रुद्रक्ष-अनन्या भाग 8

मालिक ने संपत्ति को कांच की मेज पर बाँधकर निप्पल खींचे, बार-बार भरा और खून निकालने तक पीटा। कल रात तीन दुश्मनों के सामने नंगी सर्वर बनने का अंतिम हुक्म दे दिया।

रुद्रक्ष-अनन्या भाग 7

तीसरे दिन रात को रुद्रक्ष ने अनन्या को एक बंद ट्रक के अंदर धकेल दिया। अंदर बिल्कुल अंधेरा था। कोई रोशनी नहीं। फर्श ठंडा लोहा। दीवारें धातु की। अनन्या के हाथ पीछे बाँध दिए गए। कॉलर की चेन फर्श के रिंग से कस दी गई। पैर फैलाए हुए। ताला चूत पर खुला था। शरीर पर छत और दर्पण के सारे निशान अभी भी जल रहे थे।

ट्रक का इंजन चालू हुआ। दरवाजा बाहर से बंद हो गया। अंधेरा और गहरा हो गया। ट्रक चलने लगा। हर धक्के के साथ अनन्या का शरीर फर्श पर रगड़ खा रहा था। समय का अंदाजा नहीं लग रहा था। बस इंजन की आवाज और अपने दिल की धड़कन।
अचानक ट्रक रुका। दरवाजा खुलने की आवाज आई। ठंडी हवा अंदर घुसी। एक अजनबी पुरुष चढ़ आया। अंधेरे में सिर्फ उसके कदमों की आवाज सुनाई दी। उसने अनन्या के बाल पकड़कर मुँह ऊपर उठाया और अपना लंड गले तक ठूंस दिया। अनन्या की आवाज दब गई।

वह जोर-जोर से पेलने लगा। कुछ देर बाद उसने लंड निकालकर चूत में धकेल दिया। गहराई तक। अनन्या की चीख ट्रक में गूँजी। वह जल्दी-जल्दी झड़ गया। अंदर ही। फिर बिना कुछ बोले उतर गया। दरवाजा बंद हो गया। ट्रक फिर चल पड़ा।
अनन्या अंधेरे में पड़ी रही। अंदर उसका पानी रिस रहा था। गिनती याद रखनी थी। “एक…”
थोड़ी देर बाद ट्रक फिर रुका। इस बार दो पुरुष चढ़े। एक ने मुँह पकड़ लिया, दूसरे ने गाँड में उंगलियाँ घुसा दीं। फिर लंड। दोनों एक साथ।

अनन्या का शरीर दो तरफ से भर गया। अंधेरे में सिर्फ मांस की आवाज और उसकी सिसकियाँ गूँज रही थीं। दोनों ने बारी-बारी झड़ा। एक मुँह में, एक गाँड में। फिर उतर गए। दरवाजा बंद। ट्रक चल पड़ा।
“दो… तीन…”

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तीसरी बार रुकने पर एक मोटा आदमी चढ़ा। उसने अनन्या को पेट के बल पलटा। मुट्ठी पहले चूत में धकेली। अनन्या चिल्लाई। फिर मुट्ठी निकालकर गाँड में डाल दी। पूरा। घुमाया। अंधेरे में दर्द और भी तेज लग रहा था। वह मुट्ठी अंदर रखते हुए अपना लंड उसके मुँह में ठूंसता रहा। जब झड़ा तो मुँह में ही। फिर मुट्ठी निकालकर उतर गया।
“चार…”

ट्रक चलता रहा। कभी धीरे, कभी तेज। अनन्या की चेन हर मोड़ पर खनकती। शरीर पर अजनबियों का पानी सूखकर चिपक रहा था। प्यास से जीभ सूख गई थी। लेकिन गिनती जारी रखनी थी।
चौथी बार दरवाजा खुला तो तीन पुरुष एक साथ चढ़े। अंधेरा होने की वजह से वे एक-दूसरे से टकरा रहे थे। एक ने मुँह, एक ने चूत, एक ने गाँड। तीनों एक साथ पेलने लगे। अनन्या का शरीर उनके वजन से दब गया। आवाज नहीं निकल रही थी। सिर्फ अस्पष्ट सिसकियाँ। तीनों ने अंदर ही झड़ा। फिर हँसते हुए उतर गए।

“पाँच… छह… सात…”
पाँचवीं बार एक औरत चढ़ी। अंधेरे में उसकी तेज खुशबू फैल गई। उसने अनन्या के बाल खींचकर अपनी चूत उसके मुँह पर बैठा दी। “चाट।” अनन्या ने चाटा। औरत ने नाखूनों से उसकी पीठ कुरेदी। खून निकल आया। फिर उसने अनन्या की चूत में चार उंगलियाँ घुसा दीं और जोर से फैलाने लगी। जब संतुष्ट हुई तो थूक कर उतर गई।
“आठ…”

ट्रक तीन घंटे तक शहर में घूमता रहा। कुल ग्यारह बार रुका। ग्यारह अलग-अलग अजनबी। कभी एक, कभी दो, कभी तीन। अनन्या की गिनती बाईस तक पहुँच चुकी थी। शरीर अब सुन्न पड़ने लगा था। हर नई एंट्री के साथ दर्द और अपमान नई परत चढ़ा रहा था। अंधेरे में समय रुक सा गया था। सिर्फ दरवाजे की आवाज, कदम, लंड, मुट्ठी, थूक और फिर अंधेरा।
आखिरी बार दरवाजा खुला तो रुद्रक्ष खुद चढ़ा। अंधेरे में भी अनन्या उसकी चाल पहचान गई। उसने अनन्या के बाल पकड़े।
“गिनती बता।”

अनन्या की आवाज पूरी तरह बैठ चुकी थी। “बाईस…”
“सही। अब मेरी बारी।”
उसने अंधेरे में ही अनन्या की गाँड में लंड धकेल दिया। जोर से। गहराई तक। ट्रक अभी भी चल रहा था। हर धक्के के साथ शरीर फर्श पर रगड़ खा रहा था। रुद्रक्ष ने एक हाथ से निप्पल मरोड़े। दूसरे से चूत में उंगलियाँ घुसा दीं। अनन्या अब सिर्फ काँप रही थी। जब रुद्रक्ष अंदर झड़ गया तो उसने लंड निकालकर अनन्या के मुँह में ठूंस दिया।
“चाट। साफ कर। अंधेरे में।”

अनन्या ने चाटा। स्वाद में ग्यारह अजनबियों और रुद्रक्ष का मिश्रण था।
ट्रक आखिरकार रुका। दरवाजा खुला। रोशनी अंदर आई। रुद्रक्ष ने चेन खोली। अनन्या को घसीटते हुए बाहर निकाला। शरीर पर अजनबियों के नाखूनों के निशान, थूक, पानी और खून चमक रहे थे। उसे सीधे घर के शीशे वाले कमरे में ले जाकर बाँध दिया।
रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठ गया। सिगार जलाई। धुआँ उठ रहा था।

“आज तूने बाईस बार अजनबियों को सहा। अच्छी। अब नया नियम।”
उसकी आवाज ठंडी थी।
“आज से तू रोज़ एक घंटा उसी ट्रक में बिताएगी। अंधेरे में। बाँधी हुई। मैं कभी-कभी दरवाजा खोलूँगा। कोई अजनबी चढ़ सकता है। या नहीं भी चढ़ सकता। तू नहीं जानेगी। सिर्फ सहेगी। और हर बार गिनती याद रखेगी। सुबह बताएगी।”
अनन्या फर्श पर पड़ी हांफ रही थी। शरीर जल रहा था। अंधेरे ट्रक की याद, अजनबियों के हाथ और रुद्रक्ष की आवाज सब मिलकर उसे अंदर से खा रहे थे।

रुद्रक्ष ने आखिरी कश लिया। आवाज और ठंडी हो गई।
“अगले हफ्ते मैं तुझे एक नए खेल में डालूँगा। वहाँ तू कुत्तों के साथ नहीं, बल्कि मेरे व्यापारिक दुश्मनों के सामने होगी। वे तुझे नंगी देखेंगे। छूएँगे। और मैं कीमत लूँगा। तू सिर्फ गिनेगी कि किसने कितनी बार छुआ। लौटकर हर नाम और हर स्पर्श का हिसाब देना होगा।”
अनन्या की आँखें अंधेरे में खुली रह गईं। नया डर। नई भूख। चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ अंधेरे ट्रक का नहीं, दुश्मनों की निगाहों और हाथों का भी होने वाला था।

अनन्या फर्श पर पड़ी रही। शरीर पर ट्रक के अंधेरे की सारी गंदगी चिपकी हुई थी। ग्यारह अजनबियों का पानी, थूक, नाखूनों के निशान और रुद्रक्ष का अंतिम भरना सब मिलकर उसकी त्वचा पर परत बन चुके थे। चेन हल्की सी खनक रही थी। आँखें खुली थीं लेकिन निगाहें खोई-खोई।

रुद्रक्ष सिगार की आखिरी राख गिराकर उठा। उसने अनन्या के बालों को मुट्ठी में जकड़ा और खींचकर खड़ा किया। शरीर लड़खड़ाया। पैर नहीं संभले। रुद्रक्ष ने उसे घसीटते हुए नहाने के कमरे में नहीं, बल्कि सीधे उस कमरे में ले गया जहाँ दीवारों पर लोहे के हुक लगे थे।
“ट्रक की गंदगी अभी नहीं धुलेगी। पहले मैं चेक करूँगा कि अजनबियों ने तुझे कितना खोला।”

उसने अनन्या को हुक से बाँध दिया। हाथ ऊपर। पैर फैलाए। फिर दोनों हाथों से उसके नितंब फैलाए। गाँड का छेद अभी भी ढीला और चमक रहा था। रुद्रक्ष ने चार उंगलियाँ एक साथ धकेल दीं। आसानी से चली गईं। फिर मुट्ठी। अनन्या की चीख निकली। रुद्रक्ष ने मुट्ठी अंदर घुमाई। धीरे-धीरे, फिर जोर से। खून की पतली लकीर निकल आई।
“ग्यारह लोगों के बाद भी इतनी टIGHT। अच्छी। अब और खोलता हूँ।”

उसने मुट्ठी निकाली और तुरंत अपना लंड गाँड में धँस गया। एक ही धक्के में जड़ तक। अनन्या का शरीर हुक पर झूल गया। रुद्रक्ष ने कमर पकड़कर पागलों की तरह पेलना शुरू किया। हर धक्के के साथ अनन्या की साँसें टूट रही थीं। एक हाथ से उसने निप्पल मरोड़े। दूसरे से चूत में तीन उंगलियाँ घुसा दीं और जोर से फैलाने लगा।
“बोल। अंधेरे में सबसे ज्यादा किसने भरा?”

अनन्या की आवाज काँप रही थी। “मोटे… वाले ने… मुट्ठी…”
“और मैं?”
“आपने… सबसे गहरा…”
रुद्रक्ष की लय और तेज हो गई। अनन्या का शरीर अब पूरी तरह उसके धक्कों पर निर्भर था। अचानक रुद्रक्ष ने लंड अंदर रखते हुए चूत की उंगलियाँ मोड़ दीं। अनन्या का शरीर अकड़ गया। एक लंबी फटी चीख निकली। पानी की धारें बह निकलीं। वह गिर गई। हुक पर लटकती हुई।

रुद्रक्ष रुका नहीं। वह पेलता रहा। अनन्या की संवेदनशीलता चरम पर थी। हर धक्का अब ट्रक की यादों के साथ मिलकर और क्रूर लग रहा था। आखिरकार वह गाँड में झड़ गया। गर्म पानी की धार अंदर तक भर गई। लंड निकाला। उंगलियों से पानी चुपड़कर अनन्या के मुँह में ठूंस दिया।
“निगल। ग्यारह अजनबियों का और मेरा दोनों।”
अनन्या ने निगल लिया। स्वाद मुँह में फैल गया।

रुद्रक्ष ने बंधन नहीं खोले। वह पीछे हटकर कुर्सी पर बैठ गया। नई सिगार जलाई। धुआँ उठ रहा था। अनन्या हुक पर काँप रही थी। गाँड से पानी रिस रहा था। जांघों पर खून की नई लकीरें चमक रही थीं।
“अब सुन।”
उसकी आवाज और ठंडी हो गई।

“अगले हफ्ते मेरे तीन व्यापारिक दुश्मन आ रहे हैं। वे सालों से मुझे गिराना चाहते हैं। मैं उन्हें रात के खाने पर बुलाऊँगा। तू नंगी सर्वर बनेगी। उनके सामने घूमेगी। शराब परोसेगी। और जब मैं इशारा करूँगा तो तू उनके सामने घुटनों पर बैठ जाएगी। वे तुझे छूएँगे। उंगली डालेंगे। मुँह में लेंगे। गाँड में भरेंगे। मैं कीमत लूँगा। तू सिर्फ गिनेगी। किसने कितनी बार छुआ, किसने कितनी गहराई तक भरा। लौटकर एक-एक नाम और एक-एक स्पर्श का हिसाब देना होगा। समझी?”

अनन्या की आँखें फटी रह गईं। शरीर काँप उठा। लेकिन चूत हल्की सी भींच गई। वह खालीपन फिर से जाग रहा था।
रुद्रक्ष उठा। पास आया। ठंडी उंगलियों से उसका गाल सहलाया। फिर जोर से थप्पड़ मारा।
“आज रात तू इसी हुक पर लटकती रहेगी। सुबह तक। कोई पानी नहीं। कोई आराम नहीं। ट्रक की गंदगी शरीर पर ही रहेगी। सुबह जूते चाटने के बाद मैं तय करूँगा कि नहलाना है या और गंदगी बढ़ानी है।”

उसने कमरे की लाइट बंद कर दी। अंधेरा छा गया। अनन्या हुक पर लटकती रही। शरीर भारी पड़ रहा था। कलाईयाँ जल रही थीं। गाँड से पानी टपकता रहा। दिमाग में अंधेरे ट्रक के अजनबी, उनकी मुट्ठियाँ, उनके लंड और अब तीन दुश्मनों की तस्वीरें घूम रही थीं।
रात लंबी थी। हर घंटे के साथ शरीर और सुन्न होता जा रहा था। लेकिन अंदर की भूख कम नहीं हो रही थी। वह भूख जो अपमान माँगती थी, अजनबियों के हाथ माँगती थी, और रुद्रक्ष की ठंडी निगाह माँगती थी।

सुबह की पहली रोशनी जब दरवाजे के नीचे से छनकर आई तो अनन्या की आँखें अभी भी खुली थीं। शरीर दर्द से काँप रहा था। लेकिन दिमाग में एक ही बात घूम रही थी—तीन दुश्मन… नंगी सर्वर… गिनती… हिसाब।
चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ अंधेरे और शहर की निगाहों का नहीं, दुश्मनों के सामने की बेइज्जती का भी होने वाला था।

सुबह होते-होते अनन्या की कलाईयाँ सुन्न पड़ चुकी थीं। हुक पर लटकते हुए पूरी रात बीत गई थी। कंधे जल रहे थे। गाँड से सूखा पानी और खून की परतें चिपक गई थीं। मुँह सूखा। आँखें जल रही थीं। दरवाजा खुला तो रोशनी की तेज किरणें अंदर आईं।
रुद्रक्ष अंदर आया। काली कमीज, ठंडी आँखें। उसने अनन्या को एक पल घूरा। फिर हुक से चेन खोली। अनन्या फर्श पर ढेर हो गई। शरीर ने जवाब नहीं दिया। रुद्रक्ष ने बालों से खींचकर खड़ा किया और सीधे नहाने के कमरे में नहीं, बल्कि उस बड़े हॉल में ले गया जहाँ तीन बड़े सोफे और एक लंबी कांच की मेज रखी थी।

“आज दुश्मन नहीं आ रहे। आज सिर्फ तैयारी है। मैं तुझे उनके आने से पहले तोड़कर रख दूँगा ताकि तू उनके सामने सिर्फ मांस का टुकड़ा रह जाए।”
उसने अनन्या को मेज पर पेट के बल लिटाया। हाथ-पैर चारों कोनों से बाँध दिए। सिर मेज के किनारे से बाहर लटका दिया। फिर थैले से एक मोटी काली रस्सी और कई छोटे धातु के क्लैंप निकाले। निप्पलों पर क्लैंप कसे। इतने सख्त कि अनन्या की आँखें फट गईं। फिर रस्सी से दोनों क्लैंप को जोड़कर पीछे की तरफ खींचा और मेज के पाये से बाँध दिया। हर सांस पर निप्पल और खिंचते।

रुद्रक्ष ने छड़ी उठाई। बिना गिने वार शुरू कर दिए। नितंबों पर। जांघों पर। पीठ पर। हर वार के साथ मांस फटने जैसी आवाज। खून की धारें मेज पर फैलने लगीं। अनन्या चीख रही थी लेकिन सिर लटका होने की वजह से आवाज अजीब और दबी निकल रही थी। पचास वार बाद रुद्रक्ष रुका। नितंबों का मांस सूजकर बैंगनी हो चुका था।

उसने दोनों हाथों से नितंब फैलाए। गाँड का छेद पहले से ढीला था। फिर भी उसने मुट्ठी बिना रुके अंदर धकेल दी। अनन्या की चीख मेज पर गूँजी। रुद्रक्ष ने मुट्ठी अंदर-बाहर करनी शुरू की। जोर से। गहराई तक। खून और पानी दोनों मेज पर बहने लगे। फिर मुट्ठी निकाली और तुरंत लंड गाँड में धँस गया। एक धक्के में जड़ तक।

वह पेलने लगा। मेज हिल रही थी। अनन्या का सिर हर धक्के के साथ झूल रहा था। रुद्रक्ष ने एक हाथ से रस्सी और खींची। निप्पल लगभग फटने को थे। दूसरे हाथ से चूत में चार उंगलियाँ घुसा दीं और जोर से फैलाने लगा। दोहरी गति। अनन्या का शरीर अब सिर्फ उसके धक्कों पर काँप रहा था।
“बोल। तू क्या है?”
“आपकी… संपत्ति…”
“पूरा नाम।”
“रुद्रक्ष मल्होत्रा की नंबर तीन… सिर्फ इस्तेमाल के लिए…”

रुद्रक्ष की लय और तेज हो गई। अचानक उसने लंड अंदर रखते हुए उंगलियाँ मोड़ दीं। अनन्या का शरीर अकड़ गया। एक लंबी चीख निकली। पानी की तेज धार निकल पड़ी। वह गिर गई। मेज पर काँपती हुई।
रुद्रक्ष रुका नहीं। वह पेलता रहा। अनन्या की संवेदनशीलता इतनी बढ़ चुकी थी कि हर धक्का अब बिजली जैसा लग रहा था। आखिरकार वह गाँड में झड़ गया। गर्म पानी भर गया। लंड निकाला। उंगलियों से पानी चुपड़कर अनन्या के लटके हुए मुँह में ठूंस दिया।
“निगल।”

अनन्या ने निगल लिया। पानी के साथ खून का स्वाद भी मुँह में फैल गया।
रुद्रक्ष ने बंधन नहीं खोले। वह मेज के चारों ओर घूमने लगा। नई छड़ी उठाई। इस बार जांघों के अंदरूनी हिस्से और बगलों पर वार किए। संवेदनशील जगहें। हर वार के साथ अनन्या की चीख और तेज होती गई। जब दोनों जांघें लाल-बैंगनी हो गईं तब उसने छड़ी फेंकी।
अब उसने अनन्या के मुँह में अपना लंड ठूंस दिया। गले तक। सिर लटका होने की वजह से लंड और गहराई तक चला गया। रुद्रक्ष ने बाल पकड़कर जोर-जोर से पेलना शुरू किया। अनन्या की नाक उसके पेट से टकरा रही थी। साँस पूरी तरह रुक गई। चेहरा लाल हो गया।

जब वह लगभग बेहोश होने वाली थी तब रुद्रक्ष ने निकाला। अनन्या जोर-जोर से खाँसने लगी। लार और आँसू मेज पर गिर रहे थे।
रुद्रक्ष फिर से गाँड में घुस गया। इस बार और क्रूरता से। हर धक्का इतना जोरदार था कि मेज खिसकने लगी। अनन्या अब सिर्फ अस्पष्ट सिसकियाँ निकाल रही थी। दूसरी बार गिरने के बाद भी रुद्रक्ष नहीं रुका। तीसरी बार गिरने पर उसने अंदर ही झड़ गया। फिर लंड निकालकर चूत में डाल दिया और वहाँ भी झड़ गया। दोनों जगह भर चुकी थीं।

उंगलियों से पानी उठाकर अनन्या के मुँह में ठूंसा। “निगल। सब।”
अनन्या ने निगल लिया।
रुद्रक्ष ने आखिरकार बंधन खोले। अनन्या मेज से फर्श पर गिर पड़ी। शरीर हिल नहीं रहा था। रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठ गया। सिगार जलाई। धुआँ उठ रहा था।

“तैयारी पूरी नहीं हुई। कल रात तक मैं तुझे और खोलूँगा। ताकि जब दुश्मन आएँ तो तू उनके सामने सिर्फ एक खुला हुआ छेद रह जाए।”
अनन्या फर्श पर पड़ी हांफ रही थी। शरीर हर जगह जल रहा था। निप्पल अभी भी खिंचे हुए दर्द कर रहे थे। गाँड और चूत दोनों सूज चुकी थीं। लेकिन अंदर वह खालीपन अब और गहरा हो चुका था।
रुद्रक्ष ने आखिरी कश लिया। आवाज और ठंडी हो गई।

“कल रात तीनों दुश्मन आएंगे। तू नंगी उनके बीच घूमेगी। शराब परोसेगी। जब मैं उंगली उठाऊँगा तो तू पहले के सामने घुटनों पर बैठ जाएगी। वह तुझे मुँह में लेगा। दूसरे के सामने गाँड खोलेगी। तीसरे के सामने चूत। वे बारी-बारी भरेंगे। मैं देखता रहूँगा। तू गिनेगी। हर धक्का। हर बूँद। लौटकर एक-एक बात बतानी होगी। अगर एक भी बात छिपाई तो मैं तुझे उनके पास तीन दिन के लिए भेज दूँगा।”
अनन्या की आँखें फटी की फटी रह गईं। नया डर। नई भूख। शरीर काँप रहा था लेकिन चूत हल्की सी भींच गई।

रुद्रक्ष उठा। अनन्या के बालों से मुँह ऊपर उठाया। ठंडी निगाहें उसकी आँखों में घुस गईं।
“आज रात तू फिर से हुक पर लटकती रहेगी। लेकिन इस बार मैं हर दो घंटे में आकर तुझे एक बार भरूँगा। अंधेरे में। तू नहीं जानेगी कब आऊँगा। सिर्फ सहेगी। और हर बार गिनती याद रखेगी।”

वह कमरे से बाहर चला गया। लाइट बंद कर दी। अंधेरा छा गया। अनन्या फर्श पर पड़ी रही। शरीर दर्द से चीख रहा था। दिमाग में तीन दुश्मनों के चेहरे, उनकी उंगलियाँ, उनके लंड और रुद्रक्ष की ठंडी आवाज घूम रहे थे।
चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ शरीर का नहीं, उसके अंदर की आखिरी शर्म और डर का भी हो चुका था। और कल की रात पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक और गहरी होने वाली थी।

रुद्रक्ष-अनन्या भाग 7

रस्सी, मोम और उसका शिकार

ट्रेन की उस रात ने मुझे तोड़ दिया

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