रुद्रक्ष-अनन्या भाग 5

मालिक ने लौटी संपत्ति के शरीर पर औरतों की हर हरकत फिर से खोदी, दोनों जगह एक साथ भरा और अगले हफ्ते मंच पर बीस लोगों के सामने खड़ी होकर गिनती करने का हुक्म दे दिया।

रुद्रक्ष-अनन्या भाग 4

सुबह की रोशनी से पहले ही दरवाजा खुला। रुद्रक्ष अंदर आया। अनन्या अभी भी शीशे के सामने खड़ी थी। निप्पलों की सुइयाँ जगह पर थीं। ताला ठंडा पड़ा था। जांघों पर खून के सूखे अक्षर। आँखें सूजी हुईं।
रुद्रक्ष ने कोई बात नहीं की। उसने सुइयाँ एक-एक करके निकालीं। खून की नई धारें बह निकलीं। अनन्या की सिसकी दबी रह गई। फिर उसने ताले की चाबी निकाली लेकिन खोली नहीं। बस उंगली से ताला छुआ और वापस जेब में रख लिया।

“आज रात की तैयारी। नहाएगी नहीं। कुछ पहनेगी नहीं। बस यही कॉलर और यही ताला।”
दिन भर अनन्या को एक छोटे कमरे में चेन से बाँधकर रखा गया। पानी की एक बूँद नहीं दी। शाम को रुद्रक्ष खुद आया। काली गाड़ी में अनन्या को फर्श पर लिटाया। चेन उसके पैर से बाँध दी।
एक घंटे बाद गाड़ी रुकी। बड़ा अंधेरा बंगला। अंदर कोई मर्द नहीं था। सिर्फ पाँच औरतें। सब अमीर, सब ठंडी आँखों वाली। उम्र तीस से पैंतालीस के बीच। एक ने अनन्या को सर से पैर तक देखा और मुस्कुराई।

“यह वाली है रुद्रक्ष की नई संपत्ति?”
रुद्रक्ष ने चेन उसके हाथ में थमा दी। “तीन घंटे। कीमत ले ली मैंने। जैसे चाहो। चेहरा और जीभ छोड़कर बाकी सब आजाद।”
वह पीछे हट गया। कुर्सी पर बैठकर सिगार जलाने लगा। सिर्फ देखने के लिए।
पाँचों औरतें अनन्या के चारों ओर आ गईं। पहली ने बाल पकड़कर खींचे। दूसरी ने ताले को छुआ और हँसी। तीसरी ने निप्पलों के ताजे छेदों को नाखून से कुरेदा। खून निकल आया। अनन्या की चीख निकली तो चौथी ने उसके मुँह पर थप्पड़ मारा।
“आवाज नहीं। बस सहना है।”

उन्होंने अनन्या को बीच के बड़े सोफे पर पेट के बल लिटाया। हाथ-पैर बाँध दिए। पहली औरत ने सिगरेट जलाई और अनन्या की जांघ के अंदरूनी हिस्से पर बुझा दी। मांस जलने की आवाज आई। दूसरी सिगरेट दूसरी जांघ पर। तीसरी नितंब पर। अनन्या का शरीर तड़प रहा था लेकिन बंधन कसने की वजह से हिल नहीं सकती थी।

फिर एक लंबी दुबली औरत ने अपने नाखून तेज किए हुए थे। उसने अनन्या की पीठ पर लंबे-लंबे नाखून फेरने शुरू किए। मांस कुरेदते हुए। खून की लकीरें बनने लगीं। दूसरी औरत ने उसी समय गाँड में तीन उंगलियाँ घुसा दीं और जोर से फैलाने लगी। चौथी ने मुँह खोलने के लिए बाल खींचे और अपनी चूत अनन्या के मुँह पर बैठा दी।

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“चाट। साफ कर।”
अनन्या की जीभ पर तेज गंध और स्वाद फैल गया। वह चाटने लगी। आँसू बह रहे थे। इस बीच पाँचवीं औरत ने ताले को चाबी से खोला जो रुद्रक्ष ने उसे दी थी। चूत के होंठ सूजे हुए थे। उसने बिना किसी तैयारी के चार उंगलियाँ अंदर धकेल दीं। फिर मुट्ठी। अनन्या की चीख चूत में दब गई।

तीनों जगह एक साथ। मुँह पर चूत, गाँड में उंगलियाँ, चूत में मुट्ठी। औरतें बारी-बारी बदलती रहीं। कोई नाखून से कुरेदती, कोई सिगरेट बुझाती, कोई थप्पड़ मारती, कोई बाल खींचती। एक ने अनन्या के मुँह में थूका और फिर अपनी चूत फिर से दबा दी। दूसरी ने पेशाब करने की मुद्रा बनाई और अनन्या के चेहरे पर गर्म धार छोड़ दी। गंध तेज हो गई। अनन्या का चेहरा भीग गया।
रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठा सिगार पीता रहा। कभी-कभी सिर हिलाकर इजाजत देता। कोई भाव नहीं।

दो घंटे बाद अनन्या का शरीर खून, पेशाब, लार और पानी से चमक रहा था। आवाज बैठ चुकी थी। सिर्फ सिसकियाँ रह गई थीं। औरतें थकी नहीं थीं। उन्होंने अनन्या को पलट दिया। अब पीठ के बल। ताला फिर से लगा दिया गया। चूत बंद। फिर एक औरत ने गाँड में मुट्ठी डाली और दूसरी ने निप्पलों के छेदों में अपनी उंगलियाँ घुमाईं। तीसरी ने मुँह में दो उंगलियाँ ठूंसकर गले तक पहुँचा दीं।

आखिरी आधे घंटे में पाँचों ने एक साथ घेर लिया। कोई मुँह पर बैठी, कोई मुट्ठी घुमा रही थी, कोई नाखून कुरेद रही थी, कोई सिगरेट की राख गिरा रही थी, कोई बालों से खींच रही थी। अनन्या का शरीर अब प्रतिक्रिया देना भी लगभग बंद कर चुका था। सिर्फ काँप रहा था।
तीन घंटे पूरे हुए। रुद्रक्ष उठा। चेन वापस ली। औरतों ने अनन्या को छोड़ दिया। वह फर्श पर ढेर की तरह पड़ी थी। शरीर पर नाखूनों के गहरे निशान, सिगरेट के गोल जले निशान, खून और सूखी धारें।

रुद्रक्ष ने उसे बालों से खींचकर खड़ा किया। गाड़ी में फर्श पर लिटाया। घर पहुँचते ही सीधे शीशे वाले कमरे में ले गया। बंधन फिर से कस दिए।
“अब बता। एक-एक पल।”
अनन्या की आवाज टूटी हुई थी। वह बताने लगी। किस औरत ने पहले सिगरेट बुझाई, किसने मुट्ठी डाली, किसकी चूत का स्वाद कैसा था, पेशाब की गंध कैसी थी, कितनी बार नाखून मांस में धँसे, कब-कब शरीर ने प्रतिक्रिया दी। हर विवरण। रुद्रक्ष सुनता रहा। चेहरे पर कोई भाव नहीं।

जब अनन्या खत्म हुई तो रुद्रक्ष ने ताले की चाबी निकाली। खोला नहीं। बस दिखाया और वापस रख लिया।
“अच्छी। अब मेरी बारी।”
उसने छड़ी उठाई। पुराने निशानों के ऊपर नए वार शुरू कर दिए। नितंब, जांघें, पीठ। हर वार के साथ अनन्या की दबी चीख। खून की नई धारें बहने लगीं। फिर उसने गाँड में लंड धकेल दिया। जोर से। गहराई तक। जैसे औरतों के निशान मिटा रहा हो। अनन्या का शरीर झूल रहा था। आवाज अब लगभग नहीं निकल रही थी।

वह अंदर ही झड़ गया। निकाला। उंगलियों से पानी उठाकर अनन्या के मुँह में ठूंस दिया।
“निगल। अब तू फिर से सिर्फ मेरी है।”
अनन्या ने निगल लिया।
रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठ गया। सिगार जलाई। धुआँ उठ रहा था।

“नया नियम। आज से तू रोज़ सुबह मुझे बताएगी कि रात भर तेरे शरीर ने क्या सपना देखा। दर्द का, अपमान का, या मेरे लंड का। झूठ बोली तो फिर से उन औरतों के पास एक पूरी रात के लिए भेज दूँगा।”
अनन्या फर्श पर पड़ी हांफ रही थी। शरीर जल रहा था। लेकिन अंदर वह खालीपन अब और गहरा और काला हो चुका था। पाँच औरतों की यादें, सिगरेट के निशान, मुट्ठी का दबाव और रुद्रक्ष की ठंडी आवाज सब मिलकर उसे अंदर से खा रहे थे।
रुद्रक्ष ने आखिरी कश लिया। आवाज और ठंडी हो गई।

“अगले हफ्ते मैं तुझे एक नए खेल में ले जाऊँगा। वहाँ सिर्फ दर्शक होंगे। तू मंच पर होगी। नंगी। ताला खुला। और मैं तय करूँगा कौन तुझे छूएगा, कौन भरेगा। तू सिर्फ खड़ी रहेगी और गिनेगी। समझी?”

अनन्या फर्श पर पड़ी-पड़ी काँप रही थी। शरीर पर पाँच औरतों के नाखूनों के गहरे निशान, सिगरेट के गोल जले दाग और रुद्रक्ष की छड़ी के ताजे लाल निशान एक साथ धधक रहे थे। ताला अभी भी चूत पर बंद था। गाँड से रुद्रक्ष का पानी रिस रहा था। गर्दन का कॉलर काँटे चुभा रहा था।
रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठा सिगार की राख गिरा रहा था। धुएँ के बीच उसकी आवाज आई।

“रात अभी खत्म नहीं हुई। औरतों ने तुझे तीन घंटे इस्तेमाल किया। अब मैं तुझे याद दिलाऊँगा कि असली मालिक लौट आया है।”
उसने सिगार दबाई। उठा। अनन्या के बालों को मुट्ठी में जकड़कर खींचा और शीशे के सामने खड़ा कर दिया। हाथ ऊपर बाँधे। पैर फैलाए। वजन और भारी लगाए। निप्पलों पर नए क्लैंप कस दिए। इतने सख्त कि अनन्या की आँखें फट गईं।
“आज मैं तेरे शरीर पर उनकी हर हरकत दोबारा लिखूँगा।”

उसने थैले से तेज नोक वाली छड़ी निकाली। अनन्या की पीठ पर पहली लकीर खींची—“सिगरेट”। जांघ पर “नाखून”। नितंब पर “मुट्ठी”। हर अक्षर के साथ मांस कटता। खून बहने लगा। अनन्या शीशे में देख रही थी कैसे उसके शरीर पर नए शब्द उतर रहे हैं। दर्द से साँस फूल रही थी।

जब लेखन खत्म हुआ तो रुद्रक्ष ने छड़ी फेंकी। दोनों हाथों से नितंब फैलाए। गाँड का छेद अभी भी खुला और लाल था। उसने चार उंगलियाँ एक साथ धकेल दीं। फिर मुट्ठी। अनन्या की चीख निकल गई। रुद्रक्ष ने मुट्ठी अंदर घुमाई। धीरे-धीरे फिर जोर से। अनन्या का शरीर शीशे पर रगड़ खा रहा था।
“बोल। किसकी मुट्ठी ज्यादा गहरी गई थी? उनकी या मेरी?”
“आपकी… रुद्रक्ष सर…”
“पूरा।”
“रुद्रक्ष मल्होत्रा की मुट्ठी… सबसे गहरी…”

रुद्रक्ष ने मुट्ठी निकाली। तुरंत अपना लंड गाँड में धकेल दिया। एक धक्के में जड़ तक। खुला हुआ रास्ता ले गया लेकिन दर्द पागल कर देने वाला था। वह पेलने लगा। एक हाथ से क्लैंप की चेन खींचता। दूसरा हाथ ताले पर जोर-जोर से दबता। चूत बंद होने की वजह से पूरा दबाव अंदर घूम रहा था।
“गिन। औरतों ने कितनी बार मुट्ठी डाली थी?”
अनन्या रोते हुए बोली, “पाँच… बार…”

“अब मेरी गिनती शुरू।”
रुद्रक्ष की लय तेज हो गई। हर धक्के के साथ अनन्या का शरीर झूल रहा था। निप्पल खिंच-खिंचकर खून गिरा रहे थे। शरीर पर लिखे शब्द खून से और साफ होते जा रहे थे। अचानक रुद्रक्ष ने लंड अंदर रखते हुए ताले की चाबी निकाली। ताला खोला। सूजी हुई चूत बाहर आई। उसने तुरंत तीन उंगलियाँ अंदर घुसा दीं और जोर से मोड़ने लगा।
“अब गिर। शीशे में अपनी लिखी हुई बातें देखती हुई गिर।”

अनन्या ने सिर हिलाया। रुद्रक्ष ने उंगलियाँ और गहराई तक धकेलीं और लंड पूरा अंदर ले गया। अनन्या का शरीर अकड़ गया। एक लंबी फटी चीख निकली। पानी की धारें रुद्रक्ष के हाथ पर बहने लगीं। वह गिर गई। शीशे में अपनी खून से सनी, शब्द लिखी काया देखती हुई।
रुद्रक्ष रुका नहीं। वह दोनों जगह एक साथ पेलता रहा। अनन्या की संवेदनशीलता चरम पर थी। हर धक्का अब असहनीय दर्द और मजबूर कंपन ला रहा था। आखिरकार वह गाँड में झड़ गया। गर्म धार अंदर भर गई। फिर लंड निकालकर चूत में धकेल दिया और वहाँ भी झड़ गया। दोनों जगह भर चुकी थीं।

उसने उंगलियों से पानी चुपड़ा और अनन्या के मुँह में ठूंस दिया।
“निगल। औरतों का और मेरा दोनों।”
अनन्या ने निगल लिया। स्वाद मुँह में फैल गया।
रुद्रक्ष ने बंधन नहीं खोले। वह पीछे हटकर कुर्सी पर बैठ गया। नई सिगार जलाई। धुआँ उठ रहा था। अनन्या शीशे के सामने काँप रही थी। खून और पानी फर्श पर टपक रहा था।
“अब नया नियम याद रख।”
उसकी आवाज और ठंडी हो गई।

“आज से तू रोज़ रात सोने से पहले मेरे सामने खड़ी होगी। नंगी। और बताएगी कि दिन भर तेरे शरीर के किस हिस्से ने सबसे ज्यादा दर्द माँगा। किस हिस्से ने मेरे लंड की याद की। झूठ बोली तो ताला एक हफ्ते के लिए वापस लग जाएगा और सुइयाँ भी।”
अनन्या ने काँपते हुए सिर हिलाया।
रुद्रक्ष उठा। उसने अनन्या के बालों से मुँह ऊपर उठाया। ठंडी उंगलियों से गाल पर दो थप्पड़ मारे।

“अगले हफ्ते मंच वाला खेल है। वहाँ बीस लोग बैठे होंगे। तू मंच पर नंगी खड़ी होगी। ताला खुला। मैं हुक्म दूँगा कौन तुझे छूए। कौन उंगली डाले। कौन मुँह में ले। कौन गाँड में भरे। तू सिर्फ गिनेगी। आवाज में। हर छूने वाले का नंबर। समझी?”
अनन्या की आँखें शीशे में अपनी डरी हुई सूरत को देख रही थीं। शरीर काँप रहा था। लेकिन ताला खुली चूत हल्की सी भींच गई। वह खालीपन अब भूख बन चुका था—और काली, और गहरी।

रुद्रक्ष ने लाइट बंद कर दी। अंधेरे में सिर्फ उसकी आवाज रह गई।
“रात भर यहीं खड़ी रह। अपनी लिखी हुई बातें और अपनी भरी हुई गाँड दोनों देखती रह। सुबह जूते चाटने के बाद मैं तय करूँगा कि ताला फिर से लगाना है या आज खुला छोड़ दूँ।”

दरवाजा बंद हो गया। अनन्या खड़ी रही। निप्पल जल रहे थे। शरीर पर शब्द धधक रहे थे। गाँड से पानी रिस रहा था। दिमाग में पाँच औरतों की मुट्ठी, सिगरेट के दाग और अब मंच पर बीस लोगों के सामने गिनती करने की स्वीरें घूम रही थीं।
चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ मांस और यादों का नहीं, उसके अंदर की आखिरी शर्म का भी हो चुका था। और अगला मंच पहले से कहीं ज्यादा सार्वजनिक और क्रूर होने वाला था।

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रुद्रक्ष-अनन्या भाग 4

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