रस्सी, मोम और उसका शिकार

फार्महाउस की अँधेरी रात में एक औरत खुद को पूरी तरह सौंप देती है। छत से लटकते हाथ, जलता मोम, दबी साँसें और एक मर्द जो रुकने का नाम नहीं लेता। हर क्षण और गहरा, और बेकाबू।

मैं 28 साल की हूँ। नाम है कव्या शर्मा। लंबा-चौड़ा गदराया बदन, भारी भरकम चूचियाँ, गोल-मटोल चूतड़ और एक ऐसी चूत जो हमेशा पानी से भीगी रहती है। मैं पढ़ी-लिखी हूँ, अंग्रेज़ी फर्राटेदार बोलती हूँ और सेक्स के मामले में पूरी तरह बेबाक। शादी के पहले भी मैंने कई लण्ड चूसे और कई चूतें फड़वाईं, लेकिन शादी के बाद भी मेरी भूख नहीं थमी। मेरा पति अक्सर बाहर रहता है। मैं दिल्ली के पास गुरुग्राम में रहती हूँ, लेकिन काम के सिलसिले में अक्सर जयपुर और उसके आसपास के इलाकों में आना-जाना पड़ता है।

एक दिन मैं जयपुर से वापस आ रही थी। रात का अंधेरा घिर चुका था। मैंने एक प्राइवेट कैब बुक की। ड्राइवर आया— नाम था विक्रम। उम्र 31 साल, लंबा तगड़ा जिम वाला बदन, चौड़ी छाती, मोटी भुजाएँ और आँखों में एक जंगली भूख। गोरा रंग, दाढ़ी का हल्का साया और हाथ ऐसे जैसे लोहे के हों। उसे देखते ही मेरी चूत में हलचल मच गई। मैंने जानबूझकर आगे वाली सीट पर बैठने की बजाय पीछे बैठी, ताकि मैं उसकी पीठ और कंधों को घूर सकूँ।
रास्ते में मैंने बात शुरू की। “विक्रम, तुम कितने साल से कैब चला रहे हो?”

उसने आईने में मुझसे नज़रें मिलाईं। “लगभग 8 साल, मैडम।”

“शादी हुई?”

“नहीं। अभी फ्री हूँ।”

मेरी चूत ने एक जोरदार धक्का मारा। मैंने साड़ी की पल्लू थोड़ी सी खिसकाई ताकि मेरी गहरी ब्रा की धार दिखे। “अच्छा… तो तू अकेला रहता है?”

“हाँ।”
मैंने और बोल्ड होकर पूछा, “लण्ड कितना मोटा है तेरा?”

उसकी आँखें चौड़ी हो गईं, लेकिन मुस्कुराहट नहीं छूटी। “मैडम, आप बहुत डायरेक्ट हैं।”

“मुझे मज़ा उसी में आता है। बता।”

उसने धीरे से कहा, “8 इंच लंबा और मोटा… काफी।”

मेरी चूत ने पानी छोड़ दिया। मैंने अपनी उँगली साड़ी के अंदर डालकर अपनी गीली चूत को छुआ और धीरे से कहा, “आज तू मुझे अपने घर ले चल। मैं तेरा लण्ड चूसना चाहती हूँ और अपनी चूत फड़वानी चाहती हूँ।”
विक्रम ने गाड़ी एक साइड वाले होटल की तरफ मोड़ दी। “मेरा घर दूर है। यहाँ एक कमरा ले लेते हैं।”

हम दोनों चेक-इन करके ऊपर गए। कमरा साधारण था, लेकिन बिस्तर मज़बूत। जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, मैंने साड़ी उतार फेंकी। ब्रा और पैंटी में खड़ी होकर बोली, “अब तू भी नंगा हो जा। मुझे तेरा पूरा बदन देखना है।”
विक्रम ने कपड़े उतारे। उसका लण्ड सच में 8 इंच का था, मोटा, नसों से भरा हुआ और सुपाड़ा लाल-लाल। मैं घुटनों के बल बैठ गई और बिना किसी भूमिका के उसका लण्ड मुँह में ले लिया। गहरी साँस लेकर पूरा अंदर तक घुसाया। गला भर गया, आँखों से पानी निकलने लगा, लेकिन मैं रुकी नहीं। मैंने उसके अंडकोष पकड़कर मसले और लण्ड को गले तक ठूँसा। विक्रम की साँसें तेज़ हो गईं। “मैडम… धीरे…”

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मैंने लण्ड बाहर निकाला और थूक लगाकर बोली, “धीरे क्या? मैं तेरी माँ की चूत नहीं हूँ। मुझे गला फाड़कर चोद।”
उसने मेरे बाल पकड़ लिए और ज़ोर से मेरे मुँह में लण्ड ठोकने लगा। धच्च-धच्च… गला खरखरा रहा था, लार बह रही थी, लेकिन मैं और गहरी ले रही थी। अचानक उसने मुझे उठाया और बिस्तर पर पटक दिया। “आज मैं तुझे सिर्फ चोदूँगा नहीं… तोड़ूँगा।”
उसने अपनी बेल्ट निकाली और मेरे हाथों को पीछे बाँध दिए। कसी हुई गाँठ। मैं बिल्कुल बेबस हो गई। फिर उसने मेरी पैंटी फाड़ दी। मेरी चूत पूरी तरह भीगी हुई थी, बाल साफ मुंडे हुए। उसने दो उँगलियाँ अंदर घुसा दीं और जोर से घुमाने लगा। “इतनी गीली… जैसे कुतिया हो।”

मैंने कराहते हुए कहा, “हाँ… मैं कुतिया हूँ। आज मेरी चूत और गांड दोनों फाड़ दे।”
विक्रम ने मुझे पेट के बल लिटाया। तकिया मेरे पेट के नीचे रखा ताकि मेरी गांड ऊपर उठ जाए। फिर उसने अपना मोटा लण्ड मेरी चूत के मुँह पर रगड़ा और एक झटके में पूरा अंदर धकेल दिया।

“आह्ह्ह… भोसड़ी के… मोटा है साले!”

वह बिना रुकें धक्के मारने लगा। हर धक्के के साथ मेरी चूत की दीवारें फैल रही थीं। उसने मेरे बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और कान में कहा, “आज मैं तेरी चूत का पानी निचोड़ लूँगा।”
धक्के और तेज़ हो गए। बिस्तर चरमरा रहा था। मेरी चूचियाँ बिस्तर से रगड़ खा रही थीं। अचानक उसने लण्ड बाहर निकाला और मेरी गांड के छेद पर लगा दिया। थूक लगाकर एक जोरदार धक्का मारा।

“उई माँ… फट गई!”

दर्द तेज़ था, लेकिन मज़ा उससे कहीं ज्यादा। उसने पूरी लंबाई अंदर घुसा दी और गांड चोदने लगा। एक हाथ से मेरी चूत मसल रहा था, दूसरे से मेरे बाल। मैं चीख रही थी, गाली दे रही थी— “मादरचोद… और जोर से… फाड़ दे मेरी गांड… बहनचोद तेरा लण्ड लोहे का है!”
वह रुक-रुककर चूत और गांड बदल-बदलकर चोद रहा था। कभी चूत में पूरा घुसाकर अंदर ही घुमाता, कभी गांड में ठोककर बाहर निकालता। मेरी आँखों के आगे अँधेरा छा गया। शरीर काँप रहा था। अचानक उसने मुझे पलटा। हाथ अभी भी बँधे थे। उसने मेरे पैर अपने कंधों पर रखे और चूत में फिर से घुस गया। इस बार और गहरा।

“देख… तेरी चूत कैसे निगल रही है मेरा लण्ड।”
मैं पानी छोड़ने वाली थी। उसने महसूस किया और रुक गया। “अभी नहीं। पहले तू मेरे लण्ड का पानी पी।”

उसने मुझे घुटनों पर बैठाया और लण्ड मेरे मुँह में ठोकने लगा। गला पूरी तरह खुला हुआ था। वह जोर-जोर से धक्के मार रहा था। अचानक उसका लण्ड धड़कने लगा और गर्म पानी का झरना मेरे गले में उतर गया। मैंने पूरा निगल लिया। एक बूँद भी बाहर नहीं गिरने दी।
लेकिन विक्रम का लण्ड अभी भी सख्त था। उसने मुझे फिर बिस्तर पर लिटाया। इस बार उसने अपनी शर्ट के टुकड़े से मेरी आँखें बाँध दीं। अंधेरे में सिर्फ स्पर्श बचा था। उसने ठंडा तेल मेरी चूत और गांड पर डाला और फिर से दोनों छेदों को बारी-बारी चोदने लगा। कभी तीन उँगलियाँ चूत में, कभी लण्ड गांड में। मैं बिल्कुल बेकाबू हो चुकी थी। शरीर ऐंठ रहा था, मुँह से सिर्फ कराहें और गालियाँ निकल रही थीं।
“विक्रम… अब छोड़… नहीं सहूंगी और…”

उसने जवाब में और जोर का धक्का मारा। “आज तू मेरी गुलाम है। जब तक मैं कहूँगा, चुदेगी।”

उसने मुझे चारपाई के पाये से बाँध दिया। हाथ ऊपर, पैर फैले हुए। फिर उसने एक पतला चमड़े का पट्टा निकाला (जो उसने बैग से निकाला था) और मेरी चूतड़ पर मारना शुरू किया। थप-थप… लाल निशान पड़ गए। हर मार के साथ मेरी चूत और भीगी। फिर उसने पट्टा छोड़कर लण्ड से चूत फाड़नी शुरू की। इतनी तेज़ी से कि मुझे लगा मेरी चूत सच में फट जाएगी।

मैं चिल्ला रही थी, रो रही थी, लेकिन अंदर ही अंदर और पानी छोड़ रही थी। उसने मुझे अनकाउंटेबल बार ऑर्गैज़्म दिया। शरीर थरथर काँप रहा था। आखिर में उसने खुद भी दूसरी बार झड़ते हुए मेरी चूत के अंदर ही सारा पानी उड़ेल दिया। गर्म लण्ड की धड़कनें महसूस होती रहीं।
रात भर उसने मुझे अलग-अलग पोजीशन में बाँधकर चोदा। कभी कुत्ते की तरह, कभी मेरे मुँह पर बैठकर चूत चटाई, कभी लण्ड को मेरी गांड में छोड़कर चूचियाँ मसलता रहा। सुबह जब मेरी आँख खुली तो शरीर दर्द से भरा था— चूत सूजी हुई, गांड जल रही थी, हाथ-पैरों पर रस्सी के निशान। लेकिन मन पूरी तरह संतुष्ट था।
विक्रम नंगा ही बैठकर पानी पी रहा था। मैंने धीरे से कहा, “अगली बार जब जयपुर आऊँ… तू फिर से मुझे ऐसे ही तोड़ना।”

उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “जब चाहे बुला ले। तेरी चूत अब मेरी हो चुकी है।”
हमने नहाया, कपड़े पहने और होटल से निकले। रास्ते भर मेरी चूत में उसका पानी महसूस होता रहा। मैं खिड़की से बाहर देख रही थी और मन ही मन मुस्कुरा रही थी। एक रात की इस क्रूर, बेरोक-टोक चुदाई ने मुझे फिर से जिंदा कर दिया था।
अब जब भी अकेली होती हूँ, विक्रम का मोटा लण्ड और उसकी बेदर्द धक्के याद आ जाते हैं। और मैं अपनी उँगलियों से अपनी चूत को फिर से भीगो लेती हूँ… सोचती हूँ कि अगली मुलाकात कब होगी।

अगली मुलाकात सिर्फ तीन हफ्ते बाद हुई। मैंने खुद फोन किया। आवाज़ में भूख साफ़ झलक रही थी। “विक्रम, आज रात गुरुग्राम नहीं… जयपुर के बाहर वह पुराना फार्महाउस ले चल। जहाँ कोई शोर नहीं सुनता।”
रात के दस बजे वह आया। काली जीप में। मैंने काली साड़ी पहनी थी, नीचे कुछ नहीं। सिर्फ एक पतली चेन कमर में और गर्दन में एक चoker जिस पर लिखा था—‘Property of Vikram’। जैसे ही मैं गाड़ी में बैठी, उसने मेरा मुँह पकड़कर जोर से चूमा। जीभ मेरे गले तक घुस गई। फिर उसने मेरी साड़ी ऊपर उठाई और दो उँगलियाँ चूत में धकेल दीं। “अभी से इतनी गीली? कुतिया।”

फार्महाउस वीरान था। अंदर सिर्फ एक बड़ा बेडरूम, लोहे की चारपाई, दीवारों पर हुक लगे हुए और एक लकड़ी का संदूक। विक्रम ने दरवाज़ा बंद करते ही मुझे घुटनों पर गिरा दिया। “कपड़े उतार। सब।”
मैंने साड़ी फेंकी। नंगी खड़ी थी। उसने संदूक खोला। अंदर रस्सियाँ, चमड़े के पट्टे, एक मोटी मोमबत्ती, क्लैंप और एक बड़ा काला डिल्डो था। उसने पहले मेरे दोनों हाथ ऊपर उठाकर छत के हुक से बाँध दिए। पैर फैला दिए और टखनों को भी चारपाई के पायों से कस दिया। मैं पूरी तरह फैली हुई, बेबस।
उसने मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम की पहली बूँद मेरी बाईं चूची पर गिरी।

“आह्ह्ह… साले!”

दूसरी बूँद दाईं चूची पर। फिर पेट पर, फिर सीधे चूत के ऊपर। जलन तेज़ थी। त्वचा लाल हो रही थी। वह हँस रहा था। “आज मैं तेरी चूत को सिर्फ चोदूँगा नहीं… निशान छोड़ूँगा।”
उसने क्लैंप निकाले। दोनों निपल्स को कसकर दबा दिया। दर्द से मेरी आँखें भर आईं। फिर उसने एक पतला चमड़े का पट्टा लिया और मेरी भीगी चूत पर सीधे मारना शुरू किया। थप… थप… थप… हर मार के साथ चूत की पुतलियाँ खुल-बंद हो रही थीं। पानी टपक रहा था। दस मार के बाद उसने पट्टा नीचे रखा और अपना मुँह चूत पर लगा दिया। जीभ अंदर तक घुसाई, चूसा, काटा। मैं छटपटा रही थी लेकिन रस्सियाँ नहीं झुक रहीं थीं।
अचानक वह उठा। अपना लण्ड निकाला—पहले से भी ज्यादा सख्त। बिना किसी चेतावनी के चूत में पूरा धकेल दिया।

“गच्च…”

मेरी चीख निकल गई। वह पागलों की तरह धक्के मारने लगा। हर धक्के के साथ मेरी बाँधी हुई शरीर झटके खा रही थी। निपल्स के क्लैंप हिल रहे थे, दर्द दोगुना हो रहा था। उसने मेरे बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और कान में गुर्राया, “बोल… तू किसकी कुतिया है?”

“तेरी… विक्रम की… भोसड़ी के तेरी…”

“जोर से!”

“विक्रम की कुतिया! मेरी चूत तेरी है! फाड़ दे!”
वह लण्ड बाहर निकालकर गांड की तरफ ले गया। थूक की जगह उसने मेरी ही चूत का पानी लिया और गांड के छेद पर लगाया। फिर एक ही झटके में आधा लण्ड अंदर धकेल दिया।

“उई माँ… फट रही है…”

उसने रुकने की बजाय और अंदर धकेला। पूरा। मेरी गांड फैल गई। वह धीरे-धीरे बाहर निकालता और फिर जोर से ठोंकता। बीच-बीच में चूत में भी घुसा देता। दोनों छेद बारी-बारी इस्तेमाल हो रहे थे। मेरा दिमाग सुन्न पड़ रहा था।
अचानक उसने रस्सियाँ ढीली कीं लेकिन हाथ पीछे बाँध दिए। मुझे चारपाई से उतारा और फर्श पर घुटनों के बल बैठाया। सामने एक बड़ा आईना था। उसने मेरे पीछे खड़े होकर लण्ड फिर गांड में घुसाया और मेरे बाल पकड़कर आईने की तरफ मुँह करवा दिया। “देख… कैसे तेरी गांड लण्ड निगल रही है।”

मैंने देखा—मेरा चेहरा लाल, आँखों में आँसू, मुँह खुला, लार बह रही थी। पीछे विक्रम का तगड़ा बदन धक्के मार रहा था। नज़ारा इतना अश्लील था कि मेरी चूत ने खुद-ब-खुद पानी छोड़ दिया।
वह मुझे उठाकर बिस्तर पर लिटाया। इस बार उसने काला डिल्डो निकाला—मोटा, नसों वाला। पहले उसे मेरी चूत में घुसाया, फिर लण्ड गांड में। दोनों छेद एक साथ भरे हुए। वह डिल्डो को अंदर-बाहर कर रहा था और खुद गांड चोद रहा था। मैं पागल हो रही थी। शरीर काँप रहा था, कराहें कमरे में गूँज रही थीं।

“और… और अंदर… दोनों फाड़ दे… मादरचोद…”
उसने डिल्डो निकालकर फेंक दिया और खुद चूत में आ गया। अब की बार उसने मेरी टाँगें अपने कंधों पर रखीं और इतनी गहराई तक धकेला कि मुझे लगा लण्ड मेरे पेट में घुस जाएगा। उसने एक हाथ से मेरा गला दबाया। साँस रुकने लगी। आँखों के आगे अँधेरा घूम रहा था। ठीक उसी पल उसने जोर से झड़ते हुए सारा गर्म पानी मेरी चूत के अंदर उड़ेल दिया। गला छोड़ते ही मैं जोर से साँस ली और खुद भी पानी छोड़ते हुए काँपने लगी। शरीर ऐंठ रहा था।
लेकिन वह रुका नहीं। लण्ड अभी भी अंदर था। उसने मुझे पलट दिया। पेट के बल। हाथ अभी भी बँधे। उसने फिर से गांड में लण्ड ठोंक दिया और इस बार और क्रूर हो गया। एक हाथ से मेरे बाल खींच रहा था, दूसरे से चूत मसल रहा था। कभी-कभी चूत पर थप्पड़ मारता।

“तेरी चूत कितनी लाल हो गई है… देख।”

मैं सिर्फ कराह सकती थी। “चोद… और चोद… मार डाल…”
रात के दो बज चुके थे। उसने मुझे बाँधकर रखा। कभी मोमबत्ती की बूँदें पीठ पर गिराता, कभी क्लैंप निपल्स पर फिर से लगाता, कभी लण्ड मेरे मुँह में ठोककर गला फाड़ता। मैंने तीन बार और पानी छोड़ा। शरीर थक चुका था लेकिन चूत अभी भी माँग रही थी।
सुबह चार बजे उसने आखिरकार रस्सियाँ खोलीं। मैं बिस्तर पर ढेर की तरह पड़ी थी।

चूत और गांड दोनों सूजे हुए, निपल्स पर लाल निशान, गर्दन पर उँगलियों के निशान। विक्रम मेरे पास लेट गया। उसका लण्ड अभी भी आधा सख्त था। मैंने कमजोर हाथ से उसे पकड़ा और धीरे से मुँह में ले लिया। चूसने लगी। उसने मेरे सिर पर हाथ रखा लेकिन जोर नहीं लगाया। बस आनंद ले रहा था।
जब वह फिर से झड़ने वाला था तो उसने मेरे बाल पकड़कर लण्ड बाहर निकाला और मेरा पूरा चेहरा अपने पानी से नहला दिया। गरम-गरम बूँदें आँखों, होंठों, ठोड़ी पर गिर रही थीं। मैंने जीभ निकालकर चाटा।

“अच्छा लगा?” उसने पूछा।

मैंने आँखें बंद करके कहा, “और… अगली बार और क्रूर होना। आज तूने सिर्फ शुरूआत की है।”
उसने मुझे गोद में खींच लिया। हम दोनों पसीने और पानी में सने हुए लेटे रहे। बाहर पक्षी चहचहा रहे थे। फार्महाउस की खिड़की से हल्की रोशनी आ रही थी। मेरे शरीर पर दर्द था, लेकिन अंदर एक अजीब सुकून। मैंने उसके सीने पर सिर रखकर कहा, “अब तू मुझे छोड़कर मत जाना। जब तक मैं कहूँ… यहीं रह।”
विक्रम हँसा। “तू मेरी कुतिया है। जहाँ चाहूँगा ले चलूँगा। और जब चाहूँगा… तोड़ूँगा।”

मैंने उसकी छाती पर धीरे से काट लिया। “फिर तोड़। अभी। एक बार और।”
उसका लण्ड फिर से सख्त होने लगा। उसने मुझे घुटनों के बल कर दिया, पीछे से पकड़ा और बिना किसी भूमिका के फिर से मेरी सूजी हुई चूत में धकेल दिया। सुबह की पहली किरणों के साथ फिर से धक्के शुरू हो गए। इस बार और धीमे, और गहरे, और निर्दय। हर धक्के के साथ मैं और डूबती जा रही थी।
और मैं जानती थी—यह अंत नहीं है। यह तो बस एक और रात थी। आगे और लंबी, और क्रूर रातें बाकी थीं।

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