अकेली पड़ोस की आग

एक अकेली औरत की छुपी भूख ने पड़ोसी जवान को पागल बना दिया। रातें चीखों, निशानों और बेकाबू चाहत से भर गईं। जब वह लौटी तो सीमाएँ मिट चुकी थीं padosan chudai story ।

मेरा नाम रोहन शर्मा है। उम्र पच्चीस साल। मैं पुणे के एक छोटे से इलाके में रहता था, जहाँ ज्यादातर किरायेदार परिवार रहते थे। मैं एक प्राइवेट कंपनी में जूनियर अकाउंटेंट की नौकरी करता था। सुबह ऑफिस जाता, शाम को वापस। मेरे पिता पहले ही चले गए थे और माँ गाँव में रहती थीं, इसलिए फ्लैट में अकेला ही रहता था।

ठीक मेरे फ्लैट के बगल वाले किराये के मकान में एक नया कपल आया। पति का नाम राजेश मेहता, उम्र पैंतीस, और पत्नी मीरा, उम्र उनतीस। राजेश किसी ट्रेडिंग फर्म में मैनेजर थे और हफ्ते में चार-पाँच दिन बाहर ही रहते थे। मीरा घर संभालती थीं। उनका कोई बच्चा नहीं था। मीरा का शरीर ऐसा था कि पहली नज़र में ही दिमाग घूम जाए—स्तन छत्तीस साइज के भारी और गोल, कमर छब्बीस, कूल्हे अड़तीस। गोरी चमकदार त्वचा, लंबे काले बाल, और आँखें जो सीधे अंदर तक उतर जातीं।

मैंने शुरू में सिर्फ नमस्ते कहा और अपना काम किया। लेकिन एक शाम जब मैं छत पर कपड़े सुखाने गया तो देखा—मीरा नहाकर निकली थीं। काली साड़ी और स्लीवलेस ब्लाउज में शरीर चमक रहा था। गीले बाल कंधों पर बिखरे हुए। पानी की बूंदें गर्दन से नीचे स्तनों की दरार में समा रही थीं। मैं ठहर गया। उन्होंने मुड़कर देखा। मैंने तुरंत नज़र फेर ली, लेकिन उनके होठों पर हल्की मुस्कान थी।

अगले कुछ दिनों में मैंने देखा कि वे छत पर अंडरवियर भी सुखाती थीं—पारदर्शी ब्रा और लेस वाली पैंटी। एक दिन मौका देखकर मैंने एक क्रीम रंग की पैंटी उठा ली, जेब में दबाई और कमरे में ले जाकर सूँघी। उसमें उनकी खुशबू थी—मीठा साबुन और हल्का पसीना। मैंने उसे अपने मुँह पर रखा, लंड बाहर निकाला और उसके ऊपर रगड़ते हुए झड़ गया। पैंटी छिपा ली।

मीरा शायद सब समझ रही थीं। एक दोपहर उन्होंने दरवाजा खटखटाया। “रोहन, थोड़ा सामान लाना है मार्केट से। साथ चलोगे?” आवाज में कोई झिझक नहीं थी। मैं चला गया। दुकान में उन्होंने ब्रा-पैंटी और नाइटी सेक्शन में घुसा दिया। “अंदर आओ। पसंद करो मेरे लिए।” मैंने एक काली जालीदार सेट चुनी—स्तन लगभग पूरे दिखने वाले और पैंटी इतनी पतली कि बाल भी छिप न सकें। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “साइज सही रहेगी न?” मैंने जवाब दिया, “अगर नहीं रही तो मैं खुद फिट करूँगा।” उन्होंने गुलाबी पारदर्शी नाइटी भी ली।

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घर वापस आकर उन्होंने पूछा, “दुकान में तुम्हारा लंड खड़ा हो गया था न?” मैं चुप रहा। वे हँसीं, “अंडरवियर देखकर। कोई गर्लफ्रेंड नहीं है क्या?” मैंने कहा, “अब तक कोई ऐसी नहीं मिली जो तुम्हारे जैसी हो—इतनी सेक्सी, इतनी बोल्ड।” उन्होंने शर्माते हुए नहीं, बल्कि सीधे आँखों में देखकर कहा, “सिर में दर्द हो रहा है। मालिश कर दोगे?”

बेडरूम में लेटते ही मेरा लंड पूरी तरह तन चुका था। उन्होंने नोटिस किया लेकिन कुछ नहीं कहा। मैंने सरसों का तेल लिया। नाइटी ऊपर की, जांघों तक। वे आहें भरने लगीं। “पूरा उतार दूँ?” उन्होंने एक पल सोचा फिर कहा, “किसी को पता न चले। सिर्फ हम दोनों के बीच।” मैंने नाइटी पूरी उतार दी। वे उसी काली जालीदार ब्रा-पैंटी में थीं। मैंने ब्रा के हुक खोले। छत्तीस साइज के भारी स्तन बाहर निकल आए—गुलाबी निप्पल तने हुए। मैंने दोनों हाथों से दबाया, मुँह में लिया, जोर से चूसा। वे काँप उठीं। “सॉरी—” “मत बोल। और जोर से कर।”

मैंने पैंटी फाड़ दी। उनकी चुत पहले से गीली थी, बाल छोटे कटे हुए। मैंने जीभ घुसाई, चिटोरी को दाँतों से हल्का काटा। वे चीखीं। “आज तक किसी ने नहीं चाटा… राजेश तो बस घुसेड़ देता है और सो जाता है।” मैंने अपना पूरा निचला हिस्सा उतार दिया। मेरा सात इंच का मोटा लंड उनके चेहरे के सामने था। उन्होंने पहले हिचकिचाया फिर मुँह में ले लिया। दाँत लग गए। मैंने उनके बाल पकड़कर सिर आगे धकेला। “सीख। पोर्न की तरह।” मैंने फोन पर वीडियो चलाया। वे देख-देखकर गहरी लेती रहीं, गला भरकर। लार टपक रही थी। मैंने उन्हें ’69’ में लिटाया—उनकी चुत मेरे मुँह पर, मेरा लंड उनके गले में। दोनों एक-दूसरे को चाटते, चूसते रहे। जब वे काँपने लगीं तो मैंने रोका।

“अब डाल।” उन्होंने कहा। मैंने लंड उनकी चुत पर रगड़ा, फिर एक झटके में पूरा अंदर धकेल दिया। वे चिल्लाईं। मैंने मुँह उनके मुँह पर रख दिया ताकि आवाज न निकले। जोर-जोर से धक्के मारे—तेज, गहरा, बिना रुकें। उनके स्तन मेरे हाथों में दब रहे थे, निप्पल को मैंने नोच लिया। वे दो बार झड़ गईं। मैंने अंदर ही अपना वीर्य छोड़ दिया। थोड़ी देर आराम किया फिर उन्हें पलट दिया—कुत्ते की तरह। कूल्हे पकड़े, बाल खींचे, और पीछे से फिर घुसा दिया। इस बार और जोर से। हर धक्के के साथ उनकी चुत की आवाज कमरे में गूँज रही थी।

मैंने एक हाथ उनके गले पर रखा, हल्का दबाया। वे हाँफने लगीं लेकिन पीछे धकेल रही थीं। “और… और जोर से… मार मुझे।” मैंने उनकी गांड पर थप्पड़ मारे—लाल हो गई। फिर लंड निकालकर गांड के छेद पर रखा। “यहाँ भी?” उन्होंने सिर हिलाया। मैंने थूक लगाया और धीरे-धीरे अंदर धकेला। वे चिल्लाईं लेकिन रुकने को नहीं कहा। पूरा अंदर जाने के बाद मैंने जोर से धक्के मारे। उनके आँसू निकल आए लेकिन वे बार-बार “हाँ… और गहरा” कह रही थीं। मैंने गांड में ही झड़ गया।

शाम होने वाली थी। वे किचन गईं चाय बनाने—नंगी। मैंने पीछे से पकड़ा, एक टाँग प्लेटफॉर्म पर रखी और फिर से चुत में घुसा दिया। वे चाय बनाते-बनाते धक्के खा रही थीं। पानी उबल रहा था, हम दोनों भी। आखिरी राउंड बेड पर हुआ। वे ऊपर बैठ गईं, कूद-कूदकर चुदवाईं। मैंने उनके स्तन पकड़कर खींचे, निप्पल काटे। कमरा सिसकारियों और मांस की आवाजों से भर गया। जब आखिर में दोनों थककर गिरे तो घड़ी में छः बज रहे थे।

मीरा ने कहा, “ऐसी चुदाई पहले कभी नहीं हुई। राजेश को कुछ पता नहीं चलना चाहिए। तू जब चाहे आ जा। मैं तेरी रांड बन गई हूँ।” मैंने उन्हें प्यार से नहीं, बल्कि बाल पकड़कर किस किया—जीभ गले तक उतारी। फिर चुपके से अपने फ्लैट में चला गया।
उसके बाद का सिलसिला सिर्फ चुदाई नहीं रहा। हर बार राजेश के बाहर रहने पर मैं उनके फ्लैट में घुस जाता। कभी उन्हें हाथ-पैर बाँधकर बिस्तर से बाँध देता, आँखों पर कपड़ा बाँधता, और घंटों तक इस्तेमाल करता। कभी चाबुक की जगह बेल्ट से गांड और जांघों पर

मारता जब तक लाल न हो जाएँ। कभी गला दबाकर चुत में उंगली घुमाते हुए पूछता, “कौन सी रांड है तू?” वे जवाब देतीं, “तेरी… सिर्फ तेरी।” कभी मैं उन्हें छत पर ले जाता रात में, जहाँ हवा में उनके नंगे शरीर को चूमता, चाटता और खड़े-खड़े चुदाई करता। एक बार मैंने उनकी दोनों पैंटी और ब्रा चुराकर अपने पास रख लीं और अगली मुलाकात में उन्हें उन्हीं में बाँधकर चोदा।
मीरा दिन-ब-दिन और बोल्ड होती गईं। कभी वे खुद मेरे फ्लैट आतीं, नाइटी के नीचे कुछ नहीं पहनतीं, और दरवाजा बंद होते ही घुटनों के बल बैठ जातीं। “आज अपना लंड मेरे गले में पूरा डाल। दम घुटने तक।” मैं डालता। उनकी आँखों में पानी आ जाता, लेकिन वे रुकने नहीं देतीं। कभी वे मुझे कुर्सी पर बैठाकर खुद ऊपर चढ़तीं, स्तन मेरे मुँह में ठूँसतीं और कहतीं, “काट… खून निकल आए तब तक।” मैं काटता। निप्पल पर दाँत के निशान पड़ जाते। वे चीखतीं फिर और जोर से कूदतीं।

एक रात राजेश अचानक लौट आए। हम दोनों नंगे बेड पर थे। मीरा ने जल्दी से मुझे अलमारी में छिपाया। राजेश थके हुए थे, नहाकर सो गए। मीरा अलमारी का दरवाजा थोड़ा खोलीं, मुँह अंदर किया और मेरे लंड को चुपके से चूसने लगीं जबकि उनके पति तीन फुट दूर सो रहे थे। मैंने उनके बाल पकड़कर सिर और अंदर धकेला। वे गला भरकर ले रहीं थीं बिना आवाज किए। जब मैं झड़ने वाला था तो उन्होंने मुँह खोलकर पूरा वीर्य निगल लिया। फिर दरवाजा बंद कर दिया। सुबह राजेश ऑफिस चले गए तो हमने पूरे दिन बिना रुके चुदाई की—हर पोजीशन में, हर कोने में। किचन काउंटर पर, सोफे पर, फर्श पर। मैंने उनके कलाई बाँधकर खींचा, गांड में उंगलियाँ घुमाईं, चुत में मुट्ठी तक डालने की कोशिश की। वे रोईं, गाली दीं, फिर माँगीं और फिर से झड़ गईं।

महीनों तक यह सिलसिला चला। मीरा अब सिर्फ शरीर नहीं दे रही थीं—वे अपना पूरा नियंत्रण सौंप चुकी थीं। मैं जब चाहता, उन्हें किसी भी हालत में इस्तेमाल करता। कभी इतनी जोर से कि उनके शरीर पर नीले निशान पड़ जाते, कभी इतनी देर तक कि वे बेहोश होने के करीब पहुँच जातीं। फिर भी अगली बार वे खुद बुलातीं। “आज और क्रूर बन। मुझे तोड़ दे।”

एक दिन राजेश का ट्रांसफर हो गया। वे चले गए। जाने से पहले आखिरी रात मीरा मेरे फ्लैट में आईं। पूरी रात हमने कोई सीमा नहीं रखी। सुबह जब वे जा रही थीं तो दरवाजे पर खड़ी होकर बोलीं, “जो कुछ भी हुआ… वो सिर्फ हम दोनों का है। कोई और कभी नहीं जान पाएगा।” मैंने कुछ नहीं कहा। बस उनके बाल पकड़कर एक आखिरी rough किस किया।

मीरा चली गईं। राजेश का ट्रांसफर मुंबई हो गया था। फ्लैट खाली हो गया। दीवार के उस पार अब कोई अजनबी रहता था। लेकिन रोहन के कमरे में वह क्रीम रंग की पैंटी अब भी छिपी थी। हर रात वह उसे निकालता, नाक पर रखता, और यादों में डूब जाता। शरीर में वही आग जलती रहती।
तीन महीने बाद एक रात फोन बजा। अनजान नंबर। “रोहन… मैं हूँ।” आवाज मीरा की थी। धीमी, थकी हुई, लेकिन वही पुरानी भूख भरी। “राजेश दो हफ्ते के लिए विदेश गया है। मैं पुणे आई हूँ… अकेली। पुराने फ्लैट में नहीं, पास के एक होटल में। नंबर भेज रही हूँ। आ जा।”

रोहन ने कुछ नहीं पूछा। बस उठा और निकल पड़ा। होटल का कमरा तीसरी मंजिल पर था। दरवाजा खोला तो मीरा नंगी खड़ी थी। शरीर पहले से भी ज्यादा गदराया हुआ। स्तन भारी, निप्पल काले पड़ चुके, जांघों के अंदरूनी हिस्से पर पुराने नीले निशान अभी भी हल्के दिख रहे थे। उसने दरवाजा बंद होते ही घुटनों के बल बैठ गई।

“आज कोई नाइटी नहीं, कोई शर्त नहीं। तू जो चाहे कर। मुझे तोड़ दे पूरी तरह।”
रोहन ने उसके बाल मुट्ठी में भर लिए और खींचकर खड़ा किया। मुँह उसके मुँह पर पटक दिया—दांतों से होंठ काटे, जीभ गले तक उतारी। मीरा की सांस उखड़ गई। उसने उसके दोनों हाथ पीछे किए और बेल्ट से कसकर बाँध दिए। फिर आँखों पर काला कपड़ा बाँधा। “अब तू कुछ नहीं देखेगी। सिर्फ महसूस करेगी।”

उसने मीरा को बिस्तर पर धकेल दिया। पेट के बल लिटाया। गांड ऊपर। बेल्ट निकाली और पहली चोट लगाई। छटाक! मीरा चीखी। दूसरी, तीसरी—जब तक दोनों गांड के गोल हिस्से लाल और सूज न गए। हर चोट के साथ वह काँपती, लेकिन कूल्हे पीछे धकेलती रही। “और मार… और जोर से!” रोहन ने बेल्ट फेंक दी। हाथ से थप्पड़ मारे—इतने जोर से कि उंगलियों के निशान पड़ गए। फिर दो उंगलियाँ चुत में घुसा दीं। अंदर पहले से ही पानी भरा था। उसने उंगलियाँ मोड़कर ऊपर की दीवार को जोर से रगड़ा। मीरा का शरीर ऐंठ गया। “अब मुट्ठी…” उसने चार उंगलियाँ इकट्ठी कीं और धीरे-धीरे अंदर धकेलने लगा। मीरा चिल्लाई, आँसू बह निकले, लेकिन “रुक” नहीं कहा। मुट्ठी आधी अंदर चली गई। रोहन ने घुमाया। मीरा का शरीर थरथराने लगा। वह जोर से झड़ गई—पानी बिस्तर पर फैल गया।

रोहन ने उसे पलटा। आँखों का कपड़ा हटाया नहीं। लंड निकालकर उसके मुँह में ठूँस दिया। गले तक। मीरा ने गैग किया, लार बह निकली, लेकिन उसने सिर और आगे धकेला। रोहन ने दोनों हाथों से उसके सिर को पकड़कर जोर-जोर से हिलाया—मुँह सिर्फ एक छेद बन गया था। जब लार और आँसू से चेहरा भीग गया तो उसने लंड निकाला और उसके गालों पर थप्पड़ मारे। “कौन सी रांड है तू?” “तेरी… सिर्फ तेरी… सड़क की रांड!”

उसने मीरा की टाँगें उसके कंधों पर चढ़ा दीं। लंड चुत पर रखा और एक ही झटके में पूरा अंदर धकेल दिया। इतना जोर कि मीरा की सांस रुक गई। फिर बिना रुकें धक्के शुरू किए—तेज, गहरा, क्रूर। हर धक्के के साथ बिस्तर की खाट दीवार से टकरा रही थी। उसने एक हाथ उसके गले पर रखा और दबाया। मीरा की आँखें फटी की फटी रह गईं, चेहरा लाल हो गया, लेकिन कूल्हे मिल रहे थे। रोहन ने और जोर से दबाया। मीरा का शरीर काँपने लगा। वह फिर झड़ गई—इस बार इतनी जोर से कि उसकी चुत ने लंड को जकड़ लिया। रोहन रुका नहीं।

उसने लंड निकालकर गांड के छेद पर रखा। थूक भी नहीं लगाया। सीधे धकेला। मीरा चीखी—आवाज कमरे से बाहर तक गई होगी। रोहन ने उसके मुँह पर हाथ रख दिया। पूरा लंड गांड में समा गया। फिर धक्के—इतने जोर के कि मीरा का पूरा शरीर आगे-पीछे हो रहा था। उसके स्तन उछल रहे थे, निप्पल हवा में काँप रहे थे। रोहन ने एक निप्पल पकड़कर नोच लिया। खून की एक पतली लकीर निकली। मीरा रोई, लेकिन “और” कहा।

आधे घंटे तक गांड में चुदाई होती रही। रोहन ने अंदर ही झड़ गया। वीर्य बाहर निकलकर जांघों पर बहने लगा। उसने लंड निकाला और मीरा के मुँह में फिर से डाल दिया। “चाट। अपना मल और मेरा वीर्य दोनों।” मीरा ने जीभ निकाली और चाटा—बिना हिचकिचाहट के।
रात अभी बाकी थी। रोहन ने उसके हाथ खोल दिए लेकिन पैर बिस्तर के दोनों सिरों से बाँध दिए। फिर बर्फ के टुकड़े मंगाए। एक टुकड़ा

उसके निप्पल पर रखा, दूसरा चुत की दरार में। मीरा काँपने लगी। जब निप्पल सख्त हो गए तो उसने उन्हें दाँतों से काटा। खून फिर निकला। उसने बर्फ चुत में धकेल दी और उंगलियों से अंदर घुमाया। मीरा पागल हो रही थी। “अब मुझे मार… चाबुक से… जोर से!” होटल में चाबुक नहीं था। रोहन ने तार का तार निकाला जो सूटकेस के हैंडल से लगा था और उससे उसकी जांघों, गांड और स्तनों पर मारना शुरू किया। लाल लकीरें पड़ गईं। कुछ जगहों पर त्वचा फट गई। मीरा चीख रही थी, गाली दे रही थी, फिर माँग रही थी।

सुबह चार बजे तक सत्र चला। रोहन ने आखिर में उसे कुर्सी पर बैठाया, हाथ पीछे बाँधे, और खड़े होकर उसके मुँह में बार-बार लंड ठूँसा जब तक कि वह बेहोशी की हालत में न पहुँच जाए। फिर उसे बिस्तर पर लिटा दिया। शरीर भर निशान, खून की हल्की लकीरें, वीर्य और पानी से सना हुआ। मीरा की आँखें अभी भी बंद थीं, लेकिन होठों पर मुस्कान थी।

दो दिन और यही सिलसिला चला। हर बार पहले से ज्यादा क्रूर। एक बार रोहन ने उसके दोनों निप्पल में छोटी-छोटी क्लिप लगा दीं और उन्हें धागे से बाँधकर खींचा। मीरा चीखती रही। दूसरी बार उसने उसकी चुत में मोमबत्ती का गर्म मोम गिराया। तीसरी बार उसे बाथरूम में ले जाकर ठंडे पानी की धार में खड़ा किया, फिर गरम पानी, फिर फिर से ठंडा—जब तक उसका शरीर काँपते-काँपते ढेर न हो जाए। फिर उसी हालत में चुदाई की।

तीसरे दिन सुबह मीरा ने कहा, “राजेश कल आ रहा है। मुझे जाना होगा।” रोहन ने उसके बाल पकड़कर खींचा। “जाने से पहले एक आखिरी चीज।” उसने उसे फर्श पर घुटनों के बल बैठाया, लंड निकाला और उसके चेहरे पर झड़ गया—आँखों में, बालों में, मुँह में। फिर बोला, “अब जा। लेकिन याद रखना—तू मेरी रांड है। जब भी मौका मिले, वापस आना। वरना मैं खुद तुझे ढूँढ लूँगा।”
मीरा उठी। शरीर पर निशान छुपाने के लिए ढीले कपड़े पहने। दरवाजे पर खड़ी होकर मुड़ी। आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज साफ थी। “मैं आऊँगी। हर बार और टूटी हुई।”

दरवाजा बंद हुआ। रोहन अकेला रह गया। कमरे में अभी भी उसकी सिसकारियों की गूंज थी। बिस्तर पर खून और वीर्य के धब्बे सूख रहे थे। उसने खिड़की से बाहर देखा। धूप निकल रही थी। लेकिन अंदर वही अंधेरा और वही आग जल रही थी।
कुछ हफ्ते बाद फोन फिर बजा। वही आवाज। “मैं फिर अकेली हूँ… इस बार और दिन। तैयार रह।”
रोहन मुस्कुराया। कहानी खत्म नहीं हुई थी। वह तो अभी और गहरी, और अंधेरी, और क्रूर होने वाली थी। हर मुलाकात के साथ सीमाएँ और दूर जा रही थीं। और दोनों जानते थे—कोई वापस नहीं लौटने वाला था।

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