रात की प्यासी औरतें

मुंबई की अंधेरी गलियों में एक मर्द पैसे लेकर शादीशुदा औरतों की छुपी हुई भूख मिटाता है। दर्द, कब्जा और बेकाबू रातें जो शरीर और दिमाग दोनों को तोड़ देती हैं Mumbai sex stories ।

अरे यार, मेरा नाम आरव है और मैं मुंबई के अंधेरी वेस्ट में रहता हूँ। शहर की महँगाई और इस मंदी ने कमर तोड़ रखी है। मेरा असली बिजनेस तो इलेक्ट्रॉनिक्स का है, लेकिन महीने के खर्चे पूरे करने के लिए दिन में चार-पाँच घंटे एक अलग किस्म का काम भी करता हूँ। पैसा अच्छा मिलता है, और जोखिम भी। मैं होम सर्विस ही देता हूँ, होटल या बाहर का झंझट नहीं।

कुछ हफ्ते पहले मेरी पुरानी कॉलेज फ्रेंड नीना से मुलाकात हो गई। नीना अब एक हाई-एंड बुटीक चलाती है बांद्रा में। हमने एक कैफे में कॉफी पी और पुरानी बातें कीं। नीना ने हँसते हुए बताया कि उसकी दुकान पर अमीर शादीशुदा औरतें आती हैं, खासकर तीस-पैंतीस की उम्र वाली। कई तो उससे चिपकती हैं और मजाक में कहती हैं, “काश तू मर्द होती तो रात भर तुझे अपने साथ रखती।”

मैंने सीधा पूछ लिया, “अगर कोई मुझे पैसे दे तो मैं चला जाता हूँ।” नीना पहले हँसी, फिर जब मैंने सीरियस फेस दिखाया तो उसकी आँखें गहरी हो गईं। “तुम पहले कर चुके हो?” मैंने सिर हिलाया। “दो-तीन बार। दोनों औरतें बाद में शहर छोड़कर चली गईं।”
नीना चुप रही कुछ देर। फिर बोली, “मेरी दो क्लाइंट्स हैं। दोनों शादीशुदा। दोनों को दिन के वक्त एक मजबूत लड़का चाहिए जो उन्हें अच्छी तरह इस्तेमाल कर सके। एक तो बहुत डिमांडिंग है।” मैंने रेट बता दिए—दिन के लिए पाँच हजार, पूरी रात के लिए बारह हजार, और सिर्फ एक औरत। बाहर ले जाना हो तो पंद्रह हजार प्रति दिन। नीना ने नंबर ले लिया और चली गई।

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अगले दिन शाम को साढ़े छह बजे नीना का फोन आया। “आरव, मेरी फ्रेंड कविता। उम्र 32। उसका पति अक्सर बाहर रहता है। वह तुम्हें ठाणे ले जाना चाहती है। अपने फ्लैट में। पेमेंट पंद्रह हजार फिक्स हो गई है एक रात के लिए। वह तुम्हें पिक करेगी।”
मैंने सहमति दे दी। रात आठ बजे मैं अंधेरी स्टेशन के बाहर खड़ा था। काली टी-शर्ट और जींस में। एक सफेद होंडा सिटी आकर रुकी। ड्राइवर सीट पर बैठी औरत ने खिड़की नीचे की। गोरी, तीखी नाक, घने बाल कंधों तक, और एक काली साड़ी जिसमें ब्लाउज इतना टाइट था कि बूब्स लगभग बाहर आने को तैयार लग रहे थे। उम्र 32, लेकिन बॉडी जिम जाने वाली लगती थी—कमरे वाली कमर, भारी कूल्हे, और सीने पर D साइज के उभरे हुए स्तन।

“आरव?” उसने भारी आवाज में पूछा। मैंने सिर हिलाया और आगे बैठ गया। उसने गाड़ी स्टार्ट की। रास्ते में वह सीधे बोली, “मैं मस्ती नहीं करने आई हूँ। मुझे दर्द चाहिए, नियंत्रण चाहिए। अगर तुम नरम पड़े तो पैसे काट दूँगी।” मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “मैम, मैं सर्विस देने आया हूँ। आप जितना बर्दाश्त कर सकें, उतना दूँगा।”
ठाणे बॉर्डर पार करते ही उसने अपना हाथ मेरी जाँघ पर रख दिया और जोर से दबाया। फिर जींस के ऊपर से मेरे लंड को महसूस किया। “बड़ा है। अच्छा।” उसने सीट बेल्ट खोली, झुकी और मेरे जींस का जिप खोल दिया। अंडरवियर के ऊपर से ही मुँह लगाकर काटने जैसी हरकत की। मैंने गाड़ी साइड में रोकी। “यहाँ हाईवे पर नहीं। फ्लैट चलो।”

वह हँसी। “डर गया?” मैंने उसके बालों में उंगलियाँ घुसाईं और सिर पीछे खींचा। “नहीं। सिर्फ जगह चुन रहा हूँ जहाँ तुम्हें चीखने की आजादी हो।” उसकी आँखों में चमक आ गई।
फ्लैट तीसरी मंजिल पर था। जैसे ही दरवाजा बंद हुआ, कविता ने साड़ी का पल्लू फेंका और मेरे गले में हाथ डालकर दीवार से लगा दिया। “कपड़े उतार। अभी।” मैंने टी-शर्ट उतारी। उसने अपने नाखून मेरी छाती पर फिराए और जोर से नोंच लिया। खून की हल्की लकीरें निकल आईं। “दर्द अच्छा लगता है तुम्हें?” उसने पूछा। मैंने उसके बाल फिर से पकड़े और उसके मुँह में अपनी दो उंगलियाँ ठूँस दीं। “तुम्हें भी लगेगा।”

उसने घुटनों के बल बैठकर मेरे लंड को मुँह में ले लिया। गहराई तक। गला भर गया तो भी नहीं रुकी। मैंने उसके सिर को दोनों हाथों से पकड़कर जोर-जोर से आगे-पीछे किया। थूक उसके ठुड्डी से बह रहा था। वह गड़गड़ा रही थी लेकिन मुँह नहीं हटाया। जब साँस फूलने लगी तो मैंने खींच लिया। लंड चमक रहा था, नसों में खून दौड़ रहा था।

कविता उठी और बेडरूम की तरफ चली। वहाँ उसने एक ड्रॉअर खोला। अंदर चमड़े की पट्टियाँ, एक छोटा व्हिप, और हैंडकफ्स निकाले। “आज तुम मालिक हो। लेकिन अगर मैं बोली रुकने की, तो रुकना। वर्ना…” मैंने हैंडकफ्स उठाए। “तुम बोलोगी नहीं।”
मैंने उसे बिस्तर पर धक्का दिया। साड़ी फाड़कर उतारी। ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। उसके बूब्स बाहर आए—भारी, गुलाबी निप्पल्स पहले से कड़े। मैंने एक निप्पल मुँह में लिया और दाँतों से दबाया। उसने चीख मार दी। दूसरे को उंगलियों से मरोड़ा। फिर दोनों को जोर से दबाया जब तक कि उसकी साँसें तेज न हो गईं।

मैंने उसके हाथ ऊपर करके हैंडकफ्स लगा दिए हेडबोर्ड से। फिर उसकी टाँगें फैलाईं। पैंटी नहीं थी। चूत पहले से गीली और खुली हुई। मैंने दो उंगलियाँ अंदर घुसाईं और तेजी से पिस्टन की तरह चलाया। तीसरी उंगली भी डाल दी। उसने कमर उछाली। “आह… आरव… धीरे…” मैंने और तेज किया। फिर अचानक उंगलियाँ निकालीं और उसके मुँह पर लगा दीं। “चाट। अपनी ही चूत का पानी।” उसने जीभ निकालकर चाटा।
मैंने व्हिप उठाया। पहली चोट उसकी जाँघ के अंदर लगी। लाल निशान पड़ गया। दूसरी चूत के ठीक ऊपर। तीसरी सीधे क्लिट पर हल्की। वह चीखी लेकिन पैर नहीं समेटी। मैंने उसके कूल्हों को उठाया और एक जोरदार थप्पड़ उसकी गांड पर जड़ा। फिर दूसरा, तीसरा। गांड लाल हो गई। वह रोने जैसी आवाजें निकाल रही थी लेकिन आँखों में मजा साफ दिख रहा था।

मैंने लंड उसके मुँह में फिर ठूँसा। इस बार और गहरा। वह उबकाई ले रही थी लेकिन मैंने सिर पकड़ रखा था। जब लार उसकी छाती तक बहने लगी तो निकाला। फिर उसकी टाँगें अपने कंधों पर रखीं और लंड को चूत के मुँह पर लगाया। एक झटके में आधा घुसा दिया। कविता की आँखें फटी की फटी रह गईं। “बड़ा… बहुत बड़ा… आह्ह्ह…”

मैंने पूरा अंदर धकेल दिया। उसकी चूत तन गई। एक बच्चे की माँ होने के बावजूद अंदर बहुत टाइट था। मैंने धीरे शुरू किया, फिर रफ्तार बढ़ाई। हर धक्के के साथ उसके बूब्स उछल रहे थे। मैंने एक हाथ उसके गले पर रखा और हल्का दबाया। साँस रुकने लगी तो उसने आँखें मिचकाईं। मैंने दबाव कम किया और फिर से जोर से चोदने लगा।

“बोलो कि तुम क्या हो,” मैंने गुर्राते हुए कहा। “मैं… मैं तुम्हारी रांड हूँ… आह्ह… चोदो… जोर से चोदो…” “और जोर?” मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और कमर तोड़ने वाले धक्के मारे। बिस्तर चरमरा रहा था। उसकी चूत से पानी की आवाज आ रही थी। मैंने एक उंगली गीली करके उसकी गांड के छेद में घुसाई। उसने जोर से चीखा। “नहीं… वहाँ नहीं… आह्ह्ह… मत…” लेकिन शरीर ने इनकार नहीं किया। मैंने उंगली अंदर-बाहर की और लंड से चूत मारता रहा।

जब वह कांपने लगी तो मैंने हैंडकफ्स खोले। उसे पलटा और कुत्ते की तरह कर दिया। गांड ऊपर। मैंने फिर से लंड चूत में घुसाया और इस बार दोनों हाथों से उसके कूल्हे पकड़कर इतनी ताकत से धकेले कि उसकी साँसें टूटने लगीं। व्हिप से बीच-बीच में गांड पर मारता रहा। लाल निशान गहरे हो गए।

“मैं झड़ने वाली हूँ… आरव… प्लीज… रोक… नहीं… मत रोक…” उसने हाथ पीछे करके मेरी जाँघ पकड़ी। मैंने और तेज किया। उसकी चूत ने जोर से ऐंठन ली और पानी की धार छोड़ी। पूरे बिस्तर पर गीला हो गया। मैंने भी कंट्रोल नहीं रखा। लंड को और गहराई तक धकेलकर सारा वीर्य उसकी कोख में उड़ेल दिया। इतना कि वह बाहर भी बहने लगा।

हम दोनों पसीने से भीगे हुए गिर पड़े। कविता के शरीर पर मेरे नाखून और थप्पड़ों के निशान साफ थे। उसके निप्पल्स पर दाँतों के निशान। वह साँस लेते हुए बोली, “तुमने वाकई बर्बाद कर दिया… अच्छा किया।”
मैं उठा और पानी पिया। वह भी उठी, लेकिन टाँगें कांप रही थीं। “रात अभी बाकी है,” उसने कहा। “मुझे और चाहिए। इस बार और क्रूर।”
मैंने उसे बाथरूम में खींचा। शावर चालू किया। पानी के नीचे मैंने उसे दीवार से सटाया और फिर से लंड खड़ा करके उसकी गांड में घुसाया। इस बार धीरे-धीरे, लेकिन पूरा। वह चीख रही थी, नाखून दीवार पर रगड़ रही थी। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे किया और कान में गंदे शब्द बोले। हर धक्के के साथ उसकी गांड तन रही थी। मैंने एक हाथ आगे लाकर उसकी क्लिट मसल दी। वह दूसरी बार झड़ गई, पानी और वीर्य मिलाकर बह रहा था।

बाद में बिस्तर पर वापस आकर मैंने उसे अपनी गोद में बिठाया। इस बार चेहरा सामने। लंड फिर चूत में। मैंने उसके बूब्स इतने जोर से दबाए कि उसके चेहरे पर दर्द और मजे का मिश्रण था। उसने मेरे गले में दाँत गाड़ दिए। खून की हल्की बूंद निकली। मैंने बदले में उसके कंधे पर काट लिया।

सुबह चार बजे तक हम थककर बिस्तर पर पड़े थे। कविता के शरीर पर नीले-लाल निशान, मेरे शरीर पर नाखून और दाँतों के निशान। उसने लिफाफे में पंद्रह हजार रखे और बोली, “अगली बार जब बुलाऊँ, और सामान लेकर आना। रस्सियाँ, मोमबत्ती, सब। मैं तुम्हें बर्बाद करना चाहती हूँ और खुद भी बर्बाद होना चाहती हूँ।”
मैंने पैसे रखे, कपड़े पहने। दरवाजे पर खड़े होकर उसने एक आखिरी किस दी—जोरदार, काटने वाली। “नीना से कह देना, उसकी और क्लाइंट्स भी भेज दे। लेकिन सिर्फ उन्हीं को जो दर्द सह सकें।”

मैं बाहर निकला। ठाणे की रात अभी बाकी थी, लेकिन मेरा काम पूरा हो चुका था। गाड़ी में बैठते हुए मुझे एहसास हुआ कि इस शहर में भूखी औरतें कम नहीं। और मैं उनकी भूख मिटाने के लिए हमेशा तैयार हूँ—पैसे लेकर, और जितना वे बर्दाश्त करें, उतना क्रूर होकर।
वापस अंधेरी पहुंचते-पहुंचते सुबह हो चुकी थी। ऑफिस जाने से पहले नहाया, नाश्ता किया। फोन पर नीना का मैसेज था—“कविता खुश है। अगली हफ्ते एक और नाम भेजूँगी। और रफ।”

नीना का मैसेज आने के बाद मैंने फोन साइड रख दिया। सुबह का ट्रैफिक शुरू हो चुका था। ऑफिस पहुँचकर दिनभर काम निपटाया, लेकिन दिमाग में कविता के शरीर के निशान घूमते रहे—लाल गांड, दाँतों के निशान, और उसकी आवाज जब वह चीख रही थी।
अगले हफ्ते बुधवार को शाम को नीना का फोन आया। आवाज में हल्की उत्तेजना थी। “आरव, नई क्लाइंट। नाम सोनाली। उम्र 34। पति विदेश में है तीन महीने से। वह बहुत डिमांडिंग है। बोली है कि पिछली वाली से ज्यादा क्रूर चाहिए। रस्सियाँ, थप्पड़, गला दबाना, सब। पेमेंट बीस हजार एक रात। लोकेशन उसका अपना बंगला है मालाद में। तुम्हें खुद पहुँचना है रात नौ बजे।”

मैंने सहमति दे दी। रात को तैयार होकर निकला। काली शर्ट, काली पैंट। बैग में रस्सियाँ, चमड़े का कॉलर, छोटा व्हिप और एक मोटी बेल्ट रख ली। मालाद का बंगला गेटेड सोसाइटी में था। गार्ड ने नाम पूछा, अंदर जाने दिया। दरवाजा खुद सोनाली ने खोला।
वह कविता से बिल्कुल अलग थी। गोरी नहीं, गेहुँआ रंग, लेकिन बॉडी एथलेटिक। कंधे चौड़े, कमर पतली, कूल्हे भारी। ब्लाउज के बिना सिर्फ एक काला लेस का बॉडीसूट पहना था जिसमें निप्पल्स साफ दिख रहे थे। बाल खोले हुए, आँखों में काला काजल। उम्र 34, लेकिन चेहरे पर एक क्रूर मुस्कान। “अंदर आ। देर मत कर।”

दरवाजा बंद होते ही उसने मेरे बैग से रस्सियाँ निकाल लीं। “तुम आज रात मेरे मालिक नहीं। मैं तुम्हारी मालकिन हूँ। समझा?” उसकी आवाज भारी थी। मैंने सिर हिलाया। उसने मुझे बेडरूम में घसीटा। कमरा बड़ा था, दीवारों पर दर्पण, बिस्तर के चारों कोनों पर लोहे के रिंग लगे हुए।
“कपड़े उतार। सब।” मैंने उतारे। वह मेरे सामने खड़ी होकर मेरे लंड को देखती रही। फिर अचानक एक जोरदार थप्पड़ मेरे गाल पर जड़ा। गाल जल उठा। “घुटनों पर।” मैं बैठ गया। उसने अपना बॉडीसूट नीचे खिसकाया। चूत मुंडवाई हुई, गुलाबी और पहले से गीली। “चाट। जीभ अंदर तक डाल।”

मैंने मुँह लगाया। उसकी गंध तेज थी। जीभ अंदर घुसाई तो उसने मेरे बाल पकड़कर सिर जोर से दबाया। नाक चूत में धँस गई। वह कमर घुमा रही थी। “और गहरा… हाँ… ऐसे ही कुत्ते की तरह चाट।” जब मैंने क्लिट को दाँतों से हल्का काटा तो उसने मेरे सिर को और जोर से दबाया। साँस फूलने लगी। वह नहीं रुकी। पानी उसकी टाँगों से बह रहा था मेरे मुँह में।

अचानक उसने मुझे धक्का दिया। “उठ। हाथ पीछे कर।” रस्सी से उसने मेरे हाथ पीठ के पीछे बाँध दिए। इतनी कसकर कि खून का बहाव धीमा पड़ गया। फिर कॉलर गले में पहनाया और एक छोटी चेन उससे बाँध दी। “अब तू मेरा कुत्ता है।” उसने चेन खींचकर मुझे बिस्तर के पास घसीटा।

मैंने उसे बिस्तर पर धकेला, लेकिन हाथ बँधे होने की वजह से बैलेंस नहीं रहा। वह हँसी और मेरे सीने पर बैठ गई। बूब्स मेरे मुँह पर रगड़ने लगी। “काट। जोर से काट।” मैंने एक निप्पल मुँह में लिया और दाँत गाड़ दिए। वह चीखी लेकिन सीने को और आगे धकेला। खून की हल्की बूंद निकली। उसने मेरे बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। “अब दूसरा।” मैंने दूसरा भी काटा। उसके बूब्स पर लाल निशान पड़ गए।
सोनाली उठी और व्हिप उठाया। पहली चोट मेरे सीने पर लगी। जलन तेज थी। दूसरी जाँघ पर। तीसरी सीधे लंड के पास। मैंने दाँत भींचे। वह मुस्कुराई। “चिल्ला। मैं सुनना चाहती हूँ।” चौथी चोट और जोर से। मेरे शरीर पर लाल धारियाँ उभर आईं। उसने रस्सी के दूसरे सिरे को हेडबोर्ड से बाँध दिया और मुझे बिस्तर पर लिटा दिया। टाँगें फैला दीं।

वह मेरे ऊपर चढ़ी। लंड को अपनी चूत पर रगड़ा। फिर एक झटके में पूरा अंदर ले लिया। उसकी चूत टाइट थी, गर्म। वह खुद उछलने लगी। हर बार जब नीचे बैठती तो मेरे कूल्हे दर्द करते। “देख कुत्ते… तेरा लंड मेरी चूत का खिलौना है।” उसने मेरे गले पर हाथ रखा और दबाया। साँस रुक गई। आँखों के आगे अंधेरा छा गया तो उसने छोड़ दिया। मैंने जोर से साँस ली। वह फिर से दबाने लगी। इस बार और देर तक।
जब वह तेज हो गई तो मैंने कमर ऊपर उछाली। लंड और गहराई तक घुस गया। वह चीखी। “हाँ… ऐसे ही… मार… जोर से मार मेरी चूत को।” मैंने हाथ बँधे होने के बावजूद ताकत लगाई। हर धक्के के साथ उसकी गांड मेरे जाँघों से टकरा रही थी। आवाज तेज हो गई। उसने अपने नाखून मेरे सीने में गाड़ दिए। खून की लकीरें निकल आईं।

अचानक वह उतर गई। लंड चमक रहा था उसके पानी से। उसने मुझे पलटा। पेट के बल लिटाया। रस्सी थोड़ी ढीली की लेकिन हाथ अभी भी बँधे थे। फिर बेल्ट उठाई। पहली चोट मेरी गांड पर लगी। तेज आवाज। जलन। दूसरी, तीसरी। गांड जल रही थी। उसने पाँच बार मारा। फिर अपने हाथ से सहलाया और एक उंगली गीली करके मेरे गांड के छेद में घुसा दी। “अब यहाँ भी।” उंगली अंदर-बाहर होने लगी। दर्द और मजे का मिश्रण। उसने दूसरी उंगली भी डाल दी। मैंने दाँत भींचे।

सोनाली फिर मुड़ी। इस बार उसने मेरे लंड को अपनी गांड में लिया। धीरे-धीरे। पूरा अंदर जाने में समय लगा। जब पूरा घुस गया तो वह रुकी। साँस भारी। “अब हिल। जोर से।” मैंने कमर हिलाई। हर धक्के के साथ उसकी गांड तन रही थी। उसने अपना हाथ नीचे ले जाकर अपनी क्लिट मसलनी शुरू की। चीखें तेज हो गईं। “मैं झड़ रही हूँ… आरव… तेरे लंड से… आह्ह्ह…” उसकी गांड ने जोर से ऐंठन ली। पानी की धार निकल पड़ी।

मैंने भी कंट्रोल नहीं रखा। लंड गांड के अंदर ही फट पड़ा। वीर्य इतना निकला कि बाहर बहने लगा। वह मेरे ऊपर गिर पड़ी। दोनों साँस फूल रहे थे। कुछ देर बाद उसने रस्सी खोली। मेरे हाथ सुन्न हो चुके थे। खून की लाल रेखाएँ कलाई पर थीं।
सोनाली उठी और पानी लाई। पीने के बाद वह फिर बिस्तर पर आ गई। “रात अभी खत्म नहीं हुई।” उसने मोमबत्ती जलाई। मोम गरम करके मेरे सीने पर टपकाया। जलन तेज थी। मैंने चीख ली। उसने मुस्कुराते हुए और टपकाया—निप्पल्स पर, पेट पर। फिर खुद झुकी और मोम को जीभ से चाटने लगी।

मैंने उसे पकड़ लिया। इस बार हाथ आजाद थे। उसे बिस्तर पर धक्का दिया। टाँगें फैलाईं। लंड फिर से खड़ा हो चुका था। एक झटके में चूत में घुसा दिया। अब मैंने गला दबाया। उसकी आँखें फटी रहीं। मैंने जोर-जोर से धक्के मारे। बिस्तर चरमरा रहा था। उसने मेरे हाथ को और जोर से दबाने के लिए इशारा किया। मैंने दबाया। उसका चेहरा लाल हो गया। जब साँस लगभग रुकने वाली थी तो छोड़ दिया। वह खाँसते हुए झड़ गई। चूत से पानी की बौछार निकली। मेरे पेट तक गीला हो गया।

मैंने उसे कुत्ते की पोजीशन में किया। बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। लंड चूत में। व्हिप से गांड पर मारते हुए चोदा। हर चोट के साथ वह और जोर से चीखती। “और मार… और चोद… मुझे कुत्ती बना दे…” मैंने बेल्ट से भी मारा। गांड पूरी तरह लाल और सूजी हुई थी। वीर्य फिर से उसकी कोख में उड़ेल दिया। इतना कि वह टाँगों से बहने लगा।

सुबह पाँच बजे तक हम थक चुके थे। सोनाली के शरीर पर मोम के धब्बे, थप्पड़ों के निशान, मेरे दाँतों के निशान। मेरे शरीर पर व्हिप और बेल्ट की धारियाँ। उसने बीस हजार का लिफाफा दिया। “अगली बार और सामान लेकर आना। चेन, क्लैंप, सब। मैं और बर्बाद होना चाहती हूँ।”
मैंने कपड़े पहने। दरवाजे पर उसने एक आखिरी थप्पड़ मेरे गाल पर जड़ा। “जा। लेकिन याद रखना—तू मेरा कुत्ता है जब तक मैं कहूँ।”
बाहर निकला। मालाद की सड़कें सुनसान थीं। गाड़ी में बैठते हुए शरीर दर्द कर रहा था, लेकिन अंदर एक अजीब संतुष्टि थी। नीना को मैसेज किया—“सोनाली संतुष्ट है। अगली भेज देना।”

जवाब आया—“दो दिन बाद। और भी रफ।”
मैंने इंजन स्टार्ट किया। मुंबई की सुबह शुरू हो चुकी थी। मेरे लिए रातें अब सिर्फ पैसे कमाने का जरिया नहीं रह गई थीं। वे एक नशा बन चुकी थीं—दर्द का, नियंत्रण का, और उन भूखी औरतों का जो खुद को टुकड़े-टुकड़े करवाना चाहती थीं। और मैं हर बार तैयार था उन्हें तोड़ने के लिए।

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