माँ की सजा – गुलाम बेटा

रोहित की माँ सुमन ने विक्रम को रस्सियों, चाबुक और दर्द से बाँध लिया। चूत-गांड दोनों फाड़कर, गला दबाकर, मालकिन बनकर उसे अपना कुत्ता बना दिया। दर्द ही नशा बन गया।

मेरा नाम विक्रम है। उम्र 24 साल। दिल्ली के बाहरी इलाके से हूँ। कॉलेज खत्म करके एक प्राइवेट फर्म में जॉब लग गई थी और मुझे गुरुग्राम के एक बड़े ऑफिस कॉम्प्लेक्स में काम के सिलसिले में तीन दिन रुकना पड़ा।

वहाँ मेरा पुराना स्कूल फ्रेंड रोहित रहता था अपनी माँ सुमन और बाप के साथ। रोहित का फोन आया, “भैया होटल में क्यों पड़े रहोगे? घर आ जाओ। मम्मी बहुत याद करती है तुम्हें।” मैंने मना किया लेकिन उसने इतना जोर दिया कि आखिर मान गया।

शाम को जब मैं उनके फ्लैट पहुँचा तो सुमन आंटी दरवाजे पर खड़ी थीं। उम्र करीब 42-43। शरीर भारी-भरकम, चौड़े कूल्हे, मोटे जाँघ, बड़े-बड़े स्तन जो ब्लाउज के अंदर से फूले हुए नजर आ रहे थे। चेहरा गोल, गोरी त्वचा, मोटे होंठ और आँखें जो सीधे देखती थीं।

उन्होंने मुझसे गले मिलाया। छाती मेरे सीने से रगड़ खा गई। कमरे में घुसते ही महसूस हुआ कि घर में सिर्फ तीन लोग हैं – रोहित, उसके बाप और सुमन। रात का खाना खाया। खाने के दौरान सुमन बार-बार मेरी तरफ देखती रहीं। उनकी नजर मेरी जाँघों पर टिक जाती।

रात को रोहित अपने कमरे में चला गया। मैं ड्राइंग रूम के सोफे पर लेटा था। अचानक सुमन आईं। साड़ी में थीं। उन्होंने साड़ी का पल्लू खिसकाया और मेरे पास बैठ गईं। “कल रात तुम रोहित से बात कर रहे थे ना? उन औरतों की। शिल्पा और सोनिया वाली।” मैं चौंक गया। उन्होंने धीरे से कहा, “मैंने सब सुन लिया। तुम उन दोनों को चोदते हो। अच्छी बात है। औरत को मर्द चाहिए।”

फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रख दिया। ब्लाउज के ऊपर से ही मोटे स्तन दबाने लगे। “मुझे भी चाहिए। आज रात। रोहित और उसके बाप सो गए हैं।”

मैंने मना किया। “आंटी आप रोहित की माँ हो।” उन्होंने हँसते हुए कहा, “माँ हूँ तो क्या? चूत तो वही है। और मेरी चूत भूखी है।” उन्होंने मेरे मुँह पर अपना मुँह रख दिया। जीभ अंदर घुसा दी। किश गहरा, गीला, जोरदार। उनके हाथ ने मेरी पैंट का जिप खोल दिया और लंड बाहर निकाल लिया। वह पहले से ही सख्त हो चुका था।

join my telegram channel for leaked videos

उन्होंने उसे मुट्ठी में कसकर ऊपर-नीच घुमाना शुरू किया। “बड़ा है। मोटा भी। उन औरतों को फाड़ दिया होगा।”
मैंने उनका ब्लाउज फाड़ दिया। बटन उड़ गए। काली ब्रा में बंद बड़े स्तन बाहर आ गए। मैंने ब्रा भी फाड़ दी। स्तन हाथों में भर गए – भारी, नरम, निप्पल मोटे और काले। मैंने एक निप्पल मुँह में लिया और जोर से चूसा, दाँतों से काटा। सुमन कराह उठीं।

“हाँ… काटो… जोर से।” मैंने दूसरा भी काटा। उनके हाथ मेरे बालों में उलझे हुए थे। वे मेरे सिर को अपनी छाती में दबा रही थीं।
फिर उन्होंने खुद साड़ी और पेटीकोट उतार दिए। सिर्फ पैंटी रह गई। मैंने पैंटी भी फाड़ दी। चूत साफ मुंडवाई हुई, मोटी फटी हुई होंठों वाली, गीली। मैंने उनकी जाँघें फैलाईं और जीभ चूत पर रख दी। चाटना शुरू किया। सुमन की टाँगें काँपने लगीं।

वे मेरे बाल पकड़कर जोर से दबा रही थीं। “अंदर डाल जीभ… पूरा अंदर… चाट… चाट बेटा।” मैंने जीभ अंदर घुसा दी। गीला पानी मुँह में आ रहा था। मैंने चूसना शुरू किया। सुमन जोर-जोर से कराह रही थीं। उनके नाखून मेरी पीठ पर लग रहे थे।

जब वे लगभग झड़ने वाली थीं तब मैंने अपना लंड उनकी चूत पर रखा और एक ही जोरदार धक्के में अंदर घुसा दिया। सुमन चीख पड़ीं। “आह्ह… फट गई… धीरे…” लेकिन मैंने नहीं सुना। मैंने उनके कूल्हे पकड़कर जोर-जोर से पेलना शुरू कर दिया। बेड की आवाज गूँज रही थी। थप-थप-थप। सुमन की चूचियाँ उछल रही थीं। मैंने उन्हें दोनों हाथों से दबाया और निप्पल काटे। वे मेरी कमर पर टाँगें लपेटे हुए थीं और खुद भी धक्के ले रही थीं। “चोदो… जोर से चोदो… माँ की चूत फाड़ दो…”

मैंने उन्हें पलटा। कुतिया की पोजीशन में कर दिया। उनके मोटे कूल्हे मेरे सामने थे। मैंने लंड फिर से चूत में घुसाया और कमर पकड़कर जोरदार धक्के मारने लगा। एक हाथ से उनकी गर्दन दबाई। साँस फूलने लगी उनकी। वे हाँफ रही थीं लेकिन बोल रही थीं, “और जोर से… गला दबाओ… चोदो…” मैंने और जोर से दबाया। उनकी गांड मेरे सामने हिल रही थी। मैंने थूक लगाया और एक उंगली गांड में घुसा दी। सुमन चीखीं लेकिन धक्के नहीं रोके।

थोड़ी देर बाद मैंने लंड निकाला और गांड पर रखा। धीरे-धीरे नहीं। एक जोरदार धक्के में आधा अंदर घुसा दिया। सुमन का मुँह खुला रह गया। आवाज नहीं निकली पहले। फिर वे चीखीं। “आह्ह… फाड़ दिया… निकालो…” लेकिन मैंने और अंदर धकेला। पूरा अंदर। उनकी गांड टाइट थी। मैंने कमर पकड़कर जोर-जोर से पेलना शुरू किया। हर धक्के पर उनकी आवाज निकल रही थी। मैंने उनका बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। “बोलो कैसा लग रहा है।” वे हाँफते हुए बोलीं, “दर्द… मजा… दोनों… चोदो गांड… फाड़ दो…”

मैंने गांड में ही झड़ने का मन किया लेकिन रुका। लंड निकाला। सुमन को पलटा। उनके मुँह में लंड ठूंस दिया। वे गग कर रही थीं लेकिन मैंने सिर पकड़कर अंदर-बाहर किया। लार बह रही थी उनके मुँह से। फिर मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया। पैर उनके कंधों तक मोड़ दिए। चूत और गांड दोनों खुले हुए। मैंने बारी-बारी चूत और गांड में पेलना शुरू किया। कभी चूत, कभी गांड। सुमन पागल हो चुकी थीं। वे खुद अपनी चूत खोलकर रखे हुए थीं और बोल रही थीं, “दोनों छेद फाड़ दो… भर दो… माल डालो अंदर…”

अंत में मैंने चूत में जोरदार धक्के मारते हुए अंदर ही झड़ दिया। गरम माल उनकी चूत में भर गया। सुमन भी उसी समय झड़ीं। उनका शरीर काँप रहा था। पानी निकल रहा था। मैं उनके ऊपर गिर गया। दोनों हाँफ रहे थे।
थोड़ी देर बाद सुमन उठीं। उन्होंने मेरा लंड साफ किया अपनी जीभ से। फिर बोलीं, “कल सुबह रोहित और उसके बाप ऑफिस जाएंगे। तब फिर। आज तो सिर्फ शुरूआत है।”

अगली सुबह रोहित और उसके बाप निकल गए। सुमन ने दरवाजा बंद किया। वे नंगी ही मेरे पास आईं। हाथ में रस्सी और एक छोटा सा चाबुक था। “आज तुम मेरे हो। जो कहूँगी करोगे।” उन्होंने मेरी कलाई बाँध दी बेड के हेडबोर्ड से। फिर मेरे लंड को चाटना शुरू किया जब तक वह फिर से सख्त नहीं हो गया। उसके बाद वे मेरे ऊपर बैठ गईं। चूत में लंड डालकर जोर-जोर से उछलने लगीं। उनके बड़े स्तन मेरे चेहरे पर बार-बार लग रहे थे। मैंने निप्पल काटे। वे चाबुक से मेरी छाती पर हल्के वार करने लगीं। दर्द और मजा दोनों।

फिर उन्होंने अपनी गांड मेरे मुँह पर बैठा दी। “चाटो। साफ करो।” मैंने चाटा। जीभ गांड के छेद में घुसा दी। सुमन कराह रही थीं। फिर वे उठीं और मेरा मुँह चूत पर बैठा दिया। “अब चूस। जब तक मैं नहीं कहूँ तब तक मत रुको।” मैंने चूसा। वे मेरे बाल पकड़कर जोर से दबा रही थीं। पानी मेरे मुँह में भर रहा था।

बाद में उन्होंने रस्सी खोली। मुझे खड़ा किया। दीवार के साथ खड़ा करके पीछे से चोदा। एक हाथ से गर्दन दबाई, दूसरे से स्तन मसले। धक्के इतने जोरदार थे कि दीवार से उनकी छाती रगड़ खा रही थी। फिर फर्श पर लिटाया। पैर फैलाए। घुटनों को छाती से लगाया और चूत में इतनी जोर से पेला कि सुमन की आँखों से आँसू आ गए लेकिन वे बोलती रहीं, “और… और जोर से… मारो… फाड़ दो…”

उस दिन हमने तीन बार किया। आखिरी बार सुमन ने खुद लंड को अपनी गांड में डाला और बैठकर जोर-जोर से उछलीं जब तक मैं अंदर गांड में ही नहीं झड़ गया। माल उनकी गांड में भर गया। वे मेरे ऊपर लेटी रहीं। साँसें तेज। शरीर पसीने से भीगा हुआ।

शाम को जब रोहित और उसके बाप आए तब तक सब सामान्य लग रहा था। लेकिन रात को जब सब सो गए तो सुमन फिर मेरे पास आईं। अँधेरे में। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और अपने कमरे में ले गईं। दरवाजा बंद किया। उस रात उन्होंने मुझे बिस्तर से बाँधा। आँखों पर पट्टी बाँधी।

फिर चाबुक, उंगलियाँ, मुँह, चूत, गांड – सब इस्तेमाल किया। दर्द और मजा मिलाकर। जब मैं झड़ा तो उन्होंने माल चाट लिया। फिर खुद मेरे मुँह पर बैठकर झड़ीं।

तीसरे दिन जब मैं जाने लगा तो सुमन ने दरवाजे पर कहा, “अगली बार जब आओगे तब और लंबा रुकोगे। तब तुम्हें सिखाऊँगी असली सजा क्या होती है।” उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो साफ कह रहा था कि यह खत्म नहीं हुआ।

मैं बाहर निकला। गुरुग्राम की गर्मी में पसीना बह रहा था लेकिन शरीर में एक अजीब सी थकान और संतुष्टि दोनों थी। रोहित को कुछ पता नहीं चला। और सुमन… सुमन अब सिर्फ रोहित की माँ नहीं रहीं थीं। वे कुछ और हो गई थीं। कुछ खतरनाक। कुछ भूखी। और मैं जानता था कि मैं फिर आऊंगा।
क्योंकि कुछ भूखें ऐसी होती हैं जो एक बार लग जाएँ तो आसानी से नहीं जातीं।

मैं गुरुग्राम से दिल्ली लौट आया। लेकिन दिमाग में सुमन की नंगी तस्वीरें घूमती रहीं। उनकी मोटी चूत, टाइट गांड, चाबुक की लाल निशान, रस्सी से बँधे मेरे हाथ। रात को नींद नहीं आती थी। लंड बार-बार सख्त हो जाता। मैंने खुद को हिलाया कई बार, लेकिन संतुष्टि नहीं मिली। एक हफ्ते बाद रोहित का फोन आया। “भैया, मम्मी पूछ रही हैं कब आ रहे हो। कह रही हैं कोई जरूरी काम है।” मैं समझ गया। दो दिन बाद फिर से उनके फ्लैट पहुँच गया।

दरवाजा खोला तो सुमन अकेली खड़ी थीं। साड़ी में। लेकिन आँखों में वही भूख। रोहित और उसके बाप तीन दिन के लिए बाहर गए थे रिश्तेदारों के यहाँ। पूरा फ्लैट सिर्फ हम दोनों का था। सुमन ने दरवाजा बंद किया और चटक से कुंडी लगा दी। “आज तीन पूरे दिन। कोई रुकावट नहीं।” उन्होंने साड़ी का पल्लू गिराया। ब्लाउज के बटन एक-एक करके खोले। बड़े स्तन बाहर आ गए। निप्पल पहले से ही सख्त। फिर पेटीकोट और पैंटी भी फर्श पर गिर गई। नंगी खड़ी हो गईं मेरे सामने।

“कपड़े उतारो।” आवाज में हुक्म था। मैंने उतारे। लंड पहले से खड़ा था। सुमन ने मेरा हाथ पकड़ा और अपने बेडरूम में ले गईं। बेड पर पहले से रस्सियाँ, काले चमड़े की पट्टियाँ, एक मोटा डिल्डो, चाबुक और एक धातु का कॉलर रखा था। “आज तुम मेरी संपत्ति हो। जो कहूँगी करोगे। नहीं किया तो सजा मिलेगी।” उन्होंने मेरे गले में कॉलर कस दिया। चाबी अपनी चूत की तह में छुपा ली। “ये चाबी तभी मिलेगी जब मैं संतुष्ट हो जाऊँ।”

उन्होंने मुझे बेड पर लिटाया। हाथ-पैर चारों कोनों से बाँध दिए। रस्सी इतनी कसकर कि कलाई और टखनों पर लाल निशान पड़ गए। फिर वे मेरे ऊपर चढ़ गईं। चूत मेरे मुँह पर बैठा दी। “चाटो। गहराई तक। जीभ अंदर।” मैंने चाटा। उनकी चूत पहले से गीली थी। पानी मेरे मुँह और नाक में भर रहा था। वे मेरे बाल पकड़कर जोर से दबा रही थीं। हिप्स घुमा-घुमाकर मेरे चेहरे पर रगड़ रही थीं। जब साँस फूलने लगी तो थोड़ा ऊपर उठीं, फिर फिर से बैठा दिया। “जब तक मैं नहीं झडूँ, तब तक मत रुको।”

वे झड़ीं। गरम पानी मेरे मुँह में भर गया। मैंने सब निगल लिया। सुमन मुस्कुराईं। फिर वे नीचे आईं। मेरा लंड मुँह में लिया और जोर से चूसने लगीं। दाँतों से हल्का काटतीं। गले तक ले जातीं। लार बह रही थी। अचानक उन्होंने चाबुक उठाया और मेरी जाँघों पर एक जोरदार वार किया। दर्द की लहर दौड़ गई। “चुप रहो। आवाज निकाली तो और मारूँगी।” फिर से वार। दूसरी जाँघ पर। लंड और सख्त हो गया। वे हँस पड़ीं। “दर्द से भी खड़ा हो जाता है तेरा। अच्छा।”

उन्होंने मेरी आँखों पर काली पट्टी बाँध दी। अब कुछ नहीं दिख रहा था। सिर्फ अहसास। अचानक ठंडी धातु की चीज मेरे लंड पर छूई। डिल्डो नहीं, कोई और चीज। फिर उन्होंने मेरे लंड पर तेल लगाया और धीरे-धीरे एक धातु की रिंग चढ़ा दी जड़ पर। टाइट। खून का बहाव कम हो गया। लंड और मोटा और बैंगनी नजर आने लगा होगा। फिर उन्होंने मेरी गांड के छेद पर उंगली घुमाई। तेल लगाया। एक उंगली अंदर। फिर दो। फिर तीन। मैं कराह उठा। सुमन ने चाबुक फिर से जाँघ पर मारा। “आवाज बंद।”

फिर कुछ मोटा अंदर घुसने लगा। डिल्डो। धीरे-धीरे नहीं। जोर से धकेल दिया पूरा। दर्द तेज था। आँखों से पानी आ गया पट्टी के नीचे। सुमन ने डिल्डो को अंदर-बाहर करना शुरू किया। एक हाथ से मेरा लंड हिला रही थीं, दूसरे से डिल्डो पेल रही थीं। “आज तेरी गांड भी मेरी है। जितना चाहूँ उतना इस्तेमाल करूँगी।” वे डिल्डो निकालकर खुद मेरे लंड पर बैठ गईं। चूत में पूरा ले लिया एक ही धक्के में। फिर जोर-जोर से उछलने लगीं। उनके मोटे कूल्हे मेरी जाँघों पर थप्पड़ खा रहे थे। हर बार जब वे नीचे बैठतीं तो डिल्डो जैसी भावना फिर से गांड में हो जाती क्योंकि उन्होंने डिल्डो को बाहर नहीं निकाला था। दोनों छेद भरे हुए।

वे झड़ीं एक बार। फिर दूसरी बार। मेरा लंड रिंग की वजह से झड़ नहीं पा रहा था। दर्द और दबाव बढ़ता जा रहा था। सुमन उतर गईं। पट्टी हटाई। मेरी आँखों में आँसू देखकर मुस्कुराईं। “अब सजा का असली हिस्सा।” उन्होंने रस्सियाँ थोड़ी ढीली कीं लेकिन कॉलर नहीं हटाया। मुझे फर्श पर घुटनों के बल किया। खुद बेड पर बैठ गईं। पैर फैलाए। “अब जीभ से साफ करो मेरी चूत और गांड। घंटों लग सकते हैं।” मैंने चाटा। वे कभी मेरे बाल खींचतीं, कभी चाबुक से पीठ पर वार करतीं। पीठ जल रही थी। लाल धारियाँ पड़ गईं।

रात के दो बज गए थे जब उन्होंने मुझे फिर बेड पर लिटाया। इस बार हाथ बाँधे, पैर खुले। उन्होंने अपने दोनों स्तन मेरे मुँह में ठूंस दिए। “काटो। निशान छोड़ो।” मैंने काटे। दाँतों के निशान पड़ गए। वे कराह उठीं। फिर लंड को अपनी गांड में रखा और धीरे-धीरे बैठ गईं। पूरा अंदर। फिर आंदोलन शुरू किया। ऊपर-नीचे। उनकी गांड की मांसपेशियाँ मेरे लंड को कस रही थीं। एक हाथ से उन्होंने मेरा गला दबाया। साँस कम हो गई। आँखों के सामने अँधेरा छा गया। ठीक उसी समय वे जोर से उछलीं और मैं रिंग के बावजूद झड़ गया। माल उनकी गांड में भर गया। वे बैठे रहीं जब तक आखिरी बूँद नहीं निकल गई।

सुमन ने रिंग निकाली। दर्द से लंड जल रहा था। उन्होंने उसे मुँह में लिया और साफ किया। फिर मेरे पास लेट गईं। कॉलर अभी भी गले में था। “कल और दिन हैं। कल तुम्हें और सहना होगा।” उनकी उंगली मेरे लंड पर घूम रही थी। “रोहित को कभी पता नहीं चलेगा। तू मेरा गुलाम रहेगा जब तक मैं चाहूँ।”

अगली सुबह जब आँख खुली तो हाथ फिर से बँधे हुए थे। सुमन नंगी खड़ी थीं। हाथ में नया चाबुक और कुछ क्लिप्स। उन्होंने मेरे निप्पल पकड़े और क्लिप लगा दिए। दर्द तीखा था। फिर चूत के पास वाले बालों को भी क्लिप से दबोच लिया। मैं कराह उठा। सुमन ने मुँह पर हाथ रखा। “आज पूरा दिन यही हाल रहेगा। कभी चूत, कभी गांड, कभी मुँह। कभी दर्द, कभी मजा। तू सिर्फ सहेगा।”

वे मेरे ऊपर चढ़ गईं। क्लिप लगे निप्पल को अपनी उंगलियों से मरोड़ने लगीं। दर्द और मजा का मिश्रण पागल कर रहा था। लंड फिर खड़ा हो गया। सुमन ने उसे चूत में लिया और धीरे-धीरे हिलना शुरू किया। हर हिर्कते पर क्लिप खिंचते। आँसू बह रहे थे। वे झड़ीं। फिर मुँह में लंड डालकर गले तक ले गईं। मैं हाँफ रहा था। उन्होंने क्लिप एक-एक करके हटाए। खून के छोटे धब्बे नजर आए। फिर चाबुक से उन जगहों पर हल्के वार किए। जलन तेज हो गई।

दोपहर तक उन्होंने मुझे तीन बार और इस्तेमाल किया। एक बार दीवार के साथ खड़ा करके पीछे से चोदा, गला दबा-दबाकर। एक बार फर्श पर घसीटकर, बाल पकड़कर मुँह में लंड ठूंसकर। एक बार बेड पर पैर कंधों तक मोड़कर चूत और गांड दोनों में बारी-बारी पेलकर। हर बार कॉलर की चाबी उनकी चूत में रहती। हर बार वे तय करतीं कब झड़ूँ, कब नहीं।

शाम को जब थोड़ा आराम दिया तो सुमन मेरे पास आईं। पसीने से भीगी हुई। उन्होंने कॉलर की चाबी निकाली और मेरे हाथ में रख दी। “आज रात आजादी। लेकिन याद रखना… अगली बार जब आएगा, तो और सख्त होगा। मैं और भूखी हो जाऊँगी।” उन्होंने मेरे लंड को आखिरी बार चूसा और माल निगल लिया। फिर मेरे गले में दाँत गड़ा दिए। हल्का खून निकला। “ये निशान रहेगा। याद दिलाने के लिए।”

मैं दिल्ली लौटा। गले पर दाँतों का निशान, पीठ पर चाबुक की धारियाँ, कलाई पर रस्सी के निशान। रोहित को कुछ पता नहीं। लेकिन हर रात सुमन का फोन आता। कभी सिर्फ साँसें, कभी हुक्म। “अगले महीने आना। तीन दिन नहीं… एक हफ्ता। तब तुझे असली गुलाम बनाना है।”
और मैं जानता था कि जाऊँगा। क्योंकि अब दर्द भी नशा बन चुका था। उनकी चूत, उनकी गांड, उनका चाबुक… सब कुछ। सुमन अब सिर्फ रोहित की माँ नहीं थीं। वे मेरी मालकिन थीं। और मैं उनका कुत्ता।

रुचि की बंधी गाँड को पानवाले ने चोदा

देवर ने भाभी को बेड से बांधकर बेरहम पेलाई की

पड़ोस की औरत कविता की गांड में लंड

अरुण की बीवी कविता की रात कुछ अलग थी

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *