कमजोर पति की सूखी रातों से तड़पती सुनीता जब गाँव के हट्टे-कट्टे मर्दों के पंजे में फँसी तो उसकी कोख और पिछवाड़े पर इतनी बेरहम मार पड़ी कि खून और वीर्य की नदियाँ बह निकलीं, बेटे तक शामिल हो गए xxx kahania ।
यह कहानी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे, रामनगर की है। वहाँ एक 32 साल का आदमी रहता था जिसका नाम सुरेश यादव था। वह आटा और तेल का छोटा-मोटा व्यापार करता था। उसके पास ज्यादा जमीन-जायदाद नहीं थी, फिर भी उसने एक सुंदर औरत से शादी कर ली थी। उस औरत का नाम सुनीता था। उसकी उम्र शादी के समय 24 साल थी।
सुरेश ने सुनीता की जवानी का भरपूर फायदा उठाया। हर रात उसकी चुत को फाड़-फाड़ कर चोदा। तीन साल में ही तीन बच्चे पैदा हो गए। बड़ा बेटा अजय 28 साल का, दूसरा बेटा विजय 26 साल का और बेटी प्रिया 24 साल की हो गई थी। सुनीता अब 42 साल की हो चुकी थी, लेकिन उसका जिस्म अभी भी जवान माल की तरह तना हुआ था। मोटे-मोटे दूध, चौड़ी गांड, और फूली हुई मोटी चुत जो देखकर किसी का भी लंड खड़ा हो जाए।
सुरेश दिन-रात मेहनत और चुदाई के कारण कमजोर पड़ गया था। उसका लंड अब पहले जैसा सख्त नहीं रहता था। दो-तीन धक्कों में ही झड़ जाता। सुनीता की चुत हर रात प्यासी रह जाती। घर का खर्च भी बढ़ गया था। स्कूल की फीस, दवाइयाँ, कपड़े… सब कुछ महंगा हो गया था। सुरेश का व्यापार भी ढलान पर था।
आखिरकार सुरेश ने घर के सामने ही एक छोटी दुकान खोल दी। खुद सुबह-सुबह फेरी लगाने निकल जाता। बच्चे स्कूल जाते। दुकान सुनीता संभालती। दोपहर बाद बच्चे आकर दुकान देख लेते।
दुकान खुलते ही मोहल्ले के अमीर जाट और गुर्जर युवक आने लगे। वे सुनीता से अश्लील मजाक करने लगे।
“भाभी, आज रात सुरेश भईया ने कितनी देर चोदा?”
“भाभी की गांड तो देखो… लगती है रोज दो-दो लंड लेती होगी।”
सुनीता पहले गुस्सा करती, फिर धीरे-धीरे इन बातों में रस आने लगा। उसकी प्यासी चुत को ये बातें और भड़कातीं।
एक दिन 48 साल का जाट, जिसका नाम हरपाल सिंह था, दुकान पर आया। वह लंबे कद का, चौड़े सीने वाला, हट्टा-कट्टा मर्द था। उसके लंड की शोहरत पूरे कस्बे में थी। लोग कहते थे कि हरपाल का लंड 9 इंच मोटा और लंबा है, और वह औरतों को बेहोश कर देता है।
हरपाल ने सुनीता को घूरते हुए कहा, “ललानी, तेरी चुत में अब सुरेश का सूखा लंड क्या करेगा? मेरे जैसे मर्द की जरूरत है।”
सुनीता गुस्से में बोली, “चाचा, हद कर दी! सामान लो और निकलो।”
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हरपाल हँसा, “चाचा मत बोल। मेरी बीवी आज भी रात भर मेरे लंड पर चढ़कर रोती रहती है। तेरी गाड़ी चलाने के लिए मेरे जैसे इंजन की जरूरत है।”
सुनीता झुककर ताला लगाने लगी। हरपाल ने मौका देखा और पीछे से उसकी गांड पर जोर से थप्पड़ मारा। फिर दोनों हाथों से उसकी गांड को मसलने लगा।
सुनीता चीखी, “छोड़ो… छोड़ो मुझे!”
हरपाल ने उसकी कमर पकड़कर अपने से सटा लिया। उसके लुंगी में खड़ा मोटा लंड सुनीता की गांड में धंस गया। “महसूस कर… ये है असली मर्द का हथियार। तेरा मरियल पति इसे सपने में भी नहीं दे सकता।”
सुनीता ने जोर लगाकर खुद को छुड़ाया और घर के अंदर भाग गई। दरवाजा बंद करके रोने लगी, लेकिन उसके मन में हरपाल का मोटा लंड घूम रहा था। रात को उसने सुरेश से चुदाई की जिद की। सुरेश थककर बोला, “बच्चे जवान हो गए हैं… अब ये सब बंद कर।” सुरेश का लंड दो मिनट में ही ढीला पड़ गया। सुनीता प्यासी रह गई।
अगले दिनों दूधवाला आया। उसका नाम रहीम था। उम्र 35 साल। दुबला-पतला लेकिन आँखों में हवस भरी हुई। वह रोज दूध देते समय सुनीता की छातियों को घूरता।
एक दिन सुनीता ने कहा, “रहीम, दूध का हिसाब लगाओ।”
रहीम मुस्कुराया, “ललानी, पैसों की बात छोड़ो। बच्चों को दो लीटर दूध पिलाओ। मैं मुफ्त दूँगा… बस एक शर्त पर।”
सुनीता ने पूछा, “क्या शर्त?”
रहीम ने चारों तरफ देखा और धीरे से कहा, “रात को जब सब सो जाएँ… तो मेरा दूध भी पी लेना। वो वाला दूध जो सिर्फ तेरे लिए निकलेगा।”
सुनीता की चुत में गर्मी दौड़ गई। उसने कुछ नहीं कहा।
अगले दिन रहीम जल्दी आ गया। बच्चे और सुरेश निकल चुके थे। उसने दूध की बाल्टी और एक थैला रखा। फिर अचानक सुनीता को दीवार से सटा दिया।
“आज हिसाब चुकता होगा,” उसने कहा और उसके होंठों पर जोर से मुँह रख दिया। जीभ अंदर घुसा दी। एक हाथ से उसकी साड़ी का पल्लू खींच दिया। मोटे दूध बाहर निकल आए। रहीम ने एक स्तन मुँह में ले लिया और जोर-जोर से चूसने लगा। दाँत से निपल्स को काटने लगा।
सुनीता कराह उठी, “आह… छोड़… दर्द हो रहा है…”
रहीम ने उसके बाल पकड़कर घुटनों के बल बिठा दिया। “मुँह खोल। पहले मेरा लंड चूस।”
उसने लुंगी हटाई। 8 इंच का काला, नसें फूली हुई लंड बाहर निकला। सुनीता के मुँह में जबरदस्ती ठूंस दिया। गले तक। सुनीता की आँखों से आँसू निकल आए। रहीम उसके सिर को पकड़कर जोर-जोर से धक्के मारने लगा। “और गहरा… पूरा निगल… सााली रंडी।”
पंद्रह मिनट तक मुँह चोदने के बाद रहीम ने सुनीता को फर्श पर पटक दिया। साड़ी फाड़ दी। पैंटी फाड़कर फेंक दी। उसकी चुत पहले से गीली थी। रहीम ने दो उंगलियाँ अंदर घुसाकर जोर से फैलाया।
“इतनी प्यासी चुत… सुरेश इसे सूखा छोड़ता है।”
फिर उसने अपना लंड चुत के मुँह पर रखा और एक झटके में पूरा अंदर धंसा दिया। सुनीता चीख पड़ी। दर्द और मजे का मिश्रण। रहीम ने उसके दोनों पैर कंधों पर रख दिए और पागलों की तरह धक्के मारने लगा। हर धक्के के साथ सुनीता की गांड फर्श पर पटक रही थी।
“और जोर से… और गहरा…” सुनीता खुद बोल उठी।
रहीम ने उसकी गर्दन दबाई। साँस फूलने लगी। फिर उसने सुनीता को उलटा कर दिया। गांड के छेद पर थूक लगाया और बिना किसी तैयारी के अपना मोटा लंड गांड में घुसा दिया।
सुनीता की चीख घर में गूँज गई। “नहीं… गांड फट जाएगी… छोड़…”
रहीम नहीं माना। दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़कर जानवरों की तरह गांड चोदने लगा। खून भी निकल आया, लेकिन वह रुकने वाला नहीं था। आधा घंटा गांड चोदने के बाद उसने फिर चुत में डाला और जोर से झड़ गया। गर्म वीर्य की धार सुनीता की कोख में भर गई।
रहीम उठकर लुंगी बाँधते हुए बोला, “कल फिर आऊँगा। और इस बार हरपाल को भी साथ लाऊँगा। तेरी दोनों होल की सफाई एक साथ होगी।”
सुनीता फर्श पर पड़ी कराह रही थी। चुत और गांड दोनों जल रहे थे। लेकिन अंदर कहीं गहराई में एक अजीब सी भूख जाग गई थी।
अगले दिन हरपाल और रहीम दोनों आए। दरवाजा बंद किया। सुनीता को दोनों ने पकड़ लिया। हरपाल ने उसके बाल पकड़कर अपने लंड पर बिठाया। 9 इंच का मोटा लंड एक झटके में चुत में समा गया। सुनीता की आँखें फटी की फटी रह गईं।
“आह्ह्ह… फट गई… बहुत मोटा है…”
हरपाल हँसते हुए धक्के मारने लगा। रहीम पीछे से आया और गांड में अपना लंड घुसा दिया। दोनों एक साथ। डबल पेनेट्रेशन। सुनीता पागल हो गई। दर्द इतना था कि वह बेहोश होने वाली थी, लेकिन मजा भी उतना ही। दोनों मर्द बारी-बारी से उसकी गर्दन दबाते, थप्पड़ मारते, निपल्स को मोड़ते।
हरपाल ने कहा, “आज से तू हमारी रखैल है। रोज सुबह जब सब निकल जाएँ… तब हम आएँगे। और तू दोनों होल खोलकर इंतजार करेगी।”
सुनीता ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन मुँह से निकला, “हाँ… चोदो… और जोर से चोदो…”
उस दिन दोनों ने तीन-तीन बार सुनीता को चोदा। चुत, गांड, मुँह… कोई छेद बाकी नहीं बचा। अंत में सुनीता बेहोश पड़ी थी। शरीर पर थप्पड़ों और नाखूनों के निशान, चुत और गांड से वीर्य और खून रिस रहा था।
शाम को जब बच्चे आए तो सुनीता ने बुखार का बहाना बना लिया। रात को सुरेश ने कुछ पूछा तो उसने कहा कि थकान है।
अगले हफ्तों में ये सिलसिला रोजाना चलने लगा। कभी हरपाल अकेला, कभी रहीम, कभी दोनों साथ। कभी वे सुनीता को रस्सियों से बाँध देते। कभी मोमबत्ती की मोम गिराते। कभी उसके मुँह में कपड़ा ठूंसकर चुत और गांड दोनों एक साथ फाड़ते।
एक दिन हरपाल ने कहा, “आज तेरे दोनों बेटों को भी बुलाऊँगा। वे भी अपनी माँ की चुत चखें।”
सुनीता की आँखें फैल गईं। “नहीं… वे मेरे बच्चे हैं…”
हरपाल ने उसके गाल पर जोर का थप्पड़ मारा। “तू हमारी रांड है। जो कहेंगे वो होगा।”
शाम को अजय और विजय घर आए। हरपाल और रहीम पहले से मौजूद थे। दरवाजा बंद था। सुनीता नंगी, रस्सियों से बँधी हुई बिस्तर पर पड़ी थी।
हरपाल ने अजय से कहा, “अपनी माँ की चुत देख। आज से तू भी इसे चोदेगा।”
अजय पहले हिचकिचाया, फिर सुनीता की फूली हुई चुत देखकर उसका लंड खड़ा हो गया। उसने अपनी माँ की चुत में लंड डाल दिया। सुनीता रो रही थी, लेकिन उसके मुँह से कराहें निकल रही थीं।
विजय ने गांड में डाला। दोनों भाइयों ने अपनी माँ को बारी-बारी से चोदा। हरपाल और रहीम उन्हें हिदायतें देते रहे, “और जोर से… गहरी चोदो… माँ की चुत को याद दिलाओ कि असली मर्द कैसे चोदते हैं।”
रात भर चुदाई चली। सुनीता की चुत और गांड सूज गए। शरीर पर नीले निशान पड़ गए। लेकिन अब वह खुद माँगने लगी थी।
“और चोदो… सब मिलकर चोदो… मुझे रांड बना दो…”
कस्बे में धीरे-धीरे बात फैल गई। और लोग आने लगे। कभी तीन, कभी चार। सुनीता की दुकान अब सिर्फ दिखावा रह गई थी। असल में वह एक खुली हुई रांड बन चुकी थी जो हर सुबह अपने दरवाजे पर इंतजार करती कि आज कौन-कौन आकर उसकी चुत और गांड को फाड़ेंगे।
सुरेश को अब कुछ समझ में आने लगा था, लेकिन वह चुप रहता। क्योंकि घर का खर्च अब इन्हीं लोगों के पैसे से चल रहा था।
और सुनीता? वह अब पूरी तरह बदल चुकी थी। दर्द में भी मजा लेने वाली एक पागल रांड। हर रात जब सब सो जाते, वह अकेले अपने बिस्तर पर उंगलियाँ डालकर उन क्रूर चुदाइयों को याद करती और झड़ती।
राम नगर की उस गंदी गली में सुनीता की जिंदगी अब पूरी तरह बदल चुकी थी। सुरेश दिन भर फेरी पर रहता, बच्चे स्कूल या दुकान का दिखावा करते, और सुनीता हर सुबह नंगी होकर दरवाजे के पीछे खड़ी हो जाती। उसके शरीर पर पिछले दिनों के थप्पड़ों, नाखूनों और रस्सियों के निशान साफ दिखते। चुत और गांड दोनों सूजे हुए, लाल-लाल, लेकिन अंदर की भूख और बढ़ गई थी।
एक सुबह हरपाल अकेला नहीं आया। उसके साथ रहीम, दो और जाट युवक—बलबीर और नरेश—और अजय-विजय भी थे। छह मर्द। दरवाजा बंद होते ही हरपाल ने सुनीता के बाल पकड़कर घसीटा और बिस्तर पर पटक दिया।
“आज तेरी पूरी सफाई होगी, रांड। कोई छेद बाकी नहीं रहेगा।”
सुनीता की साड़ी पहले ही फाड़ दी गई। नंगी शरीर पर छह जोड़ी आँखें घूम रही थीं। हरपाल ने मोटी रस्सी निकाली। सुनीता के दोनों हाथ पीछे बाँध दिए, फिर पैर फैलाकर घुटनों से बाँध दिए ताकि चुत और गांड पूरी तरह खुली रहें। गर्दन में भी रस्सी कस दी—साँस फूलने लगे तो ढीली, नहीं तो और कस।
बलबीर ने मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम सीधे सुनीता के निपल्स पर गिराई। सुनीता चीखी, शरीर ऐंठा, लेकिन रस्सियाँ कस गईं। मोम गांड की दरार में भी गिराई गई। जलन इतनी तेज थी कि आँखों से आँसू की धारा बहने लगी।
“चिल्लाई मत, सााली,” हरपाल ने गाल पर जोर का थप्पड़ मारा। “आज हम तेरी चुत में मुट्ठी डालेंगे।”
रहीम ने पहले दो उंगलियाँ, फिर तीन, फिर चार। सुनीता की चुत फैलती चली गई। फिर पूरी मुट्ठी अंदर धंस गई। सुनीता की चीख घर की दीवारों से टकराई। मुट्ठी अंदर घुमाते हुए रहीम हँस रहा था। “देखो कैसे फैल गई माँ की चुत… अब मुट्ठी आसानी से समा जाती है।”
अजय ने माँ के मुँह में अपना लंड ठूंस दिया। गले तक। साँस रुकने लगी तो बाल पकड़कर और गहरा धकेला। विजय ने गांड में दो उंगलियाँ घुसाकर फैलाया, फिर अपना लंड एक झटके में अंदर मार दिया। खून की हल्की रेखा बह निकली, लेकिन किसी ने परवाह नहीं की।
अब डबल नहीं, ट्रिपल पेनेट्रेशन शुरू हुआ। हरपाल चुत में, नरेश गांड में, बलबीर मुँह में। तीनों एक साथ धक्के मार रहे थे। सुनीता का शरीर झटके खा-खाकर हिल रहा था। गर्दन की रस्सी कभी कसती, कभी ढीली होती। साँस फूलने पर चेहरा लाल हो जाता, फिर जब ढीली होती तो वह हाँफती हुई और जोर से चोदने की भीख माँगती।
“और जोर… फाड़ दो… मुझे मार डालो चोद-चोदकर…”
हरपाल ने रस्सी और कस दी। सुनीता की आँखें उलटने लगीं। उसी हालत में उसने चुत में और जोरदार धक्के मारे। वीर्य की धार अंदर छोड़ते हुए बोला, “निगल ले, रांड… पूरा निगल।”
उसके बाद बारी-बारी से सबने झड़ा। मुँह में, चुत में, गांड में, छातियों पर, चेहरे पर। सुनीता का चेहरा वीर्य से लथ-पथ हो गया। बाल चिपक गए। शरीर पर थूक और वीर्य की परत जम गई।
लेकिन खेल यहीं नहीं रुका। हरपाल ने एक मोटी लकड़ी की छड़ी निकाली। सुनीता के गांड पर दस-बारह जोरदार वार किए। हर वार पर लाल निशान उभर आए, कुछ जगहों से खून की बूँदें भी रिसने लगीं। फिर छड़ी को चुत में घुसाकर घुमाने लगा। सुनीता पागलों की तरह कराह रही थी—दर्द और मजे का ऐसा मिश्रण कि वह बेहोशी की कगार पर पहुँच गई।
दोपहर तक छहों मर्द थक चुके थे। सुनीता रस्सियों में लटकी हुई, बेहोश पड़ी थी। चुत और गांड दोनों पूरी तरह खुले, सूजे, खून और वीर्य से भरे हुए। हरपाल ने रस्सियाँ ढीली कीं और पानी के छींटे मारे।
“उठ, रांड। शाम को और लोग आने वाले हैं। आज रात तेरी गांड में बोतल घुसेगी।”
शाम को सचमुच और मर्द आ गए। मोहल्ले के तीन युवक और एक बुजुर्ग जाट। कमरा भर गया। सुनीता को फिर से बाँधा गया—इस बार हाथ ऊपर, पैर फैलाकर। एक युवक ने ठंडी पानी की बोतल का मुँह गांड में घुसाया और जोर से धक्का दिया। बोतल आधी अंदर चली गई। सुनीता की चीख इतनी तेज थी कि बाहर तक सुनाई दी, लेकिन किसी ने दरवाजा नहीं खटखटाया। सब जानते थे कि अंदर क्या हो रहा है।
बोतल निकालने के बाद एक के बाद एक लंड घुसने लगे। कोई मुँह चोद रहा, कोई चुत, कोई गांड। कोई निपल्स को दाँत से काट रहा, कोई गालों पर थप्पड़ लगा रहा। सुनीता अब खुद ही कह रही थी—
“और लाओ… सबका लंड एक साथ… मुझे कुत्तिया बना दो… पेशाब कर दो मुँह में…”
और उन्होंने वैसा ही किया। एक युवक ने उसके मुँह में पेशाब कर दिया। सुनीता ने गट-गट पी लिया। चेहरे पर, छातियों पर पेशाब की धारें बह रहीं थीं। कमरा गंदगी, पसीने और वीर्य की बदबू से भर गया।
रात के दो बजे तक कुल ग्यारह मर्द सुनीता को चोद चुके थे। उसका शरीर अब पहचान से बाहर था—निशानों, खून, वीर्य और पेशाब से ढका हुआ। आँखें सूजी हुई, होंठ फटे हुए, चुत और गांड इतने फैल चुके थे कि मुट्ठी आसानी से अंदर-बाहर हो रही थी।
सब चले गए तो सुनीता अकेली फर्श पर पड़ी कराह रही थी। लेकिन उसकी आँखों में अभी भी भूख बाकी थी। उसने अपने खून से सने हाथ से चुत में उंगलियाँ डालीं और बुदबुदाई—
“कल और लाओ… और क्रूर… और गहरा… मुझे तोड़ दो पूरी तरह…”
सुरेश रात को घर आया तो पत्नी को उस हालत में देखा। उसने कुछ नहीं कहा। बस बिस्तर के दूसरे कोने में लेट गया। क्योंकि अब घर का राशन, बच्चों की फीस, दुकान का सामान—सब इन्हीं क्रूर चुदाइयों की कमाई से चल रहा था।
और सुनीता? वह अब सिर्फ एक औरत नहीं रह गई थी। वह राम नगर की सबसे गंदी, सबसे प्यासी, सबसे टूटी हुई रांड बन चुकी थी—जो हर सुबह अपने जख्मों को सहलाती और इंतजार करती कि आज कौन सा नया अत्याचार उसकी चुत और गांड पर टूटेगा।
कहानी यहीं थमती नहीं। क्योंकि अगली सुबह हरपाल ने कहा था—“कल हम तुझे खेत में ले जाएँगे। वहाँ जानवरों के सामने चोदेंगे… और अगर भागने की कोशिश की तो रस्सी से बाँधकर रात भर भूखी छोड़ देंगे।”
सुनीता ने सिर्फ मुस्कुराकर जवाब दिया था। उसकी मुस्कान में दर्द था, मजा था, और एक पागल इच्छा थी—कि अब कोई भी सीमा बाकी न रहे।
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