गंदी झुग्गी की लड़की को घर लाकर नहलाया, छोटी स्कर्ट पहनाया फिर माँ-बाप के साए में बाँधकर बेदर्दी ठोका।Naukrani ki chudai हर छेद फाड़ा, थप्पड़ से लाल किया। वह खुद मांगने लगी और तोड़ो मुझे।
मेरा नाम राघव था। उस समय मेरी उम्र 23 साल थी। मैं दिल्ली के एक बड़े इलाके में रहता था, जहाँ मेरे घर के पीछे एक पुरानी झुग्गी बस्ती थी। वहाँ कूड़ा बीनने वाली एक लड़की रोज आती थी। उसका नाम सबा था। उम्र करीब 19 साल। गोरा चमड़ी वाला बदन, कसी हुई कमर, भारी स्तन और मोटी जाँघें। लेकिन पूरा शरीर मैला, कपड़े फटे हुए, बाल बिखरे, चेहरे पर धूल। फिर भी जब वह झुककर कूड़ा चुनती तो उसकी गांड का आकार और स्तनों का भार मुझे पागल कर देता था।
मैं रोज उसे देखता और मेरा लंड तुरंत सख्त हो जाता। एक दिन मैंने हिम्मत की। पास गया और सीधा बोला, “तेरा नाम क्या है?”
वह डरते हुए बोली, “सबा… भाईजान।”
“तू मेरे साथ चल। नहा लेगी, साफ कपड़े पहनेगी। फिर जो कहूँगी वही करेगी।”
वह झिझकी, “मैं गंदी हूँ… आपको बुरा लगेगा।”
मैंने उसकी बाँह पकड़ी और खींच लिया। “चुपचाप चल। वरना अभी यहीं सड़क पर पैंटी उतार के चोद दूँगा।”
मेरे माँ-बाप उस समय दो महीने के लिए दुबई गए हुए थे। बहन कॉलेज हॉस्टल में थी। घर पूरी तरह खाली था। मैं सबा को सीधे अपने कमरे में ले आया। बाथरूम का दरवाजा खोला, गर्म पानी चालू किया और बहन की एक छोटी काली स्कर्ट और सफेद क्रॉप टॉप निकाल कर दे दिया।
“नहा। ये पहन। और जल्दी कर।”
पंद्रह मिनट बाद जब वह बाहर आई तो मेरा लंड फटने को तैयार था। गीले बाल कंधों पर, चमकता गोरा बदन, टॉप स्तनों पर इतना टाइट कि निप्पल साफ उभर आए थे, स्कर्ट इतनी छोटी कि जाँघों का मोटा हिस्सा और गांड का निचला हिस्सा दिख रहा था। पेट खुला हुआ।
मैंने उसे दीवार से धकेल दिया। एक हाथ से उसके दोनों स्तन मसलने लगा, दूसरे हाथ से स्कर्ट ऊपर चढ़ा दी। पैंटी फाड़ दी। उसकी गुलाबी चूत पहले से गीली थी।
“अब से तू मेरी रंडी है। समझी?”
वह काँपते हुए बोली, “हाँ… भाईजान…”
मैंने उसे घुटनों के बल बैठाया और अपना मोटा, नसों वाला लंड उसके मुँह में ठोक दिया। गला तक घुसाया। वह उल्टी जैसी आवाज निकाल रही थी लेकिन मैं उसके बाल पकड़कर जोर-जोर से मुँह चोदता रहा। थूक उसके गले से बाहर निकल रहा था।
फिर उठाया, बेड पर पटक दिया। टाँगें फैलाकर चूत पर मुँह लगाया। जीभ अंदर-बाहर, क्लिट को दाँत से हल्का काटा। वह कराह उठी, “आह… दर्द… पर मत रुकना…”
join my telegram channel for leaked videos
जब वह पूरी तरह भीग गई तो मैंने लंड उसके छेद पर रखा और एक झटके में पूरा घुसा दिया।
“आह्ह्ह… फट गई… बड़ा है…” वह चीखी।
मैंने कोई नरम व्यवहार नहीं किया। कमर पकड़कर जोर-जोर से ठोकने लगा। हर धक्के पर उसके स्तन हिल रहे थे, स्कर्ट कमर पर सिमटी हुई थी। बीस मिनट तक रफ चोदा। फिर निकालकर उसके चेहरे पर झाड़ दिया। वीर्य आँखों, होंठों और बालों में लग गया।
“चाट।”
उसने जीभ निकालकर चाटा।
मैंने उसे उल्टा किया। गांड के छेद पर थूक लगाया और दो उंगलियाँ अंदर घुसा दीं। वह चीखी।
“आज से ये भी मेरा है।”
धीरे-धीरे उंगलियाँ बढ़ाई, फिर लंड का सिरा लगाया और दबाव डाला। आधा अंदर गया तो वह काँपने लगी। मैंने उसके बाल पकड़कर पूरा घुसा दिया।
“आह… फाड़ दिया… मत निकालना…”
मैंने उसकी गांड को बेरहमी से चोदा। हर थ्रस्ट पर उसकी गांड हिल रही थी, स्कर्ट और ऊपर चढ़ गई थी। पंद्रह मिनट बाद मैंने उसके अंदर ही भर दिया।
रात भर मैंने उसे तीन बार और लिया। कभी मुँह में, कभी चूत में, कभी गांड में। सुबह जब उठी तो उसकी जाँघों के बीच से वीर्य बह रहा था।
अगले दिन से मैंने नियम बना दिए।
“तू अब घर की नौकरानी है। लेकिन मेरी निजी रंडी भी। जब चाहूँ, जहाँ चाहूँ, जैसे चाहूँ।”
सबा ने सिर झुकाया, “जो हुक्म हो भाईजान।”
सुबह वह झाड़ू लगा रही थी। छोटी स्कर्ट में घुटनों के बल झुकी हुई। मैंने पीछे से स्कर्ट उठाई, पैंटी खींची और बिना किसी तैयारी के लंड चूत में ठोक दिया।
“आह… बर्तन अधूरे हैं…”
“पहले तुझे पेलूँगा।”
मैंने उसके बाल पकड़कर काउंटर पर झुका दिया और जोरदार चुदाई की। थप-थप की आवाज किचन में गूँज रही थी। पाँच मिनट में उसके अंदर झाड़ दिया। वह मुस्कुराते हुए फिर से बर्तन माँजने लगी, टाँगों से वीर्य टपकता हुआ।
दोपहर को जब वह बालकनी में कपड़े सुखा रही थी, मैंने उसे दीवार से लगा दिया। स्कर्ट ऊपर, पैंटी नीचे। खड़े-खड़े चोदा। उसके स्तन दीवार से दब रहे थे।
शाम को बाथरूम साफ करते समय टॉप गीला होकर स्तनों से चिपक गया था। मैंने शावर चालू किया, उसे पानी के नीचे खड़ा किया और पीछे से गांड में घुसा दिया। पानी की आवाज में उसकी चीखें मिल रही थीं।
“हाँ… फाड़ दो… रोज ऐसे ही…”
रात को मैंने उसे सिर्फ अपनी बड़ी शर्ट पहनाई। नीचे कुछ नहीं। वह झुककर फर्श पोछती तो उसकी चूत और गांड साफ दिखती। मैं लंड निकालकर सीधे अंदर घुसा देता। कभी चूत, कभी गांड।
एक दिन मैंने रस्सी निकाली। उसके दोनों हाथ पीछे बाँध दिए। आँखों पर काला कपड़ा बाँधा। फिर बेड पर लिटाकर पहले मुँह चोदा, फिर चूत, फिर गांड। बीच-बीच में थप्पड़ मारे। स्तनों को जोर से मसला, निप्पल को दाँत से काटा। वह दर्द और मजे से काँप रही थी।
“तू सिर्फ मेरी वस्तु है। बोल।”
“हाँ भाईजान… मैं आपकी रंडी हूँ… आपकी गुलाम…”
मैंने उसे कुत्ते की तरह घुटनों पर बैठाया, रस्सी से गर्दन बाँधी और खींचते हुए चोदा। हर धक्के पर उसकी गांड लाल हो रही थी।
कुछ हफ्ते ऐसे ही बीते। सबा अब घर की पूरी जिम्मेदारी संभालती। सफाई, खाना, कपड़े। लेकिन हर समय तैयार रहती कि कब लंड अंदर घुस जाए।
फिर एक दिन माँ-बाप वापस आने वाले थे। सबा घबराई।
“भाईजान अब क्या होगा?”
“तू काम करती रह। मौका मिलेगा तो चुपके से लूँगा। और अगर पकड़ी गई तो कहूँगा तू मेरी रखैल है।”
माँ-बाप आ गए। उन्होंने सबा को देखा तो खुश हुए। “अच्छी लड़की है, घर साफ रखती है।”
रात को सब सो गए। सबा चुपके से मेरे कमरे में आई। मैंने उसे दीवार से लगा दिया। स्कर्ट ऊपर, पैंटी फाड़ दी और खड़े-खड़े जोर से चोदा। उसने मुँह मेरे कंधे पर दबाया ताकि आवाज न निकले।
“उम्म… धीरे… जाग जाएँगे…”
लेकिन उसकी चूत लंड को चूस रही थी। मैंने तेजी से पेला और अंदर ही भर दिया।
अगली सुबह माँ बगीचे में थीं। सबा किचन में नाश्ता बना रही थी। मैंने उसे काउंटर पर झुकाया, स्कर्ट उठाई और पाँच मिनट में चोदकर निकल गया। वह मुस्कुराते हुए बर्तन धोने लगी, जाँघों से वीर्य बहता हुआ।
दोपहर को माँ-बाप सो रहे थे। मैंने सबा को बाथरूम में घसीटा। शावर चालू किया और उसकी गांड बेरहमी से मारी।
“आह… चुपके से… लेकिन फाड़ दो…”
रातें अब और खतरनाक हो गईं। कभी वह मेरे ऊपर चढ़कर चुदती, कभी मैं उसे खिड़की के पास खड़े-खड़े लेता। एक रात वह लंड चूस रही थी तभी माँ पानी पीने उठीं। हम दोनों साँस रोककर रुके। माँ चली गईं तो सबा हँसते हुए और जोर से चूसने लगी।
धीरे-धीरे रिस्क बढ़ता गया। दिन में जब माँ बाजार जातीं तो मैं सबा को सोफे पर लिटाकर पूरा आराम से चोदता। कभी रस्सी से बाँधकर, कभी थप्पड़ मारकर, कभी उसके मुँह में कपड़ा ठूँसकर।
सबा अब खुद कहने लगी, “भाईजान, जितना खतरा उतना मजा… आज और क्रूर होइए… मुझे पूरी तरह तोड़ दीजिए।”
एक शाम मैंने उसे पूरी तरह नंगा किया। हाथ-पैर बाँधे। आँखों पर पट्टी। फिर मोमबत्ती जलाई और उसके स्तनों और जाँघों पर गर्म मोम टपकाया। वह चीखी लेकिन मना नहीं किया। फिर मैंने उसका मुँह खोला और लंड गले तक घुसा दिया। साँस रुकने तक चोदा। जब निकालने लगा तो उसने खुद पकड़ लिया।
रात भर मैंने उसे हर छेद में लिया। चूत सूज गई, गांड लाल हो गई, गला बैठ गया। सुबह जब रस्सी खोली तो वह मेरे सीने पर गिर पड़ी।
“अब मैं पूरी तरह आपकी हूँ… चाहे माँ-बाप के सामने भी… बस मुझे फेंकना मत।”
मैंने उसके बाल सहलाए और बोला, “तू मेरी निजी संपत्ति है। जब तक मैं चाहूँगा, यहीं रहेगी। और जितना चाहूँगा, उतना तोड़ूँगा।”
सबा मुस्कुराई। उसकी आँखों में अब सिर्फ हवस और समर्पण था।
उस दिन के बाद घर में एक नया नियम चल पड़ा। माँ-बाप के होते हुए भी मैं कभी-कभी उसे किचन में, बाथरूम में या अपने कमरे में चुपके से ले लेता। कभी रस्सी, कभी थप्पड़, कभी गला दबाकर। सबा हर बार और ज्यादा गीली हो जाती।
एक रात माँ-बाप दोनों गहरी नींद में थे। मैंने सबा को लिविंग रूम के सोफे पर लिटाया। हाथ बाँधे, आँखें ढँकीं। फिर उसकी चूत और गांड दोनों को बारी-बारी से घंटों चोदा। बीच में उसके मुँह में उंगलियाँ ठूँसीं ताकि चीख न निकले। आखिर में उसके चेहरे, स्तनों और खुली चूत पर पूरा माल उड़ेल दिया।
वह काँपते हुए लेटी रही।
“भाईजान… अब मैं हमेशा के लिए आपकी रंडी हूँ… चाहे जो भी हो…”
मैंने उसके बाल और कसकर पकड़े और हर धक्के को और गहरा कर दिया। सबा का मुँह रसोई की दीवार से दबा हुआ था ताकि आवाज बाहर न जाए। माँ सिर्फ दस कदम दूर चाय बना रही थीं। केतली की सीटी और मेरे लंड की थप-थप की आवाज एक साथ गूँज रही थी।
“चुप रह… वरना अभी माँ को बुलाऊँगा और बताऊँगा कि तू कितनी गंदी रंडी है,” मैंने उसके कान में फुसफुसाया।
उसकी चूत मेरे लंड को इतनी जोर से चूस रही थी कि हर बार निकालते समय एक गीली आवाज निकलती। मैंने स्कर्ट को उसकी कमर पर और ऊपर समेटा, एक हाथ से उसकी गांड के एक गाल को जोर से थप्पड़ मारा। लाल निशान उभर आया। फिर दूसरा थप्पड़। वह काँप उठी लेकिन पीछे की ओर कमर और ज्यादा धकेल दी।
मैंने रफ्तार बढ़ाई। पूरा लंड जड़ तक घुसाकर कुछ सेकंड रोके रखा, फिर एकदम बाहर निकाला और फिर से पूरा ठोक दिया। उसकी टाँगें काँपने लगीं। मैंने उसके बालों को और कसकर खींचा ताकि गर्दन पीछे मुड़ जाए। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे लेकिन मुँह से सिर्फ दबी हुई कराह निकल रही थी।
माँ की आवाज आई, “सबा बेटा, चाय के लिए चीनी निकालना!”
मैंने उसी पल और जोर का धक्का मारा। सबा ने मुश्किल से जवाब दिया, “जी… अम्मी…” उसकी आवाज काँप रही थी। मैंने हँसते हुए उसके कान में कहा, “अच्छी लड़की… अब झड़।”
मैंने उसके क्लिट पर उंगली रखी और तेजी से रगड़ने लगा। तीस सेकंड में उसकी पूरी बॉडी अकड़ गई। चूत ने लंड को इतनी जोर से जकड़ा कि मुझे खुद को रोकना पड़ा। वह काँपते हुए झड़ गई। उसके रस मेरे अंडों तक बह आए। मैंने उसी हालत में अपना माल उसके अंदर उड़ेल दिया। इतना जोर से कि वह दीवार से सट गई।
मैंने लंड बाहर निकाला। वीर्य उसकी जाँघों से टपकने लगा। मैंने उसकी पैंटी वापस चढ़ा दी, स्कर्ट नीचे किया और उसके बाल ठीक कर दिए।
“अब जा, चीनी निकाल। और मुस्कुराते हुए दे।”
सबा ने काँपते हुए सिर हिलाया और रसोई से बाहर चली गई। मैंने हाथ धोए और सामान्य होकर बैठ गया।
उस दिन के बाद मैंने नियम और सख्त कर दिए।
रात को जब माँ-बाप सो जाते तब मैं सबा को अपने कमरे में बुलाता। आज मैंने कुछ नया तय किया था। अलमारी से मोटी रस्सी, काला टेप, और एक छोटी सी चमड़े की पट्टी निकाली।
सबा दरवाजे पर खड़ी थी। छोटी स्कर्ट और क्रॉप टॉप में। मैंने इशारा किया। वह अंदर आई और घुटनों के बल बैठ गई, जैसे रोज का नियम था।
“आज तू बोल नहीं पाएगी,” मैंने कहा और उसके मुँह में एक मोटा कपड़ा ठूँस दिया। फिर काला टेप उसके होंठों पर चिपका दिया। आँखों पर भी पट्टी बाँध दी। दोनों हाथ पीठ के पीछे कसकर बाँधे। फिर टाँगें फैलाकर टखनों को भी बाँध दिया ताकि वह हिल न सके।
मैंने उसे बेड पर पेट के बल लिटाया। स्कर्ट पूरी तरह ऊपर चढ़ा दी। पैंटी फाड़कर फेंक दी। उसकी गांड और चूत पूरी तरह खुली हुई थी। मैंने पहले दोनों गालों पर जोर-जोर से थप्पड़ मारे। लाल निशान उभर आए। फिर चमड़े की पट्टी से उसकी गांड पर पाँच-पाँच वार किए। हर वार पर उसका बदन उछलता लेकिन आवाज नहीं निकलती थी।
“गिन,” मैंने कहा। वह सिर हिला नहीं पा रही थी लेकिन आँसू पट्टी से रिस रहे थे।
मैंने लुब्रिकेंट की जगह अपना थूक इस्तेमाल किया। दो उंगलियाँ उसकी गांड में घुसा दीं। वह अकड़ गई। मैंने उंगलियाँ फैलाकर छेद को चौड़ा किया। फिर तीसरी उंगली। जब चार उंगलियाँ अंदर चली गईं तो उसने जोर से साँस ली। मैंने अपना मोटा लंड निकाला और बिना रुके एक झटके में गांड में पूरा घुसा दिया।
उसका बदन काँप उठा। मैंने बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और जोर-जोर से ठोकने लगा। हर धक्के पर उसके स्तन बेड से रगड़ खा रहे थे। मैंने रफ्तार इतनी बढ़ाई कि बेड की चरमराहट घर में गूँजने लगी। बीच-बीच में थप्पड़ मारता रहा। उसकी गांड पूरी तरह लाल हो चुकी थी।
बीस मिनट बाद मैंने बाहर निकाला और उसी रस्सी से उसके गले में फंदा डालकर हल्का खींचा। साँस रुकने लगी तो छोड़ दिया। फिर चूत में घुसा दिया। इतनी जोर से कि उसकी टाँगें काँपने लगीं। मैंने दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़कर पूरे जोर से पेलना शुरू किया।
“तू सिर्फ एक छेद है मेरे लिए… बोल,” मैंने टेप हटाकर कहा।
उसने साँस लेते हुए फुसफुसाया, “हाँ… भाईजान… मैं सिर्फ आपका छेद हूँ… फाड़ दो मुझे…”
मैंने टेप वापस चिपका दिया और फिर से गांड में घुसा दिया। इस बार और गहरा। मैंने उसके बालों को एक हाथ में लिया और दूसरे हाथ से गर्दन दबाई। साँस पूरी तरह रोक दी। उसके बदन में ऐंठन होने लगी तब मैंने छोड़ दिया। वह जोर से साँस लेने लगी लेकिन मैंने फिर से दबा दिया। तीन बार ऐसा किया। हर बार उसकी चूत और गांड और ज्यादा सिकुड़ती।
आखिर में मैंने उसका मुँह खोला, टेप हटाया और लंड गले तक ठोक दिया। वह उल्टी जैसी आवाज निकाल रही थी। थूक और लार उसके गले से बह रहे थे। मैंने पूरा माल उसके गले में उतार दिया। उसने निगल लिया। जो बचा वह उसके चेहरे पर लगा दिया।
रस्सी खोली तो वह मेरे पैरों पर गिर पड़ी। पूरे बदन पर लाल निशान, जाँघों पर वीर्य, आँखों में आँसू।
“धन्यवाद… भाईजान…” उसने कानी आवाज में कहा।
मैंने उसे उठाया और बाथरूम ले गया। शावर चालू किया। गर्म पानी में खड़ा करके फिर से चोदा। इस बार धीरे-धीरे लेकिन बहुत गहरा। पानी उसके बालों से बह रहा था, मेरे लंड से टकराकर नीचे गिर रहा था। मैंने उसके स्तनों को जोर से मसला, निप्पल को दाँत से काटा। खून की एक बूंद निकली तो मैंने चाट लिया।
“अब से हर रात ऐसा ही होगा। कभी रस्सी, कभी मोम, कभी और कुछ। तू तैयार रह।”
उसने सिर हिलाया।
अगली सुबह माँ ने सबा के गले पर हल्के निशान देखे।
“क्या हुआ बेटा?”
सबा ने मुस्कुराते हुए कहा, “अम्मी, रात को तकिया से दब गया होगा।”
मैंने किचन में खड़े होकर मुस्कुराया। सबा ने मेरी तरफ देखा और आँख मार दी।
दोपहर को जब माँ-बाप दोनों सो रहे थे, मैंने सबा को अपने कमरे में बुलाया। इस बार मैंने उसके दोनों स्तनों को रस्सी से बाँधा ताकि वे और तने हुए दिखें। फिर उसे कुर्सी पर बैठाया, टाँगें फैलाकर बाँधीं। मुँह में फिर से कपड़ा ठूँसा।
मैंने एक बर्फ का टुकड़ा लिया और उसकी चूत पर फिराने लगा। वह अकड़ गई। फिर बर्फ को अंदर घुसा दिया। ठंडक से उसकी चूत सिकुड़ गई। मैंने तुरंत गर्म लंड घुसा दिया। ठंड और गर्मी का अंतर उसे पागल कर रहा था। मैंने बर्फ के और टुकड़े उसके निप्पलों पर रखे और चोदता रहा।
जब बर्फ पिघल गई तो मैंने मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम उसके स्तनों, पेट और जाँघों पर टपकाया। हर बूंद पर उसका बदन उछलता। मैंने मोम को ठंडा होने दिया फिर लंड से तोड़ते हुए चोदा।
रात को और आगे बढ़ाया। मैंने उसे पूरी तरह नंगा किया, हाथ-पैर चारों कोनों से बाँधे। फिर उसके पूरे बदन पर काला मार्कर से लिखा— “राघव की रंडी”, “सिर्फ इस्तेमाल के लिए”, “गांड और चूत दोनों मालिक की”।
फिर मैंने उसे घंटों तक बारी-बारी से दोनों छेदों में लिया। बीच-बीच में गला दबाता, थप्पड़ मारता, बाल खींचता। जब वह लगभग बेहोश होने वाली होती तो पानी पिलाकर फिर से शुरू कर देता।
सुबह चार बजे जब मैंने रस्सियाँ खोलीं तो वह बिल्कुल थक चुकी थी। बदन पर नीले-लाल निशान, चूत और गांड सूजी हुई, आवाज बैठ चुकी। फिर भी उसने मेरे लंड को हाथ में लिया और धीरे से चूसने लगी।
“और… भाईजान… और तोड़ दो मुझे…”
मैंने उसके सिर को दबाया और फिर से गले तक घुसा दिया।
अब घर में एक नई दिनचर्या चल पड़ी थी। माँ-बाप के सामने वह आदर्श नौकरानी थी—झाड़ू लगाना, खाना बनाना, कपड़े धोना। लेकिन जैसे ही वे पीठ मोड़ते, मैं उसे किसी कोने में घसीट लेता। कभी किचन के काउंटर पर, कभी बालकनी में, कभी बाथरूम में। रस्सी हमेशा अलमारी में तैयार रहती। चमड़े की पट्टी भी।
एक दिन शाम को माँ बाजार गईं। मैंने सबा को लिविंग रूम के बड़े शीशे के सामने खड़ा किया। उसके हाथ ऊपर बाँधे, टाँगें फैलाईं। मैंने पीछे से खड़े होकर उसकी गांड चोदी और शीशे में उसका चेहरा देखा। आँसू, लार, और मुस्कान एक साथ।
“देख… तू कितनी गंदी लग रही है,” मैंने कहा।
उसने शीशे में अपनी आँखों से आँखें मिलाईं और बोली, “और गंदा कर दीजिए भाईजान… पूरी तरह…”
मैंने रफ्तार बढ़ाई। शीशा हिलने लगा। उसके स्तन शीशे से टकरा रहे थे। मैंने एक हाथ से गर्दन दबाई और दूसरे से क्लिट रगड़ा। वह काँपते हुए झड़ गई। मैंने भी उसी पल उसके अंदर भर दिया।
वीर्य उसकी टाँगों से फर्श पर गिरने लगा। मैंने उसे वैसे ही बाँधे रखा और सिगरेट जलाकर देखा।
“अब से हर हफ्ते कुछ नया होगा। आज रस्सी और मोम। अगली बार कुछ और। तू भाग नहीं सकती। यह घर तेरी कैद है। और मैं तेरा जेलर।”
सबा ने सिर झुकाया। उसके बाल चेहरे पर चिपक गए थे।
“जी भाईजान… मैं कहीं नहीं जाऊँगी… बस मुझे तोड़ते रहिए…”
मैंने रस्सी खोली। वह मेरे पैरों पर गिर पड़ी और मेरे लंड को साफ करने लगी। जीभ से हर बूंद चाटी।
बाहर सूरज ढल रहा था। घर में माँ-बाप के लौटने की आहट हो सकती थी। लेकिन उस पल दोनों के लिए कोई और दुनिया नहीं थी।
सिर्फ मालिक और उसकी पूरी तरह टूटी हुई, लेकिन भूखी रंडी।
और खेल अभी शुरू ही हुआ था।
Naukrani ki chudai Stories :-
Kaale Tantrik Ka Desi Jaadu – Biwi Ki Chudai Pooja
Raat Ki Train Se Terrace Tak – Part 2