पिता के जाने के बाद अकेली पड़ी माँ एक पुराने जानने वाले के हाथों पूरी तरह बिखर जाती है। बेटा हर रात खिड़की से देखता रहता है जब उसकी माँ को रस्सी, कोड़े और कई मर्दों के बीच टुकड़े-टुकड़े कर दिया जाता है।
मैं मध्य प्रदेश के एक छोटे से कस्बे का रहने वाला हूँ, जहाँ चारों तरफ घने जंगल और पुरानी मिट्टी की दीवारें हैं। मेरा नाम विक्रम है। मैं 21 साल का हूँ। मेरी माँ का नाम सुनीता है। उनकी उम्र 42 साल है, लेकिन उनका शरीर अभी भी किसी 28 साल की औरत जैसा कसा हुआ और भरा-पूरा है। गोरी चमड़ी, भारी-भरकम स्तन जो ब्रा में भी नहीं समाते, मोटी गोल गांड और मोटी जांघें जो चलते समय हिलती रहती हैं।
हमारे घर में सिर्फ दो लोग रहते थे—मैं और माँ। पिताजी शहर में ट्रक ड्राइवर की नौकरी करते थे। पहले सब ठीक था, लेकिन जब वो घर आते तो शराब के नशे में माँ को पीटते। एक रात उन्होंने माँ के बाल पकड़कर दीवार से सिर पटक दिया। माँ का माथा फूट गया। उसके बाद पिताजी हमेशा के लिए चले गए। न पैसे भेजे, न फोन किया। दो साल हो गए। माँ सिलाई करके घर चला रही थीं। रात को अकेले रोतीं। शरीर में भूख जागती थी, लेकिन कोई नहीं था जो उसे मिटाए।
एक दोपहर किचन की खिड़की पर किसी ने दस्तक दी। बाहर एक लंबा, हट्टा-कट्टा आदमी खड़ा था। काले बाल, मोटी गर्दन, चौड़े कंधे। उसने कहा, “सुनीता? याद है मुझे? स्कूल में एक साथ पढ़ते थे। मैं सुरेश हूँ।”
माँ ने पहचाना। सुरेश उनकी उम्र से एक साल बड़ा था। उसकी शादी टूट चुकी थी। पत्नी भाग गई थी। अब वो पास के शहर के अस्पताल में कंपाउंडर था। माँ ने चाय बनाई। बातें हुईं। सुरेश रोज आने लगा। कभी सब्जी लाता, कभी पैसे रख जाता। माँ की आँखों में धीरे-धीरे कुछ बदलने लगा।
मेरा जन्मदिन आया। पिताजी ने न फोन किया, न याद किया। सुरेश ने केक, नए कपड़े और एक महँगा फोन लाया। रात को देर तक माँ के कमरे में बातें होती रहीं। मैंने सुना—माँ हँस रही थीं। बहुत दिनों बाद।
कुछ हफ्ते बाद माँ की पीठ में दर्द हुआ। सुरेश ने तेल लाया। माँ ने खुद कहा, “तुम ही मालिश कर दो। विक्रम देर से आता है।”
उस रात दरवाजा बंद हुआ। मैं खिड़की के पीछे छिप गया। माँ ने ब्लाउज खोला। लाल ब्रा में उनके भारी स्तन बाहर आने को बेताब थे। फिर घाघरा उतरा। पारदर्शी पेटीकोट में नीली चड्डी साफ दिख रही थी। सुरेश के हाथ पहले पीठ पर फिर कमर पर फिर स्तनों पर चले। माँ की साँसें तेज हो गईं। “आह… जोर से दबाओ…”
अगली रात बारिश हो रही थी। सुरेश भीगकर आया। माँ ने कहा, “कपड़े उतारो, नहीं तो बीमार पड़ जाओगे।” सुरेश ने सब उतार दिया। सिर्फ काली चड्डी रह गई। उसमें उसका मोटा लंड उभरा हुआ था। माँ ने ब्लाउज और ब्रा दोनों खोल दिए। लटकते गोरे स्तन, बड़े-बड़े निप्पल। फिर घाघरा और पेटीकोट। अब सिर्फ चड्डी। सुरेश ने माँ को बिस्तर पर लिटाया। तेल से मालिश शुरू की—पीठ, पेट, स्तन, जांघें। माँ की चड्डी गीली हो चुकी थी।
माँ ने खुद चड्डी उतार दी। उनकी चूत के बाल घने और काले थे। सुरेश ने जांघें कंधों पर रख लीं। जीभ चूत पर पटक दी। माँ चीखी। फिर सुरेश ने अपनी चड्डी उतारी। मोटा, नसों वाला लंड बाहर निकला। माँ ने मुँह में ले लिया। गले तक धकेला। आँखों से आँसू निकलने लगे, लेकिन माँ रुक नहीं रही थीं। गला भर रहा था, फिर भी चूस रही थीं।
सुरेश ने बाल पकड़े और जोर से धक्के मारने लगे। माँ का गला गटर की तरह इस्तेमाल हो रहा था। फिर उसने माँ को घुमाया। घोड़ी बना दिया। पहले चूत में पूरा लंड घुसाया। माँ की चीख निकल गई। “आह… तोड़ दोगे…” सुरेश ने जवाब में गांड पर जोरदार थप्पड़ मारा। लाल निशान पड़ गए। फिर और जोर से। पट्ट-पट्ट की आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी।
उसने माँ के हाथ पीछे बाँध दिए अपनी बेल्ट से। फिर गर्दन में हाथ डालकर दबाया। माँ की साँसें रुकने लगीं, लेकिन आँखों में मजा था। सुरेश ने लंड चूत से निकाला और गांड में धकेल दिया। माँ चीखी। खून की एक बूंद निकली, लेकिन सुरेश रुका नहीं। पूरा अंदर तक। माँ के शरीर में कंपन हो रहा था। वो रो रही थीं और साथ ही रानियाँ बन रही थीं।
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मैं खिड़की से देख रहा था। मेरा अपना लंड चड्डी में सख्त हो चुका था। माँ—जो कभी संस्कारी थीं—अब एक गैर मर्द के नीचे कुतिया बनकर चीख रही थीं। सुरेश ने बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और कान में कहा, “तेरा पति तुझे छोड़ गया। अब तू मेरी रांड है। जब चाहूँगा चोदूँगा। समझी?” माँ ने सिर्फ हाँ में गर्दन हिलाई।
उस रात सुरेश ने तीन बार आया। पहली बार चूत में, दूसरी बार गांड में, तीसरी बार मुँह में। माँ ने सारा माल पी लिया। आखिर में सुरेश ने माँ को फर्श पर घुटनों के बल बैठाया, मुँह खोलने को कहा और थूक दिया। माँ ने निगल लिया।
अगले दिन माँ सज-धज कर बैठी थीं। सुरेश आया तो माँ ने मुझसे कहा, “मैं इलाज कराने जा रही हूँ। घर संभाल।” दोनों बाइक पर चले। लेकिन रास्ता अस्पताल का नहीं, सुरेश के घर का था। रात ग्यारह बजे माँ वापस आईं। चल नहीं पा रही थीं। गांड लाल और सूजी हुई थी। गर्दन पर उंगलियों के निशान। स्तनों पर दांतों के काटने के निशान।
उस रात माँ ने मुझसे कुछ नहीं कहा। लेकिन मैं जानता था।
फिर रोज का सिलसिला शुरू हो गया। सुरेश अब रात भर रुकने लगा। माँ को रस्सी से बाँधता। कभी हाथ छत के पंखे से लटका देता। कभी पैर फैलाकर बिस्तर से बाँध देता। कोड़े से गांड और जांघों पर मारता। माँ चीखतीं, रोतीं, फिर भी मांगतीं। “और मारो… और जोर से…”
एक रात सुरेश ने माँ के मुँह में कपड़ा ठूंस दिया ताकि चीख न निकले। फिर मोटी मोमबत्ती गांड में घुसाई और जला दी। मोम तप contती चमड़ी पर गिर रही थी। माँ का शरीर ऐंठ रहा था। सुरेश हँस रहा था। “तेरी यह संस्कारी चूत अब मेरी कुतिया की चूत है।”
मैं हर रात देखता। कभी हस्तमैथुन करता, कभी सिर्फ जलता। माँ की चीखें, थप्पड़ों की आवाज, चूत और गांड की सिसकियाँ—सब मेरे कानों में बजती रहतीं।
एक रात सुरेश ने माँ को मेरे कमरे के पास लाया। दरवाजा थोड़ा खुला छोड़ दिया। माँ घुटनों पर थीं। सुरेश उनके बाल पकड़े हुए था। “आज तेरे बेटे को भी दिखाऊँ कि उसकी माँ कितनी रांड है?” माँ ने सिर हिलाया। सुरेश ने लंड माँ के गले में धकेल दिया। माँ की आँखें फटी हुई थीं। गला भर गया। फिर उसने माँ को घुमाया और मेरे दरवाजे के सामने ही चोदने लगा। हर धक्के के साथ माँ का शरीर आगे बढ़ता। “देख विक्रम… तेरी माँ अब मेरी है। जब चाहूँगा उसे कुतिया बनाऊँगा।”
माँ की आँखों में आँसू थे, लेकिन शरीर मांग रहा था। सुरेश ने आखिर में माँ के चेहरे पर माल गिराया। माँ ने जीभ निकालकर चाटा।
अब घर में नियम बदल गए थे। माँ सुरेश के आने से पहले नहातीं, सुगंध लगातीं, सिर्फ चड्डी पहनतीं। कभी-कभी बिल्कुल नंगी रहतीं। सुरेश आता तो माँ खुद घुटनों पर बैठ जातीं। लंड निकालतीं। चूसतीं। फिर जैसी पोजीशन वो कहता, वैसी बन जातीं।
एक बार सुरेश ने माँ को रसोई में चोदा। गैस जल रही थी। माँ का पेट गैस के पास था। सुरेश पीछे से धक्के मार रहा था। माँ की छातियाँ टेबल पर पटक रही थीं। “आज से तू सिर्फ मेरी रखैल है। पति का नाम भी मत लेना।” माँ ने हाँ कहा।
फिर एक रात सुरेश ने माँ के दोनों निप्पलों में छेद करवाए। छोटी-छोटी अंगूठियाँ डालीं। माँ दर्द से कांप रही थीं, लेकिन मुस्कुरा रही थीं। “अब ये तुम्हारे हैं,” उन्होंने कहा।
कहानी यहाँ खत्म नहीं होती। सुरेश अब अक्सर माँ को अपने साथ शहर ले जाता। वहाँ उसके दोस्त भी आते। माँ को नंगा करके मेज पर लिटा दिया जाता। एक के बाद एक। कभी दो साथ में। माँ की चूत और गांड दोनों भरी रहतीं। चीखें निकलतीं, लेकिन वो मना नहीं करतीं।
मैं घर पर इंतजार करता। माँ जब लौटतीं तो चल नहीं पातीं। शरीर पर निशान, काटने के घाव, रस्सी के निशान। वो मुझसे आँखें नहीं मिलातीं। लेकिन रात को जब सोतीं तो सपने में सुरेश का नाम लेतीं।
पिताजी कभी वापस नहीं आए। माँ अब पूरी तरह सुरेश की हो चुकी थीं। शरीर, मन, इज्जत—सब। और मैं? मैं सिर्फ देखता रहा। अपनी माँ को दुनिया की सबसे बड़ी रांड बनते हुए।
सुरेश अब सिर्फ मेहमान नहीं रहा। वो घर का नया मालिक बन गया। माँ ने खुद उसके लिए अलग कमरा खाली कर दिया, लेकिन वो अक्सर माँ के बिस्तर पर ही सोता। मेरी मौजूदगी में भी।
अगली सुबह माँ रसोई में चाय बना रही थीं। उनके शरीर पर पिछले रात के निशान साफ दिख रहे थे—गर्दन पर उंगलियों के निशान, स्तनों पर दांतों के गहरे काट, गांड और जांघों पर कोड़े के लाल-लाल धारीदार निशान। चलते समय वो लंगड़ा रही थीं। सुरेश पीछे से आया, उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और गाल पर जोर से थप्पड़ मारा।
“सुबह-सुबह चुपचाप खड़ी क्यों हो? घुटनों पर बैठ।”
माँ बिना बोले फर्श पर बैठ गईं। सुरेश ने अपनी चड्डी नीचे की और मोटा, आधा खड़ा लंड माँ के मुँह में ठूंस दिया। माँ ने आँखें बंद कर लीं और गले तक लेने लगीं। सुरेश ने बाल और जोर से पकड़े। धक्के तेज हो गए। माँ का गला घरघरा रहा था, आँसू बह रहे थे, लेकिन उन्होंने रुकने की कोशिश नहीं की। मैं दरवाजे के पास खड़ा देख रहा था। सुरेश ने मेरी तरफ देखा और मुस्कुराया।
“आ जा विक्रम। अपनी माँ को देख। आज से रोज सुबह यही होगा।”
माँ ने मेरी तरफ आँखें उठाईं। उनमें कोई शर्म नहीं थी। सिर्फ आज्ञाकारिता। सुरेश ने पूरा माल माँ के गले में उतार दिया। माँ ने निगल लिया, फिर जीभ निकालकर लंड साफ किया।
उस दिन से नियम सख्त हो गए।
माँ को घर में नंगा रहना पड़ता। सिर्फ कमर में एक पतली चेन, जिस पर सुरेश की चाबी लगी होती। हाथों में हमेशा हथकड़ी जैसे लोहे के कड़े। सुरेश जब चाहे रस्सी निकालता और माँ को जहाँ चाहे बाँध देता। कभी छत के हुक से हाथ ऊपर लटका देता, कभी पैर फैलाकर कुर्सी से बाँध देता।
एक दोपहर सुरेश ने माँ को रसोई की मेज पर पेट के बल लिटाया। हाथ पीछे बाँधे। पैर फैलाए। फिर उसने एक मोटी लकड़ी की छड़ी निकाली।
“गिनती शुरू कर।”
पहला वार गांड पर पड़ा। माँ चीखी। दूसरा, तीसरा… बीस तक। गांड लाल हो गई, सूज गई, जगह-जगह खून की पतली लकीरें निकल आईं। सुरेश रुकता नहीं था। छड़ी हर बार और जोर से पड़ती। माँ रो रही थीं, शरीर कांप रहा था, लेकिन गिनती जारी रखीं।
बीस के बाद सुरेश ने छड़ी रखी और अपनी उंगलियाँ माँ की सूजी हुई गांड में घुसा दीं। तीन उंगलियाँ एक साथ। माँ चीखी। फिर चार। फिर उसने मुट्ठी बंद की और धीरे-धीरे अंदर धकेलने लगा। माँ का शरीर ऐंठ गया। आँसू फर्श पर गिर रहे थे। सुरेश हँस रहा था।
“तेरी गांड अब मेरी मुट्ठी खाती है। याद रख।”
रात को और बुरा हुआ। सुरेश ने अपने दो दोस्त बुलाए। दोनों उसके अस्पताल के साथी। एक मोटा, एक दुबला लेकिन लंबा। माँ को बिस्तर पर नंगा लिटाया गया। चारों तरफ रस्सी से बाँधा गया—हाथ, पैर, गर्दन। आँखों पर काला कपड़ा बाँध दिया गया।
पहले सुरेश ने माँ की चूत में लंड घुसाया। जोर-जोर से धक्के। फिर मोटे वाले ने मुँह में। दुबले वाले ने गांड में। तीनों एक साथ। माँ का शरीर इधर-उधर हिल रहा था। गला भर रहा था, चूत फटने को थी, गांड जल रही थी। सुरेश ने कपड़ा हटाया तो माँ की आँखें फटी हुई थीं।
“बोल, तू क्या है?”
माँ ने फुसफुसाया, “तुम्हारी रांड… तुम्हारी कुतिया…”
सुरेश ने गाल पर थप्पड़ मारा। “जोर से बोल!”
“मैं सुरेश की रांड हूँ! मेरी चूत, गांड, मुँह सब उसके हैं!”
तीनों हँसे। फिर बारी-बारी से आए। माँ के चेहरे पर, स्तनों पर, पेट पर माल गिराया गया। माँ को चाटने को कहा गया। उसने चाटा। फिर सुरेश ने एक मोटी मोमबत्ती जलाई और जलती हुई मोम माँ के निप्पलों पर टपकाई। माँ चीखी। मोम ठंडी होकर सफेद परत बन गई। सुरेश ने फिर से गर्म मोम टपकाई—इस बार चूत के ऊपर।
मैं कोने में खड़ा था। मेरा लंड चड्डी फाड़ने को बेताब था। लेकिन सुरेश ने मुझे छूने नहीं दिया। सिर्फ देखने का आदेश था।
अगले दिनों में सजा और बढ़ गई।
सुरेश ने माँ के दोनों निप्पलों में और बड़ी अंगूठियाँ डलवा दीं। अब उनमें छोटी-छोटी जंजीरें बँधी रहतीं। जब वो माँ को घुमाता तो जंजीर खिंचती और निप्पल खिंच जाते। दर्द से माँ की आँखें नम हो जातीं। कभी-कभी वो माँ को कुत्ते की तरह पट्टा बाँधकर घर में घुमाता। माँ चारों पैरों पर चलतीं। जीभ बाहर निकाली हुई। सुरेश पीछे से कभी चूत में उंगली डाल देता, कभी गांड में।
एक रात उसने माँ को मेरे बिस्तर के पास लाया।
“आज तेरे बेटे के सामने पूरी कहानी सुना।”
माँ घुटनों पर थीं। सुरेश ने बाल पकड़े हुए थे।
“बोल, तू कैसे रांड बनी।”
माँ ने आँखें नीचे किए हुए कहा, “मेरे पति ने छोड़ दिया… मुझे लंड की जरूरत थी… सुरेश आया… उसने मेरी चूत फाड़ी… गांड फाड़ी… अब मैं सिर्फ उसकी कुतिया हूँ… जब चाहे चोदे… जितने मर्द लाए, सबके लंड लेती हूँ…”
सुरेश ने माँ का मुँह खोला और थूक दिया। माँ ने निगल लिया। फिर उसने मुझे इशारा किया।
“आगे बढ़। अपनी माँ की गांड पर थप्पड़ मार।”
मैं कांप रहा था। लेकिन मैंने मारा। एक, दो, तीन। माँ की गांड हिली। सुरेश हँसा।
“और जोर से। जब तक लाल न हो जाए।”
मैंने मारा। माँ चीखीं लेकिन हटी नहीं। सुरेश ने फिर माँ को मेरे बिस्तर पर लिटाया। पैर मेरे कंधों पर रख दिए।
“देख विक्रम। तेरी माँ की चूत कितनी खुली हुई है। कितनी इस्तेमाल हो चुकी है।”
उसने दो उंगलियाँ अंदर डालीं, फिर तीन, फिर चार। माँ कराह रही थीं। सुरेश ने मेरा हाथ पकड़ा और मेरी उंगलियाँ भी अंदर घुसा दीं। माँ की चूत गर्म और गीली थी। मैंने पहली बार अपनी माँ के अंदर स्पर्श किया।
सुरेश ने कहा, “आज नहीं। अभी तू सिर्फ देख। लेकिन जल्द ही तू भी इसमें शामिल होगा। अपनी माँ को चोदेगा। समझा?”
माँ ने मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में स्वीकृति थी।
उस रात सुरेश ने माँ को पूरे घर में घसीटा। रस्सी से बाँधकर खींचा। फर्श पर घसीटा। दीवार से पीठा। फिर आखिर में बाथरूम में ले जाकर ठंडे पानी से नहलाया और फिर से चोदा। पानी के नीचे, दीवार से सटाकर। माँ की चीखें टाइल से टकराकर गूँज रही थीं।
अब माँ बिल्कुल टूट चुकी थीं। सुबह उठते ही सुरेश के लंड की पूजा करतीं। खाना बनाते समय नंगी रहतीं। जब सुरेश के दोस्त आते तो खुद कपड़े उतार देतीं और पूछतीं, “आज किस-किसको दूँ?”
एक शाम सुरेश ने माँ को बाहर, घर के पिछवाड़े अंधेरे में ले गया। वहाँ एक पुराना पेड़ था। उसने माँ के हाथ पेड़ से बाँध दिए। फिर कोड़े से पीटा—पीठ, गांड, जांघें। माँ की चीखें रात में गूँज रही थीं। खून की बूंदें मिट्टी पर गिर रही थीं। पीटने के बाद उसने माँ को वहीं खड़ा करके पीछे से चोदा। गांड में, फिर चूत में। माँ का शरीर पेड़ से सटकर कांप रहा था।
वापस आकर सुरेश ने माँ को मेरे कमरे में धकेल दिया।
“आज रात यहीं सो। अपने बेटे के पास। कल से नई सजा शुरू होगी।”
माँ मेरे बिस्तर पर गिर गईं। शरीर भर निशान, खून के धब्बे, सूजी हुई गांड और चूत। उन्होंने मेरी तरफ देखा। आवाज कांपती हुई निकली,
“विक्रम… माँ अब सिर्फ एक इस्तेमाल की हुई चीज रह गई है… सुरेश जो कहता है, वही करती हूँ… तू भी… अगर वो कहे तो…”
उनकी आँखों में आँसू थे, लेकिन शरीर अभी भी गरम था।
मैंने कंबल ओढ़ाया। माँ मेरे सीने से चिपक गईं। उनकी साँसें गरम थीं। निप्पलों की अंगूठियाँ मेरे शरीर से छू रही थीं।
बाहर कमरे में सुरेश की हँसी आ रही थी।
और मैं जानता था—कल और बुरा होने वाला है। माँ अब पूरी तरह टूट चुकी थीं। और मैं भी धीरे-धीरे उसी अंधेरे में डूब रहा था।