तीन दिन अकेले कमरे में कैमरे घूमते रहे। संपत्ति ने अपनी ही मुट्ठी और नाखूनों से खुद को बार-बार खोला। लौटकर मालिक ने नई शर्त रख दी—रोज़ एक घंटा और अगला कमरा सिर्फ दर्पणों से भरा।
हफ्ते भर अनन्या रोज़ रात शीशे के सामने खड़ी होकर बताती रही कि दिन भर किस हिस्से ने दर्द माँगा। रुद्रक्ष सुनता, कभी थप्पड़ मारता, कभी ताला लगा देता, कभी खोल देता। शरीर पर पुराने शब्द और नए निशान एक साथ रहते।
सातवें दिन शाम को रुद्रक्ष ने अनन्या को काली गाड़ी में फर्श पर लिटाया। कोई कपड़ा नहीं। सिर्फ कॉलर और खुला ताला। एक घंटे बाद गाड़ी रुकी। बड़ा अंधेरा हॉल। अंदर बीस पुरुष कुर्सियों पर बैठे थे। बीच में ऊँचा लकड़ी का मंच। रोशनी सिर्फ मंच पर।
रुद्रक्ष ने चेन थाम रखी थी। अनन्या को मंच पर घसीट कर ले गया। हाथ ऊपर बाँध दिए। पैर फैलाए। वजन लगाए। अब वह नंगी, रोशनी में, बीस जोड़ी आँखों के सामने खड़ी थी।
रुद्रक्ष माइक के पास गया। आवाज हॉल में गूँजी।
“यह मेरी संपत्ति है। नंबर तीन। आज तुम छू सकते हो। मैं बताऊँगा कब और कैसे। यह गिनेगी। हर छूने का नंबर। आवाज में।”
पहला पुरुष उठा। रुद्रक्ष ने इशारा किया। उसने अनन्या के स्तनों को जोर से मसला। निप्पल दबाए। अनन्या की आवाज काँपी।
“एक…”
दूसरा आया। उंगलियाँ चूत में घुस गईं। तीन उंगलियाँ। अनन्या बोली, “दो…”
तीसरा। गाँड में दो उंगलियाँ। “तीन…”
चौथा। मुँह में लंड। गले तक। अनन्या की आवाज लंड में दब गई फिर निकली, “चार…”
रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठा सिगार पी रहा था। हर बार सिर हिलाकर इजाजत देता। पाँचवाँ, छठा, सातवाँ…
अनन्या गिनती जारी रखे हुए थी। शरीर पर हाथ, उंगलियाँ, लंड फिर रहे थे। कभी स्तन, कभी चूत, कभी गाँड, कभी मुँह। खून के पुराने निशान नई उंगलियों से दब रहे थे।
दसवें के बाद रुद्रक्ष ने हुक्म दिया, “अब एक साथ तीन।”
तीन पुरुष मंच पर चढ़े। एक ने मुँह में लंड ठूंसा, दूसरे ने चूत में, तीसरे ने गाँड में। अनन्या का शरीर तीनों तरफ से भर गया। आवाज में गिनती जारी रही।
“ग्यारह… बारह… तेरह…”
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हॉल में सिर्फ मांस की आवाज और अनन्या की काँपती गिनती गूँज रही थी। रुद्रक्ष कभी-कभी पास आकर क्लैंप कस देता या बाल खींच देता। अनन्या की आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे लेकिन गिनती नहीं रुक रही थी।
बीस तक पहुँचते-पहुँचते अनन्या का शरीर काँप रहा था। आवाज बैठने लगी थी। रुद्रक्ष उठा। मंच पर आया। बाकी पुरुष हट गए। उसने खुद अनन्या की चूत में लंड धकेल दिया। जोर से। गहराई तक।
“अब मेरी गिनती। बोल।”
अनन्या रोते हुए बोली, “एक…”
रुद्रक्ष पेलने लगा। हर धक्के के साथ अनन्या गिनती करती। “दो… तीन… चार…” बीस तक। फिर वह रुका नहीं। तीस, चालीस। अनन्या की आवाज टूट रही थी। शरीर झूल रहा था। आखिरकार रुद्रक्ष अंदर ही झड़ गया। गर्म पानी भर गया। उसने लंड निकाला और अनन्या के मुँह में ठूंस दिया।
“चाट। साफ कर। सबके सामने।”
अनन्या ने चाटा। बीस जोड़ी आँखें देख रही थीं।
रुद्रक्ष ने बंधन खोले। अनन्या मंच पर ढेर हो गई। उसने चेन पकड़ी और अनन्या को घसीटते हुए गाड़ी तक ले गया। घर पहुँचते ही शीशे वाले कमरे में बाँध दिया।
“अब बता। एक-एक नंबर। किसने कहाँ छुआ। कैसे भरा। तुझे क्या महसूस हुआ।”
अनन्या की आवाज पूरी तरह टूटी हुई थी। वह बताने लगी। कौन सा पुरुष कितनी उंगलियाँ डालता, किसका लंड कितना मोटा था, कब दर्द ज्यादा हुआ, कब शरीर ने प्रतिक्रिया दी। हर विवरण। रुद्रक्ष सुनता रहा।
जब वह खत्म हुई तो रुद्रक्ष ने छड़ी उठाई। पुराने निशानों पर नए वार किए। नितंब, जांघें, पीठ। खून की नई धारें बहने लगीं। फिर गाँड में लंड धकेल दिया। जैसे मंच के सारे निशान मिटा रहा हो। अनन्या अब सिर्फ सिसक रही थी।
वह अंदर झड़ गया। निकाला। उंगलियों से पानी अनन्या के मुँह में ठूंसा।
“निगल।”
अनन्या ने निगल लिया।
रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठ गया। सिगार जलाई।
“नया नियम। आज से तू रोज़ मंच वाली गिनती दोहराएगी। आँखें बंद करके। एक से बीस। और हर नंबर के साथ बताएगी कि उस वक्त तेरे शरीर ने क्या महसूस किया। गलती हुई तो फिर से मंच पर खड़ा कर दूँगा। इस बार पचास लोगों के सामने।”
अनन्या फर्श पर पड़ी काँप रही थी। शरीर जल रहा था। लेकिन अंदर वह खालीपन अब और गहरा हो चुका था। बीस लोगों की आँखें, गिनती की आवाज और रुद्रक्ष की ठंडी हुक्म सब मिलकर उसे अंदर से खा रहे थे।
रुद्रक्ष ने आखिरी कश लिया। आवाज और ठंडी हो गई।
“अगले महीने मैं तुझे एक बंद कमरे में छोड़ दूँगा। तीन दिन। अंदर सिर्फ कैमरे होंगे। मैं बाहर से देखूँगा। तू खुद तय करेगी कब और कैसे अपने शरीर को तोड़ना है। अगर तीन दिन में तूने खुद को पर्याप्त नहीं तोड़ा तो मैं आकर इतना तोड़ूँगा कि तू चल भी नहीं पाएगी।”
अनन्या की आँखें अंधेरे में खुली रह गईं। नया डर। नई भूख। चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ दूसरों के हाथों का नहीं, उसके अपने हाथों का भी होने वाला था। और अगला कमरा पहले से कहीं ज्यादा अकेला और काला होने वाला था।
अनन्या फर्श पर पड़ी रही। शरीर पर मंच के सारे निशान धधक रहे थे। बीस लोगों की उंगलियाँ, लंड और आँखें अभी भी त्वचा पर महसूस हो रही थीं। रुद्रक्ष की आखिरी बात कानों में गूँज रही थी—तीन दिन का बंद कमरा, सिर्फ कैमरे, खुद को तोड़ना।
दो दिन बाद वह कमरा तैयार हो गया। बिल्कुल खाली। चार दीवारें, एक रोशनी, तीन कोनों में काले कैमरे। फर्श ठंडा सीमेंट। कोई बिस्तर नहीं, कोई कपड़ा नहीं, कोई पानी का जग नहीं। सिर्फ बीच में एक छोटी लोहे की रिंग और उससे जुड़ी मोटी चेन।
रुद्रक्ष ने अनन्या को अंदर घसीटा। कॉलर की चेन रिंग से बाँध दी। लंबाई इतनी कि वह कमरे में चार-पाँच कदम चल सके लेकिन दरवाजे तक न पहुँच सके। ताला चूत पर खुला छोड़ दिया गया था। निप्पलों पर कोई क्लैंप नहीं। बस नंगी काया और कैमरों की लाल बत्तियाँ।
“तीन दिन। अंदर कोई नहीं आएगा। मैं बाहर स्क्रीन पर देखूँगा। तू खुद तय कर। कैसे तोड़ना है। उंगलियों से, मुट्ठी से, फर्श से, दीवार से। जितना गहरा तोड़ेगी उतना अच्छा। अगर तीसरे दिन शाम तक मैंने पर्याप्त नहीं देखा तो मैं खुद आकर इतना तोड़ूँगा कि तू खड़ी भी न हो सके।
दरवाजा बंद हो गया। ताला बाहर से लग गया। अनन्या अकेली रह गई। कैमरों की लाल आँखें उसे घूर रही थीं।
पहले कुछ घंटे वह कोने में दुबकी रही। शरीर काँप रहा था। भूख और प्यास शुरू हो गई। फर्श ठंडा था। वह उठकर चेन की हद तक चली। दीवार को छुआ। ठंडी। फिर अपनी उंगलियाँ देखीं। रुद्रक्ष की आवाज याद आई—“खुद तय कर।”
रात के पहले पहर में उसने पहली बार अपनी ही उंगलियाँ चूत में डालीं। धीरे-धीरे। कैमरों की तरफ पीठ करके। लेकिन लाल बत्ती हर कोने में थी। कोई अंधेरा नहीं। वह उंगलियाँ और गहराई तक ले गई। दो, फिर तीन। शरीर ने प्रतिक्रिया दी। पानी लगने लगा। वह रुक गई। शर्म और डर एक साथ। लेकिन खालीपन भूख बन चुका था।
आधी रात को वह फिर से उठी। इस बार दीवार के सहारे खड़ी हुई। एक हाथ से निप्पल मरोड़े, दूसरे से चूत में चार उंगलियाँ घुसा दीं। दर्द हुआ। लेकिन वह रुकी नहीं। उंगलियाँ अंदर-बाहर करने लगीं। आवाज निकली। कैमरे सब रिकॉर्ड कर रहे थे। वह जानती थी रुद्रक्ष देख रहा है। सोच सोचकर और जोर से करने लगी। जब गिरी तो फर्श पर गिरकर काँपती रही।
दूसरे दिन प्यास से जीभ सूख गई। पेट में दर्द। उसने अपनी ही लार से उंगलियाँ गीली कीं और गाँड में दो उंगलियाँ डालने की कोशिश की।
दर्द तेज था। आँखों से आँसू बहे। लेकिन कैमरों की वजह से रुकी नहीं। तीन उंगलियाँ। फिर चार। मुट्ठी बनाने की कोशिश में चीख निकल गई। फर्श पर घुटनों के बल बैठकर उसने मुट्ठी अंदर धकेली। आधा। फिर और। जब पूरी मुट्ठी अंदर चली गई तो वह चीखते हुए गिर गई। पानी की धार निकल रही थी। कैमरे सब देख रहे थे।
दोपहर तक वह बार-बार दोहरा रही थी। कभी चूत में मुट्ठी, कभी गाँड में उंगलियाँ, कभी दोनों एक साथ। फर्श पर लेटकर निप्पल को मुँह में ले लेती। काटती। खून का स्वाद लेती। दीवार से पीठ रगड़ती ताकि पुराने निशान फिर से खुल जाएँ। खून लग जाता। वह अपनी ही उंगलियों से खून को चूत और गाँड पर मलती। कैमरों को दिखाती।
तीसरे दिन सुबह तक अनन्या का शरीर पूरी तरह थक चुका था। लेकिन अंदर की भूख और तेज हो गई थी। उसने चेन को हाथों से पकड़ा और खुद को खींच-खींचकर रिंग के पास ले गई। वहाँ बैठकर दोनों हाथों से अपनी चूत फैलाई और कैमरों की तरफ मुँह करके मुट्ठी अंदर तक डाल दी। जोर-जोर से। आवाज निकाल-निकालकर। फिर मुट्ठी निकालकर गाँड में डाल दी। बारी-बारी। जब गिरी तो फर्श पर लेटकर अपनी ही उंगलियों से दोनों जगह एक साथ फैलाने लगी। खून और पानी मिला हुआ बह रहा था।
शाम ढलने से पहले दरवाजे पर कदमों की आवाज आई। ताला खुला। रुद्रक्ष अंदर खड़ा था। काली कमीज, ठंडी आँखें। हाथ में स्क्रीन वाला छोटा उपकरण। उसने अनन्या को फर्श पर खून और पानी में सना देखा।
“तीन दिन में तूने खुद को तैंतालीस बार तोड़ा। मुट्ठी अट्ठाईस बार। खून ग्यारह बार निकाला। अच्छी कोशिश।”
अनन्या उठ नहीं पा रही थी। रुद्रक्ष ने बालों से खींचकर खड़ा किया। शरीर लड़खड़ा रहा था। उसने अनन्या को सीधे शीशे वाले कमरे में घसीटा। बंधन कस दिए।
“अब मैं चेक करूँगा कि तूने कितना गहरा तोड़ा।”
उसने अपनी मुट्ठी अनन्या की चूत में धकेल दी। आसानी से चली गई। अनन्या की चीख निकली। रुद्रक्ष ने मुट्ठी घुमाई। फिर निकाली और गाँड में डाली। और आसानी से। वह दोनों जगह बारी-बारी मुट्ठी घुमाता रहा। अनन्या का शरीर काँप रहा था। आवाज टूट चुकी थी।
“अब मेरी बारी।”
उसने लंड निकाला। पहले गाँड में जड़ तक धकेल दिया। जोर से पेलने लगा। एक हाथ से निप्पल मरोड़ता। दूसरा हाथ चूत में उंगलियाँ घुमाता। अनन्या शीशे में अपनी थकी और खुली काया देख रही थी। रुद्रक्ष की लय तेज होती गई। जब अनन्या गिरी तो भी वह रुका नहीं। अंदर ही झड़ गया। फिर लंड निकालकर चूत में डाला और वहाँ भी झड़ गया।
उंगलियों से पानी उठाकर अनन्या के मुँह में ठूंसा।
“निगल। तीन दिन का अपना और मेरा दोनों।”
अनन्या ने निगल लिया।
रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठ गया। सिगार जलाई। धुआँ उठ रहा था।
“नया नियम। आज से तू रोज़ एक घंटा अकेली उस कमरे में बिताएगी। कैमरे चालू। खुद को तोड़ने के नए तरीके खोजेगी। मैं स्क्रीन पर देखूँगा। अगर कोई दिन तूने दोहराया या कम जोर से किया तो अगली बार तीन दिन की जगह पाँच दिन बंद कर दूँगा।”
अनन्या फर्श पर पड़ी हांफ रही थी। शरीर जल रहा था। लेकिन अंदर वह खालीपन अब खुद को तोड़ने की भूख बन चुका था। कैमरों की लाल आँखें, अपनी ही मुट्ठी का दबाव और रुद्रक्ष की ठंडी निगाह सब मिलकर उसे अंदर से हावी हो रहे थे।
रुद्रक्ष ने आखिरी कश लिया। आवाज और ठंडी हो गई।
“अगले हफ्ते मैं तुझे एक नई जगह ले जाऊँगा। वहाँ सिर्फ दर्पण होंगे। चारों तरफ। तू बीच में खड़ी होगी। मैं तुझे बाँधूँगा। और तू अपनी ही आँखों के सामने खुद को बार-बार तोड़ती देखेगी। जब तक तू रो-रोकर न माँग ले कि अब काफी हो गया। लेकिन मैं तब भी नहीं रुकूँगा।”
अनन्या की आँखें अंधेरे में खुली रह गईं। नया कमरा। सिर्फ दर्पण। अपनी ही टूटती सूरत के हजार टुकड़े। चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ शरीर का नहीं, उसकी अपनी निगाह का भी होने वाला था। और अगला कमरा पहले से कहीं ज्यादा क्रूर और अंधा करने वाला था।
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