जोधपुर स्टेशन की ठंडी रात में एक जवान लड़के की कामवासना जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई जब बाड़मेर के सरपंच ने उसकी कुंवारी गांड को खून से सना दिया और फिर पूरे गाँव के आदमियों से मरवाया कामवासना।
यह कहानी राजस्थान के बीकानेर जिले के एक छोटे से कस्बे नोखा से शुरू होती है। साल 2018 की कड़ाके की सर्दी थी। दिसंबर का महीना। हवा में ठंड ऐसी घुसी हुई थी कि हड्डियों तक पहुँच रही थी। मैं विजय सिंह, उम्र 22 साल, नोखा का रहने वाला था। कॉलेज की फाइनल एग्जाम के लिए जोधपुर आया हुआ था। एग्जाम खत्म होने के बाद रात के करीब 11 बजे मैं जोधपुर रेलवे स्टेशन के पास वाले पुराने बस अड्डे पर पहुँचा। घर लौटने की बस का इंतजार कर रहा था। पेशाब का जोर लगा तो मैं अड्डे के पीछे वाले गंदे पब्लिक टॉयलेट की तरफ चला गया।
टॉयलेट के अंदर की रोशनी बहुत कम थी। एक टूटी हुई ट्यूबलाइट हल्की-हल्की जल रही थी। मैंने देखा कि दो मोटे-तगड़े आदमी एक कोने में खड़े होकर एक-दूसरे का मोटा लंड कसकर पकड़े हुए हिला रहे थे। उनकी साँसें भारी थीं। मैं पहली बार जिंदगी में ऐसा नजारा देख रहा था। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। डर भी लगा और अजीब सी गर्मी भी। मैंने मुँह फेर लिया लेकिन आँखें बार-बार उसी तरफ घूम जातीं। दोनों आदमी मूँछ वाले थे, शरीर हट्टा-कट्टा। राजस्थान के गाँवों वाले मर्द जैसे। मुझे कॉलेज के दिनों से ही ऐसे परिपक्व, मूँछ वाले, शक्तिशाली शरीर वाले आदमियों की तरफ एक अजीब आकर्षण महसूस होता था। उनकी मर्दानगी मुझे अंदर तक छू जाती थी।
मैं वहीं खड़ा रह गया। थोड़ी देर बाद उनमें से एक ने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में एक क्रूर मुस्कान थी। उसने सिर हिलाकर इशारा किया कि अंदर आ जा। मैं घबरा गया। बाहर निकल आया। लेकिन बाहर भी कई आदमी घूम रहे थे। रात के अँधेरे में उनकी आँखें चमक रही थीं। सब एक-एक करके अंदर जा रहे थे और निकल रहे थे। मैं समझ गया कि यह जगह सिर्फ पेशाब के लिए नहीं थी।
तभी एक लंबा आदमी आया। कद करीब 6 फीट 2 इंच। उम्र लगbhag 58 साल। शरीर लोहे जैसा तगड़ा। चौड़ी छाती, मोटी गर्दन, और बड़ी-बड़ी घनी काली मूँछें जो उसके चेहरे को और भी भयानक बना रही थीं। उसने गहरे रंग का ऊनी कोट पहना था और नीचे सफेद धोती। आँखों पर मोटा चश्मा। वह सीधे टॉयलेट के अंदर घुस गया। मैं बिना सोचे-समझे उसके पीछे चला गया।
वह पेशाब करने लगा। मैं उसके बगल में खड़ा हो गया। अपना लंड निकाला। उसकी नजर मेरे लंड पर पड़ी। वह हँसा। उसकी हँसी में एक जंगलीपन था। मैंने उसकी तरफ देखा तो मेरी साँस अटक गई। उसका लंड मेरे से काफी बड़ा और मोटा था। गाढ़ा, नसें फूली हुई, और सिर काला-काला चमक रहा था। वह पेशाब खत्म करके बाहर निकला। मैं भी पीछे-पीछे चला गया। बाहर हम दोनों एक-दूसरे को घूरने लगे। उसकी आँखें मेरे शरीर को नंगा कर रही थीं। वह अपने धोती के ऊपर से लंड सहलाने लगा। काफी देर तक यही खेल चलता रहा। फिर वह पास आया।
उसकी आवाज भारी और हुक्म वाली थी। “कहाँ का है रे?”
मैंने कहा, “नोखा।”
“मैं बाड़मेर का हूँ। नाम है भैरव सिंह। सरपंच हूँ गाँव का।”
उसकी उम्र 58 थी लेकिन शरीर 40 का लग रहा था। वह बोला, “इतनी रात को नोखा कैसे जाएगा? मेरे साथ चल। पास ही एक पुराना लॉज है। रूम ले रखा है।”
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कहते हुए उसने धोती के अंदर हाथ डालकर अपना मोटा लंड बाहर निकाल लिया और मेरे सामने हिलाने लगा। मैंने हामी भर दी। वह मेरा हाथ कसकर पकड़कर खींचने लगा। मैं उसके साथ चल पड़ा।
लॉज पहुँचे। कमरा छोटा था, दीवारें गंदी, बिस्तर पर पुराना कम्बल। जैसे ही दरवाजा बंद हुआ, भैरव सिंह ने मुझे दीवार से सटा दिया। उसकी साँस मेरे चेहरे पर पड़ रही थी। उसने बिना पूछे मेरे होंठों को अपने मोटे होठों में दबा लिया। जीभ जोर से मेरे मुँह में घुसा दी। मैं काँप रहा था। वह हँसते हुए बोला, “पहली बार है ना? डर मत। आज तेरी गांड फाड़ दूँगा।”
उसने मेरी टी-शर्ट फाड़कर उतार दी। छाती के निप्पल्स को दाँतों से काटने लगा। दर्द हुआ तो मैं कराह उठा। वह और जोर से काटने लगा। फिर अपना कोट और धोती उतारी। उसकी छाती सफेद बालों से भरी हुई थी। पेट पर भी बाल। और नीचे… उसका लंड अब पूरा खड़ा हो चुका था। लंबाई करीब 9 इंच और मोटाई इतनी कि मुट्ठी में पूरा नहीं आ रहा था। नसें फूली हुई, सिर चमकदार। उसने मेरा हाथ पकड़कर उस पर रख दिया। “पकड़। कसकर।”
मैंने पकड़ा। वह बोला, “चूस।” मैंने मुँह खोला। जैसे ही उसका मोटा सिर मेरे मुँह में घुसा, मेरी आँखों में आँसू आ गए। बहुत मोटा था। वह मेरे बाल पकड़कर जोर से अंदर धकेलने लगा। गले तक। मैंने उल्टी जैसी आवाज निकाली तो उसने और जोर से पकड़ लिया। “सह ले साले। आज से तेरी गांड मेरी है।” वह मेरे मुँह में जोर-जोर से धक्के मारने लगा। लार बह रही थी। आँखों से आँसू। वह हँस रहा था।
फिर उसने मुझे बिस्तर पर धकेल दिया। मेरे पजामे और चड्डी फाड़कर उतार दी। मेरी गांड नंगी हो गई। उसने दोनों टाँगें फैला दीं और अपनी मोटी जीभ से मेरे छेद पर हमला बोल दिया। जीभ अंदर घुसा दी। मैं तड़प उठा। वह चाटता रहा, काटता रहा, थूक लगाता रहा। फिर बैग से एक बड़ी डिब्बी निकाली। उसमें चिकना तेल था। पूरे छेद पर लगा दिया। अपनी उँगलियाँ एक-एक करके अंदर घुसाने लगा। पहले एक, फिर दो, फिर तीन। दर्द से मेरी चीख निकल गई। उसने मुँह दबा दिया। “चुप रह। नहीं तो और फाड़ दूँगा।”
जब चार उँगलियाँ अंदर घुस चुकीं तब उसने अपना 9 इंच का मोटा लंड मेरे छेद पर सेट किया। धीरे से नहीं। एक जोरदार झटके में आधा अंदर घुसेड़ दिया। मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया। दर्द ऐसा कि साँस रुक गई। शरीर अकड़ गया। आँसू बहने लगे। वह रुका नहीं। दूसरा झटका। पूरा लंड अंदर समा गया। मैं चीखने लगा लेकिन उसकी हथेली मेरे मुँह पर थी। वह हिलने लगा। पहले धीरे, फिर जोर से। थप-थप की आवाज पूरे कमरे में गूँजने लगी।
“तेरी गांड कितनी टाइट है साले। पहली बार है ना? आज फाड़ के रख दूँगा।” वह और तेज धक्के मारने लगा। मेरी गांड की खाल अंदर-बाहर हो रही थी। दर्द के साथ अजीब सी गर्मी भी पैदा हो रही थी। वह मेरे बाल पकड़कर सिर पीछे खींचता और जोर-जोर से चोदता। कभी रुककर पूरा बाहर निकालता और फिर एक झटके में पूरा अंदर पेल देता। हर बार मेरी चीख निकलती। वह हँसता।
एक घंटे तक वह मुझे घोड़ी बनाकर चोदता रहा। मेरी गांड से खून की हल्की धार बह निकली। वह बोला, “देख, खून निकल रहा है। अच्छी बात है। और ढीली हो जाएगी।” फिर उसने मुझे करवट पर लिटाया। एक टाँग ऊपर उठाकर और जोर से पेलने लगा। दूसरे हाथ से मेरे लंड को कसकर हिला रहा था। दर्द और मजे का मिश्रण मुझे पागल कर रहा था।
वह तीन बार मुझमें झड़ चुका था। हर बार पूरा वीर्य मेरी गांड के अंदर छोड़ता। गर्म-गर्म। फिर भी उसका लंड नहीं गिरता था। वह थोड़ा आराम करके फिर शुरू हो जाता। बीच-बीच में मुझे चाँटा मारता, निप्पल काटता, गर्दन पर दाँत गड़ाता। “तू मेरी रंडी है आज से। जब बुलाऊँगा तब आना। नहीं तो गाँव में सबको बता दूँगा।”
रात भर यही सिलसिला चला। सुबह चार बजे जब वह थककर सोया तो मेरी गांड जल रही थी, सूज गई थी। चलने में दर्द हो रहा था। लेकिन अंदर कहीं एक भूख जाग चुकी थी। वह क्रूरता, वह दर्द, वह मोटा लंड… सब मुझे फिर चाहिए था।
उसके बाद मैं कई बार बाड़मेर गया। हर बार भैरव सिंह मुझे उसी पुराने लॉज में ले जाता। कभी रस्सी से बाँधकर चोदता, कभी चाबुक जैसा पतला डंडा लेकर गांड पर मारता, कभी कई लोगों को बुलाकर मेरी गांड सबको इस्तेमाल करने देता। हर बार ज्यादा क्रूर, ज्यादा बर्बर। मेरी गांड अब उसकी हो चुकी थी। फटी हुई, ढीली, लेकिन हमेशा उसके मोटे लंड की भूखी।
आज भी जब सर्दी पड़ती है तो वह पुराना लॉज और भैरव सिंह की मूँछें याद आ जाती हैं। वह रात जब पहली बार मेरी कुंवारी गांड फाड़ी गई थी। दर्द के साथ जो मजा मिला था, वह जिंदगी भर नहीं भूला।
भैरव सिंह के साथ वह पहली रात खत्म हुई तो लगा जैसे मेरी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। सुबह जब मैं लॉज से निकला तो गांड में इतना दर्द था कि सीधा खड़ा होना मुश्किल हो रहा था। हर कदम पर जलन होती। लेकिन अंदर कहीं एक अजीब सी भूख जाग चुकी थी। वह मोटा लंड, वह क्रूर धक्के, वह खून और वीर्य का मिश्रण… सब याद आकर शरीर को फिर से गरम कर देते।
तीन दिन बाद ही भैरव सिंह का फोन आया। आवाज वैसी ही हुक्म वाली। “नोखा से निकल। बाड़मेर आ। आज रात लॉज में। देर की तो गांड में लोहे की रॉड घुसेड़ दूँगा।” मैं बिना सोचे भाग निकला। बस पकड़ी और रात होते-होते बाड़मेर पहुँच गया। लॉज का वही पुराना कमरा। दरवाजा खुलते ही भैरव सिंह खड़ा था। इस बार उसके साथ दो और आदमी थे। एक उम्र करीब 50 का, नाम हरपाल, शरीर काला और हट्टा-कट्टा। दूसरा जवान लेकिन तगड़ा, नाम रूपा राम, उम्र 35। तीनों की आँखों में वही जंगली भूख।
भैरव सिंह ने दरवाजा बंद करते हुए कहा, “आज तेरी गांड तीनों की है। अगर चीखा तो मुँह में कपड़ा ठूंस दूँगा।” उसने मेरी गर्दन पकड़कर दीवार से सटा दिया। बाकी दोनों ने मेरे कपड़े फाड़कर उतार दिए। नंगा होते ही हरपाल ने मेरे निप्पल्स को दाँतों से जकड़ लिया। रूपा राम ने नीचे झुककर मेरे लंड को मुँह में ले लिया और जोर-जोर से चूसने लगा। भैरव सिंह ने अपना 9 इंच का मोटा लंड मेरे मुँह के सामने लाया। “खोल साले।” मैंने मुँह खोला तो उसने पूरा गले तक पेल दिया। साँस रुक गई। आँखों में आँसू आ गए। वह बाल पकड़कर जोर-जोर से धक्के मारने लगा। गले से अजीब आवाजें निकल रही थीं। लार बहकर छाती पर गिर रही थी।
थोड़ी देर बाद भैरव सिंह ने मुझे बिस्तर पर धकेल दिया। घोड़ी बना दिया। हरपाल ने मेरे हाथ पीछे बाँध दिए। मोटी रस्सी से इतने कसकर कि कलाई कटने लगी। रूपा राम ने मेरे मुँह में कपड़ा ठूंस दिया। फिर भैरव सिंह ने बैग से एक लंबी चमड़े की पट्टी निकाली। “आज सिर्फ चोदना नहीं। सजा भी मिलेगी।” पहली चोट गांड पर पड़ी तो मैं तड़प उठा। दर्द बिजली जैसा दौड़ा। दूसरी, तीसरी… लगातार दस चोटें। गांड लाल हो गई, सूजन आ गई। हर चोट पर मेरी चीख कपड़े में दब जाती। भैरव सिंह हँस रहा था। “तेरी गांड अब और सुंदर लग रही है।
फिर तेल निकाला। इस बार सिर्फ तेल नहीं। एक मोटी लोहे जैसी रॉड भी थी, सिर गोल और चिकना। भैरव सिंह ने पहले अपनी तीन उँगलियाँ अंदर घुसाईं, फिर चार। जब छेद थोड़ा खुला तो रॉड अंदर धकेल दी। ठंडी धातु अंदर जाते ही मेरा शरीर अकड़ गया। वह रॉड को अंदर-बाहर करने लगा। हर बार गहरा। दर्द इतना कि आँखों के आगे अंधेरा छा गया। तभी उसने रॉड निकालकर अपना मोटा लंड सेट किया और एक झटके में पूरा पेल दिया। खून की धार फिर बह निकली। वह रुकने वाला नहीं था। जोर-जोर से धक्के। थप-थप की आवाज कमरे में गूँज रही थी। हरपाल ने मेरे बाल पकड़कर सिर ऊपर उठाया और अपना लंड मुँह में ठूंस दिया। रूपा राम नीचे से मेरे लंड को कसकर हिला रहा था और कभी-कभी दाँतों से काट भी लेता।
भैरव सिंह ने पहली बार झड़ते हुए पूरा वीर्य अंदर छोड़ दिया। फिर निकला और हरपाल ने जगह ले ली। हरपाल का लंड थोड़ा छोटा लेकिन बहुत मोटा था। उसने बिना रुकें पेलना शुरू कर दिया। मेरी गांड अब पूरी तरह फट चुकी थी। दर्द के साथ अजीब सी गर्मी फैल रही थी। रूपा राम ने भी अपना लंड मेरे मुँह में ठूंस रखा था। तीनों बारी-बारी से इस्तेमाल कर रहे थे। कभी दो एक साथ। एक गांड में, एक मुँह में। कभी दोनों गांड के छेद को फैलाकर दो लंड एक साथ अंदर घुसाने की कोशिश। दर्द ऐसा कि होश लगभग उड़ गए।
रात के दो बज चुके थे। मेरी गांड से खून और वीर्य का मिश्रण बह रहा था। शरीर पर चाँटे और चोटों के निशान। भैरव सिंह ने रस्सी खोली तो हाथ सुन्न पड़ चुके थे। उसने मुझे करवट पर लिटाया और फिर से अपना लंड अंदर पेल दिया। इस बार धीरे। लेकिन हर धक्के के साथ बोल रहा था, “तू मेरी रंडी है। जब चाहूँ बुलाऊँगा। इनकार किया तो गाँव के सब सरपंचों को बुलाकर तेरी गांड सबको दूँगा। समझा?” मैं सिर्फ हामी भर सका। बोलने की ताकत नहीं बची थी।
सुबह तक तीनों ने मुझमें कुल सात बार झड़ा। हर बार अंदर। आखिर में भैरव सिंह ने मुझे बाथरूम में घसीटा। ठंडे पानी से धोया। गांड पर दवा जैसी कोई चीज लगाई। फिर बोला, “अब जा। लेकिन याद रखना… अगली बार और कड़ी सजा मिलेगी।”
मैं नोखा लौटा तो हफ्ते भर चल नहीं पाया। गांड की सूजन इतनी थी कि बैठना मुश्किल। लेकिन रात को नींद में वही दृश्य आते। रस्सी, चाबुक, मोटे लंड, खून… और शरीर फिर से मांगने लगता। दस दिन बाद फोन आया। “आजा। आज अकेले नहीं। पूरे गाँव के चार आदमी और हैं।”
मैं गया। इस बार लॉज नहीं। भैरव सिंह के गाँव के एक सुनसान कच्चे मकान में। अँधेरा कमरा। चारों तरफ से घिरा हुआ। जैसे ही दाखिल हुआ, रस्सी से बाँध दिया गया। हाथ ऊपर, टाँगें फैली हुई। नंगा। भैरव सिंह ने शुरूआत की। पहले चाबुक। गांड, जांघें, पीठ… सब लाल। फिर एक-एक करके चारों ने चोदा। कोई धीरे नहीं। सब बर्बर। एक ने तो गांड में लंड डाले रखने के दौरान मेरे मुँह में पेशाब तक कर दी। दूसरा वीर्य छोड़ने के बाद थूककर बोला, “अब यह छेद सबका है।”
रात भर यह सिलसिला चला। कभी रॉड, कभी मोटी मोमबत्ती, कभी सिर्फ मुट्ठी। मेरी गांड अब पहचानने लायक नहीं रही। फटी हुई, सूजी हुई, खून और वीर्य से सनी। लेकिन सबसे भयानक बात यह थी कि दर्द के बीच मुझे मजा भी आने लगा था। जब कोई जोर से पेलता तो शरीर खुद ही गांड आगे कर देता। भैरव सिंह यह देखकर हँसता, “देखो साले को मजा आ रहा है। और फाड़ो।”
सुबह जब रस्सी खोली गई तो मैं गिर पड़ा। चल नहीं सकता था। भैरव सिंह ने खुद उठाया और अपने घर ले गया। दो दिन वहीं रखा। रोज दो-तीन बार चोदा। कभी अकेले, कभी किसी को बुलाकर। मेरे शरीर पर उसके दाँतों और चाबुक के निशान स्थायी होते जा रहे थे। वह रोज कहता, “तू अब वापस नोखा का नहीं। तू मेरी संपत्ति है। जब तक चाहूँ तब तक रखूँगा।”
तीसरे दिन उसने मुझे बस स्टैंड छोड़ा। पैसे दिए और बोला, “अगली बार फोन आए तो तुरंत आना। नहीं तो खुद नोखा आकर तेरे घर से खींच लाऊँगा।”
मैं नोखा लौटा। लेकिन अब वह पुरानी जिंदगी नहीं रही। हर रात सपने में वही कमरा, वही रस्सियाँ, वही मोटे लंड। शरीर मांगता रहा। और मैं जानता था… अगला फोन जल्द आएगा। और तब और कड़ी, और बर्बर रात होगी।
सर्दी अभी बाकी थी। और मेरी गांड अब हमेशा के लिए भैरव सिंह की हो चुकी थी। फटी हुई, इस्तेमाल की हुई, लेकिन उसकी क्रूरता की भूखी कामवासना ।
कामवासना :-
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