस लेती हैं। मैंने प्रोफाइल बनाई। तीन दिन बाद एक नंबर से कॉल आया। आवाज़ में हल्की सी पकी हुई मिठास थी।
“तुम अर्जुन हो? 26 साल? फोटो में जो दिखाया है वैसा ही हो?”
“हाँ।”
“कल रात 11 बजे आना। पता भेजूँगी। नकद मिलेगा। और अगर तुमने अच्छा चोदा तो दोबारा बुलाऊँगी।”
पता आया—हिरन मगरी इलाके में एक बड़ा बंगला। मैं पहुँचा। दरवाज़ा खोला एक औरत ने। उम्र 37 साल। नाम मालिनी शर्मा। शरीर 38-28-40। गोरी नहीं, गेहुँआ रंग की, लेकिन चमकदार। बड़े-बड़े स्तन, पतली कमर, चौड़ी कूल्हे। बाल कंधों तक काले, आँखें तीखी। उसने सिर्फ एक काले रंग की शिफ़ॉन नाइटी पहनी थी, नीचे कुछ नहीं। निप्पल नाइटी से झाँक रहे थे।
उस रात मैंने उसे तीन बार चोदा। पहली बार बिस्तर पर, दूसरी बार बाथरूम की दीवार से लगाकर, तीसरी बार बालकनी में खड़ी करके। वह चीखी, काँपी, मेरे बालों को नोचा, और आखिर में मेरे लंड को चाटते हुए बोली, “तुम्हारा लंड जहर है… मुझे और चाहिए।”
मैं चला गया। पैसे लिए। सोचा काम खत्म। लेकिन तीन हफ्ते बाद फिर कॉल आया। आवाज़ मालिनी की नहीं थी।
“अर्जुन? मेरी सहेली मालिनी ने तुम्हारा नंबर दिया। मैं भी तुमसे सर्विस लेना चाहती हूँ। लेकिन शर्त है—फोटो नहीं भेजूँगी। तुम मेरे घर आओगे। पता अभी देती हूँ।”
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पता सुनकर मेरी साँस अटक गई। वही हिरन मगरी का इलाका, लेकिन अलग गली। घर पहुँचा तो दरवाज़ा खोला जिस औरत ने, उसे देखकर मेरा दिमाग घूम गया।
वह मेरी भाभी थी। नाम काव्या राठौर। मेरे बड़े भाई रोहित की पत्नी। उम्र 34 साल। शरीर 37-29-41। गेहुँआ रंग, घने काले बाल कमर तक, होंठ मोटे, आँखों में हमेशा एक ठंडी चमक। मैंने उसे हमेशा सम्मान से देखा था। आज वह दरवाज़े पर खड़ी थी सिर्फ एक लाल रंग की रेशमी नाइटी में, जिसके नीचे कुछ नहीं था। निप्पल सख्त हो चुके थे।
“अंदर आओ देवर जी,” उसने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा। “मालिनी ने सब बता दिया।”
मेरे पैर काँप रहे थे। “भाभी… यह क्या… मैं…”
उसने दरवाज़ा बंद किया और ताला लगा दिया। फिर मेरे कॉलर को पकड़कर दीवार से सटा दिया। आवाज़ अब नरम नहीं थी।
“तुमने मेरी सहेली को चोदा। उसने कहा तुम्हारा लंड उसे रात भर रोने पर मजबूर कर देता है। मैंने फोटो माँगी तो मालिनी ने भेज दी। पहचान लिया। फिर सोचा—अगर यह लंड मेरी सहेली को इतना मज़ा दे सकता है तो मुझे क्यों नहीं?”
“भाभी कृपया… भाई…”
उसने मेरे मुँह पर तमाचा जड़ दिया। जोर से। गाल जल गया।
“भाई का नाम मत ले। आज से तुम मेरा कुत्ता हो। समझे?”
मैं चुप रहा। वह मुझे कमरे में घसीट ले गई। कमरा अंधेरा था, सिर्फ एक लाल बत्ती जल रही थी। दीवारों पर चमड़े के पट्टे, रस्सियाँ, एक लकड़ी का स्टैंड, और बिस्तर के चारों कोनों पर लोहे के छल्ले लगे थे।
काव्या ने नाइटी उतार दी। नंगी खड़ी हो गई। स्तन भारी थे, निप्पल गहरे भूरे, कूल्हे चौड़े, चूत पर घने काले बालों का त्रिकोण। उसने मेरे कपड़े फाड़ दिए। लंड पहले से ही कठोर हो चुका था।
“घुटनों के बल बैठो,” उसने हुक्म दिया।
मैं बैठ गया। उसने मेरे मुँह में अपना चूत का रस भरा अंगूठा घुसेड़ दिया।
“चाटो। अच्छे से।”
मैंने चाटा। कड़वा-मीठा स्वाद। वह मेरे बालों को पकड़कर अपने ऊपर दबा रही थी। फिर अचानक पीछे से मेरे दोनों हाथों को रस्सी से बाँध दिया। कसकर। कलाई कटने लगीं।
“आज तुम सिर्फ चोदोगे नहीं। आज तुम सहोगे भी।”
उसने मुझे बिस्तर पर धकेला। पेट के बल लिटाया। दोनों टाँगें फैला दीं और टखनों को छल्लों में बाँध दिया। फिर एक काले चमड़े का चाबुक उठाया। पहली मार कमर पर पड़ी। जलन इतनी तेज़ थी कि मैं चीख पड़ा। दूसरी मार जाँघों पर। तीसरी गांड के बीच।
“चुप रहो कुत्ते,” उसने कहा और चाबुक को मेरे मुँह में दबा दिया। “काटो इसे।”
फिर वह मेरे ऊपर सवार हो गई। अपनी गीली चूत को मेरे मुँह पर रख दिया।
“चाटो। जब तक मैं न कहूँ रुकना मत। वरना चाबुक और चलेगा।”
मैंने चाटा। जीभ अंदर तक घुसाई। वह हिल रही थी, कराह रही थी, मेरे बालों को नोच रही थी। अचानक उसके शरीर में कंपन दौड़ा और गर्म पानी जैसा कुछ मेरे मुँह में भर गया। वह झड़ गई थी। लेकिन रुकी नहीं।
“अब बारी तुम्हारी।”
उसने मुझे उलटा किया। लंड हवा में तना हुआ था। उसने एक पतली रस्सी ली और लंड की जड़ से सिर तक कसकर बाँध दी। खून का बहाव लगभग रुक गया। दर्द तेज़ था। फिर वह अपने मुँह में ले गई। गहरी। गले तक। आवाज़ें निकल रही थीं—घुर्र-घुर्र। वह ऊपर-नीचे कर रही थी, कभी दाँत लगा रही थी, कभी जीभ से नसों को चाट रही थी। जब मैं चरम पर पहुँचने वाला था तो उसने मुँह हटा लिया और रस्सी और कस दी।
“आज तुम बिना इजाजत के नहीं झड़ोगे।”
उसने मुझे खड़ा किया। हाथ अभी भी बँधे थे। वह मेरे सामने घुटनों के बल बैठी और अपने स्तनों के बीच लंड को दबा लिया। ऊपर-नीचे। निप्पल रगड़ रहे थे। फिर अचानक उठी और दीवार की तरफ मुँह करके खड़ी हो गई। दोनों हाथ दीवार पर टिका दिए।
“अब चोदो। लेकिन धीरे। अगर जोर से किया तो चाबुक फिर चलेगा।”
मैंने पीछे से प्रवेश किया। उसकी चूत इतनी गीली थी कि आसानी से अंदर चला गया। लेकिन रस्सी की वजह से लंड और भी सख्त और दर्दनाक हो चुका था। मैं धीरे-धीरे धक्का देने लगा। वह कराह रही थी।
“और अंदर… पूरा… हाँ ऐसे…”
मैंने पूरा घुसा दिया। कूल्हे उसकी गांड से टकरा रहे थे। आवाज़ गूँज रही थी—थप-थप-थप। अचानक उसने कहा, “रुको।”
मैं रुक गया। वह मुड़ी। आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
“अब गांड में।”
मेरे होश उड़ गए। उसने बिस्तर से एक छोटी सी बोतल उठाई—तेल। अपनी गांड पर लगाई, फिर मेरे लंड पर। फिर फिर से दीवार की तरफ मुँह करके खड़ी हो गई और दोनों हाथों से अपनी गांड के छेद को फैला दिया।
“धीरे से डालो। लेकिन पूरा।”
मैंने सिर रखा। दबाव डाला। वह सिसकने लगी। धीरे-धीरे आधा अंदर गया। फिर पूरा। उसकी गांड इतनी कसकर दब रही थी कि मुझे साँस लेने में तकलीफ हो रही थी। मैं हिलने लगा। पहले धीरे, फिर तेज़। वह चीख रही थी—आह… उह्ह… मार डालोगे… लेकिन रुकने के लिए नहीं कह रही थी।
एक घंटे तक मैंने उसकी गांड चोदी। बीच-बीच में वह मुड़कर मेरे मुँह में थूकती, गाली देती, फिर फिर से दीवार पकड़ लेती। आखिर में जब मैं झड़ने वाला था तो उसने कहा, “बाहर निकालो। मेरे मुँह में।”
मैंने निकाला। वह घुटनों के बल बैठ गई। मुँह खोला। मैंने उसके मुँह में झड़ दिया। गाढ़ा वीर्य उसकी जीभ पर, गले में, होठों पर। उसने सब निगल लिया। फिर मेरा लंड साफ किया।
रात अभी खत्म नहीं हुई थी।
उसने मुझे फिर से बाँधा। इस बार पीठ के बल। दोनों हाथ ऊपर, टाँगें फैली हुई। फिर वह एक छोटी सी मोमबत्ती लाई। जलाई। मोम पिघलने लगी। पहली बूँद मेरे सीने पर गिरी। जलन। मैं तड़प उठा। दूसरी बूँद निप्पल पर। तीसरी लंड पर। वह हँस रही थी।
“दर्द अच्छा लगता है ना कुत्ते?”
फिर उसने एक छोटी सी चमड़े की पट्टी ली जिसमें छोटे-छोटे काँटे लगे थे। उसे मेरे लंड पर रगड़ने लगी। दर्द और मज़े का मिश्रण। मैं कराह रहा था। वह अपने ऊपर सवार हो गई। चूत में लंड डाल लिया और ऊपर-नीचे होने लगी। एक हाथ से अपने स्तन मसल रही थी, दूसरे से मेरे गले को दबा रही थी।
“आज से तुम सिर्फ मेरे हो। जब भी बुलाऊँगी आओगे। भाई के सामने मुस्कुराना, लेकिन रात को मेरी गांड चाटना। समझे?”
मैंने सिर हिलाया। वह और तेज़ हिलने लगी। चूत की आवाज़ें कमरे में गूँज रही थीं। अचानक उसके शरीर में कंपन दौड़ा। वह झड़ गई। गर्म रस मेरे लंड पर बह रहा था। फिर उसने रस्सी खोली। लंड में खून दौड़ा। दर्द तेज़ था। लेकिन उसी दर्द में मैंने फिर से सख्त कर लिया।
बाकी की रात हमने हर कोने में चोदा। फर्श पर, कुर्सी पर, बाथरूम की टाइल पर, यहाँ तक कि रसोई के काउंटर पर भी। वह कभी ऊपर होती, कभी नीचे। कभी मेरे मुँह में पेशाब करती, कभी मेरे लंड को चाबुक से मारती। सुबह चार बजे जब हम थककर बिस्तर पर गिरे तो उसके शरीर पर मेरे नाखूनों के निशान थे, मेरे शरीर पर उसके दाँतों और चाबुक के।
सुबह उसने मुझे चाय पिलाई। नंगी ही।
“अगली बार जब भाई बाहर जाएँगे तो तुम आना। और अगली बार और सख्त होगा। समझे अर्जुन?”
मैंने सिर हिलाया।
उसके बाद से हर हफ्ते जब भाई किसी ट्रिप पर जाते, काव्या मुझे बुलाती। कभी घर पर, कभी होटल में। हर बार कुछ नया। कभी मुझे कुत्ते की तरह रस्सी से बाँधकर घुमाती, कभी मेरे लंड पर बर्फ रखती और फिर गर्म मोम। कभी मुझे अपना पेशाब पीने को कहती, कभी अपनी सहेली मालिनी को भी बुला लेती और दोनों मिलकर मुझे सतातीं।
एक रात उसने कहा, “तुम्हारा लंड अब सिर्फ मेरी चूत और गांड के लिए है। अगर किसी और को छुआ तो काट दूँगी।”
और मैं मान गया।
आज भी जब भाई घर पर होते हैं तो हम दोनों सामान्य रहते हैं। वह मुझे भाभी कहकर बुलाती है, मैं आदर से जवाब देता हूँ। लेकिन रात को जब अंधेरा होता है और फोन बजता है, तो मैं जान जाता हूँ कि आज फिर से उसका कुत्ता बनना है।
रात को फोन बजा। स्क्रीन पर काव्या का नाम चमक रहा था। मैंने तुरंत उठाया। आवाज़ में वही ठंडी हुक्म थी।
“अभी निकलो। भाई दो दिन के लिए जयपुर गए हैं। तुम सीधे घर आओ। देर की तो सज़ा और बढ़ेगी।”
मैंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ “हाँ” बोला और निकल पड़ा। हिरन मगरी का वह बंगला अब मेरा दूसरा घर बन चुका था। दरवाज़ा खुला था। अंदर घुसा तो लाल बत्ती जल रही थी। काव्या नंगी खड़ी थी। हाथ में काला चमड़े का कॉलर और लंबी चेन। आँखों में वह चमक जो हमेशा खून और मज़े की भूख जगाती थी।
“घुटनों पर।”
मैं झुक गया। उसने कॉलर मेरे गले में कस दिया। चेन खींची। मैं रेंगता हुआ उसके पीछे-पीछे कमरे में गया। इस बार कमरा और भी सजाया गया था। छत से मोटी रस्सियाँ लटक रही थीं। एक लोहे का पिंजरा कोने में रखा था। बिस्तर के पास एक लकड़ी का क्रॉस खड़ा था, जिस पर चमड़े की पट्टियाँ लगी थीं।
काव्या ने चेन को छत की रस्सी से बाँध दिया। मेरे हाथ ऊपर उठ गए। फिर उसने मेरी टाँगें फैलाकर टखनों को फर्श के छल्लों में कस दिया। लंड पहले से ही तना हुआ था। उसने एक पतली धातु की अंगूठी लंड की जड़ में फँसाई और कस दी। खून का बहाव लगभग थम गया। दर्द तेज़ था, लेकिन वह दर्द अब मेरी लत बन चुका था।
“आज तुम बोलोगे नहीं,” उसने कहा और मेरे मुँह में एक बड़ा सा रबर का गैग ठूस दिया। पट्टियाँ सिर के पीछे कस दीं। साँस लेने के लिए सिर्फ नाक बची थी।
फिर चाबुक उठाया। पहली मार पीठ पर पड़ी। आवाज़ गूँजी। दूसरी जाँघों पर। तीसरी गांड पर। हर मार के साथ मेरा शरीर तड़प रहा था, लेकिन गैग की वजह से सिर्फ घुटी हुई आवाज़ें निकल रही थीं। वह हँस रही थी। चाबुक की मारें लगातार पड़ती रहीं—पीठ, कूल्हे, जाँघें, यहाँ तक कि लंड पर भी। लंड लाल हो चुका था, सिर से पानी जैसा रस रिस रहा था।
जब मेरी पीठ पर लाल धारियाँ उभर आईं तब उसने चाबुक रोका। पास आई। अपनी गीली चूत मेरे चेहरे पर रगड़ी।
“चाटो। लेकिन गैग के साथ।”
मैंने जीभ बाहर निकाली। गैग के छेद से ही उसकी चूत चाटने लगा। वह मेरे बालों को पकड़कर जोर-जोर से रगड़ रही थी। अचानक उसके शरीर में कंपन दौड़ा और गर्म रस मेरे चेहरे पर छलक गया। उसने गैग नहीं खोला। बल्कि और जोर से दबाया।
फिर वह पीछे गई। एक मोटी मोमबत्ती जलाई। पिघला हुआ मोम मेरे निप्पलों पर टपकाने लगी। जलन इतनी तेज़ थी कि आँखों से आँसू बहने लगे। मोम लंड पर भी गिरा। मैं तड़प उठा। रस्सियाँ खिंचीं। कलाई कटने लगीं।
“अच्छा लग रहा है ना कुत्ते?” उसने पूछा और मेरे गले पर थप्पड़ जड़ा। “आज तुम्हारी गांड भी नहीं बचेगी।”
उसने तेल की बोतल उठाई। अपनी उँगलियाँ तेल में डुबोईं और मेरी गांड के छेद में एक-एक करके घुसेड़ने लगीं।
पहले एक, फिर दो, फिर तीन। दर्द और दबाव से मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। वह उँगलियाँ अंदर घुमा रही थी, खोल रही थी। फिर एक मोटा काला डिल्डो निकाला—मेरे लंड से भी मोटा। उसे तेल लगाया और धीरे-धीरे मेरी गांड में धकेलने लगी।
मैं चीखना चाहता था लेकिन गैग ने आवाज़ दबा दी। डिल्डो आधा अंदर गया। फिर पूरा। उसने उसे वहीं छोड़ दिया और बाहर से एक पट्टा बाँध दिया ताकि वह अंदर ही रहे। अब मेरी गांड भरी हुई थी, लंड बँधा हुआ था, और शरीर दर्द से काँप रहा था।
काव्या मेरे सामने आई। अपने स्तनों को मेरे मुँह के पास लाई।
“चूसो।”
मैंने गैग के बावजूद निप्पल को मुँह में लेने की कोशिश की। वह हँसते हुए पीछे हट गई और अचानक मेरे लंड पर जोर से थप्पड़ जड़ा। दर्द की लहर पूरे शरीर में दौड़ गई। फिर वह बिस्तर पर लेट गई। टाँगें फैला दीं।
“अब रस्सी खोलो और मुझे चोदो। लेकिन डिल्डो अंदर ही रहेगा। और अगर तुम झड़ गए बिना इजाजत के तो रात भर पिंजरे में रहोगे।”
मेरे हाथ छूटे। टखने भी। लेकिन गैग और लंड की अंगूठी और गांड का डिल्डो जस के तस। मैं उसके ऊपर चढ़ा।
चूत इतनी गीली थी कि लंड आसानी से अंदर चला गया। लेकिन गांड में डिल्डो की वजह से हर धक्के के साथ दोहरा दबाव बन रहा था। दर्द और मज़ा एक साथ। मैं जोर-जोर से धकेलने लगा। थप-थप की आवाज़ें कमरे में गूँज रही थीं। काव्या के नाखून मेरी पीठ की लाल धारियों पर फिर से घुस रहे थे।
“और जोर से… मारो… हाँ ऐसे… कुत्ते की तरह…”
मैंने उसकी टाँगें कंधों पर चढ़ा लीं। पूरा लंड अंदर तक। हर धक्के के साथ डिल्डो और गहरा जा रहा था। वह चीख रही थी। अचानक उसके शरीर में तेज़ कंपन दौड़ा। चूत ने मेरे लंड को जकड़ लिया। वह झड़ गई। लेकिन मैं रुका नहीं। उसने मेरे बाल पकड़कर सिर ऊपर खींचा।
“मुँह में डालो। अभी।”
मैंने लंड निकाला। गैग अभी भी था। उसने खुद गैग खोला और तुरंत मेरे लंड को मुँह में ले लिया। गले तक। आवाज़ें घुर्र-घुर्र की आ रही थीं। मैं झड़ने वाला था। उसने बालों से खींचकर लंड बाहर निकाला।
“नहीं। आज तुम झड़ोगे मेरी गांड में। डिल्डो निकालो।”
मैंने डिल्डो बाहर खींचा। छेद खुला और लाल हो चुका था। मैंने लंड रखा और एक ही धक्के में पूरा घुसा दिया। काव्या की चीख निकली। मैंने उसके कूल्हे पकड़कर जोर-जोर से ठोकना शुरू कर दिया। गांड की दीवारें कसकर दबा रही थीं। दर्द दोनों को हो रहा था लेकिन कोई रुकने वाला नहीं था। दस-बारह धक्कों के बाद मैं उसके अंदर ही झड़ गया। गाढ़ा वीर्य उसकी गांड में भर गया। वह सिसक रही थी।
लेकिन रात अभी शुरू ही हुई थी।
उसने मुझे पिंजरे में धकेला। पिंजरा इतना छोटा था कि मैं झुककर ही बैठ सकता था। दरवाज़ा बंद करके ताला लगा दिया। फिर वह नंगी ही कुर्सी पर बैठ गई और अपनी चूत में उँगलियाँ घुमाने लगी। मेरे सामने। मैं पिंजरे की सलाखों से चिपका हुआ देख रहा था। वह अपनी उँगलियाँ चाट रही थी, कराह रही थी, और बीच-बीच में मुझे देखकर मुस्कुरा रही थी।
“कल सुबह तक यहीं रहोगे। पेशाब करना है तो पिंजरे में ही करना। मैं साफ नहीं करूँगी।”
मैंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ देखा। रात भर वह सोती रही। मैं पिंजरे में दर्द और इंतज़ार में जागता रहा। सुबह जब सूरज निकला तो उसने दरवाज़ा खोला। मुझे बाहर निकाला। शरीर अकड़ा हुआ था। उसने मुझे बाथरूम ले जाकर ठंडे पानी से नहलाया। फिर फिर से कॉलर पहनाया।
“आज पूरा दिन तुम मेरे पैरों के नीचे रहोगे। खाना भी यहीं फर्श पर खाओगे। और शाम को मालिनी आने वाली है। दोनों मिलकर तुम्हें नई सज़ा देंगे।”
मालिनी आई। काली साड़ी में। आँखों में वही भूख। दोनों ने मिलकर मुझे क्रॉस पर बाँधा। हाथ-पैर फैले। फिर दोनों ने बारी-बारी से चाबुक चलाया। मालिनी की मारें और भी क्रूर थीं। वह मेरे लंड को मुँह में लेकर दाँत लगाती, फिर अचानक छोड़ देती। काव्या मेरे मुँह में बैठ जाती और अपना पेशाब मेरे गले में उतारती। मैं निगलता रहा।
फिर दोनों ने मुझे फर्श पर लिटाया। काव्या मेरे मुँह पर बैठ गई, मालिनी मेरे लंड पर। दोनों एक साथ हिल रही थीं। मैं नीचे दबा हुआ था। साँस नहीं ले पा रहा था। काव्या ने मेरे गले को और दबाया। आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा। तभी उसने छोड़ा। मैंने जोर से साँस ली। उसी पल मालिनी ने मेरे लंड को अपनी गांड में ले लिया और जोर-जोर से उछलने लगी। काव्या मेरे मुँह में थूक रही थी, गाली दे रही थी।
“आज तुम दोनों की रंडी हो। समझे?”
मैंने सिर हिलाया। बाकी का दिन और रात दोनों ने मिलकर मुझे इस्तेमाल किया। हर छेद में। हर तरीके से। कभी रस्सियों से लटकाया, कभी फर्श पर घसीटा, कभी एक-दूसरे के ऊपर लिटाकर चोदा। मेरे शरीर पर नीले-काले निशान उभर आए थे। लंड सुन्न पड़ चुका था लेकिन फिर भी बार-बार सख्त हो जाता था।
रात के दो बजे जब दोनों थककर बिस्तर पर गिरे तो काव्या ने मेरे कान में फुसफुसाया।
“भाई कल शाम को लौटेंगे। तब तक तुम यहीं रहोगे। और अगली बार जब बुलाऊँगी तो उससे भी सख्त होगा। शायद तुम्हें जनता के सामने ले जाऊँ। या फिर किसी और मर्द को बुलाकर तुम्हें चोदवाऊँ। सोचो… तुम्हारा लंड किसी और के मुँह में जाएगा और मैं देखूँगी।”
मैंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ उसकी आँखों में देखा। उसमें वही भूख थी जो कभी खत्म होने वाली नहीं थी।
सुबह जब मैं उठा तो शरीर में दर्द की लहरें दौड़ रही थीं। लेकिन मन में एक अजीब सी शांति थी। काव्या रसोई में नंगी चाय बना रही थी। मैं रेंगता हुआ उसके पास गया। उसने मेरे सिर पर हाथ फेरा।
“अच्छा कुत्ता। अब जाओ। नहाओ। कपड़े पहनो। और याद रखना—तुम सिर्फ मेरे हो। बाकी दुनिया के लिए तुम सिर्फ देवर हो।”
मैंने सिर उसके पैरों से लगाया। उसने चेन खींचकर मुझे उठाया। आँखों में मुस्कान थी।
“जाओ। लेकिन फोन पास रखना। रात को फिर बज सकता है।”
मैं निकला। बाहर धूप थी। शरीर के नीचे कपड़ों में छिपे निशान जल रहे थे। लेकिन हर कदम के साथ एक ही बात दिमाग में घूम रही थी—अगली बार क्या नई क्रूरता इंतज़ार कर रही होगी। और मैं जानता था कि जब भी फोन बजेगा, मैं फिर से उसी दरवाज़े पर खड़ा हो जाऊँगा। कॉलर पहनने को तैयार। चाबुक सहने को तैयार। और उसकी हर गंदी चाहत को पूरा करने को तैयार।
क्योंकि अब मैं सिर्फ अर्जुन नहीं था। मैं काव्या राठौर का कुत्ता था। और कुत्ते को अपने मालिक की हर सज़ा प्यारी लगती है।