कॉलेज गर्ल प्रिया खून-चाबुक वाली गुलाम चूत

गरीब कॉलेज गर्ल प्रिया ने पैसे के लालच में बुजुर्ग साहब से कुंवारी चूत फड़वाई। चाबुक, रस्सी, ग्रुप बलात्कार और बॉयफ्रेंड की जबरदस्ती भागीदारी वाली बर्बर बीडीएसएम कहानी।

प्रिया मेरा नाम है। मैं कानपुर की रहने वाली हूँ और मेरी उम्र 21 साल है। बी.ए. द्वितीय वर्ष की छात्रा हूँ। घर की हालत बहुत खराब है। माँ दिन-रात दूसरों के घर झाड़ू-पोछा करके परिवार चलाती है। पिता जी बीमार रहते हैं, एक छोटा भाई भी है जो स्कूल जाता है। चार लोगों का घर, एक कमरा, टूटी चारपाई और हमेशा पैसे की तंगी।


उस दिन माँ की तबियत इतनी खराब हो गई कि उठ भी नहीं पा रही थी। शाम को श्री वर्मा के घर से फोन आया। वर्मा साहब की उम्र 52 साल है। उनकी पत्नी सालों पहले मर चुकी थी। बेटा आकाश ऑफिस जाता था और बहू नवजात बच्ची के साथ कमरे में रहती थी। घर बहुत बड़ा था, तीन मंजिला, अलग-अलग विंग में कमरे। माँ ने कहा कि अगर सुबह तक ठीक न हुई तो बेटी को भेज दूँगी। सुबह तक माँ की हालत नहीं सुधरी तो मुझे कॉलेज की छुट्टी लेकर उनके घर भेज दिया गया।


मैं मध्यम कद की हूँ, सांवला रंग, लेकिन शरीर काटना है। साइज 34-36-34। बूब्स भारी और गोल, कमर पतली, हिप्स गोल। घर पर कभी ब्रा नहीं पहनती। पैसे नहीं होते। कमीज ढीली रहती, चूचियाँ अंदर से हिलती रहतीं। उस दिन भी वही पुरानी सलवार-कमीज पहनी थी।
जब मैं पहुँची तो आकाश ऑफिस जाने की तैयारी कर रहा था। बहू अपने कमरे में सो रही थी। मैंने पहले बहू के कमरे की सफाई की, फिर किचन में जाकर आकाश के लिए टिफिन बनाया। वर्मा साहब बेड पर लेटे टीवी देख रहे थे। उनकी नजर बार-बार मेरे बदन पर ठहर रही थी।

मैंने ध्यान नहीं दिया। आकाश चला गया, बहू को नाश्ता दे दिया। फिर वर्मा साहब के कमरे में झाड़ू लगाने गई।
झाड़ू लगाते हुए जब झुकती तो चूचियाँ कमीज के अंदर हिलतीं। साहब घूर रहे थे। मैं जल्दी सफाई खत्म करके निकली। उन्होंने कहा बाथरूम भी साफ कर दो। कॉमन बाथरूम में बहू की महंगी ब्रा और पैंटी हैंगर पर टंगी थीं। मैंने हाथ में लेकर देखी। तभी पीछे से साहब आ गए।
“क्या कर रही हो? चुराने का इरादा था?” उनकी आवाज कड़ी थी।


मैं काँप उठी। “नहीं साहब, सिर्फ देख रही थी।”
उन्होंने हँसते हुए कहा, “तुम्हारे पास ऐसे कपड़े नहीं होंगे। लो, पाँच सौ।” नोट बढ़ाया। मैंने मना किया लेकिन उन्होंने मेरी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, “ले लो। तुम्हारी मदद करना चाहता हूँ।”


मेरी नजर उनके पजामे पर गई। अंदर कुछ तना हुआ था। मैं बाहर निकलने लगी तो उन्होंने कलाई पकड़ ली। बाथरूम का दरवाजा बंद कर दिया। “पैसे ले लिए तो अब मना मत करो।”
उन्होंने मेरा हाथ अपने पजामे पर रख दिया। मोटा, गरम लंड मेरे हाथ में धड़क रहा था। सात इंच से ज्यादा लंबा, मोटा। मैंने पहले कभी छुआ नहीं था। डर के साथ एक अजीब सी गर्मी शरीर में फैल गई। उन्होंने मेरे हाथ को दबाकर अपने लंड पर मुठ मारवाई। दूसरी तरफ मेरे चूचों को जोर से मसलने लगे। कमीज के ऊपर से निप्पल्स को चुटकी काटी। दर्द हुआ लेकिन उनके हाथ नहीं हटे।

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“दो हजार और चाहिए तो कमरे में चलो।” उन्होंने नोट दिखाया। माँ एक महीने में इतना नहीं कमाती। लालच ने जीत ली। मैं उनके कमरे में चली गई। दरवाजा अंदर से लॉक हुआ।
उन्होंने मुझे बेड पर बैठाया और पजामा नीचे गिरा दिया। लंड बाहर निकला—काला, नसों से भरा, टोपा चमकता हुआ। उन्होंने मेरी गर्दन पकड़कर सिर नीचे झुकाया। “मुँह में ले।” मैंने मना किया तो उन्होंने बालों में मुट्ठी बाँध ली और जबरदस्ती मुँह के पास लाए। लंड के टोपे को मेरे होठों पर रगड़ा। “खोल।”


मैंने होठ खोले। मोटा लंड मुँह में घुस गया। गला भर गया। उन्होंने पीछे से सिर दबाया। मैंने खाँसी लेकिन उन्होंने नहीं छोड़ा। लार टपकने लगी। कुछ देर मुँह में पेलने के बाद निकाला। मैं साँस ले रही थी।
फिर उन्होंने मेरी कमीज फाड़ दी। चूचियाँ बाहर निकल आईं। भारी, तनी हुई। उन्होंने दोनों को दोनों हाथों में भरकर जोर से दबाया। निप्पल्स मुँह में लेकर दाँत से काटा। मैं कराह उठी। दर्द और मजे का मिश्रण। सलवार का नाड़ा खोला, नीचे खींचा। कच्छी भी निकाल दी। पूरा नंगा शरीर बेड पर लेटा था।


साहब ने मेरी टाँगें फैलाईं। कुंवारी चूत को ध्यान से देखा। उंगली से फाँक खोली। “कितनी टIGHT है।” एक उंगली अंदर घुसाई। मैं चीख पड़ी। कभी उंगली नहीं डाली थी। उन्होंने तेजी से अंदर-बाहर करना शुरू किया। दो उंगलियाँ डाल दीं। चूत फैल रही थी, दर्द हो रहा था। फिर तीन। मैं बेड की चादर पकड़े कराह रही थी।


उन्होंने पास पड़ी वैसलीन ली, लंड पर और मेरी चूत पर लगाई। लंड को चूत के मुँह पर टिकाया। धीरे से दबाव डाला। सिर्फ टोपा अंदर गया और अटक गया। “सह लो।” एक जोर का धक्का मारा।
जैसे कोई चाकू घुस गया हो। पूरी लंबाई एक झटके में अंदर चली गई। मैं चीखी। साहब ने मुँह पर हाथ रख दिया। खून निकला। चूत फटने का अहसास। लंड पूरा अंदर था, अंडकोश चूत से टकरा रहे थे। वे रुके नहीं। धीरे-धीरे हिले फिर जोर से पेलने लगे।


हर धक्के पर दर्द बढ़ता जा रहा था। लेकिन पैसे ले लिए थे। मैंने दाँत भींच लिए। साहब ने मेरे दोनों हाथ ऊपर उठाकर बेड के हेडबोर्ड से बाँध दिए। रस्सी से कसी। अब मैं हिल नहीं सकती थी। वे मेरे ऊपर चढ़े और पूरे जोर से चुदाने लगे। चूत में लंड अंदर-बाहर हो रहा था। खून और क्रीम मिलकर आवाज कर रहे थे।


उन्होंने मेरी गर्दन दबाई। साँस रुकने लगी। “चुपचाप ले।” धक्के और तेज हो गए। बीस मिनट तक लगातार पेला। मेरी चूत सूज गई थी। फिर उन्होंने लंड निकाला, मुझे घुमाया, पेट के बल लिटाया। हिप्स ऊपर उठाईं। पीछे से फिर घुसाया। और गहरा। हाथों से मेरे हिप्स पकड़कर जोर-जोर से धक्के मारने लगे। थप्पड़ जड़ने लगे। गाल लाल हो गए।


“आज से तुम मेरी रंडी हो। जब बुलाऊँगी तब आना।” उन्होंने बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। दर्द हो रहा था लेकिन शरीर में गर्मी भी फैल रही थी। पहली बार चुदाई का दर्द धीरे-धीरे कम होने लगा और एक अजीब सी गुदगुदी शुरू हुई।
वे फिर मुँह के बल लाए। लंड चूत से निकाला और मुँह में ठूंस दिया। खून और क्रीम का स्वाद। मैंने गला खोलकर लिया। वे गले तक पेल रहे थे। आँखों से पानी निकल रहा था। फिर वापस चूत में। इस बार उन्होंने मेरी टाँगें कंधों पर रखीं और पूरा वजन डालकर चुदाई की। हर धक्के पर मेरी चूत की दीवारें फैल रही थीं।


अंत में उन्होंने जोर से कराहते हुए अंदर ही झाड़ दिया। गरम वीर्य की धारें चूत के अंदर भर गईं। लंड अभी भी धड़क रहा था। वे मेरे ऊपर लेटे रहे। कुछ देर बाद निकाला। चूत से खून और वीर्य दोनों बह रहे थे। बेड लाल हो गया था।
मैं उठ नहीं पा रही थी। साहब ने रस्सी खोली। “कपड़े पहनो।” मैंने किसी तरह सलवार-कमीज पहनी। दर्द इतना था कि चलना मुश्किल हो रहा था। उन्होंने खुद गाड़ी में बिठाकर घर तक छोड़ा। माँ से कहा, “आपकी बेटी बहुत अच्छा काम करती है। रोज भेज दिया करो।”


माँ खुश हो गई। शक जरूर हुआ लेकिन पैसे की जरूरत ज्यादा थी। अगले दिन फिर गई। और अगले। हफ्ते भर रोज। हर दिन नया तरीका। कभी हाथ बाँधकर, कभी आँखों पर पट्टी बाँधकर, कभी चूचियों पर क्लिप लगाकर। कभी मुँह में पेशाब करवाया, कभी चूत में उंगलियाँ और लंड दोनों। कभी थप्पड़, कभी चाबुक जैसी पतली बेल्ट। दर्द बढ़ता गया लेकिन पैसे भी। एक हफ्ते में मैंने जितना माँ महीने भर में कमाती, उससे ज्यादा ले आई।


अब मुझे इस काम में मजा आने लगा था। दर्द के साथ सुख भी मिलने लगा। शरीर बदल गया। चूत ढीली नहीं हुई लेकिन आदी हो गई। ब्रा-पैंटी खरीद ली। कपड़े अच्छे पहनने लगी। परिवार की जरूरतें पूरी होने लगीं।
एक दिन साहब ने कहा, “अब तुम सिर्फ मेरे नहीं रहोगी। मेरे दोस्त भी आएँगे।” मैंने मना नहीं किया। पैसे ज्यादा मिलते। दोस्त आए। तीन आदमी। मुझे बेड पर नंगा करके बाँधा। एक मुँह में, एक चूत में, एक गाँड में। पहली बार गाँड की चुदाई। दर्द असहनीय था। चीखी लेकिन मुँह भरा था। खून फिर निकला। वे बारी-बारी से पेले। घंटों। वीर्य शरीर के हर छेद में भर गया।


उसके बाद नियमित हो गया। कभी अकेले, कभी ग्रुप। कभी पब्लिक प्लेस में, कार में, छत पर। साहब ने मुझे सिखाया कैसे और दर्द सहूँ, कैसे और मजे लूँ। बीडीएसएम के सामान आए—हथकड़ी, चाबुक, वैक्यूम कप, एनल प्लग। मेरी चूत, गाँड, मुँह सब इस्तेमाल होते रहे।
माँ को शक तो था लेकिन पैसे देखकर चुप रहती। भाई स्कूल जाने लगा अच्छी जगह। पिता की दवाई चलने लगी। मैं कॉलेज भी जाने लगी लेकिन शरीर अब पहले जैसा नहीं रहा। रात को याद आती वे धक्के, वे थप्पड़, वे गरम धारें।


अब मैं खुद मांगती हूँ। जब पैसे की जरूरत होती है तो फोन करती हूँ। साहब हँसते हैं, “आ जा रंडी।” और मैं चली जाती हूँ। नंगी होकर उनके सामने खड़ी हो जाती हूँ। हाथ ऊपर करती हूँ। वे बाँधते हैं, मारते हैं, चोदते हैं। जितना बर्बर, जितना क्रूर, उतना ही मैं भीग जाती हूँ।
मेरी कुंवारी चूत की पहली चुदाई ऐसे हुई। दर्द से भरी, खून से लथपथ, पैसे के लालच में। लेकिन अब वह दर्द मेरी आदत बन चुका है। शरीर माँगता है और मैं देती हूँ।


अब मैं खुद फोन करती हूँ। जब पैसे की जरूरत होती है या सिर्फ शरीर तड़पता है तो नंबर मिलाती हूँ। साहब हँसते हैं, “आ जा रंडी। आज खास तैयारी है।” और मैं चली जाती हूँ।
उस दिन घर पहुँची तो कमरा पहले से तैयार था। बेड पर काली चादर बिछी थी, चारों कोनों पर मोटी रस्सियाँ बँधी थीं। दीवार पर चाबुक, चमड़े की पट्टी, मोटे लोहे के हथकड़े, वैक्यूम कप, मोटे-मोटे एनल प्लग और एक लंबा धातु का स्पेकुलम रखा था। साहब नंगे खड़े थे। उनका लंड पहले से तना हुआ, नसों से फूला हुआ। उन्होंने मुझे देखते ही हुक्म दिया, “कपड़े उतार। सब।”


मैंने एक-एक करके उतारे। नंगी खड़ी हो गई। चूचियाँ भारी, निप्पल्स पहले से कड़े। चूत पहले से गीली थी। साहब ने पास आकर दोनों चूचियों को जोर से मसला। नाखून गड़ा दिए। मैं कराह उठी। फिर उन्होंने वैक्यूम कप दोनों निप्पल्स पर लगाए और पंप करना शुरू किया। चूचियाँ फूलने लगीं, दर्द बढ़ता गया। निप्पल्स काले पड़ने लगे, खून जैसे अंदर जमा हो रहा हो। मैंने हाथ आगे बढ़ाया तो उन्होंने थप्पड़ जड़ा। “हिलेगी नहीं।”


फिर मुझे बेड पर लिटाया। हाथ-पाँव चारों रस्सियों से बाँध दिए। इतनी कसकर कि कलाई और टखनों पर लाल निशान पड़ गए। टाँगें पूरी फैली हुईं। चूत खुली पड़ी थी। साहब ने स्पेकुलम उठाया, क्रीम लगाई और चूत के मुँह में घुसाया। धीरे-धीरे खोला। चूत की दीवारें फैलती गईं। मैं चीखी। उन्होंने और खोला। अंदर तक दिखने लगा। फिर उंगलियाँ अंदर डालकर दीवारों को खींचने लगे। “आज इसे और ढीला करेंगे।”


चाबुक उठाया। पहले चूचियों पर। वैक्यूम कप लगे होने के कारण दर्द दोगुना हो गया। फिर पेट पर, फिर अंदरूनी जाँघों पर। हर वार पर त्वचा जलने लगी। लाल धारियाँ पड़ गईं। कुछ वार चूत के ऊपर भी जड़े। फाँक पर चाबुक की नोक लगते ही मैं झटकी। खून की छोटी-छोटी बूँदें निकल आईं। साहब हँसते रहे, “चिल्ला। घर में कोई नहीं है।”


फिर उन्होंने मोटा एनल प्लग लिया। क्रीम लगाई और गाँड के छेद पर लगाया। एक जोर का धक्का। प्लग अंदर चला गया। मैंने दाँत भींच लिए। साहब ने प्लग को घुमाया, अंदर-बाहर किया। फिर लंड चूत में ठूंस दिया। स्पेकुलम निकाले बिना। दोनों चीजें एक साथ। चूत और गाँड दोनों भरे हुए। धक्के इतने जोर के थे कि बेड हिल रहा था। हर धक्के पर प्लग और गहरा जाता। मेरी आँखों से पानी बह रहा था लेकिन चूत पानी छोड़ रही थी।


बीस मिनट बाद उन्होंने लंड निकाला, मुँह के पास लाए। “चाट। अपना खून और पानी।” मैंने चाटा। फिर उन्होंने मेरे बालों में मुट्ठी बाँध ली और गले तक पेल दिया। साँस रुक गई। उन्होंने रोके रखा। जब मैं काली पड़ने लगी तो निकाला। फिर वापस चूत में। इस बार दोनों हाथों से गर्दन दबाई। साँस पूरी तरह बंद। धक्के जारी। मुझे लग रहा था अब मर जाऊँगी। तभी उन्होंने छोड़ दिया। मैं हाँफ रही थी।


उन्होंने रस्सियाँ खोलीं लेकिन हथकड़े हाथों में डाल दिए। मुझे घुटनों के बल खड़ा किया। पीछे से फिर घुसाया। एक हाथ से बाल पकड़े, दूसरे से चाबुक जाँघों पर जड़ते रहे। “गिन।” मैं गिनने लगी। पचास तक पहुँचे तब जाकर रुके। जाँघें सूज गई थीं, नीली पड़ने लगी थीं।
उस दिन वे तीन बार झाड़े। एक बार चूत में, एक बार गाँड में, एक बार मुँह में। आखिरी बार मुँह में इतना जोर से पेल रहे थे कि मैंने उल्टी कर दी। उन्होंने हँसते हुए कहा, “साफ कर।” मैंने फर्श चाटा।


रात को जब घर लौटी तो चल नहीं पा रही थी। चूत और गाँड दोनों जल रहे थे। निप्पल्स अभी भी फूलें हुए थे। माँ ने पूछा तो कहा कॉलेज में चोट लग गई। पैसे दे दिए। माँ चुप हो गई।
अगले हफ्ते और बुरा हुआ। साहब ने अपने दो दोस्त बुलाए। एक मोटा, दूसरा लंबा दुबला। तीनों ने मुझे नंगा करके बीच में खड़ा किया। पहले मोटे ने चाबुक से पीठ पर इतने वार जड़े कि खून की लकीरें बहने लगीं। फिर दुबले ने चूचियों को रस्सी से बाँधा और ऊपर खींच लिया।

दर्द असहनीय। फिर तीनों ने बारी-बारी से मुँह, चूत और गाँड भरे। एक के निकलते ही दूसरा घुस जाता। मेरी चूत से खून और वीर्य का मिश्रण बह रहा था। गाँड फटने के कगार पर थी। उन्होंने मुझे फर्श पर लिटाया, टाँगें कंधों तक मोड़ीं और एक साथ दो लंड चूत में ठूंसने की कोशिश की। मैं चीखी। फटी। खून और ज्यादा बहने लगा। वे रुके नहीं। जब दोनों अंदर हो गए तो धक्के लगाने लगे। मेरी चीखें कमरे में गूँज रही थीं।


तीन घंटे बाद उन्होंने छोड़ दिया। मैं बेड पर पड़ी सिसक रही थी। शरीर के हर छेद से वीर्य और खून रिस रहा था। पीठ पर चाबुक के निशान, चूचियों पर रस्सी के गड्ढे, कलाई और टखनों पर हथकड़ों के घाव। साहब ने पैसे गिनकर मेरे हाथ में रखे, “अगली बार और लाएँगे।”
मैं उठकर कपड़े पहन नहीं पाई। उन्होंने खुद मुझे नहलाया, जख्मों पर दवा लगाई और गाड़ी में बिठाकर घर छोड़ा। रास्ते में उन्होंने मेरी चूत में उंगली डाले रखा। “सूखी मत होना।”


घर पहुँचकर मैं सीधे बिस्तर पर गिर गई। रात भर दर्द से कराहती रही। सुबह उठकर देखा तो चूत अभी भी सूजी हुई थी, गाँड से खून रिस रहा था। फिर भी शाम को फिर फोन किया। शरीर माँग रहा था।
अब कॉलेज में मेरा एक बॉयफ्रेंड बन गया था। नाम रोहित। मेरी ही क्लास का। अच्छा लड़का, गरीब घर का। मुझे पसंद करता था। मैंने उससे बातें कीं, घूमी। एक दिन उसने मुझे पार्क में चूमा। मैंने जवाब दिया। रात को जब साहब के यहाँ से लौटी तो रोहित ने मेसेज किया, “कल मिलते हैं।”


मैं मिली। हम नदी के किनारे बैठे। उसने मेरा हाथ पकड़ा। “प्रिया, मैं तुमसे प्यार करता हूँ।” मैंने मुस्कुराकर कहा, “मैं भी।” लेकिन अंदर से मेरी चूत अभी भी साहब के लंड की याद से धड़क रही थी। रोहित ने मुझे चूमा। हाथ चूचियों पर ले गया। मैंने नहीं रोका। वह उत्साहित हो गया। “चलो कहीं एकांत में।”


हम एक पुरानी इमारत के पीछे चले गए। रोहित ने मुझे दीवार से सटाया। कमीज के बटन खोले। चूचियाँ निकालीं। उसने मुँह में लिया। मैंने उसकी पेंट खोली। उसका लंड निकला—साहब से छोटा, पतला। मैंने मुठ मारी। वह जल्दी गरम हो गया। उसने मेरी सलवार नीचे की। चूत में उंगली डाली। “इतनी गीली?” मैंने कुछ नहीं कहा।


वह मुझमें घुस गया। दर्द नहीं हुआ। साहब ने पहले ही ढीला कर रखा था। रोहित जोर-जोर से पेलने लगा। मैंने उसके कंधे पकड़ लिए। अंदर से मुझे हँसी आ रही थी। यह तो बच्चों का खेल लग रहा था। फिर भी मैं कराहने लगी। वह जल्दी झाड़ गया। अंदर ही।
उसने मुझसे लिपटते हुए कहा, “तुम मेरी हो गई।” मैंने सिर हिलाया। लेकिन उसी रात साहब का फोन आया। “आजा। आज अकेले हैं। खास सामान लाया हूँ।”


मैं गई। रोहित को मेसेज किया कि माँ बीमार है। साहब के कमरे में पहुँची तो उन्होंने मुझे देखते ही गला दबाया। “आज तेरे बॉयफ्रेंड की खुशबू आ रही है।” उन्होंने नाक में सूँघा। “चूत में किसी और का वीर्य है?”
मैं काँप गई। उन्होंने मुझे बेड पर पटक दिया। कपड़े फाड़ दिए। चूत में उंगली डाली, निकालकर सूँघा। “हरामी। किसी और से चुदवाया?” गुस्से में उन्होंने चाबुक उठाया। इस बार कोई गिनती नहीं। पीठ, चूत, चूचियाँ, जाँघें—जहाँ चाबुक पड़ा। मैं चीखती रही। खून की धारें बहने लगीं। फिर उन्होंने मोटा लोहे का रॉड जैसा डंडा उठाया। चूत में घुसाया। अंदर तक। घुमाया। निकालकर गाँड में ठूंस दिया। मैं बेहोशी के कगार पर थी।


उन्होंने मुझे उल्टा लटकाया। पैरों से बाँधकर छत के हुक से। सिर नीचे। खून दिमाग में भर गया। फिर चाबुक से चूत पर वार। हर वार पर चूत खुलती और बंद होती। उन्होंने लंड मुँह में ठूंस दिया। उल्टी आ गई। उन्होंने नहीं निकाला। गला भर गया।
जब उन्होंने मुझे उतारा तो मैं चल नहीं पा रही थी। उन्होंने मुझे फर्श पर घसीटा। कुत्ते की तरह। फिर पीछे से घुसे। एक हाथ से गर्दन दबाई, दूसरे से चूचियाँ मसलते रहे। “अब से कोई और छूने नहीं पाएगा। समझी?” मैंने सिर हिलाया। वे झाड़ते समय मेरे कान में बोले, “कल तेरे बॉयफ्रेंड को भी बुलाऊँगा। देखूँगा कैसे चुदाई करता है।”


मैं डरी हुई घर लौटी। शरीर जल रहा था। रोहित ने सुबह मेसेज किया, “आज मिलते हैं न?” मैंने जवाब नहीं दिया। दोपहर को साहब का फोन आया। “रोहित को पता चल गया है। वह आ रहा है यहाँ। तू भी आजा।”
मेरा दिल बैठ गया। लेकिन गई। जब पहुँची तो रोहित पहले से वहाँ था। उसकी आँखें लाल थीं। साहब ने मुस्कुराते हुए कहा, “आजा रंडी। अपने प्रेमी को दिखा कैसे चुदती है तू।”


रोहित चिल्लाया, “प्रिया यह क्या है?” साहब ने उसे कुर्सी पर बैठाया। “देख। और चुप रह।”
उन्होंने मुझे नंगा किया। रोहित के सामने। चाबुक से पीटा। रोहित रोने लगा। साहब ने मुझे उसके सामने घुटनों के बल बैठाया। “इसका लंड निकाल और मुँह में ले।” मैंने रोहित की पेंट खोली। उसका लंड अभी भी नरम था। मैंने मुँह में लिया। साहब पीछे से मेरी गाँड में घुस गए। धक्के लगाते हुए बोले, “जोर से चूस। नहीं तो और पीटूँगा।”


रोहित रो रहा था लेकिन लंड तन गया। मैंने चूसा। साहब ने मेरी चूत में उंगलियाँ डालकर तेजी से चलाया। फिर उन्होंने रोहित को हुक्म दिया, “तू भी आ। इसकी गाँड में घुस।” रोहित ने मना किया। साहब ने चाबुक उठाया। “नहीं तो मैं इसे अभी मार डालूँगा।”
रोहित काँपते हुए आया। उसने अपनी पतली लंड मेरी गाँड में डाली। साहब चूत में थे। दोनों एक साथ पेलने लगे। मैं बीच में दब गई। दर्द और अपमान दोनों। साहब हँस रहे थे। “देख तेरी प्रेमिका कितनी अच्छी रंडी है।”


वे घंटों चले। रोहित कई बार झाड़ गया। साहब ने उसे मजबूर किया कि वह मेरी चूत का खून चाटे। रोहित ने किया। रोते हुए। आखिर में साहब ने दोनों को एक साथ बाँध दिया। मुझे और रोहित को आमने-सामने। फिर चाबुक दोनों पर जड़ने लगे। “अब से तुम दोनों मेरे हो।”
रात गए जब छोड़ा तो रोहित बोल नहीं पा रहा था। मैं भी नहीं। साहब ने पैसे दोनों को दिए। “कल फिर आना। और दोस्त लाऊँगा।”
घर लौटकर रोहित ने मुझसे कहा, “मैं पुलिस में शिकायत करूँगा।” मैंने उसका मुँह बंद किया। “पैसे देख। घर चल जाएगा। चुप रह।” वह रोया। लेकिन अगले दिन फिर दोनों साहब के घर पहुँचे।


अब हम दोनों उनकी संपत्ति थे। रोहित को भी बाँधते, पीटते, मेरी चूत चाटने को मजबूर करते। कभी मुझे उसके मुँह पर बैठाते। कभी दोनों को एक साथ चोदते। कभी चाबुक से इतना पीटते कि हम चल नहीं पाते।
मेरी जिंदगी अब सिर्फ दर्द, वीर्य, खून और पैसे की हो गई थी। रोहित भी बदल गया। पहले रोता था। अब खुद माँगने लगा। “आज और जोर से मारना।” साहब खुश होते।

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