बाप की रंडी मौसी

बेटा नाइट विजन से देखता रहा जब बाप ने मौसी को खंभे से बाँधकर चाबुक मारे, मुट्ठी से फाड़ा, गांड कुचली और गला दबाकर कुतिया बनाया। खून का सबसे गन्दा, बर्बर राज़।

यह कहानी राजस्थान के एक छोटे से कस्बे नागौर की है। वहाँ की धूल भरी गलियाँ, पुराने पत्थर के मकान और तपती दोपहरें किसी को भी याद रह जाएँ। मैं अमन था, बाईस साल का, और मेरे पिता महेंद्र सिंह—पैंतालीस साल के मोटे-तगड़े आदमी—उस पुराने हवेलीनुमा घर में अकेले रह रहे थे। माँ और छोटा भाई रोहन शहर में थे, क्योंकि रोहन की पढ़ाई चल रही थी। परिवार बँट चुका था। जमीन-जायदाद, दुकानें, सब कुछ बाँट लिया गया था। पिताजी को गाँव की पुरानी हवेली और कुछ खेत मिले थे, इसलिए हम दोनों वहीं रह गए।


हवेली में दो बड़े कमरे थे। एक में मैं सोता था, दूसरे में पिताजी। रातें लंबी और सुनसान होती थीं। उस रात मुझे नींद नहीं आ रही थी। मैं अपने बिस्तर पर लेटा फोन घुमा रहा था। मुझे ऑनलाइन सामान मँगवाने का शौक था। कुछ हफ़्ते पहले मैंने एक हाई-टेक नाइट विजन डिवाइस मँगवाया था—सैन्य स्तर का, जो अँधेरे में भी सब कुछ साफ दिखाता था।


अचानक मुझे हल्की खटखटाहट की आवाज आई। मैंने उठने का सोचा, लेकिन पिताजी के गुस्से का डर था। तभी दिमाग में ख्याल आया। मैंने नाइट विजन पहन लिया और चुपके से दरवाजे की ओर बढ़ा। जो नजारा देखा, उससे मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।


पिछले दरवाजे से एक औरत अंदर आ रही थी। मेरी मौसी—रेखा। पैंतीस साल की, गेहुआँ रंग, घनी काली बालों वाली, और शरीर ऐसा जैसे किसी मूर्तिकार ने गढ़ा हो। कमर छत्तीस इंच, और सीने पर दो भारी-भरकम स्तन जो साड़ी के नीचे भी अपनी उपस्थिति जता रहे थे। पिताजी ने दरवाजा खोला और धीमी आवाज में कहा, “अंदर आ जा। आवाज मत करना।”


रेखा अंदर आई और बिना एक पल गवाए पिताजी से लिपट गई। दोनों के होंठ एक-दूसरे में खो गए। पिताजी ने उसकी साड़ी के पल्लू को खींचा। साड़ी फर्श पर गिर गई। उसके नीचे सिर्फ एक पतली ब्लाउज और पेटीकोट था। पिताजी ने ब्लाउज के हुक खोले। रेखा के स्तन बाहर निकल आए—गोल, भारी, और निप्पल सख्त। पिताजी ने दोनों हाथों से उन्हें पकड़ा और जोर से मसला। रेखा कराह उठी।
“आज तो पूरी तरह से इस्तेमाल करूँगा तुझे,” पिताजी ने कहा। उनकी आवाज में एक क्रूर मजा था।


वे दोनों मेरे कमरे से सटे कमरे में चले गए। मैं नाइट विजन से सब देख रहा था। पिताजी ने रेखा को बिस्तर पर धकेल दिया। वह गिरते-गिरते हँसी। पिताजी ने उसकी पेटीकोट फाड़ दी। नीचे कुछ नहीं था। रेखा ने पूरी तरह साफ कर रखा था। उसकी योनि चिकनी चमक रही थी। पिताजी ने उसके पैर फैलाए और बिना किसी प्रस्तावना के अपना मुँह वहाँ लगा दिया। जीभ अंदर घुसाई, चूसा, काटा। रेखा के हाथ चादर कस गए। उसकी कराहें दबी हुई थीं, लेकिन कमरे में गूँज रही थीं।

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पिताजी ने अपना मुँह हटाया। उनके होंठ रेखा के रस से चमक रहे थे। “आज तो मैं तुझे कुतिया की तरह चोदूँगा,” उन्होंने कहा। रेखा ने सिर हिलाया। “करो। जितना चाहो बर्बर बनो।”
पिताजी ने अपने पजामे की डोरी खोली। उनका लिंग बाहर निकला—मोटा, लंबा, नसों से भरा हुआ। रेखा ने उसे देखा और मुँह खोला। पिताजी ने उसके बाल पकड़े और अपना लिंग उसके मुँह में ठूंस दिया। रेखा ने गला खोला। पिताजी ने उसके सिर को दोनों हाथों से पकड़कर जोर-जोर से हिलाया। रेखा की आँखों से आँसू बहने लगे, लेकिन उसने विरोध नहीं किया। गले से अजीब सी आवाजें आ रही थीं। पिताजी ने कुछ देर ऐसा ही किया, फिर लिंग निकाला। रेखा ने खाँसते हुए साँस ली।


“अब लेट,” पिताजी ने आदेश दिया। रेखा लेट गई। पिताजी ने उसके दोनों पैर अपने कंधों पर रखे और बिना रुके एक ही धक्के में पूरा लिंग अंदर घुसा दिया। रेखा चीखने को हुई, लेकिन पिताजी ने उसका मुँह दबा लिया। फिर शुरू हुई असली मारपीट। पिताजी का शरीर भारी था। हर धक्का इतना जोरदार था कि बिस्तर चरमरा रहा था। रेखा की योनि से आवाजें आ रही थीं—गीली, चिपचिपी। पिताजी ने उसकी गर्दन दबाई। रेखा की आँखें फटी की फटी रह गईं, लेकिन उसने पिताजी के हाथ को और जोर से अपने गले पर दबाया।


“और जोर से,” रेखा ने हाँफते हुए कहा। “मुझे दर्द दो।”
पिताजी ने उसकी एक टाँग और ऊपर की और कोण बदल दिया। अब हर धक्का और गहरा जा रहा था। रेखा के स्तन इधर-उधर हिल रहे थे। पिताजी ने एक स्तन पकड़कर जोर से दबाया। निप्पल को दाँतों से काटा। रेखा के शरीर में कंपकंपी दौड़ गई। कुछ देर बाद पिताजी ने लिंग निकाला और रेखा को पलट दिया। उसे कुतिया की मुद्रा में कर दिया। फिर से लिंग अंदर धकेला। अब गति और तेज हो गई। पिताजी ने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। रेखा की पीठ झुक गई। हर धक्के के साथ उसकी गांड की मांसपेशियाँ काँप रही थीं।


“आज तेरी गांड भी लूँगा,” पिताजी ने कहा। रेखा ने सिर हिलाया। पिताजी ने लिंग निकाला। रेखा की योनि से उनका रस बह रहा था। पिताजी ने थूक लिया और रेखा की गांड पर लगा दिया। फिर लिंग का सिरा वहाँ रखा और धीरे-धीरे दबाव डाला। रेखा की मुट्ठियाँ भींच गईं। पिताजी ने एक हाथ से उसकी कमर पकड़ी और दूसरे से बाल। धीरे-धीरे पूरा लिंग अंदर चला गया। रेखा की आवाज बदल गई—दर्द और मजे का मिश्रण।


पिताजी ने गांड में जोर-जोर से धक्के देने शुरू किए। कमरे में पच-पच की आवाज गूँज रही थी। रेखा के मुँह से अनियंत्रित आवाजें आ रही थीं। पिताजी ने उसकी गांड पर कई थप्पड़ मारे। लाल निशान पड़ गए। फिर उन्होंने रेखा के हाथ पीछे बांध दिए—अपनी पजामे की डोरी से। रेखा पूरी तरह बेबस हो गई। पिताजी ने और बर्बरता से चोदना शुरू किया। हर धक्का इतना जोरदार था कि रेखा का शरीर आगे की ओर खिसक रहा था।


कुछ देर बाद पिताजी ने लिंग निकाला। रेखा की गांड खुली हुई थी, लाल और इस्तेमाल की हुई। पिताजी ने उसे फिर पलटा। अब रेखा की आँखों में आँसू थे, लेकिन मुँह पर मुस्कान। “अब मेरी योनि में झड़,” उसने कहा। पिताजी ने फिर से लिंग अंदर डाला और आखिरी धक्कों की बौछार की। दोनों एक साथ काँप उठे। पिताजी का वीर्य रेखा की योनि में भर गया। कुछ बाहर भी बह निकला।


वे दोनों पसीने से तर बिस्तर पर लेटे रहे। पिताजी ने रेखा के माथे पर चुंबन लिया। “मेरी रंडी,” उन्होंने कहा। रेखा हँसी। “तुम्हारी ही तो हूँ।”
थोड़ी देर बाद रेखा उठी। कपड़े पहनने लगी। पिताजी ने उसका हाथ पकड़ा। “रुक। एक बार और।” रेखा ने सिर हिलाया। “नहीं। काफी हो गया। तुम्हारी बेटी घर पर है। अगर जाग गई तो मुश्किल हो जाएगी।”


मैंने वह बात सुनी तो सन्न रह गया। बेटी?
रेखा चली गई। पिताजी अकेले बिस्तर पर लेटे रहे। मैं अपने कमरे में वापस आया। रात भर नींद नहीं आई। अगले दिनों में मैंने चुपके-चुपके पता किया। सच्चाई यह थी कि रेखा शादी के एक साल बाद ही चाचा की बेरोजगारी के कारण घर छोड़कर चली गई थी। चाचा ने उसे वापस लाया था, लेकिन एक शर्त पर—कि वह जेठ यानी मेरे पिताजी के साथ रहेगी। शरीर देगी, बदले में पैसे मिलेंगे। पिताजी ने भी कसम खाकर स्वीकार कर लिया था। सालों तक यह सिलसिला चला। रेखा गर्भवती हो गई। एक लड़की पैदा हुई—नैना। अब नैना अठारह साल की हो चुकी थी। खून पिताजी का था।


जब मुझे यह पता चला तो पहले तो गुस्सा आया, फिर एक अजीब सा लगाव। नैना मेरी सौतेली बहन थी। खून एक था। मैंने उसे बहन की तरह अपनाना शुरू कर दिया। पिताजी और रेखा का खेल अब भी जारी था। कभी रेखा रात को आती, कभी पिताजी उसके घर चले जाते। मुझे अब हर रात वे आवाजें सुनाई देतीं—पच-पच, कराहें, थप्पड़ों की आवाज, बाल खींचने की आवाज। कभी-कभी रेखा को बाँधकर चोदते, कभी गर्दन दबाकर, कभी गांड में इतनी बर्बरता से कि रेखा की आँखों से आँसू बह जाते। लेकिन रेखा खुद मांगती थी। “और जोर से मारो,” “मुझे कुतिया बनाओ,” “मेरी गांड फाड़ दो।”


एक रात मैंने देखा कि पिताजी ने रेखा को पूरी तरह नग्न करके हवेली के आँगन में ले जाया। चाँदनी रात थी। उन्होंने रेखा को एक पुराने खंभे से बाँध दिया। फिर चाबुक जैसा कुछ लेकर उसकी पीठ और गांड पर मारने लगे। रेखा की चीखें दबी हुई थीं। हर वार के बाद पिताजी उसका मुँह चूमते और फिर से मारते। बाद में उन्होंने रेखा को खंभे से खोला और आँगन की मिट्टी पर गिरा दिया। वहीं कुतिया बनाकर चोदा। रेखा की गांड और योनि दोनों इस्तेमाल कीं। आखिर में पिताजी ने उसका मुँह खोला और अपना वीर्य उसके गले में उतार दिया। रेखा ने सब निगल लिया।


अब मैं इन आवाजों से परेशान नहीं होता। नैना के बारे में सोचता हूँ। वह शहर में पढ़ती है, लेकिन कभी-कभी गाँव आती है। जब आती है तो पिताजी और रेखा थोड़े संयमी हो जाते हैं। लेकिन मैं जानता हूँ कि नैना के जाने के बाद फिर वही बर्बरता शुरू हो जाएगी। रेखा अब भी उतनी ही कामुक है। उसका शरीर अब भी उतना ही गदराया हुआ। और पिताजी उतने ही क्रूर।


मैं अब सिर्फ देखता हूँ। कभी-कभी नाइट विजन पहनकर। कभी-कभी सिर्फ आवाजें सुनकर। खून का रिश्ता है। परिवार का राज़ है। और मैंने तय कर लिया है कि जब तक मेरा रास्ता नहीं काटते, मैं चुप रहूँगा। बाद में जो होगा देखा जाएगा।
कभी-कभी रात को जब पिताजी रेखा की गांड में अपना मोटा लिंग धकेल रहे होते हैं और रेखा की आवाज दर्द और आनंद से भर जाती है, तो मैं सोचता हूँ—यह परिवार कितना अजीब है। कितना क्रूर। कितना भूखा। और कितना सच्चा।


रेखा अब भी आती है। पिताजी अब भी उसे बाँधते हैं, पीटते हैं, चोदते हैं। और मैं अब भी सुनता हूँ। पच-पच की आवाज। कराहें। थप्पड़। बाल खींचने की आवाज। और आखिर में दोनों की भारी साँसें। फिर सन्नाटा। फिर रेखा का जाना। और पिताजी का अकेले बिस्तर पर लेटना।

पिछली रात का सन्नाटा अभी टूटा भी नहीं था कि अगली रात फिर वही खेल शुरू हो गया। मैं अपने कमरे में लेटा हुआ था, नाइट विजन पास रखकर। पिताजी का कमरा अँधेरा था, लेकिन मुझे सब साफ दिख रहा था। रेखा इस बार और पहले आ गई थी। उसने साड़ी तक नहीं पहनी थी। सिर्फ एक काला लहंगा और ऊपर कुछ नहीं। स्तन खुले हुए थे, निप्पल पहले से ही सख्त। पिताजी ने दरवाजा खोला और बिना एक शब्द कहे उसके बाल पकड़कर अंदर घसीटा।


“आज तो तेरी हद पार करूँगा,” पिताजी ने कहा। आवाज में वह क्रूरता थी जो सिर्फ तब आती है जब कोई पूरी तरह मालिक बन चुका हो। रेखा मुस्कुराई। “करो महेंद्र। आज मुझे तोड़ना है।”
पिताजी ने उसे बिस्तर पर नहीं ले जाया। उन्होंने रेखा को कमरे के बीचों-बीच खड़े एक पुराने लोहे के खंभे से बाँध दिया। हाथ ऊपर, पैर फैलाए हुए। डोरी इतनी कसकर बाँधी कि रेखा की कलाईयाँ लाल हो गईं। फिर पिताजी ने एक चमड़े का चाबुक निकाला—मोटा, लचीला, और एक सिरे पर गाँठदार। पहली मार रेखा की पीठ पर पड़ी।

आवाज इतनी तेज थी कि मुझे लगा जैसे कमरा काँप गया। रेखा की पीठ पर तुरंत लाल लकीर उभर आई। दूसरी मार गांड पर। तीसरी जांघ पर। रेखा हर वार पर काँप रही थी, लेकिन मुँह से सिर्फ एक ही आवाज आ रही थी—“और… और जोर से…”


पिताजी ने बीस-पच्चीस वार किए। रेखा की पीठ, गांड और जांघें लाल हो चुकी थीं। कुछ जगहों पर हल्की खरोंचें भी आ गई थीं। तब पिताजी ने चाबुक फेंका और रेखा के पास गए। उन्होंने उसके स्तनों को दोनों हाथों से पकड़ा और जोर से मसला। निप्पल को दाँतों से काटा। रेखा चीखी, लेकिन आवाज दब गई क्योंकि पिताजी ने उसी समय अपना लिंग उसके मुँह में ठूंस दिया। रेखा का गला भरा हुआ था। पिताजी ने उसके बाल पकड़कर सिर को आगे-पीछे हिलाया। लिंग गले तक जा रहा था। रेखा की आँखों से आँसू बह रहे थे, नाक से पानी, लेकिन उसने विरोध नहीं किया। उल्टे अपनी जीभ से और जोर से चाटा।


जब पिताजी का लिंग पूरी तरह गीला हो गया तो उन्होंने उसे निकाला। रेखा हाँफ रही थी। पिताजी ने उसका मुँह पकड़ा और थूक उसके अंदर उगल दिया। रेखा ने सब निगल लिया। फिर पिताजी ने रेखा के पैर और ज्यादा फैलाए। उसकी योनि पहले से ही गीली चमक रही थी। पिताजी ने दो उंगलियाँ अंदर घुसाईं और जोर से हिलाने लगे। फिर तीन। फिर चार। रेखा की योनि फैल रही थी। पिताजी ने मुट्ठी बंद की और धीरे-धीरे अंदर धकेलनी शुरू की। रेखा की आँखें फटी की फटी रह गईं। दर्द साफ था, लेकिन उसने पैर और ज्यादा फैला दिए। “पूरी मुट्ठी डालो… फाड़ दो मुझे…”


पिताजी ने मुट्ठी अंदर घुसा दी। रेखा का शरीर काँप उठा। पिताजी ने मुट्ठी घुमाना शुरू किया। रेखा की कराहें अब दब नहीं पा रही थीं। पिताजी ने दूसरी हाथ से उसके गले को दबाया। रेखा की साँसें उखड़ने लगीं, लेकिन आँखों में मजा था। कुछ देर बाद पिताजी ने मुट्ठी निकाली। रेखा की योनि खुली हुई थी, लाल और इस्तेमाल की हुई। पिताजी ने अपना लिंग वहाँ रखा और एक ही धक्के में पूरा अंदर घुसा दिया। फिर शुरू हुई असली कुटाई।


धक्के इतने जोरदार थे कि रेखा का शरीर खंभे से टकरा-टकरा रहा था। पिताजी ने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। गर्दन की नसें उभर आईं। हर धक्के के साथ रेखा की गांड की मांसपेशियाँ काँप रही थीं। पिताजी ने अचानक लिंग निकाला और रेखा की गांड में ठूंस दिया। कोई थूक नहीं, कोई जेल नहीं—सिर्फ रेखा के अपने रस से। रेखा चीख उठी। पिताजी ने परवाह नहीं की। उन्होंने दोनों हाथों से रेखा की कमर पकड़ी और गांड में बर्बरता से धकेलना शुरू किया। पच-पच की आवाज अब और तेज हो गई थी। रेखा की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन मुँह से शब्द आ रहे थे—“मारो… फाड़ दो… मुझे कुतिया बनाओ…”


पिताजी ने रेखा के हाथ खोल दिए। वह ढेर की तरह गिर गई। पिताजी ने उसे बालों से पकड़कर खींचा और बिस्तर पर फेंक दिया। फिर उसके हाथ पीछे बाँध दिए। रेखा पेट के बल लेटी हुई थी। पिताजी ने उसके पैर फैलाए और फिर से गांड में लिंग डाल दिया। अब गति पागलों जैसी थी। हर धक्के के साथ रेखा का शरीर आगे खिसक रहा था। पिताजी ने उसकी गर्दन दबाई और कान में कहा, “आज तेरी गांड में इतना झाड़ूँगा कि तू एक हफ्ते तक बैठ नहीं पाएगी।”


रेखा ने सिर्फ कराहकर जवाब दिया। पिताजी ने कुछ और देर गांड चोदी, फिर लिंग निकाला और रेखा के मुँह के पास लाया। “चूस। अपने ही गंदे रस के साथ।” रेखा ने मुँह खोला। पिताजी ने लिंग अंदर डाला और गले तक ठूंस दिया। रेखा ने सब चाटा। पिताजी का वीर्य उसके गले में उतरने लगा। रेखा ने खाँसते हुए भी सब निगल लिया। कुछ बाहर निकलकर उसके होठों पर लग गया। पिताजी ने उसे चाट लिया।


लेकिन खेल खत्म नहीं हुआ था। पिताजी ने रेखा को पलटा। अब वह पीठ के बल लेटी हुई थी, हाथ बँधे हुए। पिताजी ने उसके पैर अपने कंधों पर रखे और योनि में फिर से लिंग डाल दिया। इस बार उन्होंने एक हाथ से रेखा के गले को दबाया और दूसरे से उसके स्तन को मसला। निप्पल को इतना जोर से मरोड़ा कि रेखा की आँखें गीली हो गईं। पिताजी की गति फिर से बढ़ गई। बिस्तर चरमरा रहा था। रेखा की योनि से आवाजें आ रही थीं—गीली, चिपचिपी, और शर्मनाक। पिताजी ने अचानक रुककर लिंग निकाला और रेखा के चेहरे पर थूक दिया। फिर फिर से अंदर डाल दिया।


“बोल, तू क्या है?” पिताजी ने गला दबाते हुए पूछा। “रंडी… आपकी रंडी…” रेखा ने हाँफते हुए कहा। “और जोर से।” “मैं आपकी कुतिया हूँ… आपकी गांड मरवाने वाली रंडी…”
पिताजी मुस्कुराए। उन्होंने रेखा के गले पर और जोर डाला। रेखा की साँसें लगभग रुक गई थीं। उसी समय पिताजी ने आखिरी धक्कों की बौछार की और रेखा की योनि में झड़ गए। इतना कि वीर्य बाहर निकलकर उसकी जांघों पर बहने लगा। पिताजी कुछ देर अंदर ही रहे, फिर लिंग निकाला। रेखा की योनि खुली हुई थी, लाल, सूजी हुई, और वीर्य से भरी हुई।


पिताजी ने रेखा के बँधे हाथ खोले। वह हिल भी नहीं पा रही थी। पिताजी ने उसके शरीर पर हाथ फेरते हुए कहा, “कल रात और बुलाऊँगा। अगली बार तेरी गांड में कोई चीज डालकर रखूँगा पूरी रात।” रेखा ने आँखें खोलीं। उनमें थकान थी, दर्द था, लेकिन मजा भी था। “जैसी आपकी इच्छा,” उसने फुसफुसाकर कहा।


रेखा ने धीरे-धीरे कपड़े पहने। चलते समय उसकी चाल लड़खड़ा रही थी। गांड और योनि दोनों दर्द कर रहे थे। दरवाजे पर पहुँचकर उसने मुड़कर देखा। “नैना अगले हफ्ते आ रही है। तब तक मुझे और तोड़ दो।” पिताजी ने सिर हिलाया। रेखा अँधेरे में गायब हो गई।
मैं अपने कमरे में लेटा रहा। नाइट विजन अभी भी आँखों पर था। पिताजी अकेले बिस्तर पर लेटे थे, साँसें अभी भी तेज। कमरे में सिर्फ पसीने और सेक्स की गंध बाकी रह गई थी। मैंने नाइट विजन उतारा। अँधेरा हो गया। लेकिन आवाजें अभी भी कानों में गूँज रही थीं—चाबुक की leg, पच-पच, रेखा की दबी चीखें, पिताजी की भारी साँसें।


अगली सुबह पिताजी सामान्य लग रहे थे। चाय पी रहे थे, अखबार देख रहे थे। जैसे रात को कुछ हुआ ही न हो। मैंने कुछ नहीं कहा। नैना के आने तक यह सिलसिला और तेज होने वाला था। मैं जानता था। रेखा को और दर्द चाहिए था। पिताजी को और सत्ता। और मुझे… मुझे सिर्फ देखना था। सुनना था। और इस परिवार के सबसे गंदे, सबसे क्रूर राज़ को अपने अंदर दबाना था।


रात फिर आएगी। रेखा फिर आएगी। और पिताजी फिर से उसे तोड़ेंगे—इस बार और बर्बर तरीके से। मैं तैयार था। नाइट विजन के साथ। और चुप रहने के साथ। क्योंकि खून का रिश्ता है। और कुछ रिश्ते सिर्फ दर्द से ही मजबूत होते हैं।

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