मालिक ने निप्पलों में सुइयाँ चुभाकर पानी से अंदर तक धोया, मुट्ठी घुमाई और चूत पर ताला ज्यों का त्यों रखा। कल पाँच औरतों के बीच तीन घंटे की बोली का फैसला सुना दिया।
दो घंटे बाद दरवाजा खुला। रुद्रक्ष अंदर आया। हाथ में एक काला चमड़े का थैला था। अनन्या कोने में उसी तरह पड़ी थी। शरीर पर सूखा खून और पानी के धब्बे। आँखें खुली हुईं लेकिन निगाहें खोई-खोई।
रुद्रक्ष ने थैला फर्श पर पटक दिया। “उठ।”
अनन्या ने कोशिश की। पैर नहीं संभले। रुद्रक्ष ने बालों से खींचकर खड़ा कर दिया और सीधे शीशे के सामने ले गया। फिर से हाथ ऊपर बाँधे। पैर फैलाए। वजन और भारी बाँधे।
“आज तेरी याददाश्त तोड़नी है। तीन दिन की हर बात को मैं तेरे शरीर पर फिर से लिखूँगा। ताकि तू कभी भूल न पाए कि तू कितनी बार भरी गई।”
उसने थैले से एक मोटी काली मार्कर जैसी छड़ी निकाली जिसके सिरे पर तेज धातु की नोक थी। अनन्या की पीठ पर पहली लकीर खींची। मांस कटने जैसी जलन। अनन्या सिसकी। रुद्रक्ष ने धीरे-धीरे लिखना शुरू किया—पीठ पर, नितंबों पर, जांघों पर।
“मुँह में बारह” “चूत में चौदह” “गाँड में नौ”
हर अक्षर के साथ नोक मांस में धँसती। खून की पतली धारें बहने लगीं। अनन्या शीशे में देख रही थी कैसे उसके शरीर पर संख्याएँ उतर रही हैं। दर्द इतना तेज था कि साँस फूल रही थी।
जब लेखन खत्म हुआ तो रुद्रक्ष ने छड़ी नीचे रखी। उसने दोनों हाथों से अनन्या के नितंब फैलाए और बिना किसी तैयारी के अपना लंड गाँड में धकेल दिया। एक ही धक्के में जड़ तक। अनन्या की चीख निकल गई। रुद्रक्ष ने कमर पकड़कर पेलना शुरू किया। हर धक्के के साथ शरीर पर लिखी संख्याएँ खून से और साफ होती जा रही थीं।
“गिन। जोर से गिन। जितनी बार भरी गई उतनी बार।”
अनन्या रोते हुए गिनने लगी। “एक… दो… तीन…” रुद्रक्ष की लय में। जब वह पैंतीस तक पहुँची तो रुद्रक्ष रुका नहीं। उसने और तेज कर दिया।
“अब मेरी गिनती। आज की।”
वह पेलता रहा। अनन्या की आवाज टूट रही थी। शरीर शीशे से रगड़ खा रहा था। निप्पल फिर से क्लैंप में कसे जा चुके थे और खिंच-खिंचकर खून गिरा रहे थे।
अचानक रुद्रक्ष ने लंड निकाला। अनन्या हांफ रही थी। उसने थैले से एक मोटा काला खिलौना निकाला—लंबा, नसों जैसा बना हुआ, सिरे पर मोटी गाँठ। उसे अनन्या की चूत में धकेल दिया। पूरा अंदर। फिर गाँड में अपना लंड फिर से डाल दिया। अब दोनों जगह भरी हुई थीं।
रुद्रक्ष ने एक हाथ से खिलौना अंदर-बाहर करना शुरू किया और दूसरे से कमर पकड़कर पेलने लगा। दोहरी भरने की गति पागल कर देने वाली थी। अनन्या का शरीर काँप रहा था। आवाज अब सिर्फ रोने और सिसकने की रह गई थी।
“गिर। शीशे में देखती हुई। अपनी लिखी हुई संख्याएँ देखती हुई गिर।”
join my telegram channel for leaked videos
अनन्या ने सिर हिलाया। रुद्रक्ष ने खिलौना और गहराई तक धकेला और लंड पूरा अंदर ले गया। अनन्या का शरीर अकड़ गया। एक लंबी काँपती चीख निकली। चूत और गाँड दोनों धड़कने लगीं। पानी की धारें बह निकलीं। वह गिर गई। शीशे में अपनी खून से सनी काया देखती हुई।
रुद्रक्ष ने नहीं रोका। वह पेलता रहा। अनन्या की संवेदनशीलता इतनी बढ़ चुकी थी कि हर धक्का असहनीय दर्द और मजबूर गर्मी दोनों ला रहा था। आखिरकार रुद्रक्ष गाँड में ही झड़ गया। गर्म पानी अंदर भर गया। उसने लंड निकाला और खिलौना भी बाहर खींचा। दोनों जगह से पानी रिसने लगा।
उसने अनन्या के मुँह में उंगलियाँ ठूंस दीं। “चाट। साफ कर।”
अनन्या ने चाटा।
रुद्रक्ष ने बंधन नहीं खोले। वह पीछे हटकर कुर्सी पर बैठ गया। सिगार जलाई। धुआँ उठ रहा था। अनन्या शीशे के सामने बाँधी हुई काँप रही थी। शरीर पर खून से लिखी संख्याएँ चमक रही थीं।
“अब सुन।”
उसकी आवाज और ठंडी हो गई।
“अगले हफ्ते मैं तुझे उस जगह ले जाऊँगा जहाँ औरतें होंगी। वे तुझे एक रात के लिए खरीदेंगी। कीमत मैं लूँगा। वे तुझे अपने नाखूनों से कुरेदेंगी, सिगरेट से जलाएँगी, अपनी मुट्ठी अंदर तक डालेंगी, अपनी चूत तेरे मुँह पर बैठाएँगी। तू सब सहेगी। और जब लौटेगी तो मुझे हर पल बताना होगा। कौन औरत कैसी थी, उसने क्या किया, तुझे कितना दर्द हुआ, कब गिरने का मन किया। एक भी बात छिपाई तो मैं तुझे वहाँ एक हफ्ते के लिए छोड़ दूँगा।”
अनन्या की आँखें शीशे में अपनी ही डरी हुई सूरत को देख रही थीं। शरीर काँप रहा था। लेकिन चूत फिर से हल्की सी भींच गई। वह खालीपन और गहरा हो चुका था।
रुद्रक्ष उठा। उसने अनन्या के बंधन खोले। वह फर्श पर ढेर हो गई। रुद्रक्ष ने उसके बालों से मुँह ऊपर उठाया।
“आज रात तू यहीं शीशे के सामने सोएगी। बाँधी हुई। अपनी संख्याएँ देखती हुई। सुबह जूते और लंड दोनों तैयार रखना। और हाँ… कल से मैं तुझे रोज़ एक नया अक्षर तेरे शरीर पर लिखूँगा। जब तक तू खुद मुझसे न कह दे कि तू सिर्फ मेरी संपत्ति है और किसी और की नहीं।”
उसने कमरे की लाइट बंद कर दी। अंधेरे में सिर्फ शीशे से हल्की चमक आ रही थी। अनन्या बाँधी हुई खड़ी रही। शरीर जल रहा था। दिमाग में संख्याएँ, औरतों की तस्वीरें और रुद्रक्ष की ठंडी आवाज घूम रही थीं।
चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ शरीर का नहीं, यादों और इच्छाओं का भी हो चुका था। और अगला हफ्ता पहले से कहीं ज्यादा अंधेरा होने वाला था।
अंधेरे में अनन्या की साँसें भारी चल रही थीं। शीशे के सामने बाँधी हुई उसका शरीर काँप रहा था। पीठ और नितंबों पर खून से लिखी संख्याएँ सूखकर काली पड़ने लगी थीं। निप्पल क्लैंप अभी भी कसे हुए थे। हर छोटी हरकत पर काँटे गर्दन में चुभते और निप्पल खिंचते।
रात के कितने बजे थे पता नहीं चला। अचानक लाइट जल उठी। रुद्रक्ष कमरे में खड़ा था। हाथ में एक नया काला थैला और एक लंबी पतली धातु की छड़ी। उसने अनन्या को देखा—आँखों के नीचे काले घेरे, होठ सूखे, जांघों पर सूखा पानी और खून।
“सो नहीं पाई नंबर तीन?”
अनन्या ने सिर हिलाया। आवाज नहीं निकली।
रुद्रक्ष ने थैला खोला। अंदर से उसने एक जोड़ी तेज नोक वाले हुक निकाले। बिना किसी बात के वह अनन्या के दोनों निप्पलों के क्लैंप हटाए। सूजे हुए निप्पल तुरंत और बाहर निकले। फिर उसने हुक की नोक निप्पल के बिलकुल बीच में चुभा दी। अनन्या की चीख निकल गई। हुक मांस में धँस गया। दूसरे निप्पल के साथ भी वही किया। अब दोनों निप्पलों से छोटी चेन लटक रही थी। रुद्रक्ष ने उन चेनों को कॉलर से बाँध दिया। हर सांस पर निप्पल नीचे खिंचते।
“अब नया लेखन।”
उसने पतली छड़ी ली। नोक तेज थी। अनन्या की जांघ के अंदरूनी हिस्से पर पहली लकीर खींची। “मेरी”। फिर दूसरी जांघ पर “संपत्ति”। खून की धार तुरंत बहने लगी। अनन्या शीशे में देख रही थी कैसे उसके शरीर पर नए शब्द उतर रहे हैं। दर्द इतना तेज था कि पैर काँप रहे थे। वजन भारी होने की वजह से वह गिर नहीं सकती थी।
रुद्रक्ष ने छड़ी नीचे रखी। वह पीछे गया और अनन्या के नितंबों को दोनों हाथों से फैलाया। गुदा अभी भी थोड़ी खुली और लाल थी। उसने थूकने की जगह सीधे दो उंगलियाँ अंदर धकेल दीं और जोर से फैलाया। अनन्या तड़प उठी। फिर तीसरी उंगली। फिर चौथी। मुट्ठी거의 बनाने की कोशिश। अनन्या की आवाज फट गई।
“नहीं… सर… हो नहीं रहा…”
रुद्रक्ष रुका नहीं। वह धीरे-धीरे मुट्ठी अंदर धकेलता रहा। जब आखिरी पोर भी अंदर चली गई तो अनन्या की चीख दीवारों से टकराई। रुद्रक्ष ने मुट्ठी अंदर घुमाई। अनन्या का शरीर शीशे पर रगड़ खा रहा था। खून और पानी दोनों बह रहे थे।
“देख शीशे में। तेरी गाँड मेरी मुट्ठी खा रही है। बोल। किसकी है?”
“आपकी… रुद्रक्ष सर की…”
“पूरा नाम।”
“रुद्रक्ष मल्होत्रा की संपत्ति की गाँड…”
रुद्रक्ष ने मुट्ठी अंदर-बाहर करनी शुरू की। धीरे-धीरे फिर जोर से। अनन्या रो रही थी। आँसू शीशे पर गिर रहे थे। जब उसने मुट्ठी निकाली तो गुदा का छेद पूरी तरह खुला और काँप रहा था। रुद्रक्ष ने तुरंत अपना लंड वहाँ रख दिया और एक धक्के में जड़ तक घुसा दिया। खुला हुआ छेद आसानी से ले गया लेकिन दर्द अभी भी पागल कर देने वाला था।
वह पेलने लगा। एक हाथ से निप्पल की चेन खींचता तो दूसरा हाथ आगे जाकर चूत में तीन उंगलियाँ घुसा देता। दोहरी गति। अनन्या का शरीर झूल रहा था। आवाज अब सिर्फ अस्पष्ट रोने और भीख माँगने जैसी रह गई थी।
“गिर। अपनी लिखी हुई बातें देखती हुई गिर।”
अनन्या ने सिर हिलाया। रुद्रक्ष ने चेन और जोर से खींची और उंगलियाँ चूत के अंदर मोड़ दीं। अनन्या का शरीर अकड़ गया। एक लंबी काँपती चीख निकली। पानी की धारें रुद्रक्ष के हाथ पर बहने लगीं। वह गिर गई। शीशे में अपनी खून से सनी, मुट्ठी खाई हुई काया देखती हुई।
रुद्रक्ष रुका नहीं। वह पेलता रहा। अनन्या की संवेदनशीलता इतनी बढ़ चुकी थी कि हर धक्का अब असहनीय था। आखिरकार वह गाँड में ही झड़ गया। गर्म धार अंदर तक भर गई। उसने लंड निकाला। पानी रिसने लगा। रुद्रक्ष ने उंगलियों से उसे उठाया और अनन्या के मुँह में ठूंस दिया।
“निगल।”
अनन्या ने निगल लिया।
रुद्रक्ष ने बंधन नहीं खोले। वह कुर्सी पर बैठ गया। सिगार जलाई। धुआँ उठ रहा था। अनन्या शीशे के सामने काँप रही थी। निप्पलों से खून की बूँदें टपक रही थीं। जांघों पर नए शब्द चमक रहे थे।
“अब से रोज़ एक नया शब्द लिखूँगा। जब तक तू खुद घुटनों पर बैठकर न बोले कि तू सिर्फ मेरी है। किसी और ने भरा तो भी तू मेरी ही रहेगी। समझी?”
अनन्या ने काँपते हुए सिर हिलाया।
रुद्रक्ष उठा। उसने थैले से एक छोटा सा धातु का ताला निकाला। अनन्या की चूत के दोनों होंठों को पकड़कर एक पतली सुई से छेद किया। अनन्या चिल्लाई। फिर उसने दोनों छेदों में से एक छोटी रिंग निकालकर ताला लगा दिया। अब चूत बंद थी। ताले की चाबी उसने अपनी जेब में रख ली।
“आज से जब तक मैं चाबी न खोलूँ, तू अपनी चूत नहीं छू सकती। न उंगली, न लंड। सिर्फ मैं। समझी?”
अनन्या की आँखें फटी रह गईं। दर्द और नई बेबसी दोनों एक साथ।
रुद्रक्ष ने उसके बालों से मुँह ऊपर उठाया। “अगले हफ्ते औरतों वाली रात है। वे तुझे खरीदेंगी। मैं कीमत लूँगा। वे तुझे खोलेंगी—नाखून से, मुट्ठी से, सिगरेट से, अपनी चूत से। तू सब सहेगी। और जब लौटेगी तो यही ताला मैं फिर से लगा दूँगा। ताकि तू याद रखे कि असली चाबी सिर्फ मेरे पास है।”
उसने अनन्या के बंधन थोड़े ढीले किए लेकिन पूरी तरह नहीं खोले। निप्पल के हुक वैसे ही रहे। ताला वैसे ही रहा।
“रात बाकी है। शीशे के सामने खड़ी रह। अपनी बंद चूत और खुली गाँड दोनों देखती रह। सुबह जूते चाटने के बाद मैं यह ताला खोलूँगा… या नहीं खोलूँगा। मूड पर निर्भर करता है।”
रुद्रक्ष कमरे से बाहर चला गया। लाइट बंद कर दी। अंधेरे में अनन्या खड़ी रही। निप्पलों से खून टपक रहा था। जांघों पर “मेरी संपत्ति” के शब्द जल रहे थे। चूत पर ताला ठंडा और भारी लग रहा था। गाँड से पानी रिस रहा था।
दिमाग में एक ही बात घूम रही थी—औरतें… मुट्ठी… सिगरेट… और यह ताला। शरीर दर्द से चीख रहा था लेकिन अंदर वह खालीपन अब भूख बन चुका था। वह भूख जो और अपमान माँगती थी।
चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ मांस का नहीं, उसके अंदर की आखिरी स्वतंत्र साँस का भी हो चुका था। और अगला हफ्ता पहले से कहीं ज्यादा काला और गहरा होने वाला था।
अंधेरा कमरे में कितनी देर बीती, अनन्या को पता नहीं चला। निप्पलों के हुक हर सांस के साथ मांस खींच रहे थे। जांघों पर खून से लिखे शब्द सूखकर सख्त हो गए थे। चूत पर लगा ताला ठंडा और भारी लग रहा था। गाँड से रुद्रक्ष का पानी अभी भी धीरे-धीरे रिस रहा था और जांघों पर बहकर फर्श पर छोटे-छोटे धब्बे बना रहा था।
अचानक दरवाजा खुला। रोशनी की तेज किरणें अंदर आईं। रुद्रक्ष खड़ा था। काली कमीज के बटन खोले हुए, आस्तीन ऊपर चढ़ी हुईं। हाथ में एक नया काला बॉक्स और एक लंबी पारदर्शी ट्यूब। उसने दरवाजा बंद किया और धीरे-धीरे अनन्या के पास आया।
“रात भर खड़ी रही। अच्छी। अब सबक जारी रखते हैं।”
उसने अनन्या के बंधन थोड़े और कस दिए। फिर बॉक्स खोला। अंदर से उसने एक जोड़ी लंबी धातु की सुइयाँ निकालीं। बिना किसी चेतावनी के एक सुई अनन्या के बाएँ निप्पल के हुक के ठीक नीचे चुभा दी। अनन्या की चीख निकल गई। दूसरी सुई दाएँ निप्पल में। खून की ताजी धारें ट्यूब जैसी बहने लगीं। रुद्रक्ष ने दोनों सुइयों के सिरे एक पतली चेन से जोड़ दिए और चेन को कॉलर से बाँध दिया। अब हर हल्की हरकत पर सुइयाँ और गहराई में धँसतीं।
“आज मैं तुझे अंदर तक साफ करूँगा।”
उसने पारदर्शी ट्यूब निकाली। एक सिरा अनन्या की गाँड के खुले छेद में धकेल दिया। दूसरा सिरा एक बड़े सिरिंज से जोड़ा। ठंडा पानी अंदर जाने लगा। अनन्या तड़प उठी। पेट फूलने लगा। रुद्रक्ष ने ट्यूब को अंदर-बाहर किया। पानी और गहराई तक जा रहा था। जब अनन्या का पेट तनकर गोल हो गया तो उसने ट्यूब निकाल ली और गाँड के छेद को उंगलियों से दबाकर बंद रखा।
“रोक। एक बूँद भी बाहर नहीं निकलेगी जब तक मैं न कहूँ।”
अनन्या काँप रही थी। पेट में पानी का दबाव असहनीय था। आँखों से आँसू बह रहे थे। रुद्रक्ष ने उसके सामने घुटनों के बल बैठकर चूत के ताले को छुआ। चाबी निकाली लेकिन लगाई नहीं। सिर्फ ताले को उंगली से खेलाने लगा।
“तीन दिन किसी और ने भरा। कल रात मैंने मुट्ठी डाली। अब यह पानी तेरे अंदर की सारी गंदगी निकाल देगा। लेकिन समय मेरा है।”
वह उठा। छड़ी ली। नितंबों पर वार शुरू कर दिए। हर वार के साथ अनन्या का पेट और तनता। पानी का दबाव बढ़ता। वह चीख रही थी लेकिन रुद्रक्ष रुका नहीं। बीस वार बाद उसने अचानक उंगलियाँ हटा दीं। पानी की तेज धार निकल पड़ी। अनन्या की चीख और तेज हो गई। पानी फर्श पर फैल गया। गंदगी और खून मिला हुआ।
रुद्रक्ष ने तुरंत ट्यूब फिर से डाल दी। नया पानी अंदर भरा। फिर से दबाकर रोका। फिर छड़ी। फिर छोड़ा। तीन बार यह चक्र दोहराया। अनन्या का शरीर काँप रहा था। पैर लड़खड़ा रहे थे। वजन भारी होने की वजह से वह गिर नहीं सकती थी। निप्पलों की सुइयाँ हर चीख के साथ और धँस रही थीं।
जब आखिरी बार पानी निकल चुका तो रुद्रक्ष ने ट्यूब फेंक दी। उसने अनन्या की गाँड में तीन उंगलियाँ एक साथ घुसा दीं और जोर से फैलाया। फिर चौथी। मुट्ठी फिर से अंदर चली गई। इस बार और आसानी से। अनन्या की आवाज टूट चुकी थी। सिर्फ अस्पष्ट सिसकियाँ रह गई थीं।
“देख शीशे में। तेरी गाँड अब मुट्ठी की आदी हो रही है। जल्द ही तू खुद माँगेगी।”
रुद्रक्ष ने मुट्ठी अंदर घुमाई। अनन्या का शरीर शीशे पर रगड़ खा रहा था। खून की नई धारें जांघों पर बह रही थीं। जब उसने मुट्ठी निकाली तो छेद पूरी तरह खुला और काँप रहा था। रुद्रक्ष ने अपना लंड निकाला और एक ही धक्के में जड़ तक धकेल दिया। खुला हुआ रास्ता ले गया लेकिन दर्द अभी भी पागल कर देने वाला था।
वह पेलने लगा। एक हाथ से निप्पल की चेन खींचता। दूसरा हाथ ताले वाले हिस्से पर जोर-जोर से दबता। चूत बंद होने की वजह से दबाव और बढ़ रहा था। अनन्या रो रही थी। आवाज में भीख थी लेकिन शब्द नहीं बन रहे थे।
“गिर। अपनी बंद चूत और खुली गाँड दोनों देखती हुई गिर।”
रुद्रक्ष ने चेन जोर से खींची और लंड पूरा अंदर ले गया। अनन्या का शरीर अकड़ गया। एक लंबी फटी चीख निकली। शरीर में कंपन दौड़ गया। वह गिर गई। शीशे में अपनी सुइयों, ताले और खून से सनी काया देखती हुई।
रुद्रक्ष रुका नहीं। वह पेलता रहा। अनन्या की संवेदनशीलता चरम पर थी। हर धक्का अब दर्द और मजबूर गर्मी का मिश्रण बन चुका था। आखिरकार वह गाँड में ही झड़ गया। गर्म पानी की धार अंदर भर गई। उसने लंड निकाला। पानी रिसने लगा। रुद्रक्ष ने उंगलियों से उसे चुपड़ा और अनन्या के मुँह में ठूंस दिया।
“निगल। सब।”
अनन्या ने निगल लिया। स्वाद मुँह में फैल गया।
रुद्रक्ष ने बंधन थोड़े ढीले किए लेकिन सुइयाँ और ताला वैसे ही रहे। वह कुर्सी पर बैठ गया। सिगार जलाई। धुआँ उठ रहा था। अनन्या शीशे के सामने काँप रही थी। फर्श पर पानी और खून के धब्बे फैल चुके थे।
“अब सुन नई बात।”
उसकी आवाज और ठंडी हो गई।
“कल रात मैं तुझे उस घर ले जाऊँगा जहाँ पाँच औरतें होंगी। वे तुझे खरीद चुकी हैं। कीमत मैंने ले ली। वे तुझे तीन घंटे के लिए अपना बनाएंगी। नाखून, सिगरेट, मुट्ठी, अपनी चूत, अपनी पेशाब—जो चाहें करेंगी। तू मना नहीं करेगी। लौटकर मुझे हर पल का हिसाब देना होगा। कौन औरत कैसी गंध की थी, उसने कितनी बार मुट्ठी डाली, सिगरेट कहाँ-कहाँ बुझाई, तुझे कब-कब गिरने का मन हुआ। एक भी बात छिपाई तो यह ताला मैं एक हफ्ते के लिए लगा दूँगा और सुइयाँ भी नहीं निकालूँगा।”
अनन्या की आँखें शीशे में अपनी डरी हुई सूरत को देख रही थीं। शरीर काँप रहा था। लेकिन ताले के नीचे चूत हल्की सी भींच गई। वह खालीपन अब भूख बन चुका था—और गहरी, और काली।
रुद्रक्ष उठा। उसने अनन्या के बालों से मुँह ऊपर उठाया। ठंडी उंगलियों से उसके गाल पर थप्पड़ मारा।
“रात बाकी है। शीशे के सामने खड़ी रह। अपनी सुइयाँ, अपना ताला और अपनी खुली गाँड देखती रह। सुबह जूते चाटने के बाद मैं तय करूँगा कि ताला खोलना है या और कसाव बढ़ाना है।”
वह कमरे से बाहर चला गया। लाइट बंद कर दी। अंधेरा फिर से छा गया। अनन्या खड़ी रही। निप्पलों से खून की बूँदें टपकती रहीं। जांघों पर शब्द जलते रहे। ताला ठंडा और भारी बना रहा। गाँड से पानी रिसता रहा।
दिमाग में एक ही तस्वीर घूम रही थी—पाँच औरतें… नाखून… सिगरेट… मुट्ठी… पेशाब… और लौटकर दिया जाने वाला हर पल का हिसाब। शरीर दर्द से चीख रहा था लेकिन अंदर वह भूख और तेज हो चुकी थी।
चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ शरीर और यादों का नहीं, उसके अंदर की आखिरी बचाव की इच्छा का भी हो चुका था। और कल की रात पहले से कहीं ज्यादा काली और गहरी होने वाली थी।
Pingback: chudai ka safar :- रुद्रक्ष-अनन्या भाग 5 - Lustystories
Pingback: xxx stories :- रुद्रक्ष-अनन्या भाग 6 - Lustystories