प्रोफेसर के बिस्तर के नीचे लेटा कबीर। ऊपर चुदाई की आवाज़ें, नीचे लंड में सुइयाँ। हर धक्के के साथ दर्द बढ़ता गया, फिर भी वो और मांगता रहा।
सुबह सात बजकर बीस मिनट पर मैं फिर उस घर के दरवाज़े पर था। शरीर पर कल के क्लिप्स और बेल्ट के निशान अभी भी साफ दिख रहे थे। गांड की जलन बाकी थी। फिर भी हाथ खुद-ब-खुद घंटी बजाने को उठ गए।
निशा ने दरवाज़ा खोला। इस बार उनकी आँखों में पहले से ज़्यादा ठंडी चमक थी। उन्होंने मुझे अंदर खींचा और फुसफुसाकर कहा,
“प्रोफेसर अभी भी सो रहे हैं। आज तुम उनके बेडरूम के ठीक बाहर खड़े रहोगे। नंगे। और तुम्हारे लंड पर वजन लटकेंगे। एक भी आवाज़ निकली तो सब खत्म।”
वे मुझे ऊपर की सीढ़ियों की तरफ ले गईं। बेडरूम का दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर प्रोफेसर की भारी साँसें आ रही थीं। निशा ने मुझे नंगा किया। हाथ पीछे बाँध दिए। मुँह में कपड़ा ठूंसकर टेप लगा दिया। फिर उन्होंने एक छोटी सी भारी लोहे की रिंग निकाली और उसे मेरे अंडकोष के नीचे से निकालकर लंड के आधार पर कस दी। रिंग से एक पतली चेन लटकी थी। चेन के सिरे पर एक मोटा लोहे का वज़न था—लगभग एक किलो।
निशा ने वज़न छोड़ दिया। पूरा भार अंडकोष और लंड पर आ गया। दर्द तुरंत नीचे तक उतर गया। मैं लगभग झुक गया लेकिन निशा ने मेरे कंधे पकड़कर सीधा खड़ा कर दिया।
“सीधे खड़े रहो। घुटने मत मोड़ो। आधा घंटा कम से कम।”
वे चली गईं। मैं बेडरूम के दरवाज़े के ठीक बाहर नंगा खड़ा था। वज़न हर साँस के साथ झूल रहा था और अंडकोष को नीचे खींच रहा था। दर्द धीरे-धीरे बढ़ रहा था। प्रोफेसर की साँसें अंदर से साफ सुनाई दे रही थीं। अगर वे जाग गए तो बस दो कदम की दूरी थी।
बीस मिनट बीत चुके होंगे। पैर काँपने लगे थे। वज़न और भारी लग रहा था। अचानक निशा वापस आईं। उन्होंने मेरे कान में फुसफुसाया,
“अभी तक संभाला? अच्छा।”
उन्होंने वज़न को थोड़ा ऊपर उठाया और फिर झटके से छोड़ दिया। दर्द की तेज़ लहर उठी। फिर उन्होंने एक और छोटा वज़न चेन में लगा दिया। अब भार लगभग डेढ़ किलो हो गया था। मैं दाँत भींचकर खड़ा रहा।
निशा ने मेरी जाँघ के अंदरूनी हिस्से पर नाखून फेरते हुए कहा,
“मैं अंदर जा रही हूँ। प्रोफेसर के पास। तुम यहीं सुनते रहना।”
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वे बेडरूम में चली गईं। दरवाज़ा थोड़ा और खोल दिया। मैं उनकी आवाज़ सुन सकता था। निशा प्रोफेसर को जगा रही थीं—नरम स्वर में। फिर बिस्तर की हल्की आवाज़ आने लगी। कपड़ों की रगड़। प्रोफेसर की नींद भरी आवाज़। निशा जानबूझकर मेरे सामने वाले कोने में खड़ी होकर अपनी साड़ी का पल्लू ठीक कर रही थीं ताकि मैं उनकी हरकतों का अंदाज़ा लगा सकूँ।
फिर धीमी सिसकारियाँ शुरू हुईं। निशा प्रोफेसर के साथ थी। मैं बाहर नंगा खड़ा था, वज़न झूल रहा था, और अंदर वो आवाज़ें आ रही थीं। जलन और बेबसी एक साथ बढ़ रही थी। मेरा लंड वज़न के बावजूद तन रहा था। हर बार जब अंदर की आवाज़ तेज़ होती, वज़न और झूलता।
लगभग पैंतालीस मिनट बाद निशा बाहर आईं। उनके बाल बिखरे हुए थे। गाल लाल थे। उन्होंने मेरे वज़न को देखा और मुस्कुराईं।
“तुम्हारा लंड अभी भी तना है… जबकि मैं अंदर चुद रही थी।”
उन्होंने वज़न को थोड़ा घुमाया। दर्द तेज़ हो गया। फिर वे मेरे पीछे गईं और मेरे गांड के दोनों हिस्सों को फैलाया। ठंडी उंगली अंदर घुस गई। एक, फिर दो। वे अंदर घुमा रही थीं जबकि वज़न सामने झूल रहा था।
“अब और खड़े रहो। मैं फिर अंदर जा रही हूँ।”
निशा वापस बेडरूम में चली गईं। इस बार आवाज़ें और साफ थीं। बिस्तर की चरमराहट, निशा की दबी सिसकारियाँ, प्रोफेसर की भारी साँसें। मैं बाहर खड़ा सुन रहा था। पैर अब पूरी तरह काँप रहे थे। वज़न ने अंडकोष को सुन्न करना शुरू कर दिया था लेकिन दर्द कम नहीं हो रहा था।
एक घंटा बीत चुका होगा। अचानक बेडरूम से प्रोफेसर की आवाज़ आई—“पानी लाओ।” निशा जल्दी से बाहर निकलीं। उन्होंने मुझे देखा। मेरे माथे पर पसीना था। आँखों में आँसू। उन्होंने झट से वज़न पकड़ा और मेरे कान में कहा,
“हिलो मत। बिलकुल मत।”
वे पानी का गिलास लेकर अंदर चली गईं। प्रोफेसर ने पानी पिया। फिर फिर से बिस्तर की आवाज़ें शुरू हो गईं। निशा जानबूझकर दरवाज़े के पास ही रहने लगीं ताकि उनकी आवाज़ मुझे साफ सुनाई दे।
जब निशा दोबारा बाहर आईं तो उनके चेहरे पर एक क्रूर संतुष्टि थी। उन्होंने मेरे मुँह से टेप हटाया।
“बोलो।”
“और… वज़न बढ़ा दो…”
निशा की आँखें चमक उठीं। उन्होंने एक और वज़न जोड़ा। अब कुल भार दो किलो के करीब था। अंडकोष बुरी तरह खिंच गए। मैं लगभग बैठने ही वाला था लेकिन निशा ने मेरे बाल पकड़कर सीधा किया।
“अब अंतिम हिस्सा।”
उन्होंने मुझे बेडरूम के दरवाज़े से और करीब खींचा। सिर्फ एक फुट की दूरी रह गई थी। अंदर प्रोफेसर गहरी नींद में थे। निशा ने मेरे लंड को पकड़ा और वज़न के साथ ही उसे अपनी हथेली में मसलना शुरू किया। ऊपर से नीचे। नाखून से। वज़न हर हरकत के साथ झूलता और खींचता।
“इसी वज़न के साथ चरम पर पहुँचो। बिना आवाज़ के। अगर आवाज़ निकली तो प्रोफेसर जाग जाएंगे।”
मैं हिल रहा था। दर्द और उत्तेजना एक साथ चोटी पर थे। निशा की हथेली तेज़ हो गई। वज़न लगातार खींच रहा था। मेरी साँसें तेज़ हो गईं लेकिन आवाज़ दबाने की पूरी कोशिश थी। अचानक शरीर ऐंठ गया। वीर्य निकलने लगा—वज़न पर, फर्श पर, निशा की हथेली पर। मैं काँप रहा था लेकिन चीख नहीं निकली।
निशा ने वीर्य को अपनी उंगली से उठाया और मेरे मुँह में ठूंस दिया।
“निगल।”
मैंने निगल लिया। निशा ने वज़न धीरे-धीरे हटाया। अंडकोष में जलन इतनी तेज़ थी कि खड़े रहना मुश्किल हो रहा था। उन्होंने हाथ की रस्सी खोली। मेरे हाथ नीचे गिरे।
“आज काफी हो गया,” निशा ने कहा। “कल फिर आना। अगली बार मैं तुम्हें उनके बिस्तर के नीचे छिपाऊँगी। और ऊपर चुदाई होते समय तुम्हारे लंड में सुई चुभाती रहूँगी।”
मैंने सिर हिलाया। कपड़े पहनने में हाथ काँप रहे थे। सीढ़ियों से नीचे उतरते समय हर कदम पर अंडकोष में दर्द उठ रहा था। दरवाज़े तक पहुँचते-पहुँचते साँस फूल गई।
बाहर निकलते समय निशा ने पीछे से आवाज़ दी,
“कबीर… तुम्हारा डर अब मेरा सबसे बड़ा नशा है। कल और करीब जाएंगे।”
मैं गली में निकला। सुबह की रोशनी में आँखें चौंधिया गईं। हर कदम भारी लग रहा था। लेकिन दिमाग में सिर्फ एक तस्वीर घूम रही थी—कल बेडरूम के बिस्तर के नीचे छिपकर लेटना, ऊपर की आवाज़ें सुनना, और निशा की सुई।
सुबह सात बजकर पंद्रह मिनट पर मैं फिर उस घर के सामने खड़ा था। कल का वज़न अभी भी अंडकोष में दर्द छोड़ गया था। चलते समय हर कदम भारी लग रहा था। फिर भी हाथ ने घंटी दबा दी।
निशा ने दरवाज़ा खोला। इस बार उनका चेहरा पहले से ज़्यादा गंभीर था। उन्होंने मुझे अंदर खींचा और फुसफुसाकर कहा,
“आज प्रोफेसर अभी सो रहे हैं। तुम उनके बिस्तर के नीचे जाओगे। और जब मैं ऊपर चुदवाऊँगी, तुम्हारे लंड में सुई चुभती रहेगी। एक भी हरकत या आवाज़ हुई तो सब खत्म।”
वे मुझे ऊपर ले गईं। बेडरूम का दरवाज़ा बंद था। निशा ने धीरे से खोला। प्रोफेसर गहरी नींद में थे। बिस्तर बड़ा था। निशा ने मुझे नंगा किया। हाथ पीछे बाँध दिए। मुँह में मोटा कपड़ा ठूंसकर टेप लगा दिया। फिर उन्होंने मुझे बिस्तर के नीचे धकेल दिया।
जगह बहुत तंग थी। पीठ फर्श से चिपक रही थी। ऊपर गद्दे का भार महसूस हो रहा था। निशा ने मेरे पैर फैला दिए और लंड को सीधा किया। फिर एक छोटी चमकदार सुई निकाली। मेरे लंड के सिरे के ठीक नीचे नोक रखी और धीरे-धीरे धकेल दी। दर्द तेज़ था। सुई आधी अंदर चली गई। फिर दूसरी सुई दूसरी तरफ। तीसरी सुई अंडकोष के पास त्वचा में।
“अब ये अंदर रहेंगी। मैं ऊपर जा रही हूँ।”
निशा बिस्तर पर चढ़ गईं। मैं नीचे से उनकी हरकतों को महसूस कर सकता था। गद्दा दब रहा था। कुछ देर बाद प्रोफेसर की नींद भरी आवाज़ आई। निशा उन्हें जगा रही थीं। कपड़ों की आवाज़। फिर बिस्तर चरमराया। निशा की दबी सिसकारी। प्रोफेसर की भारी साँस।
मैं नीचे लेटा हुआ सब सुन रहा था। हर बार जब ऊपर धक्का लगता, गद्दा मेरे सीने पर दबाव डालता और लंड में चुभी सुइयाँ हिलतीं। दर्द की लहरें दौड़तीं। मेरा लंड सुइयों के बावजूद तन रहा था। खून की पतली लकीरें टपकने लगी थीं।
आधा घंटा बीत चुका होगा। ऊपर की चुदाई तेज़ हो रही थी। बिस्तर जोर-जोर से हिल रहा था। निशा जानबूझकर अपने पैर को नीचे की तरफ सरका रही थीं। अचानक उनका पैर मेरे लंड पर पड़ गया। सुइयाँ और धँस गईं। मैं सिसक उठा लेकिन आवाज़ कपड़े में दब गई। निशा का पैर मेरे लंड को दबा रहा था—जानबूझकर। ऊपर से वे प्रोफेसर को और उत्तेजित कर रही थीं।
“ज़ोर से… और अंदर…” निशा की आवाज़ आ रही थी।
उनका पैर नीचे और दबाव डाल रहा था। सुइयाँ लंड के अंदर खिसक रही थीं। दर्द असहनीय हो चला था। आँखों से आँसू बह रहे थे। फर्श गीला हो रहा था। मैं हिल नहीं सकता था। एक भी हलचल पर बिस्तर के ऊपर पता चल सकता था।
ऊपर चरम की आवाज़ें आने लगीं। प्रोफेसर की भारी कराह। निशा की दबी चीख। बिस्तर एकदम रुक गया। फिर भारी साँसें। प्रोफेसर शायद सो गए या थककर लेट गए। निशा कुछ देर चुप रही। फिर धीरे से बिस्तर से उतरीं।
वे मेरे पास झुकीं। बिस्तर के नीचे उनका चेहरा दिखाई दिया। आँखों में क्रूर चमक।
“अभी तक जिया हुआ है?” उन्होंने फुसफुसाया।
उन्होंने एक सुई को थोड़ा और अंदर धकेला। मैं तड़प उठा। निशा मुस्कुराईं। फिर उन्होंने मेरे मुँह से टेप हटाया।
“बोल… लेकिन बहुत धीरे।”
“सुई… और चुभाओ…”
निशा की साँस तेज़ हो गई। उन्होंने चौथी सुई निकाली और लंड के सबसे संवेदनशील नस पर चुभा दी। दर्द इतना तेज़ था कि मेरी साँस रुक गई। निशा ने मेरा लंड पकड़ा और सुइयों के साथ ही धीरे-धीरे ऊपर-नीचे करने लगीं। खून और अधिक बहने लगा।
“प्रोफेसर सो रहे हैं। लेकिन अगर जागे तो…” उन्होंने बात अधूरी छोड़ दी।
निशा ने मेरे ऊपर अपना एक घुटना रख दिया। सीने पर दबाव बढ़ गया। फिर उन्होंने अपना दूसरा हाथ नीचे भेजा और मेरे अंडकोष को पकड़कर मसलना शुरू किया। सुइयाँ हिल रही थीं। दर्द और दबाव एक साथ। मैं रो रहा था—बिना आवाज़ के। आँसू फर्श पर गिर रहे थे।
अचानक ऊपर प्रोफेसर की करवट लेने की आवाज़ आई। निशा झट से रुक गईं। दोनों ने साँस रोक ली। कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर प्रोफेसर की गहरी साँसें फिर शुरू हो गईं। निशा ने राहत की साँस ली और फिर से मेरे लंड को मसलना शुरू कर दिया।
“आज तुम यहीं रहोगे जब तक वो बाथरूम न जाएँ,” निशा ने कहा। “और जब तक मैं कहूँ, सुइयाँ अंदर रहेंगी।”
वे वापस बिस्तर पर चढ़ गईं। इस बार वे प्रोफेसर के पास लेट गईं। मैं नीचे सुन सकता था—उनकी धीमी बातें, फिर फिर से कपड़ों की आवाज़। प्रोफेसर फिर से उत्तेजित हो रहे थे। बिस्तर हिलने लगा। निशा जानबूझकर अपने शरीर का वजन ऐसे रख रही थीं कि गद्दा मेरे लंड पर और दबाव डाले। सुइयाँ हर धक्के के साथ धँसतीं।
इस बार चुदाई और लंबी चली। लगभग चालीस मिनट। मैं नीचे खून और पसीने में नहाया हुआ लेटा रहा। लंड सुन्न होने लगा था लेकिन दर्द कम नहीं हो रहा था। जब ऊपर फिर से चरम की आवाज़ें आईं तो निशा ने जानबूझकर अपना पैर फिर से मेरे लंड पर दबा दिया। सुइयाँ और गहराई तक चली गईं। मैंने मुँह में कपड़ा होने के बावजूद जोर से सिसका। आवाज़ दब गई।
प्रोफेसर थककर सो गए। निशा धीरे से उतरीं। इस बार उन्होंने सभी सुइयाँ एक-एक करके निकालीं। हर सुई निकलते समय ताज़ा दर्द होता। लंड पर छोटे-छोटे छेद और खून की धारें थीं। निशा ने खून को अपनी उंगली से उठाया और मेरे मुँह में डाल दिया।
“चाटो।”
मैंने चाटा। निशा ने हाथ की रस्सी खोली। मेरे हाथ सुन्न थे। वे मुझे बिस्तर के नीचे से बाहर खींचने लगीं। शरीर घिसट रहा था। खून के निशान फर्श पर रह गए।
निशा ने मुझे बैठने में मदद की। मेरे लंड को देखा और धीरे से छुआ।
“आज बहुत गहराई तक चली गईं सुइयाँ। कल और मोटी वाली इस्तेमाल करूँगी।”
उन्होंने मेरे कपड़े फेंके। मैं लड़खड़ाते हुए खड़ा हुआ। पैर काँप रहे थे। बेडरूम से बाहर निकलते समय प्रोफेसर की गहरी साँसें अभी भी आ रही थीं। सीढ़ियों से नीचे उतरना मुश्किल हो रहा था।
दरवाज़े पर निशा ने मुझे रोका। उनके चेहरे पर एक अजीब सी भूख थी।
“कल सुबह सात बजे आना। अगली बार मैं तुम्हें उनके बाथरूम में छिपाऊँगी। जब वो नहा रहे होंगे, मैं तुम्हारे अंडकोष पर क्लिप लगाकर खींचती रहूँगी। समझे?”
मैंने सिर हिलाया। निशा ने दरवाज़ा खोला। मैं गली में निकल आया। सुबह की रोशनी में आँखें चौंधिया गईं। लंड पर खून के छोटे धब्बे कपड़े से चिपक रहे थे। हर कदम पर जलन उठ रही थी।
लेकिन दिमाग में सिर्फ एक बात घूम रही थी—कल बाथरूम, क्लिप, और निशा की वह आवाज़। अब ये खेल सिर्फ सज़ा का नहीं रह गया था। ये एक नशा बन चुका था जो हर दिन और गहरा होता जा रहा था। और मैं खुद को इससे बाहर निकालने की कोई कोशिश नहीं कर रहा था।