रस्सी से कसकर बांधकर गला घोंटा, मुट्ठी चूत में ठूंसकर फाड़ा, गांड में लंड घुसाकर खून निकाला, फिर मुंह में मूत डाला और बार-बार तोड़-मरोड़ कर चोदा। अब वह सिर्फ इस्तेमाल की जाने वाली फटी हुई वस्तु रह गई थी।
रोहन की पत्नी प्रिया और पड़ोस की औरत कविता अक्सर एक-दूसरे से मिलती रहती थीं। कविता बयालीस साल की थी लेकिन दिखती बत्तीस की थी। उसका शरीर भरा-भरा, कमर पतली, नितंब गोल और भारी, और स्तन इतने बड़े और सख्त कि साड़ी के ऊपर से भी उनका आकार साफ दिख जाता। वह जानबूझकर साड़ी की पल्लू को कम बांधती थी ताकि गहरी दरार और उभरे हुए भाग सबके सामने हों। मोहल्ले के हर मर्द उसकी तरफ घूरता था। रोहन भी कई बार रात को उसकी कल्पना करके हस्तमैथुन कर चुका था।
कविता का पति विक्रम किसी आईटी कंपनी में सीनियर मैनेजर था और अक्सर विदेश जाता रहता था। उनके दो बेटे कनाडा में पढ़ते थे। प्रिया को कविता के शरीर से ईर्ष्या होती थी। एक दिन दोनों किचन में खड़े बातें कर रहे थे। प्रिया ने कहा कि वह मसाले में ज्यादा जीरा डालती है। कविता हंस पड़ी और बोली, “जीरा मर्दों की ताकत कम कर देता है। तेरा पति रोहन कितना सहन कर पाता है?” प्रिया ने मजाक में जवाब दिया, “तू खुद आजमा लेना। मेरे पति की ताकत देखकर तू हैरान रह जाएगी।” दोनों हंस दीं, लेकिन यह बात उनके बीच छिपी हुई चुनौती बन गई।
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तीन महीने बाद प्रिया अपनी बहन के पास लंदन चली गई। विक्रम भी सिंगापुर गया हुआ था। एक शुक्रवार की शाम रोहन के फोन पर कविता का कॉल आया। उसकी आवाज में हल्की सी गुनगुनाहट थी। “रोहन भाई, मेरा वाशिंग मशीन अटक गया है। कोई आएगा नहीं। क्या तुम देख सकते हो?” रोहन ने हल्के से पूछा, “फीस क्या मिलेगी?” कविता धीरे से बोली, “जो तुम मांगोगे… सब कुछ।”
रोहन उसके फ्लैट में पहुंचा। दरवाजा खोला तो कविता खड़ी थी। साड़ी कमर पर इतनी नीचे बंधी हुई कि नाभि और पेट के निचले हिस्से के बालों की हल्की छाया साफ दिख रही थी। ब्लाउज इतना टाइट था कि स्तन बाहर निकलने को बेताब लग रहे थे। उसने मुस्कुराते हुए अंदर बुलाया। “आओ… मशीन बेडरूम के पास है।”
रोहन मशीन खोलने लगा। आधे घंटे में खराबी निकाल ली। जब उसने दोबारा जोड़ा तो अचानक लाइट चली गई। कविता बोली, “बिजली आने में देर लगेगी। बैठो। कुछ पी लोगे?” रोहन ने कहा, “मैं अकेला शराब नहीं पीता।” कविता ने आंखें सिकोड़ते हुए जवाब दिया, “मैं भी पीऊंगी। सर्दी में व्हिस्की अच्छी लगती है।”
दो गिलास व्हिस्की और नमकीन आ गए। मद्धिम रोशनी में दोनों सोफे पर बैठे। दूसरे गिलास के बाद रोहन का हाथ गलती से कविता के हाथ पर पड़ गया। उसने हाथ नहीं हटाया। रोहन ने हिम्मत करके उसकी उंगलियों को सहलाना शुरू किया। कविता उठी और तीसरा गिलास बनाकर लाई। अब दोनों की आवाज में नशा झलकने लगा था।
कविता ने अचानक कहा, “प्रिया ने कहा था तेरी ताकत आजमा लूं। अब तक कुछ महसूस नहीं हुआ।” रोहन मुस्कुराया और उसका नंगा बाजू सहलाने लगा। कविता ने हल्के से कहा, “नहीं… यह ठीक नहीं।” लेकिन आवाज में मना करने का जोर नहीं था। तभी बिजली आ गई। रोहन ने मशीन चेक की। काम कर रही थी। कविता किचन में नमकीन बनाने गई।
रोहन ने सोचा डीवीडी प्लेयर भी चेक कर ले। किचन में गया तो कविता ने चौंककर ट्रे गिरा दी। सारी चीजें उसकी साड़ी पर गिर गईं। वह फिसली। रोहन ने झपटकर उसकी कमर पकड़ ली। अब वह उसकी बाहों में थी। रोहन का लंड पूरी तरह खड़ा हो चुका था और उसकी जांघ से सट गया। कविता ने महसूस किया। मुस्कुराई लेकिन कुछ नहीं बोली। “मैं कपड़े बदल कर आती हूं।”
वह बेडरूम गई और पारदर्शी काले नाइटगाउन में निकली। अंदर ब्रा-पैंटी कुछ नहीं। रोशनी में उसके स्तनों का पूरा आकार, काले घेरे वाले कड़े निप्पल साफ दिख रहे थे। रोहन ने ड्रॉअर खोला तो हैरान रह गया। पूरा ड्रॉअर हार्डकोर पोर्न डीवीडी से भरा था। उसने एक फिल्म लगा दी। स्क्रीन पर एक औरत का गला किसी मोटे लंड से भरा जा रहा था।
रोहन अब खुद को रोक नहीं सका। वह उठा और कविता को सोफे से खींच लिया। दोनों के होंठ टकराए। पहले धीरे, फिर पागलों की तरह। जीभें लड़ने लगीं। रोहन के हाथ उसके नाइटगाउन के नीचे घुस गए। नंगे शरीर को महसूस करके वह और सख्त हो गया। उसने नाइटगाउन उतार फेंका। सामने थे दो विशाल, सख्त स्तन। उसने दोनों को मुट्ठियों में भर लिया और निप्पल मुंह में ले लिए। जोर-जोर से चूसने लगा, दांत से हल्के से काटने लगा। कविता कराह उठी, “आह… कुत्ते… और जोर से चूस… निप्पल काट… दर्द अच्छा लग रहा है।”
रोहन ने उसे बेड पर धकेल दिया। उसके पैर फैलाए और घुटनों के बल बैठकर उसकी चूत पर मुंह लगा दिया। बदबू आ रही थी लेकिन उसने परवाह नहीं की। जीभ से होंठ खोले, क्लिटोरिस को जोर से चाटा, चूसा, दांत से काटा। कविता छटपटा रही थी, “बहनचोद… जीभ अंदर घुसा… मेरी बुर चाट… और गहरा…” रोहन ने उसके नितंबों पर जोरदार थप्पड़ मारे। लाल निशान पड़ गए। कविता चिल्लाई, “मार… और मार… कुत्ते की औलाद… मेरी गांड पर थप्पड़ मार।”
रोहन ने उसके बाल पकड़कर खींचे और अपना लंड उसके मुंह में ठूंस दिया। कविता उबकाई लेने लगी लेकिन उसने गले तक ले लिया। रोहन ने उसके सिर को दोनों हाथों से पकड़कर जोर-जोर से हिलाना शुरू किया। लंड गले में अटक रहा था। कविता के आंसू निकल आए लेकिन वह चूसती रही। रोहन झड़ने वाला था तो उसने लंड निकाला और उसके चेहरे पर थूक कर फिर से मुंह में ठूंस दिया। “चाट रंडी… पूरा निगल… एक बूंद मत गिरा।” कविता ने सारा वीर्य निगल लिया।
अब रोहन फिर से सख्त हो गया। उसने कविता को करवट करवाया, हाथ पीछे बांध दिए और उसकी गांड पर थूक लगाकर एक उंगली घुसा दी। कविता चीखी, “आह… दर्द… और डाल… दो उंगलियां… फाड़ दे मेरी गांड।” रोहन ने दो उंगलियां अंदर घुसाकर जोर-जोर से हिलाने लगा। फिर लंड निकालकर उसकी चूत में एक झटके में पूरा घुसा दिया। कविता की चीख निकल गई। “बड़ा… बहुत मोटा… फाड़ रहा है… और जोर से चोद… मार मेरे अंदर।”
रोहन ने उसके बाल पकड़कर खींचे और कमर पर जोर-जोर से ठोकरें मारने लगा। हर ठोकर पर कविता की चीखें बढ़ती जा रही थीं। “कुत्ते… और तेज… मेरी चूत फाड़ दे… थप्पड़ मार… गला दबा…” रोहन ने एक हाथ से उसका गला दबाया और दूसरे से स्तन मसलने लगा। कविता की सांसें फूल रही थीं लेकिन आंखों में मजा दिख रहा था। रोहन ने कई पोजीशन बदलीं। डॉगी स्टाइल में उसकी गांड पर थप्पड़ मारते हुए चोदा, फिर उसे ऊपर बैठाया और निप्पल काटते हुए नीचे से जोर लगाया।
कविता पागल हो रही थी। “मैं तेरी रांड हूं… तेरी कुतिया… जितना चाहे इस्तेमाल कर… मेरी चूत, गांड, मुंह… सब तेरा है।” रोहन ने उसे बेड से उतारा, दीवार से सटाया और खड़े-खड़े चोदने लगा। उसके एक पैर को ऊपर उठाकर इतनी जोर से ठोकरें मारीं कि कविता की पीठ दीवार से रगड़ खा रही थी। फिर उसने उसे फर्श पर लिटाया, पैर कंधों पर रखकर इतनी गहराई तक घुसाया कि कविता की आंखें फटी की फटी रह गईं।
रातभर यह सिलसिला चलता रहा। रोहन ने उसकी चूत में बर्फ के टुकड़े डालकर चाटे, स्तनों पर शहद लगाकर चाटा, फिर फिर से मुंह में लंड ठूंसकर गला फाड़ा। कविता ने खुद रोहन के लंड पर थूककर गांड में डालने को कहा। रोहन ने धीरे-धीरे गांड में घुसाया। कविता चीख रही थी लेकिन पीछे हटकर खुद और अंदर ले रही थी। “फाड़… मेरी गांड फाड़ दे… कुत्ते…”
सुबह चार बजे तक दोनों थक चुके थे। रोहन पांच बार झड़ चुका था। कविता की चूत, गांड और मुंह सब सूजे हुए थे, शरीर पर थप्पड़ों और नाखूनों के निशान थे। दोनों नंगे लेटे हुए थे। कविता ने धीरे से कहा, “अब हर बार जब विक्रम बाहर जाएगा… तू आएगा। मैं तेरी निजी रांड बन गई हूं।”
रोहन ने उसके बाल सहलाते हुए जवाब दिया, “और अगली बार और ज्यादा बर्बर होगा। तेरी चूत और गांड दोनों को और फाड़ूंगा।” कविता मुस्कुराई और उसके लंड को फिर से हाथ में ले लिया। बाहर सूरज निकल रहा था लेकिन कमरे के अंदर अभी भी अंधेरा और गंदी गंध भरी हुई थी। दोनों जानते थे कि यह सिर्फ शुरुआत है।
रोहन की आंखें अभी बंद भी नहीं हुई थीं कि कविता का हाथ उसके आधे-मुलायम लंड को फिर से सख्त करने लगा। सुबह की हल्की रोशनी खिड़की से छन रही थी। कविता की चूत अभी भी सूजी हुई थी, गांड के छेद से हल्का खून और वीर्य मिला हुआ रस रिस रहा था, लेकिन उसकी आंखों में भूख और भी बढ़ गई थी। उसने रोहन के लंड को मुंह में ले लिया और जोर से चूसने लगी। दांत से हल्के-हल्के काटती हुई बोली, “कुत्ते… अभी थका नहीं… मेरी गांड अभी पूरी तरह फटी नहीं… आज पूरा दिन चोदेगा मुझे।”
रोहन उठ बैठा। उसने कविता के बाल मुट्ठी में भरकर खींचे और लंड उसके गले तक ठूंस दिया। कविता की आंखों से आंसू बहने लगे, नाक से लार और वीर्य की मिलावट निकलने लगी, लेकिन उसने विरोध नहीं किया। रोहन ने उसके सिर को दोनों हाथों से पकड़कर बेरहमी से हिलाना शुरू किया। हर धक्के पर कविता का गला भर जाता, वह हाँफती, फिर भी मुंह खुला रखती। रोहन ने अचानक लंड निकाला और उसके चेहरे पर थूक दिया। “चाट रांड… अपना थूक और मेरा रस दोनों चाट।” कविता ने जीभ निकालकर चेहरे पर फैला हुआ सब चाट लिया।
रोहन उठा और बेडरूम के अलमारी से मोटी रस्सी और चमड़े की बेल्ट निकाल लाया। कविता की दोनों कलाईं पीठ के पीछे बांध दीं। फिर उसके पैर फैलाकर टखनों को बेड के दोनों कोनों से बांध दिया। अब वह पूरी तरह फैली हुई, असहाय पड़ी थी। रोहन ने बेल्ट निकाली और उसकी जांघों पर जोरदार प्रहार किए। लाल धारियां पड़ गईं।
कविता चीखी, “आह… और मार… कुत्ते… जांघों पर और मार… मेरी चूत पर भी मार।” रोहन ने बेल्ट का सिरा उसकी सूजी चूत पर पटक दिया। तीन-चार वार में चूत और भी लाल और सूज गई। कविता रोने लगी लेकिन आवाज में मजा साफ था। “और… फाड़ दे… दर्द दो…”
रोहन ने उसकी चूत में तीन उंगलियां एक साथ घुसा दीं और जोर-जोर से हिलाने लगा। उंगलियां अंदर तक जा रही थीं, कविता की कमर उछल रही थी। फिर उसने चौथी उंगली भी अंदर ठूंस दी। कविता की चीख कमरे में गूंज गई। “बहनचोद… हाथ अंदर डाल रहा है… फाड़ रहा है मेरी बुर…” रोहन ने पूरा हाथ अंदर घुसाने की कोशिश की।
कलाई तक पहुंचते-पहुंचते कविता का शरीर कांपने लगा। वह जोर से झड़ गई। चूत से पानी की धार छूट पड़ी। रोहन ने हाथ निकालकर उसके मुंह में ठूंस दिया। “चाट… अपना ही रस चाट कुतिया।”
अब रोहन ने उसके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया ताकि चीखें दब जाएं। फिर उसकी गांड के छेद में थूक लगाकर लंड एक झटके में घुसा दिया। कविता की आंखें फटी रह गईं। रोहन ने उसके कंधे पकड़कर इतनी जोर से ठोकरें मारीं कि बेड की खटखटाहट पूरे फ्लैट में गूंज रही थी। हर धक्के पर कविता का शरीर आगे सरक रहा था।
रोहन ने उसके बाल खींचकर गर्दन पीछे की और कान में गंदे शब्द बोलने लगा, “तेरी गांड मेरी व्यक्तिगत छेद है… जब चाहूं फाड़ूंगा… तेरा पति लौटेगा तो तू उसे बताना कि पड़ोसी ने तेरी गांड में कितने लंड ठोके… रांड…”
एक घंटे तक लगातार गांड चोदने के बाद रोहन ने लंड निकाला।
कविता की गांड का छेद खुला रह गया था, वीर्य और मल की मिलावट बह रही थी। रोहन ने उसे अनबाइंड किया, लेकिन तुरंत ही उसे फर्श पर घुटनों के बल बैठाया। उसके चेहरे पर बैठ गया और अपना गांड उसके मुंह पर दबा दिया। “चाट… मेरी गांड चाट रांड… जीभ अंदर घुसा।” कविता ने बिना हिचकिचाहट के जीभ निकाली और उसके छेद को चाटने लगी। रोहन ने उसके सिर को और जोर से दबाया। कविता की सांसें रुक रही थीं लेकिन वह चाटती रही।
फिर रोहन ने उसे उठाया और बाथरूम में घसीट कर ले गया। शावर खोला। गर्म पानी दोनों पर गिरने लगा। रोहन ने कविता को दीवार से सटाया, उसके एक पैर को ऊपर उठाया और चूत में फिर से लंड घुसा दिया। पानी के साथ-साथ जोर-जोर से धक्के लग रहे थे। कविता की पीठ दीवार से रगड़ खा रही थी। रोहन ने उसके दोनों निप्पल पकड़कर इतनी जोर से मरोड़े कि कविता की आंखों से आंसू बहने लगे। “काट… निप्पल काट… दर्द दो…” रोहन ने दांत गड़ा दिए। खून की बूंदें निकलीं। कविता जोर से झड़ गई। उसकी चूत सिकुड़-सिकुड़ कर रोहन के लंड को निचोड़ रही थी।
बाथरूम से निकलकर रोहन ने उसे फिर बेड पर लिटाया। इस बार उसने उसकी दोनों टांगें कंधों पर रखीं और इतनी गहराई तक चोदा कि कविता की सांसें फूल गईं। बीच-बीच में वह रुक-रुक कर उसके गले को दबाता, जब कविता का चेहरा लाल होने लगता तो छोड़ देता। कविता पागल हो चुकी थी। “मार मुझे… गला दबाकर चोद… मुझे बेहोश कर दे… फिर जगाकर फिर चोद…” रोहन ने वैसा ही किया। गला दबाया, धक्के जारी रखे, जब कविता की आंखें बंद होने लगीं तो छोड़ा। वह हाँफते हुए फिर से होश में आई तो रोहन ने फिर से गला दबा लिया।
दोपहर तक रोहन ने उसे सात बार झड़ाया। कविता का शरीर अब पूरी तरह से निशानों से भरा था—थप्पड़, दांत, नाखून, रस्सी के निशान। उसकी चूत और गांड दोनों से लगातार वीर्य रिस रहा था। रोहन खुद भी थक चुका था लेकिन कविता ने उसके लंड को फिर से मुंह में ले लिया। “और… एक बार और… मेरी चूत में मूत… आज पूरा इस्तेमाल कर मुझे।”
रोहन उठ खड़ा हुआ, कविता को टॉयलेट में घसीटा, घुटनों के बल बैठाया और उसके खुले मुंह में मूतने लगा। कविता ने जितना हो सका पिया, बाकी उसके चेहरे, स्तनों और शरीर पर बह गया। वह हंस रही थी। “और… और मूत… मेरी चूत में भी डाल…”
रोहन ने उसे फिर बेड पर लिटाया, चूत फैलाकर मूत की धार अंदर डाली। कविता कराह उठी। फिर रोहन ने उसी गंदी चूत में लंड घुसा दिया और आखिरी बार जोर-जोर से चोदा। दोनों एक साथ झड़े। रोहन का वीर्य कविता की चूत से बाहर निकलकर चादर पर फैल गया।
शाम होने तक दोनों नंगे ही लेटे रहे। कविता ने रोहन के सीने पर सिर रखकर धीरे से कहा, “अगली बार जब विक्रम जाएगा… तू चेन और कालर लेकर आना। मुझे कुत्ते की तरह पालना। गली में घुमाना। सबके सामने मेरी इज्जत उतारना।” रोहन ने उसके बाल सहलाते हुए जवाब दिया, “ और अगली बार तेरी गांड में मुट्ठी डालूंगा। पूरी बांह अंदर तक।”
कविता मुस्कुराई। बाहर मोहल्ले की आवाजें आ रही थीं लेकिन कमरे के अंदर सिर्फ गंदी गंध और थकी हुई सांसें थीं। दोनों जानते थे कि यह सिलसिला अब कभी खत्म नहीं होने वाला। रोहन की उंगली कविता की सूजी चूत में फिर से घुस गई और कहानी का अगला अध्याय वहीं से शुरू हो गया।
47 साल की मोटी पड़ोसन की चुदाई
प्राइवेट फर्म में प्रोजेक्ट मैनेजर रौनक को बेरहम चोदता