कज़िन की रस्सी और चाबुक वाली रातें

दो कज़िन बहनों ने खुद को रस्सियों से बँधवाया, गला घोंटने, चाबुक और बर्बर चुदाई की भीख माँगी। दर्द, अपमान और क्रूर भूख से भरी वो रातें जो आत्मा तक हिला दें।

मैं मुंबई का रहने वाला हूँ। उस समय मेरी उम्र 22 साल थी। गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थीं। मेरी मौसी की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई थी। अस्पताल में भर्ती होने के बाद हम सब उनके घर पहुँचे। दस दिन बाद मौसी थोड़ी ठीक हुईं तो माँ-बाप वापस मुंबई लौट गए। मैं अकेला वहीं रुक गया। छुट्टियाँ बिताने के बहाने। मौसी के पति बाहर शहर में जॉब करते थे, इसलिए घर पर अक्सर नहीं रहते थे।

मौसी की दो बेटियाँ थीं। बड़ी – प्राची, 24 साल की। छोटी – नयना, 21 साल की। नयना का शरीर देखकर पहली बार मेरी साँसें अटक गई थीं। उम्र कम थी लेकिन जिस्म पूरी तरह से गदराया हुआ। छाती 38, कमर 28, कूल्हे 40। गोरी चिकनी त्वचा, लंबे काले बाल और जाँघें इतनी मोटी और मुलायम कि मिनी स्कर्ट में स्कूल जाते समय हर किसी की निगाहें चिपक जाती थीं।

वह जानबूझकर जाँघों तक की छोटी स्कर्ट पहनती थी। कपड़े शरीर पर चिपकते थे। मैंने खुद को समझाया – यह मेरी कज़िन है। लेकिन मेरा लंड नहीं माना। कई हफ्तों से चुदाई नहीं हुई थी। रातों को नयना के जिस्म को याद करके मूठ मारता था।

पाँच-छह दिन ऐसे ही बीते। एक दोपहर प्राची को हिन्दी पढ़ा रहा था। डस्टर नहीं मिला तो नयना के बैग में ढूँढने लगा। डस्टर के बजाय एक सीडी मिली। ऊपर लिखा था “Hardcore BDSM Collection – Extreme Edition”। मैंने कई ब्लू फिल्में देखी थीं। यह वाली साफ थी – रस्सियाँ, चाबुक, गला घोंटना, जबरदस्ती के सीन। मैंने सीडी वापस रख दी।

रात को पानी पीने बाहर निकला। लौटते समय नयना के कमरे का दरवाजा थोड़ा खुला था। कान लगाए तो अंदर से आवाजें आ रही थीं – “आह्ह्ह… उउउह… जोर से… गला दबा… चोदो मुझे कुत्ते की तरह… हाँ बेबी… और गहरा…”। मैं समझ गया। वह उसी सीडी को देख रही थी। मैं चुपचाप लौट आया और एक और बार मूठ मारकर सो गया।

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सुबह नयना तैयार होकर निकल रही थी। उसकी आँखों में एक अजीब हवस थी। मुझ पर टिकी निगाहें। वह मुस्कुराई। अगले दो-तीन दिन मैंने उसे हवस भरी निगाहों से घूरा। वह भी जानबूझकर मिनी स्कर्ट और डीप नेक टॉप पहनने लगी। ब्लू फिल्म का असर साफ था।

एक दोपहर मैं कमरे में अकेला था। नयना का ख्याल आया और लंड तन गया। लोवर नीचे किया, नंगा हो गया और मूठ मारने लगा। इतना मग्न था कि गेट खुला छोड़ दिया। अचानक दरवाजे पर आहट हुई। नयना खड़ी थी। आँखें फटी हुईं। मेरे लंड को घूर रही थी जैसे अभी निगल जाएगी। मैं झड़ने ही वाला था। उठा और बाथरूम की तरफ भागा। लेकिन उसने रास्ता रोक लिया। उसके चेहरे पर मुस्कान थी – क्रूर और भूखी।

“भैया… आप तो बड़े छुपे रुस्तम निकले,” उसने धीरे से कहा। पास आई। मेरे गाल पर एक गीला चुंबन दिया। फिर मेरे तने हुए लंड को अपने नरम हाथ में पकड़ लिया। “आज रात मेरे कमरे में आना। आपको कुछ दिखाना है… आपके इस लंड के लिए।”
मैंने पूछा, “फर्श पर झाड़ दिया… अजीब नहीं लगा?”

“नहीं भैया। मुझे तो मज़ा आया।” उसने झुका और फर्श पर पड़े गर्म वीर्य को जीभ से चाट लिया। फिर मुस्कुराते हुए चली गई।
रात हुई। घर के सब सो चुके थे। मैं नयना के कमरे में गया। दरवाजा खुला था। अंदर जाकर बंद कर दिया। वह बेड पर लेटी थी। पारदर्शी काली नाइटी में। नीचे कुछ नहीं। ब्लू फिल्म टीवी पर चल रही थी – एक लड़की को रस्सियों से बाँधकर चाबुक मारा जा रहा था, गला दबाया जा रहा था। नयना की उंगलियाँ उसकी गीली चूत में घूम रही थीं।

मैंने आवाज लगाई। वह मुड़ी। आँखों में आग थी।
“आओ भैया। आज तुम मेरे मालिक हो। मैं तुम्हारी कुतिया।”
वह उठी। नाइटी उतार दी। नंगी खड़ी हो गई। 38 की भारी छातियाँ, कड़े निप्पल, चिकनी मुंडवाई हुई चूत और मोटी जाँघें। उसने बेड के पास से चमड़े की पट्टियाँ, रस्सी और एक छोटा चाबुक निकाला।

“बाँध दो मुझे। जोर से। दर्द दो। आज रात मैं तुम्हारी पूरी तरह से गुलाम हूँ।”
मैंने उसके हाथ पीछे बाँधे। रस्सी कसी। वह कराह उठी। मैंने उसे बेड पर पेट के बल लिटाया। टाँगें फैलाईं। चाबुक उठाया और उसकी गददी गांड पर एक जोरदार सटका मारा। लाल निशान पड़ गया। वह चीखी लेकिन आवाज दबाई।

“और… और जोर से… मुझे कुतिया बनाओ…”
मैंने लगातार दस-बारह चाबुक मारे। गांड और जाँघें लाल हो गईं। वह रो रही थी लेकिन चूत से पानी टपक रहा था। मैंने उसके बाल पकड़े और सिर पीछे खींचा। गला दबाया। दूसरे हाथ से अपनी मोटी लंड उसकी गीली चूत में एक झटके में घुसेड़ दी। वह चीखी। मैंने बिना रुकें जोर-जोर से ठोके। हर धक्के के साथ उसके कूल्हे पर थप्पड़ मारे।

“बोल… तू क्या है?”
“मैं… आपकी… कुतिया… हूँ भैया… चोदो… मारो…”
मैंने उसे पलटा। हाथ बाँधे हुए। छातियों को जोर से मसला, निप्पलों को दाँतों से काटा। खून की छोटी बूँदें निकलीं। वह कराहती रही। फिर मैंने लंड उसकी तंग गांड में धकेला। पहले आधा, फिर पूरा। वह चीख पड़ी। आँसू बह रहे थे।

लेकिन उसने कहा, “और गहरा… तोड़ो मुझे…”
मैंने गांड कुचली। एक हाथ गला दबाए रखा। साँस फूल रही थी उसकी। चेहरा लाल हो गया। जब वह बेहोशी के करीब पहुँची तो मैंने छोड़ दिया। फिर से चूत में घुसाया। अब दोनों छेद बारी-बारी से कुचले। चाबुक बीच-बीच में उसकी पीठ और जाँघों पर पड़ता रहा।

घंटे भर बाद मैंने उसके मुँह में लंड ठूंस दिया। बाल पकड़कर गले तक घुसाया। वह उल्टी करने वाली थी लेकिन मैंने बाहर नहीं निकाला। आखिर में उसके चेहरे, छातियों और खुली हुई चूत पर गर्म वीर्य की धार छोड़ दी। वह लेटी हुई हाँफ रही थी। शरीर पर चाबुक के निशान, थप्पड़ों के निशान, रस्सी के लाल निशान।

सुबह चार बजे तक यह सिलसिला चला। मैंने उसे फर्श पर घुटनों के बल बैठाया, कुत्ते की तरह चोदा, गला दबाया, चाबुक मारा, थूक उसके मुँह में डाला और कहा कि निगल ले। उसने निगल लिया। आखिर में जब मैं थक गया तो उसने मेरे लंड को चाटा-चाटाकर साफ किया और कहा, “भैया… कल रात फिर आना। और ज्यादा क्रूर बनना। मुझे तोड़ना।”

अगले तीन दिन यही सब हुआ। हर रात नयना खुद रस्सियाँ और चाबुक तैयार रखती। एक रात उसने मुझसे कहा कि प्राची को भी बुलाऊँ। मैंने मना किया। लेकिन चौथी रात जब मैं कमरे में घुसा तो प्राची भी नंगी बैठी थी। दोनों बहनें एक साथ घुटनों के बल।
“भैया… आज दोनों आपकी हैं। जितना चाहो क्रूर बनो।”

उस रात मैंने दोनों को बाँधा। एक को चाबुक मारता तो दूसरी का मुँह लंड से भरता। दोनों की गांड और चूत बारी-बारी से कुचली। गला दबाया, थप्पड़ मारे, बाल खींचे। प्राची की छातियाँ भी 36 की थीं। दोनों की चीखें दबी हुई थीं। कमरा वीर्य, पसीने और दर्द की आवाजों से भरा था।

पाँचवें दिन मौसी की तबीयत और ठीक हो गई। फूफा जी आने वाले थे। नयना ने आखिरी रात मुझसे कहा, “भैया… जब भी आओ… याद रखना… मैं आपकी कुतिया हूँ। जितना दर्द दोगे उतना ही मैं गीली रहूँगी।”

मैं मुंबई लौट तो गया था लेकिन शरीर और दिमाग दोनों नयना और प्राची के गुलाम बन चुके थे। हर रात नींद में उनकी चीखें, चाबुक की सटसटाहट और गर्म वीर्य की गंध आती थी। दो महीने बाद मौसी का

फोन आया। तबीयत फिर खराब हो गई थी। माँ-बाप इस बार नहीं जा सके। मैं अकेला ही ट्रेन पकड़कर उनके शहर पहुँच गया।
घर पहुँचा तो मौसी अस्पताल में थीं। फूफा जी भी वहीं डटे हुए। घर में सिर्फ प्राची और नयना थीं। दरवाजा खुलते ही नयना ने मुझे देखा और उसकी आँखों में वही पुरानी हवस जल उठी। प्राची पीछे खड़ी मुस्कुरा रही थी। दोनों ने मुझे अंदर खींचा। सामान रखने का मौका भी नहीं दिया।

नयना ने सीधे कहा, “भैया… दो महीने से सूखी पड़ी हूँ। आज रात तुम दोनों को तोड़ोगे। जितना क्रूर बन सकते हो बनो। हम तैयार हैं।”
रात के ग्यारह बजे जब पूरा मोहल्ला सो चुका था, मैं उनके कमरे में घुसा। दोनों पहले से नंगी थीं। बेड पर काली चादर बिछी थी। एक तरफ मोटी रस्सियाँ, चमड़े के कॉलर, चाबुक, छोटी चेन, क्लिप्स और एक मोटी डिल्डो रखा था। नयना ने घुटनों के बल बैठकर मेरे पैर छूए।
“मालिक… आज हम आपकी पूरी संपत्ति हैं। जो चाहो करो।

दर्द दो, गला घोंटो, गांड फाड़ो, थूक डालो, मारो… बस छोड़ना मत।”
मैंने पहले नयना का कॉलर पहनाया। चेन पकड़कर उसे घसीटते हुए बेड के पास लाया। उसके हाथ पीछे बाँधे। फिर प्राची को भी वही हालत दी। दोनों को आमने-सामने घुटनों के बल बैठाया। मैंने अपनी पैंट उतारी। तना हुआ लंड दोनों के चेहरे के सामने झूल रहा था।
“चाटो। दोनों मिलकर।”

नयना और प्राची ने जीभ निकाली। एक लंड के ऊपर, दूसरी नीचे अंडकोष चाटने लगी। मैंने दोनों के बाल पकड़कर बारी-बारी से गले तक ठूंसा। नयना की आँखों से आँसू बहने लगे लेकिन उसने विरोध नहीं किया। प्राची को जब गहराई तक धकेला तो वह उल्टी की आवाज करने लगी। मैंने बाहर नहीं निकाला। थूक और लार उसके चेहरे पर बह रही थी।

फिर मैंने नयना को पेट के बल लिटाया। टाँगें फैलाकर रस्सी से बेड के खंभों से बाँध दीं। चाबुक उठाया। पहली सटक उसकी गददी गांड पर पड़ी तो वह चीख पड़ी। दूसरी, तीसरी… लगातार बीस बार। गांड लाल हो गई, कुछ जगहों से हल्की खरोंचें निकल आईं। वह रो रही थी लेकिन चूत से पानी की धारा बह रही थी।

मैंने लंड उसकी तंग गांड में बिना थूक लगाए धकेला। आधा घुसा। वह चीखी, “आह्ह्ह… फट गया… भैया… पूरा डालो… तोड़ो…”। मैंने पूरा अंदर धकेल दिया। उसके कूल्हे पर जोर-जोर से थप्पड़ मारते हुए धक्के लगाने लगा। हर धक्के के साथ चाबुक उसकी जाँघों पर पड़ता रहा। प्राची को मैंने नयना के चेहरे के पास बैठाया और कहा, “इसकी चीखें पी। इसकी जीभ चूस।”

प्राची ने नयना का मुँह चूसा जबकि मैं उसकी गांड कुचल रहा था। आधे घंटे बाद मैंने लंड निकाला और प्राची की चूत में एक झटके में घुसेड़ दिया। प्राची की छातियाँ जोर से हिल रही थीं। मैंने दोनों निप्पलों पर क्लिप्स लगा दिए। चेन खींचते हुए और गहराई तक ठोका। प्राची चीख रही थी, “मालिक… गला दबाओ… और जोर से… मुझे कुतिया बनाओ…”।

मैंने एक हाथ से उसका गला दबाया। साँस रुकने लगी। चेहरा लाल हो गया। जब वह बेहोशी के करीब पहुँची तो छोड़ दिया। फिर से गला दबाया। इस बार और देर तक। उसके शरीर में ऐंठन हो रही थी लेकिन चूत और ज्यादा भीग गई थी। नयना को मैंने उसके ऊपर लिटा दिया। दोनों की चूतें एक-दूसरे से सट गईं। मैंने बारी-बारी से दोनों को चोदा। कभी नयना की गांड, कभी प्राची की चूत। बीच-बीच में चाबुक दोनों की पीठ पर पड़ता रहा।

रात के दो बज चुके थे। दोनों के शरीर पर लाल निशान, थप्पड़ों के निशान, रस्सी के गड्ढे। मैंने नयना को फर्श पर घसीटा। कुत्ते की तरह बैठाया। चेन पकड़कर उसके मुँह में लंड ठूंसा और गांड में मोटी डिल्डो घुसेड़ दी। प्राची को मैंने पीछे से पकड़ा और उसकी गांड में अपना लंड धकेला। दोनों को एक साथ कुचल रहा था। नयना के बालों से खींचते हुए कहा, “बोल… तू क्या है?”

“मैं… आपकी… पेशाब पीने वाली… कुतिया… हूँ…”
मैंने बाहर निकाला और उसके खुले मुँह में पेशाब की धार छोड़ दी। उसने पूरा निगला। प्राची ने भी आगे बढ़कर बाकी चाट लिया। फिर मैंने दोनों को बेड पर लिटाया। टाँगें कंधों तक मोड़ दीं। पहले नयना की चूत में पूरा लंड घुसाया और उसके गले पर दोनों हाथ रख दिए।

जोर से दबाया। वह हाँफ रही थी, आँखें उलटने लगीं। मैंने उसी हालत में वीर्य की मोटी धार उसके अंदर छोड़ दी। फिर तुरंत प्राची की गांड में घुसा और वही किया। गला दबाते हुए दूसरी बार झड़ गया।

सुबह चार बजे तक सिलसिला चला। मैंने दोनों को बाँधकर छोड़ दिया। उनके शरीर से वीर्य चूत, गांड और मुँह से बह रहा था। चाबुक के निशान सूज आए थे। नयना ने आधी बेहोशी में कहा, “भैया… कल रात और ज्यादा… आज तो बस शुरुआत थी…”

अगली रात और क्रूर हो गई। मैंने दोनों को बाथरूम में घसीटा। ठंडे पानी से नहलाया। फिर नयना को शॉवर के नीचे खड़ा करके उसके हाथ ऊपर बाँधे। चाबुक से उसकी छातियों और पेट पर मारा। निप्पल इतने सूज गए कि छूने से वह चीख पड़ती। प्राची को मैंने फर्श पर लिटाकर उसके मुँह पर बैठ गया। उसने मेरी गांड चाटी जबकि मैं नयना की चूत में तीन उंगलियाँ घुमा रहा था।

फिर दोनों को एक के ऊपर एक लिटाया। नीचे प्राची, ऊपर नयना। मैंने ऊपर वाली की गांड और नीचे वाली की चूत एक साथ दो लंड की तरह कुचली – अपना लंड और डिल्डो। दोनों चीख रही थीं। मैंने उनके बाल एक साथ पकड़कर सिर पीछे खींचे और गला दबाया।
रात भर यही सब चला।

कभी उन्हें कुत्ते की तरह घसीटना, कभी उनके मुँह में थूक डालना, कभी उनके चेहरे पर थप्पड़ मारना, कभी लंबे समय तक गला घोंटना जब तक उनकी आँखों में अँधेरा न छा जाए। दोनों बार-बार कहती रहीं, “और मारो… और तोड़ो… हम आपकी संपत्ति हैं…”
तीसरी रात फूफा जी के आने की खबर आ गई। आखिरी मौका था। मैंने दोनों को पूरी तरह से बेकाबू कर दिया।

नयना को उल्टा लटकाया। पैर ऊपर, सिर नीचे। उस हालत में उसकी चूत और गांड दोनों में बारी-बारी से लंड ठोका। खून की छोटी धार भी निकली लेकिन उसने कहा, “रुको मत… जारी रखो…”। प्राची को मैंने उसके नीचे बैठाया और नयना के मुँह से गिरते वीर्य और पसीने को चाटने को कहा। आखिर में दोनों के चेहरे, छातियों, चूत और गांड पर इतना वीर्य छोड़ा कि वे चमक रही थीं।

सुबह मैंने उन्हें खोला। दोनों के शरीर पर इतने निशान थे कि कपड़ों से छिपाना मुश्किल था। नयना ने मेरे लंड को आखिरी बार चाटा और कहा, “भैया… जब भी मौका मिले… आना। हम हमेशा तैयार रहेंगी। जितना क्रूर बनोगे… उतना ही हम गीली रहेंगी।”
मैं फिर मुंबई लौट आया। लेकिन इस बार शरीर में एक भूख रह गई जो कभी नहीं बुझती।

हर रात जब अकेला होता हूँ तो नयना की चीखें, प्राची का गला दबते हुए कराहना और चाबुक की आवाज कानों में गूँजती है। और मैं जानता हूँ… अगली बार जब जाऊँगा… तो और भी ज्यादा क्रूर बनूँगा। क्योंकि वे खुद माँगती हैं… और मैं देता हूँ।

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