मेरे मुँह में उसका पूरा कचरा

गरीब अमित को प्रिया ने अपना चलता-फिरता कमोड बना लिया। खून चाटा, पेशाब निगला, टट्टी खाई। हर बार और गहराई तक धकेला। अब उसकी साँस भी प्रिया की इजाजत से चलती है Sexual Desire Hindi Stories ।

मेरा नाम अमित है। मैं इंदौर (मध्य प्रदेश) का रहने वाला हूँ। उम्र 26 साल। एक छोटी सी इलेक्ट्रॉनिक्स शॉप पर सेल्स बॉय का काम करता था। सीधा-सादा, थोड़ा शर्मीला लड़का। पैसे की तंगी हमेशा रहती थी। घर में माँ बीमार थीं, भाई पढ़ रहा था। हर महीने दस-बारह हजार की जरूरत पड़ जाती थी।

उस दिन दुकान पर एक औरत आई। नाम पूछा तो बोलीं—प्रिया शर्मा। उम्र करीब 34 साल। शरीर 36-28-38 का। गोरा रंग, लंबे काले बाल, तीखी आँखें, और एक ऐसा ठंडा अंदाज कि देखकर ही लगता था ये सिर्फ खरीदने नहीं आई हैं। उन्होंने महंगे स्पीकर और कुछ गैजेट्स चुने। मालिक से डीलिंग की और चली गईं। मैं उन्हें देखते रह गया। उस दिन कुछ नहीं हुआ।

दो हफ्ते बाद मालिक ने कहा—“अमित, ये सामान प्रिया मैडम के फ्लैट पर छोड़ आ। पते पर लिख दिया है।” मैं सामान लेकर पहुँचा। सोसायटी का नाम ग्रीन वैली रेसीडेंसी था, ब्लॉक-सी, फ्लैट नंबर 402। दरवाजा खोला तो वही प्रिया। छोटे नाइटवेअर में। टाइट टॉप और शॉर्ट्स। शरीर और भी साफ दिख रहा था। आँखें मुझे ऊपर से नीचे तक नाप गईं।
“अंदर रख दो,” उन्होंने ठंडी आवाज में कहा। मैंने सामान रखा और निकलने लगा। पीछे से आवाज आई—“रुको।”
मैं रुका। उन्होंने सिगरेट जलाई, कश लिया और बोलीं—“नाम?”
“अमित।”
“मुझे एक काम है। घिनौना है। लेकिन पैसे अच्छे मिलेंगे। करोगे?”
मैंने पूछा—“क्या काम?”

“टॉयलेट साफ करना है। स्वीपर नहीं मिला। मेहमान आने वाले हैं। पाँच हजार अभी और बाकी बाद में।”
पैसे की जरूरत थी। मैंने हाँ कह दी। लंच टाइम में वापस आया। दरवाजा खोला तो प्रिया ने कहा—“अंदर आ। जल्दी।” उनकी आवाज में पहले से ज्यादा हुक्म था।
टॉयलेट का दरवाजा खोला तो बदबू ने साँस रोक दी। कमोड भरा हुआ, फर्श पर छींटे, नैपकिन के टुकड़े। मैं साफ करने लगा। तभी प्रिया अंदर आ गईं। मेरे सामने ही शॉर्ट्स और पैंटी नीचे सरकाई। नैपकिन चिपकी हुई थी। खून के धब्बे साफ दिख रहे थे। वे कमोड पर बैठ गईं और पेशाब करने लगीं। मेरी तरफ देखती रहीं जैसे मैं फर्नीचर हूँ।

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पेशाब खत्म करके उठीं, पैंटी चढ़ाई और बोलीं—“अच्छे से साफ कर। फिर मेरे बेडरूम में आ।”
मैंने साफ किया। बेडरूम में पहुँचा तो वे बिस्तर पर बैठी सिगरेट पी रही थीं। बोलीं—“कितने पैसे चाहिए?”
“दस हजार।”
“मिल जाएंगे। लेकिन मेरी शर्तें माननी पड़ेंगी।”
“क्या शर्तें?”
“मेरी चूत चाटनी है। अभी। पीरियड्स चल रहे हैं।”
मैंने हिचकते हुए कहा—“मैडम… खून…”

तभी एक जोरदार चांटा पड़ा। गाल जल उठा। प्रिया ने बाल पकड़कर खींचा—“कैसे पता चला कि पीरियड्स हैं? बोल!”
“जब आप… मूतने आई थीं… नैपकिन दिख गई थी।”
दूसरा चांटा। और जोर का। फिर उन्होंने मुझे बिस्तर के पास घसीटा। “दाँतों से पैंटी उतार। अभी।”
मैं झुका। दाँतों से उनके शॉर्ट्स और पैंटी को पकड़कर नीचे खींचा। नैपकिन अलग हुई। उनकी चूत पर गाढ़ा खून लगा हुआ था। गंध तेज थी। प्रिया ने मेरे सिर को दोनों हाथों से दबाया और चूत मेरे मुँह पर रगड़ दी।
“चाट। अच्छे से। जीभ अंदर तक ले जा।”

मैंने चाटा। खून का स्वाद कड़वा, धातु जैसा। बदबू नाक में घुस रही थी। प्रिया कराह रही थीं—“हाँ… ऐसे ही… और गहरा… चाट साले…” उनके नाखून मेरे सिर में धंस गए। वे हिप्स हिला-हिलाकर मेरी जीभ पर रगड़ती रहीं। खून मेरे होंठों, ठोड़ी, गले तक लग गया।
फिर अचानक उन्होंने मुझे फर्श पर धकेल दिया। “सीधा लेट।” मैं लेटा। वे मेरे मुँह पर बैठ गईं। चूत ने मेरे होठों को पूरी तरह ढक लिया। और तब उन्होंने पेशाब छोड़ दी। गर्म धार सीधे मेरे मुँह में भर गई। मैं हाथ-पैर मारने लगा लेकिन उनके वजन और पकड़ ने मुझे दबा रखा। पेशाब गले से नीचे उतरने लगी। मजबूरन निगलना पड़ा। जब धारा थमी तो उन्होंने खंखारकर मेरे मुँह में थूक दिया और पंजे से मुँह दबाया। “निगल। पूरा।”

मैंने निगल लिया। प्रिया हँस पड़ीं। ठंडी, क्रूर हँसी।
“अब तू मेरा टॉयलेट बनने वाला है,” उन्होंने कहा।
मैं कुछ बोल पाता उससे पहले वे घूम गईं। इस बार उनकी गांड मेरे मुँह पर बैठ गई। मैंने सोचा शायद चाटना है, जीभ लगाई। तभी उन्होंने जोर से दबाया और टट्टी छोड़नी शुरू कर दी। गर्म, नरम, बदबूदार मल मेरे मुँह में भर गया। मैंने सिर हिलाने की कोशिश की लेकिन वे बैठे रहीं। “खा। पूरा खा। नहीं तो तेरा वीडियो बनाकर वायरल कर दूंगी। दुकान वाले, तेरे घर वाले… सब देखेंगे।”
मैंने खाया। गले तक उतरता महसूस किया। आँखों में पानी आ गया। जब वे उठीं तो मैं तुरंत बाथरूम की तरफ भागा। उन्होंने आवाज लगाई—“रुक। धोने की इजाजत मैं दूंगी।”

मैं रुका। प्रिया ने टिश्यू से अपनी गांड पोछी, फिर मेरे पास आईं। एक हाथ से मेरा मुँह खोला और बाकी बचे मल को उंगली से अंदर धकेल दिया। “अब निगल।” मैंने निगल लिया।
उसके बाद उन्होंने शराब निकाली। स्कॉच। एक बड़ा घूंट मेरे मुँह में उड़ेला। “पी। स्वाद बदल जाएगा।” मैंने पिया। फिर उन्होंने खुद भी पिया और मेरे मुँह में थूक दिया। “मिलाकर पी।”

रात लंबी थी। प्रिया ने मुझे बिस्तर पर लिटाया। रस्सी निकाली। हाथ-पैर बाँध दिए। कसकर। फिर अपनी चूत फिर से मेरे मुँह पर बैठाई। इस बार उन्होंने खून और पेशाब दोनों मिलाकर छोड़ दी। मैं निगलता रहा। बीच-बीच में वे सिगरेट का धुआँ मेरे मुँह में छोड़तीं और हँसतीं।
“तू सिर्फ सफाई वाला नहीं है अब,” उन्होंने कहा। “तू मेरा निजी शौचालय है। जब मन करेगा बुलाऊँगी। पैसे मिलते रहेंगे। इनकार किया तो…” उन्होंने फोन दिखाया। रिकॉर्डिंग चल रही थी।

मैं चुप रहा। शरीर काँप रहा था। लेकिन अंदर कहीं एक अजीब उत्तेजना भी थी—डर, घिन और कामुकता का मिश्रण।
प्रिया ने रस्सी खोली। “आज काफी है। दस हजार ले जा। कल रात आठ बजे आना। और अगली बार साफ कपड़े पहनकर मत आना। गंदे ही आना। मैं और गंदा करूँगी।”
मैंने पैसे लिए। बोतल भी थमा दी उन्होंने। “ये भी ले जा। पीकर सो। कल फिर आना है।”

बाहर निकलते समय मैंने आईने में खुद को देखा। चेहरा खून, पेशाब और मल के धब्बों से सना हुआ। आँखों में एक नअगली शाम ठीक आठ बजे मैं ग्रीन वैली रेसीडेंसी के गेट पर खड़ा था। कपड़े जान-बूझकर गंदे पहनकर आया था—कल का वही टी-शर्ट जिसमें अभी भी हल्की बदबू बाकी थी। लिफ्ट में चढ़ते हुए दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। डर था, घिन थी, लेकिन नीचे पेट में एक गरम ऐंठन भी थी जो हर कदम पर बढ़ती जा रही थी।

दरवाजा खोला तो प्रिया नंगी खड़ी थी। सिर्फ कमर में एक पतली काली चेन बंधी हुई थी, जिससे एक छोटी सी घंटी लटक रही थी। शरीर पर तेल लगा था। स्तन भारी, निपल्स कड़े, और जाँघों के बीच की चूत अभी भी हल्के खून से सनी हुई दिख रही थी। पीरियड्स का तीसरा दिन था।
“अंदर आ और कपड़े उतार। फर्श पर घुटनों के बल,” उन्होंने हुक्म दिया।
मैंने टी-शर्ट और पैंट उतारे। नंगा होते ही उन्होंने मेरे लंड को एक ठंडी नजर से देखा। अभी तक वो सीधा नहीं हुआ था—डर ज्यादा था। प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा—“डर से लंड नहीं खड़ा होता तो मैं खड़ा कर दूंगी।”

उन्होंने एक लंबी चमड़े की पट्टी निकाली। मेरे दोनों हाथ पीछे बांध दिए। फिर गर्दन में चेन डालकर दीवार के हुक से कस दिया। मैं घुटनों के बल, हाथ बंधे, गर्दन खिंची हुई अवस्था में था। प्रिया मेरे सामने आकर बैठ गईं। पैर फैलाए। चूत पूरी तरह खुली। खून की धार अभी भी धीरे-धीरे रिस रही थी।
“जीभ बाहर निकाल।”
मैंने निकाली। उन्होंने आगे बढ़कर अपनी चूत मेरे मुँह पर रगड़ दी। खून तुरंत जीभ पर लग गया। कड़वा, लोहे जैसा स्वाद। प्रिया ने मेरे बाल पकड़कर जोर से दबाया—“चाट। सिर्फ ऊपर-ऊपर नहीं। अंदर तक जीभ घुसा। खून पी। पूरा।”

मैंने चाटा। जीभ अंदर धकेली। खून मेरे गले तक उतरने लगा। प्रिया कराह उठीं। उनके नाखून मेरे सिर की खाल में धंस गए। वे हिप्स हिला-हिलाकर मेरी जीभ पर अपनी चूत रगड़ती रहीं। खून मेरे चेहरे पर conferने लगा—माथे, आँखों, गालों पर। मैं साँस लेने के लिए मुँह खोलता तो और खून अंदर चला जाता।
तभी उन्होंने पेशाब छोड़ दी। गर्म धार खून के साथ मिलकर मेरे मुँह में भर गई। मैं निगलने की कोशिश कर रहा था लेकिन मात्रा ज्यादा थी। कुछ पेशाब नाक से निकलने लगी। प्रिया हँस पड़ीं—“देख कैसे कुत्ता बन गया है। और निगल। एक बूँद बाहर गिरी तो आज रात तुझे और सख्त सजा मिलेगी।”

मैंने पूरा निगल लिया। गला जल रहा था। पेट में गर्म तरल उतरता महसूस हो रहा था। प्रिया उठीं और मेरे मुँह में दो उंगलियाँ ठूंस दीं। खून और पेशाब से सनी उंगलियाँ गले तक पहुँचाईं। “साफ कर। चाट।”
जब वे संतुष्ट हुईं तो चेन ढीली की। “अब बिस्तर पर लेट। पेट के बल।”
मैं लेटा। उन्होंने मेरे पैर फैला दिए और टखनों को बिस्तर के दोनों सिरों से बाँध दिया। फिर कमर के नीचे एक तकिया दबाया ताकि गांड ऊपर उठ जाए। मैं पूरी तरह बेबस था। प्रिया ने पीछे से आकर मेरी गांड के दोनों भाग फैलाए। ठंडी हवा लगी। फिर उनकी गर्म जीभ ने मेरे गाँड के छेद पर स्पर्श किया।

मैं सिहर उठा। प्रिया ने जीभ अंदर धकेली। गहरे तक। फिर अचानक रुकीं और बोलीं—“अब मेरी बारी।”
वे मेरे ऊपर सवार हो गईं। इस बार उनकी गांड मेरे मुँह पर थी। उन्होंने जोर से दबाया और टट्टी छोड़नी शुरू कर दी। नरम, गर्म मल मेरे होठों को खोलता हुआ अंदर घुसने लगा। मैंने सिर हिलाने की कोशिश की लेकिन चेन और उनके वजन ने रोक रखा था। मल मेरे मुँह में भर गया। बदबू इतनी तेज थी कि आँखें पानी छोड़ने लगीं। प्रिया ने नीचे झुककर मेरे कान में कहा—“खा। चबा। निगल। आज तू सिर्फ खाएगा। पानी भी नहीं मिलेगा जब तक ये पूरा नहीं निगल लेता।”

मैंने मजबूरन चबाना शुरू किया। गले से उतरते समय उल्टी का एहसास हुआ लेकिन उन्होंने और जोर से दबाया। जब पहली बार निगल लिया तो उन्होंने और छोड़ दी। दूसरी बार। तीसरी बार। मेरे पेट में भारीपन बढ़ रहा था। चेहरा मल से पूरी तरह सना हुआ था। आँखें, नाक, बाल—सब।
जब वे उठीं तो मैं हाँफ रहा था। प्रिया ने टिश्यू से अपनी गांड पोछी और वही टिश्यू मेरे मुँह पर रगड़ दी। “अब साफ कर ये भी।”
उसके बाद उन्होंने मुझे खड़ा किया। हाथ अभी भी बंधे थे। वे नहा ने चली गईं। मैं वहीं खड़ा मल और खून से सना इंतजार करता रहा। बीस मिनट बाद वे लौटीं। साफ शरीर, लेकिन आँखों में वही क्रूर चमक।

उन्होंने एक नया खेल शुरू किया। एक छोटी सी लोहे की छड़ निकाली जिसमें एक तरफ गोला था। मेरे मुँह में ठूंस दी। फिर छड़ के दूसरे सिरे को दीवार के हुक से बाँध दिया। अब मेरा मुँह खुला रहता था, सिर हिल भी नहीं सकता था। प्रिया ने मेरे सामने खड़े होकर पेशाब करना शुरू किया। धार सीधे मेरे खुले मुँह में जा रही थी। मैं निगल नहीं पा रहा था पूरी तरह। पेशाब मेरे गले से होते हुए छाती पर बह रही थी।
जब पेशाब खत्म हुई तो उन्होंने अपनी चूत फिर से मेरे मुँह पर दबा दी। खून अभी भी रिस रहा था। “अब चूस। खून चूस। जैसे कुत्ता दूध चूसता है।”

मैंने चूसा। जीभ और होठों से। खून मेरे पेट में जा रहा था। प्रिया कराह रही थीं। उनके पैर काँप रहे थे। अचानक उन्होंने जोर से काँपा और एक लंबी साँस के साथ मेरे मुँह में और खून छोड़ दिया—शायद ऑर्गज्म के साथ।
रात के बारह बज चुके थे। प्रिया ने मुझे आखिरकार खोला। मैं फर्श पर गिर पड़ा। शरीर काँप रहा था। पेट भरा हुआ था—मल, पेशाब, खून से। प्रिया ने मेरे बाल पकड़कर सिर उठाया।

“कल सुबह दस बजे आना। आज की सजा अभी बाकी है।”
उन्होंने एक काला मार्कर लिया और मेरे माथे पर लिखा—“प्रिया का टॉयलेट”। फिर छाती पर—“खाऊं, पीऊं, चूसूं”। लंड पर—“सिर्फ सजा के लिए”।
“इन लिखाइयों के साथ बाहर निकल। अगर मिटाया तो अगली बार तेरी गांड में लाल मिर्च भरूँगी और फिर टट्टी करूँगी।”
मैंने कपड़े पहने। चेहरा धोने की हिम्मत नहीं हुई। लिफ्ट में एक बुजुर्ग आदमी था। उसने मेरी तरफ देखा, नाक सिकोड़ी और मुँह फेर लिया। मैंने नजरें झुका लीं।

घर पहुँचकर मैंने बाथरूम का दरवाजा बंद किया और आईने में खुद को देखा। माथे पर लिखा शब्द चमक रहा था। आँखों में पानी था, लेकिन लंड आधा खड़ा था। मैंने उसे छुआ। तुरंत प्रिया की आवाज याद आ गई—“बिना इजाजत छुआ तो काट दूंगी।”
मैंने हाथ हटा लिया। फर्श पर बैठ गया। पेट में वह भारीपन अभी भी था। गले में खून और मल का स्वाद बाकी था। और अजीब बात ये थी कि मैं डर के साथ-साथ अगली सुबह का इंतजार भी कर रहा था।

सुबह नौ बजते-बजते मैं फिर से उनके फ्लैट के बाहर खड़ा था। इस बार उन्होंने दरवाजा खोला तो हाथ में एक लंबी चमड़े की बेल्ट थी। मुस्कुराती हुई बोलीं—“आज तेरी असली ट्रेनिंग शुरू होती है। आज तू सिर्फ खाएगा और पीएगा मेरा निकाला हुआ। और जब मैं कहूँगी तब ही साँस लेगा।”
वे अंदर खींचती हुई ले गईं। दरवाजा बंद हुआ। ताला लगा। और उस पल मुझे पता चल गया था—अब वापसी का कोई रास्ता नहीं बचा था। मैं पूरी तरह उनका हो चुका था। उनका निजी, गंदा, बेबस, साँस तक उनकी इजाजत वाला टॉयलेट।
और ये तो सिर्फ शुरुआत थी।ई चमक थी—शर्म की नहीं, स्वीकार की।

दोस्तो, उस रात के बाद मेरी जिंदगी बदल गई। प्रिया शर्मा सिर्फ एक कस्टमर नहीं रहीं। वे मेरी मालकिन बन गईं। हर हफ्ते दो-तीन बार मैं उनके फ्लैट पहुँचता। कभी सिर्फ चाटना, कभी पूरा टॉयलेट बनना, कभी रस्सियों में बँधा हुआ उनकी गांड और चूत दोनों साफ करना। कभी वे मुझे फर्श पर घुटनों के बल बैठाकर अपने पैरों तले दबातीं और पेशाब करतीं। कभी खून से सनी उंगलियाँ मेरे मुँह में ठूंसतीं और कहतीं—“चाट, चाट… तू इसी के लिए बना है।”

एक बार उन्होंने मुझे पूरे दिन बाथरूम में बंद रखा। सुबह से शाम तक। जब भूख लगी तो दरवाजा खोला, अपनी टट्टी थाली में रखकर दी और बोलीं—“ये खा। पानी भी यहीं से पीएगा।” मैंने खाया। शाम को जब छोड़ा तो शरीर काँप रहा था, लेकिन उन्होंने पैसे गिनकर दिए और बोलीं—“अच्छा काम किया। अगली बार और सख्त होगा।”
मैं वापस दुकान जाता, सामान्य जीवन जीने का नाटक करता। लेकिन रात को जब अकेला होता तो वही गंध, वही स्वाद याद आता। और शरीर प्रतिक्रिया देता।

प्रिया ने एक दिन कहा था—“दुनिया में कितने तरह के शौक होते हैं, तू अब जान गया। कुछ लोग सिर्फ चुदाई करते हैं। कुछ लोग शरीर को पूरा इस्तेमाल करते हैं—खून, मूत, मल, थूक, पसीना… सब। तू मेरा पूरा इस्तेमाल है।”
अब जब भी इंदौर की उन गलियों से गुजरता हूँ, ग्रीन वैली रेसीडेंसी की तरफ नज़र जाती है। फ्लैट 402 की खिड़की कभी-कभी जलती दिखती है। और मैं जानता हूँ कि अंदर कोई मेरा इंतजार कर रही है—अपने निजी, गंदे, क्रूर शौचालय का।

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