पड़ोसन की टूटी सीमाएँ

रात के अंधेरे में रस्सियों से बंधी लड़की की चीखें दब जाती हैं जब मोटा लंड उसकी दोनों जगहों को फाड़ता है। दर्द में भी वह और मांगती है। हर बार शरीर पर नए निशान, नई गुलामी।

मेरा नाम विक्रम राठौड़ है। मैं उदयपुर राजस्थान का रहने वाला हूँ। उम्र 31 साल। दिखने में साधारण सा लेकिन शरीर मज़बूत। ऊँचाई 5 फुट 11 इंच। तीसरी टांग 7.5 इंच की है, मोटी और नसों वाली। घर में सिर्फ माँ और मैं रहते हैं। पापा का निधन हो चुका है। माँ ज़्यादातर दोपहर बाद सो जाती हैं।

मेरे घर के ठीक पीछे वाली गली में एक घर है। वहाँ रहती है नैना। 22 साल की, कॉलेज की अंतिम वर्ष की छात्रा। रंग गेहुँआ, शरीर भरा-भरा, कूल्हे चौड़े, छातियाँ भारी। हर बार जब वह गली से गुज़रती, मेरी नज़रें उसके शरीर पर चिपक जातीं। मैं छत पर खड़ा होकर उसे देखा करता। मन में हज़ार बार उसे दीवार से सटाकर चोदने के ख़्याल आते।

एक दोपहर ऑफिस से लौटकर छत पर खड़ा था। नैना अपने पिता के साथ मेरे घर की ओर आ रही थी। उसने टाइट ब्लैक लेगिन्स और सफ़ेद क्रॉप टॉप पहना था। क्रॉप टॉप के नीचे उसकी नाभि और पेट की चिकनी त्वचा साफ़ दिख रही थी। छातियाँ टॉप में भरी हुई थीं। पिताजी ने मुझे बुलाया।
“विक्रम बेटा, एक काम है। अकाउंट की फाइल बनानी है। कर दोगे?”
मैंने हाँ कह दी। पिताजी ने कागज़ दिए और कहा कि नैना यहीं रुकेगी। खुद कहीं चले गए। माँ किचन में थीं। मैंने नैना को ऊपर अपने कमरे में बुला लिया।

कमरे में आकर मैंने पंखा और लाइट चालू की। नैना बिस्तर के किनारे बैठ गई। मैं बाथरूम गया। अंडरवियर उतारकर सिर्फ एक पतला सफ़ेद निक्कर पहन लिया। निक्कर में मेरा लंड साफ़ उभार मार रहा था। वापस आकर लैपटॉप खोला और काम शुरू किया।
थोड़ी देर बातचीत चली। नैना ने कहा कि कॉलेज में लड़के-लड़कियाँ सिर्फ मस्ती करते हैं। मैंने पूछा, “तेरा कोई बॉयफ्रेंड नहीं?”
वह थोड़ी शर्माई। “नहीं… कोई ऐसा नहीं मिला जो… समझदार हो।”
मैंने हँसकर कहा, “तो मुझे ही बना ले।”

दोनों हँसे। लेकिन मेरा लंड निक्कर में और सख़्त हो गया। नैना की नज़र बार-बार मेरे उभार पर जा रही थी। मैंने उसे पास बुलाया। वह झुककर लैपटॉप देखने लगी। उसकी गर्म साँसें मेरे जांघ पर पड़ रही थीं। अचानक उसने हाथ बढ़ाया और मेरे लंड को ऊपर से दबा दिया।
मैं खड़ा हो गया। “ये क्या कर रही है?”
नैना की आवाज़ काँप रही थी। “रहा नहीं जा रहा… दिख रहा है… प्लीज़…”
वह मेरे पास आई और होंठों से होंठ चिपका दिए। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे झुकाया और ज़ोर से चूसा। जीभ उसके मुँह में घुसा दी। उसने मेरे निक्कर को नीचे खींच लिया। लंड बाहर निकला। मोटा, कड़ा, सिर पर नसें फूली हुईं।

नैना घुटनों के बल बैठ गई। दोनों हाथों से लंड पकड़ा और मुँह में ले लिया। पहले सिर्फ सिर चूसा, फिर धीरे-धीरे पूरा अंदर ले जाने की कोशिश की। गला भर गया। आँखों में आँसू आ गए लेकिन उसने रोका नहीं। मैंने उसके बाल कसकर पकड़े और कमर आगे धकेल दी। लंड उसके गले तक चला गया। वह घुटने टेककर खांसने लगी लेकिन मैंने छोड़ने नहीं दिया। थोड़ी देर बाद निकाला तो लार की धारें उसके ठोड़ी से टपक रही थीं।

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मैंने उसे उठाया और दीवार से सटा दिया। क्रॉप टॉप ऊपर फेंक दी। ब्रा खोलकर छातियाँ बाहर निकाल लीं। भारी, गोल, निप्पल काले और कड़े। मैंने एक निप्पल मुँह में ले लिया और दाँतों से काटा। नैना चीखी। दूसरे हाथ से उसकी लेगिन्स नीचे खींची। लाल रंग की पैंटी गीली थी। पैंटी फाड़ दी। चूत पर छोटे बाल थे। फांक पहले से चमक रही थी।
मैं नीचे बैठ गया। दोनों जांघें उसके कंधों पर रखीं और चूत पर मुँह लगा दिया। जीभ अंदर घुसाई। चूसा। चाटा। क्लिट को दाँतों से हल्के से काटा। नैना दीवार से सटकर काँप रही थी। उसके हाथ मेरे सिर पर थे। “और ज़ोर से… और…”

मैंने दो उंगलियाँ अंदर घुसा दीं। चूत तंग थी। उंगलियाँ घुमाते हुए चूसता रहा। थोड़ी देर में वह मेरे मुँह पर झड़ गई। पानी मेरे चेहरे पर लगा। मैंने चाट लिया।
अब मैं खड़ा हुआ। लंड उसकी चूत पर रगड़ा। नैना ने कहा, “डाल दो… अब मत तड़पाओ।”
मैंने एक झटके में आधा लंड अंदर धकेल दिया। नैना की चीख निकल गई। चूत फटने जैसी दर्दनाक सिकुड़न हुई। मैं रुका नहीं। पूरा लंड अंदर पेल दिया। उसके पेट तक महसूस हो रहा था। दीवार से सटाकर दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़ी और तेज़ धक्के लगाने लगा। हर धक्के पर उसकी छातियाँ उछल रही थीं। मैंने एक छाती मुँह में ले ली और दाँतों से निप्पल दबाया।

“दर्द हो रहा है?” मैंने पूछा।
“हाँ… लेकिन मत रुको…” उसकी आवाज़ टूटी हुई थी।
मैंने गति बढ़ा दी। लंड पूरा बाहर निकालकर फिर जोर से अंदर पेल रहा था। चूत की आवाज़ गीली-गीली आ रही थी। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और गर्दन पर काटा। नैना कराह रही थी।
फिर मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया। पेट के बल। कूल्हे ऊपर उठाए। दोनों हाथ उसकी पीठ पर दबाए और पीछे से घुसा दिया। इस बार और गहरा। नैना के मुँह से तकिया दबाया ताकि आवाज़ कम निकले। मैंने उसके कूल्हों को ज़ोर से पकड़कर ताबड़तोड़ चुदाई शुरू की। हर धक्के पर उसकी चूत से पानी निकल रहा था। मैंने एक हाथ आगे ले जाकर क्लिट मसलना शुरू किया।

थोड़ी देर बाद नैना ने कहा, “अब और नहीं सह सकती… निकाल लो…”
मैंने नहीं निकाला। बल्कि और तेज़ कर दिया। जब मेरा निकलने को हुआ तो मैंने लंड बाहर निकाला और उसके मुँह के पास लाया। “खोल।”
नैना ने मुँह खोला। मैंने पूरा माल उसके मुँह और चेहरे पर छोड़ दिया। गर्म वीर्य उसकी जीभ, ठोड़ी और गर्दन पर लगा। कुछ उसके बालों में भी चला गया। वह निगल गई। बाकी चाट लिया।

हम दोनों पसीने से भीगे हुए थे। नैना की चूत लाल और सूजी हुई थी। मैंने उसे उठाया और बाथरूम ले गया। नहलाया। फिर कपड़े पहनाए। नीचे आने से पहले मैंने उसके कान में कहा, “अब तू मेरी है। जब चाहूँगा, बुलाऊँगा। मना नहीं करेगी।”
नैना ने सिर हिलाया। आँखों में अभी भी वासना और थोड़ी सी डरी हुई चमक थी।
उस दिन के बाद नैना नियमित आने लगी। कभी दिन में, कभी रात को। हर बार मैं उसे और ज़्यादा सख़्त तरीके से लेता। कभी हाथ बाँधकर, कभी आँखें ढककर, कभी उसके मुँह में कपड़ा ठूँसकर। कभी चूत के साथ गांड भी ली। पहली बार गांड लेते समय वह रोई थी लेकिन रोका नहीं। मैंने धीरे-धीरे पूरा लंड अंदर पेल दिया और तब तक चुदाई की जब तक वह काँपते हुए झड़ नहीं गई।

एक रात मैंने उसे अपने कमरे में पूरी रात रखा। सुबह तक तीन बार लिया। सुबह जब वह जा रही थी तो उसकी चाल लड़खड़ा रही थी। चूत और गांड दोनों सूजे हुए थे। मैंने उसके गाल पर थप्पड़ मारा और कहा, “अगली बार और ज़ोर से लूँगा।”
नैना ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं तैयार रहूँगी।”

उस दिन के बाद नैना की ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई। अब वह सिर्फ पड़ोसन नहीं रही थी। वह मेरी संपत्ति बन चुकी थी। हर शाम ऑफिस से लौटते ही मैं उसे मैसेज करता। कभी “आ जा”, कभी “रात को बारह बजे”, कभी “सुबह पाँच बजे”। वह कभी मना नहीं करती। माँ के सो जाने के बाद चुपके से मेरे कमरे में घुस जाती।
एक रात मैंने तय किया कि आज उसकी सारी हदें तोड़ दूँगा।

रात के ग्यारह बजे दरवाज़ा खुला। नैना अंदर आई। काली टाइट फ्रॉक पहनी थी, नीचे कुछ नहीं। बाल खुले, आँखों में इंतज़ार। मैंने दरवाज़ा बंद किया और ताला लगा दिया।
“कपड़े उतार।”
उसने फ्रॉक उतार दी। नंगी खड़ी हो गई। छातियाँ भारी, निप्पल पहले से कड़े। चूत पर बाल थोड़े बढ़े हुए थे। मैंने उसकी ठोड़ी पकड़ी और ज़ोर से चूमा। फिर उसके बाल पकड़कर बिस्तर की ओर घसीटा।
बिस्तर के सिरहाने मैंने पहले से रस्सियाँ बाँध रखी थीं। दोनों कलाईयाँ बिस्तर के खंभों से कसकर बाँध दीं। टाँगें फैलाकर टखनों को भी बाँध दिया। अब वह पूरी तरह फैलकर पड़ी थी। हिल नहीं सकती थी।

मैंने एक काला कपड़ा उसकी आँखों पर बाँध दिया। फिर उसके मुँह में अपना अंडरवियर ठूँस दिया।
“आज तू कुछ नहीं बोलेगी। सिर्फ सहेगी।”
मैंने अपनी पैंट उतारी। लंड पहले से कड़ा था। 7.5 इंच का मोटा लंड उसके चेहरे के पास लाया। उसने सूँघा। मैंने उसके मुँह से कपड़ा निकाला और लंड अंदर ठूँस दिया। गले तक। वह घुटने मोड़ने की कोशिश करने लगी लेकिन रस्सियाँ कस गईं। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर स्थिर रखा और कमर हिलाई। लंड बार-बार उसके गले में धँस रहा था। लार बह रही थी। आँखों से आँसू। लेकिन मैं रुका नहीं। दस मिनट तक लगातार मुँह चोदा। जब निकाला तो उसकी साँसें उखड़ी हुई थीं। गला लाल।

फिर मैं नीचे गया। चूत पर मुँह लगाया। जीभ अंदर घुसाई। चूसा। चाटा। फिर दो उंगलियाँ अंदर पेल दीं। तीसरी भी। चूत फैल रही थी। मैंने चार उंगलियाँ अंदर घुसा दीं और मुट्ठी बनाने की कोशिश की। नैना के शरीर में झटके आने लगे। वह कराह रही थी लेकिन आवाज़ नहीं निकाल सकती थी क्योंकि मैंने फिर से उसके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया था।

जब चूत काफी गीली हो गई तो मैंने लंड उसकी चूत पर रखा और एक झटके में पूरा अंदर पेल दिया। वह काँप उठी। मैंने रुकने की ज़रूरत नहीं समझी। दोनों हाथ उसकी कमर पर रखे और ताबड़तोड़ धक्के लगाने लगा। हर धक्के पर बिस्तर चरमरा रहा था। उसकी छातियाँ उछल रही थीं। मैंने एक छाती पकड़कर निप्पल मरोड़ा। दाँतों से काटा। खून की बूँद निकली। मैंने चाट लिया।
“दर्द अच्छा लग रहा है ना?” मैंने पूछा। उसने सिर हिलाया।

मैंने गति और बढ़ा दी। लंड पूरा बाहर निकालकर फिर जोर से अंदर पेल रहा था। चूत की गीली आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी। थोड़ी देर बाद मैंने लंड बाहर निकाला और उसकी गांड की ओर मुड़ा।
गांड की छेद छोटी और कसी हुई थी। मैंने थूक लगाकर दो उंगलियाँ अंदर घुसाईं। नैना तड़पने लगी। मैंने उंगलियाँ फैलाईं। फिर लंड का सिर लगाया और धीरे-धीरे दबाव डाला। पहली इंच अंदर गई। वह चीखने वाली थी लेकिन कपड़े ने आवाज़ दबा दी। मैंने और दबाव दिया। आधा लंड अंदर चला गया। फिर एक ज़ोरदार धक्का। पूरा लंड उसकी गांड में धँस गया।

नैना का शरीर काँप रहा था। आँसू कपड़े को गीला कर रहे थे। मैं रुका नहीं। गांड चोदने लगा। धीरे-धीरे शुरू किया फिर गति बढ़ाई। हर धक्के पर उसकी गांड फैल रही थी। मैंने एक हाथ आगे ले जाकर उसकी चूत में तीन उंगलियाँ घुसा दीं। अब दोनों छेद भरे हुए थे। मैं दोनों जगह एक साथ घुसेड़ रहा था।
बीस मिनट तक लगातार गांड चोदी। जब मेरा निकलने को हुआ तो मैंने लंड बाहर निकाला और उसके मुँह के पास लाया। कपड़ा हटाया। “खोल।”

उसने मुँह खोला। मैंने पूरा गर्म माल उसके मुँह में छोड़ दिया। कुछ उसके चेहरे पर गिरा। वह निगल गई। बाकी चाट लिया।
मैंने रस्सियाँ नहीं खोलीं। उसे वैसे ही बाँधकर छोड़ दिया। खुद बाथरूम गया। नहाया। वापस आकर उसके शरीर पर पानी छिड़का। फिर दोबारा लंड कड़ा करके उसकी चूत में घुसा दिया। इस बार और ज़्यादा बर्बरता से। चूत पहले से सूजी हुई थी। हर धक्के पर दर्द हो रहा था लेकिन वह सह रही थी।

रात भर मैंने उसे तीन बार और लिया। कभी चूत, कभी गांड, कभी मुँह। बीच-बीच में उसके निप्पल पर मोमबत्ती का गर्म मोम गिराया। वह तड़पती रही। कभी उसके जांघों पर थप्पड़ मारे। लाल निशान पड़ गए। कभी बाल पकड़कर खींचा।
सुबह चार बजे जब मैंने रस्सियाँ खोलीं तो उसके हाथ-पैर सुन्न हो चुके थे। चूत और गांड दोनों लाल, सूजे हुए, थोड़े खून लगे हुए। मैंने उसे उठाया और बाथरूम ले गया। नहलाया। मरहम लगाया। फिर बिस्तर पर लिटा दिया।

“अब तू मेरे बिना नहीं रह सकती,” मैंने उसके कान में कहा। “जब बुलाऊँगी, दौड़ती हुई आएगी। चाहे रात हो या दिन। चाहे दर्द हो या मज़ा। समझी?”
नैना ने आँखें बंद करके सिर हिलाया। उसकी आवाज़ काँप रही थी, “हाँ… मैं तुम्हारी हूँ… पूरी तरह।”
उसके बाद के हफ़्तों में मैंने उसे और आगे ले गया। कभी चेन से बाँधकर छत पर ले गया रात के अंधेरे में। वहाँ खुले आसमान के नीचे चोदा। कभी उसके मुँह में गैग लगाकर पूरे शरीर पर हल्के चाबुक के निशान बनाए। कभी उसकी चूत में ठंडी बर्फ़ डाली फिर गर्म लंड पेल दिया। कभी दोनों हाथ पीछे बाँधकर घुटनों के बल बैठाया और घंटों मुँह चोदा जब तक उसका गला सूज नहीं गया।

एक बार मैंने उसके दोनों निप्पल पर क्लिप्स लगा दिए। चेन से खींचा। वह कराह रही थी लेकिन मना नहीं किया। जब क्लिप्स हटाए तो निप्पल सूजे हुए और बेहद संवेदनशील हो चुके थे। मैंने उन्हें मुँह में लेकर दाँतों से कुतरा।
नैना अब खुद मांगने लगी थी। “आज और सख़्त करो… आज बांधो… आज गांड लो… आज थप्पड़ मारो…”
मैंने उसकी हर मांग पूरी की। और हर बार खुद भी नई सीमाएँ तोड़ीं।

अब वह मेरी पूरी गुलाम बन चुकी थी। शरीर पर मेरे बनाए निशान थे। गर्दन पर कभी-कभी हल्के दांत के निशान। कलाईयों पर रस्सी के लाल निशान। चूत और गांड हमेशा मेरे इस्तेमाल के लिए तैयार।
रात को जब वह मेरे बिस्तर पर नंगी लेटी होती, आँखों में सिर्फ़ समर्पण होता। मैं उसके बाल सहलाता और कहता, “तू अब सिर्फ़ मेरी है। दुनिया की किसी और चीज़ की नहीं।”
और वह जवाब देती, “हाँ… सिर्फ़ तुम्हारी… जितना चाहो तोड़ो… मैं सह लूँगी।”
मैं उसके शरीर को तोड़ता रहा। और वह हर बार और ज़्यादा टूटकर, और ज़्यादा मेरी होकर लौटती रही।

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