बीस साल का रोहित पहली बार टॉयलेट में फंसता है। विकास उसके छेद को खून से भिगोकर फाड़ता है, फिर पूरे कॉलेज को बुलाकर बारी-बारी से चीरता है। दर्द अब उसकी सांस बन चुका है gay sex stories ।
मेरा नाम रोहित है। उम्र बीस साल। मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज में पढ़ता था, तीसरे साल में। शरीर मेरा दुबला-पतला था, लेकिन गांड बड़ी और गोल थी, इतनी कि जींस में भी साफ दिख जाती। बचपन से ही मुझे गांड मरवाने का ख्याल आता था, लेकिन कभी किसी के साथ कुछ नहीं किया था। रात-रात भर अकेले लेटे हुए अपनी ही उंगलियां अंदर डालकर कल्पना करता रहता था कि कोई मुझे जबरदस्ती पकड़कर फाड़ दे। वो ख्याल दिन-ब-दिन और गहरा होता गया।
कक्षा में एक लड़का था—विकास। उम्र मेरी ही, शरीर मोटा-ताजा, चेहरा थोड़ा रूखा। वो हमेशा अकेला बैठा करता था। एक दिन मैं उसके पास जाकर बैठ गया। हाथ उसकी जांघ पर फेरते हुए धीरे से बोला, “अगर किसी की गांड मिल जाए तो मारेगा?”
विकास ने मेरी तरफ देखा, आंखें तरेरकर। “किसकी?”
“मेरी।”
वो हंसा। “मस्ती मत कर।”
“सच में। पहली बार है। जितना जोर से मार सके, मार।”
उसने मेरी कलाई पकड़ ली। “क्लास के बाद। पीछे वाले पार्क के टॉयलेट में।”
क्लास खत्म होते ही हम दोनों वहां पहुंच गए। टॉयलेट पुराना था, दीवारें गंदी, दरवाजा जंग लगा। विकास अंदर घुसा, मुझे खींचकर अन्दर ले गया और दरवाजा बंद कर दिया। बिना एक शब्द बोले उसने अपनी पैंट नीचे की। उसका लंड मोटा था—सात इंच लंबा और करीब तीन इंच मोटा। नसें फूली हुई। मैं घुटनों के बल बैठ गया और मुंह में ले लिया। जीभ से चाटा, गले तक उतारा। वो मेरे बाल पकड़कर जोर-जोर से धक्के देने लगा। थूक मेरी ठुड्डी पर टपक रहा था।
फिर उसने मुझे खड़ा किया। “पैंट उतार। जल्दी।”
मैंने उतार दी। वो पीछे आया, दोनों हाथों से मेरी गांड के गालों को चीरकर फैलाया और बिना किसी चिकनाई के, सूखे लंड को छेद पर सटा दिया। एक जोरदार धक्का। लंड फिसल गया। दर्द इतना तेज था कि मेरी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। मैं चिल्लाया।
“चुप रह,” उसने कहा और दोबारा ठोका। इस बार उसने थूक लगाया—अपने लंड पर और मेरे छेद पर—फिर पूरा जोर लगाकर घुसा दिया। सिर्फ टोपा अंदर गया और मेरी गांड जैसे फट गई। खून निकलने लगा। मैं दीवार पकड़कर कांप रहा था।
“आह… निकाल… बहुत दर्द हो रहा है…”
विकास ने मेरी गर्दन दबाई। “आज तो तेरी गांड फाड़कर रहूंगा। चिल्लाया तो और जोर से मारूंगा।”
उसने पूरा लंड अंदर उतार दिया। मेरी सांस अटक गई। वो बिना रुके धक्के लगाने लगा—तेज, गहरे, क्रूर। हर धक्के पर मेरी गांड और फटती जा रही थी। खून उसकी जांघों पर लग रहा था। मैं रो रहा था, लेकिन वो नहीं रुका। दस मिनट तक वो मुझे दीवार से सटाकर चोदता रहा। फिर अचानक लंड बाहर निकाला, मुझे घुटनों पर बैठाया और मेरे मुंह में डालकर झड़ गया। गर्म वीर्य मेरे गले में उतर गया। मैंने थूक दिया। वो हंसा और चला गया।
मैं लंगड़ाते हुए घर पहुंचा। रात भर गांड में जलन रही। सुबह कक्षा में विकास मेरे पास आया।
“आज फिर।”
“नहीं… अभी दर्द है।”
उसने मेरी जांघ दबाई। “आज नहीं तो कल पूरी क्लास को बता दूंगा कि तू गांड मरवाता है। चल।”
मैं चुपचाप उसके पीछे चला गया। उसी टॉयलेट में। इस बार वो और ज्यादा बर्बर था। पहले उसने मुझे मुंह के बल झुकाया, दोनों हाथ पीछे बांध दिए अपनी बेल्ट से। फिर लंड घुसाया—इस बार पूरा एक झटके में। मैं चिल्लाया तो उसने मेरा मुंह अपने हाथ से बंद कर दिया। वो इतनी तेजी से चोद रहा था कि मेरी गांड की मांसपेशियां कांप रही थीं। बीच-बीच में वो लंड बाहर निकालकर थूक लगाता और दोबारा घुसा देता। खून और थूक मिलाकर उसकी जांघें गीली हो गई थीं। आखिर में उसने मेरी गांड में ही झड़ दिया और लंड अंदर ही छोड़कर बोला, “रोज आएगा। समझा?”
अगले दिन वो अकेला नहीं आया। अपने दोस्त राहुल को भी ले आया। राहुल लंबा था, लंड उसका विकास से भी मोटा—आठ इंच। टॉयलेट में दोनों ने मुझे घेर लिया। विकास ने फिर से मेरे हाथ बांध दिए। राहुल ने पहले मेरा मुंह चोदा, गले तक लंड उतार-उतारकर। फिर दोनों ने बारी-बारी से मेरी गांड मारी। एक चोद रहा तो दूसरा मेरे बाल खींचकर मुंह में ठूस रहा था। जब राहुल अंदर था तो विकास ने कहा, “इसकी गांड देख, कितनी फट रही है।” राहुल ने और जोर लगाया। मुझे लगा मेरी गांड सच में फट जाएगी। खून फिर निकला। दोनों ने मुझ पर वीर्य बरसाया—गांड पर, पीठ पर, चेहरे पर।
उसके बाद से वो रोज आते। कभी विकास अकेला, कभी राहुल, कभी दोनों। एक दिन तीसरा भी आ गया—संजय, कॉलेज का चौकीदार। उम्र करीब पैंतीस। उसने मुझे देखा तो हंसा। “ये तो मुफ्त का माल है।” उसने भी हिस्सा लिया। उसका लंड मोटा और टेढ़ा था। उसने मुझे फर्श पर लिटाया, टांगें कंधों पर चढ़ाईं और इतनी गहराई तक घुसाया कि मुझे उल्टी आने लगी। वो मुझे चांटे मार-मारकर चोदता रहा। “साले गांडू, तेरी गांड तो सड़कछाप है।”
एक हफ्ते बाद टॉयलेट में भीड़ होने लगी। विकास ने मुझे एक कमरे में बुलाया जो कॉलेज के पीछे खाली पड़ा था। वहां पांच लड़के थे। उन्होंने मुझे नंगा किया, हाथ-पैर रस्सी से बांध दिए। एक ने मेरी आंखों पर कपड़ा बांधा। फिर बारी-बारी से सबने मेरी गांड मारी। कोई थूक लगाता, कोई नहीं। कोई धीरे, कोई इतनी बर्बरता से कि मैं बेहोश होने वाला था। एक ने सिगरेट की आग मेरी गांड के पास लाई और धमकाया, “चिल्लाया तो जला दूंगा।” मैं चुप रहा। उन्होंने मुझे घंटों तक इस्तेमाल किया। आखिर में सबने मेरे मुंह में, गांड में, छाती पर वीर्य छोड़ दिया। मैं फर्श पर पड़ा कांप रहा था, गांड खुली और खून से लथ-पथ।
रात को घर पहुंचकर मैंने आईने में देखा। गांड सूजी हुई थी, लाल-नीली। फिर भी अंदर कुछ और चाहता था। अगले दिन विकास आया तो मैंने खुद कहा, “आज और जोर से।”
उसने मुस्कुराया। “अब तू तैयार है।”
उसने मुझे अपने घर बुलाया। वहां उसका एक रूम था। उसने मुझे बेड पर लिटाया, हाथ-पैर चारों कोनों से बांध दिए। फिर मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम मेरी गांड पर टपकाया। मैं चीखा। उसने हंसा और लंड घुसा दिया। मोम और खून मिलाकर उसकी गति और तेज हो गई। वो मुझे घंटे भर चोदता रहा, बीच-बीच में थप्पड़ मारता, गालों को चीरता, नाखून गाड़ता। आखिर में उसने एक लकड़ी का डंडा लिया—मोटा, लंबा—और उसे मेरी गांड में घुसा दिया। मैं रो रहा था, भीख मांग रहा था, लेकिन वो नहीं रुका। डंडा अंदर-बाहर करता रहा जब तक कि मैं कांपते-कांपते झड़ नहीं गया।
उसके बाद से मेरी जिंदगी बदल गई। कॉलेज के कई लड़के मुझे जानते थे। कोई मुझे स्टाफ रूम के पीछे ले जाता, कोई बाथरूम में, कोई रात को पार्क में। एक दिन एक प्रोफेसर ने भी पकड़ लिया। उम्र पचास के करीब। उसने मुझे अपने ऑफिस में बंद किया, टेबल पर लिटाया और इतनी क्रूरता से चोदा कि मेरी गांड से खून की धार बहने लगी। उसने कहा, “अब तू मेरा है। जब बुलाऊं, आना।”
मैं आने लगा। रोज। कभी अकेला, कभी तीन-चार के साथ। उन्होंने मुझे कुत्ता बनाया—गर्दन में कॉलर, रस्सी से खींचकर। कभी मुझे फर्श पर घुटनों के बल रेंगवाया, कभी दीवार से बांधकर घंटों छोड़ा। एक रात उन्होंने मुझे पूरा नंगा सड़क पर छोड़ दिया और कहा, “घर जा। जो मिलेगा, लेगा।” मैं लंगड़ाता हुआ जा रहा था तभी दो अजनबी मिले। उन्होंने भी लिया। पार्क के अंधेरे में, बिना नाम पूछे।
अब मेरी गांड हमेशा खुली रहती है। कोई भी आ जाए, मैं तैयार रहता हूं। दर्द अब मजा बन चुका है। जितना बर्बर, जितना क्रूर, उतना ही अच्छा। विकास अभी भी आता है। कभी अकेला, कभी अपनी पूरी टोली के साथ। वो मुझे देखकर सिर्फ एक शब्द बोलता है—“झुक।”
और मैं झुक जाता हूं।
मैं तुरंत घुटनों के बल बैठ जाता, पैंट और अंडरवियर एक साथ नीचे सरका देता और दोनों हाथों से अपनी गांड के गालों को चीरकर फैला देता। छेद पहले से ही सूजा, लाल और थोड़ा खुला रहता। विकास कभी अकेला आता, कभी अपनी पूरी टोली लेकर—राहुल, संजय, और दो नए लड़के जिनके नाम मैंने कभी नहीं पूछे। वे मुझे जानवर की तरह इस्तेमाल करते।
एक रात विकास ने मुझे अपने रूम में बुलाया। कमरा अंधेरा था, सिर्फ एक लाल बत्ती जल रही थी। उसने मुझे नंगा किया, फिर एक मोटी चेन गर्दन में डाल दी। चेन इतनी छोटी थी कि सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था। दोनों हाथ पीछे बांध दिए गए, टखनों में अलग-अलग रस्सियां बांधकर उन्हें बेड के पायों से खींच दिया गया। मेरी गांड हवा में तनी हुई थी।
विकास ने पहले गर्म मोमबत्ती जलाई। मोम की बूंदें मेरी पीठ पर, गांड के गालों पर और सीधे छेद के आसपास टपकने लगीं। हर बूंद आग की तरह जलती। मैं कराह उठा तो उसने मेरा मुंह कपड़े से बंद कर दिया। फिर उसने एक धातु का मोटा प्लग निकाला—ठंडा, भारी, और आधार पर एक रिंग लगा हुआ। बिना किसी चिकनाई के उसने उसे मेरे छेद में ठूसना शुरू किया। दर्द इतना तेज था कि आंखों से पानी निकलने लगा। प्लग आधा अंदर गया तो रुक गया। विकास ने हथौड़ा जैसा जोर लगाया और पूरा अंदर धकेल दिया। मेरी गांड फटने जैसी आवाज आई। खून प्लग के चारों तरफ बहने लगा।
“अब इसे निकाले बिना सोएगा,” उसने कहा।
रात भर प्लग अंदर रहा। हर बार हिलने पर अंदर की दीवारें जल उठतीं। सुबह उसने प्लग निकाला तो खून और मल का मिश्रण बह निकला। फिर उसने अपना लंड घुसा दिया—सूखा, मोटा, और क्रूर। हर धक्का पहले से फटी हुई गांड को और चीर रहा था। राहुल और संजय भी आ गए। तीनों ने बारी-बारी से मुझे चोदा। एक लंड अंदर होता तो दूसरा मेरे मुंह में ठूस दिया जाता। जब तीनों झड़ चुके तो विकास ने एक पतली बेंत निकाली। उसने मेरी गांड पर पच्चीस वार किए। हर वार पर खून की लकीरें उभर आतीं। मैं रो रहा था, लेकिन मुंह बंद होने की वजह से सिर्फ गले से आवाजें निकल रही थीं।
अगले हफ्ते उन्होंने मुझे एक और स्तर पर ले गए। कॉलेज के पीछे एक पुराना स्टोर रूम था। वहां उन्होंने मुझे छत से उल्टा लटका दिया। रस्सियां टखनों में कसी हुईं, सिर नीचे, गांड ऊपर। विकास ने मेरे दोनों निप्पल्स पर क्लिप्स लगा दिए—धातु के, नुकीले। फिर उसने एक पतली चेन दोनों क्लिप्स से जोड़कर खींच दी। दर्द छाती तक उतर गया। नीचे से राहुल ने मेरी गांड में एक मोटा डildo घुसाया—काला, नसों वाला, और आधार पर एक मोटर लगी हुई। मोटर चालू होते ही डildo अंदर कंपन करने लगा, इतनी तेज कि मेरी पूरी बॉडी कांपने लगी। संजय ने मेरे मुंह में अपना लंड डाल रखा था और गले तक धक्के दे रहा था। उल्टी आने लगी तो उसने और जोर लगाया।
वे तीन घंटे तक मुझे उल्टा लटकाए रहे। बीच-बीच में डildo निकालकर अपना लंड घुसाते, फिर वापस डildo लगा देते। खून सिर में चढ़ आया था, आंखें लाल हो गई थीं। जब उन्होंने मुझे उतारा तो मैं चल भी नहीं पाया। विकास ने मुझे कंधे पर उठाया और सीधे अपने रूम ले गया। वहां उसने मुझे बाथटब में लिटाया और ठंडा पानी मुझ पर डाल दिया। फिर उसने एक पतली सुई निकाली। “आज निशान बनाएंगे,” उसने कहा।
सुई से उसने मेरे गांड के दोनों गालों पर छोटे-छोटे छेद किए और उनमें काले धागे पिरो दिए। हर छेद में खून निकला। धागे कसकर बांध दिए गए ताकि गांड के गाल हमेशा थोड़े खुले रहें। फिर उसने अपना लंड उन धागों के बीच से घुसाया। धागे लंड को खरोंच रहे थे, लेकिन उसे मजा आ रहा था। वो घंटे भर चोदता रहा। आखिर में वीर्य गांड के अंदर छोड़कर बाहर निकला और धागों को ऐसे ही छोड़ दिया।
रात को मैं घर नहीं गया। विकास के रूम में ही पड़ा रहा। सुबह उसने मुझे जगाया और गर्दन की चेन पकड़कर खींचते हुए बाथरूम ले गया। वहां उसने मुझे टॉयलेट सीट पर बैठाया, फिर अपना लंड मेरे मुंह में डालकर पेशाब कर दिया। गर्म पेशाब गले में उतरता गया। मैंने निगला। उसने कहा, “अब से रोज यही होगा।”
उसके बाद की जिंदगी सिर्फ दर्द और इस्तेमाल की हो गई। कभी वे मुझे कॉलेज के बेसमेंट में ले जाते, जहां कोई नहीं आता था। वहां उन्होंने एक लोहे का पिंजरा रखा था। मुझे उसके अंदर नंगा बंद कर देते। पिंजरे के सलाखों के बीच से वे अपनी उंगलियां, डंडे, लंड अंदर डालते रहते। कभी घंटों मुझे भूखा-प्यासा छोड़ देते, फिर अचानक दरवाजा खोलकर झुंड बनाकर चोदते। एक दिन उन्होंने मेरे दोनों हाथों को पीठ के पीछे बांधकर मुझे कुत्ते की तरह रेंगवाया। गर्दन में कॉलर, मुंह में बॉल-गैग। विकास ने कॉलर की चेन पकड़ रखी थी और मुझे पूरे बेसमेंट में घुमाता रहा। हर कोने में कोई न कोई लंड मेरा इंतजार कर रहा था। मैं रेंगता, रुकता, गांड फैलाता, और वे बारी-बारी से मुझे भरते जाते।
एक रात सबसे क्रूर खेल हुआ। विकास ने मुझे बेड पर चित लिटाया। दोनों टांगें कंधों तक मोड़ दीं और रस्सियों से बांध दीं ताकि गांड पूरी तरह खुली रहे। फिर उसने एक लंबी, पतली धातु की रॉड निकाली—ठंडी और चमकदार। रॉड के सिरे पर एक छोटा सा हुक था। उसने रॉड को मेरे छेद में धीरे-धीरे घुसाया, इतनी गहराई तक कि मुझे लगा वह मेरे पेट को चीरकर बाहर निकल जाएगी। फिर हुक को अंदर घुमाकर किसी चीज में अटका दिया। दर्द असहनीय था। मैं छटपटाया तो उसने मेरे निप्पल्स के क्लिप्स और कस दिए। राहुल ने मेरे मुंह में एक मोटा रबर का मुखौटा लगा दिया जिसमें सिर्फ सांस लेने के छेद थे। अब मैं बोल भी नहीं सकता था।
वे चार घंटे तक मुझे वैसे ही छोड़ गए। बीच-बीच में आकर रॉड को थोड़ा घुमा देते, या लंड से गांड के आसपास रगड़ते। जब आखिर में रॉड निकाली गई तो खून की धार बह निकली। विकास ने तुरंत अपना लंड उस खून में डुबोया और अंदर घुसा दिया। हर धक्का पहले से कटे हुए मांस को और चीर रहा था। उसने मेरी गर्दन दबाई और बोला, “आज तू मर भी जाए तो हमें फर्क नहीं पड़ता।”
मैं मरने के करीब पहुंच चुका था, लेकिन बचा रहा।
अब मेरी जिंदगी सिर्फ इंतजार की रह गई है। इंतजार इस बात का कि अगली बार विकास क्या नया टॉर्चर लेकर आएगा। कभी बिजली के तार, कभी बर्फ के टुकड़े छेद के अंदर, कभी गर्म चम्मच से दाग। मेरी गांड अब एक खुला घाव है, हमेशा इस्तेमाल के लिए तैयार। और मैं खुद इसे और चौड़ा करने के लिए मरा जा रहा हूं।
क्योंकि जितना दर्द, उतना ही जीवन।
और विकास जानता है कि मुझे मारकर भी जिंदा रखना है।
ताकि अगली बार फिर से “झुक” कह सके।
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