गाँव के अकेले डॉक्टर ने विधवा के इलाज को दर्द की लत में बदल दिया। हर रात नई यातना, नई सीमा तोड़ता रहा जब तक वह खुद टूटकर उसकी भूखी दासी न बन गई।
डॉ. विकास शर्मा उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे बरहिया में रहते थे। कस्बा छोटा था, चारों ओर खेत और कुछ झोपड़ियाँ। वहाँ सिर्फ एक ही क्लिनिक था—विकास का। पहले एक और डॉक्टर थे, लेकिन कुछ साल पहले अचानक बीमारी से चल बसे। अब पूरा इलाका विकास पर निर्भर था। लोग गरीब थे, इसलिए सस्ता इलाज ही उनका सहारा था। विकास झोलाछाप डॉक्टर थे, लेकिन गाँववाले उन्हें भगवान मानते थे।
उनका क्लिनिक छोटा था—लगभग 9 फीट गुणा 11 फीट का एक कमरा। पीछे वाली दीवार पर मोटा पर्दा लटका था, जिसके पीछे एक लकड़ी की बेंच। सामने टेबल-कुर्सी, पेशेंट के लिए स्टूल और एक पुरानी बेंच। अलमारी में सिरिंज, एम्प्यूल और दवाईयाँ भरी रहती थीं।
एक दोपहर विकास खाली बैठे थे। तभी दरवाजे पर खटखटाहट हुई। अंदर आई रजनी। उम्र 32 साल, गोरा रंग, गदराया बदन। ब्लाउज में 36 के भारी स्तन, कमर 28, कूल्हे 38। काली साड़ी, गहरा लाल ब्लाउज और काला पेटीकोट। साड़ी के नीचे से नाभि झाँक रही थी। साथ में उसका बेटा अमन था, उम्र 7 साल। अमन मोबाइल में व्यस्त था।
“डॉक्टर साहब, मैं बीमार हूँ,” रजनी ने धीमी आवाज में कहा।
विकास की आँखें चमक उठीं। “क्या तकलीफ है?”
“दो दिन से बुखार, बदन दर्द, बेचैनी।”
विकास ने स्टेथो लगाया। ठंडे स्टेथो को उसके स्तनों पर बार-बार दबाया। “जोर से साँस लो।” रजनी की साँसें तेज हो गईं। फिर थर्मामीटर। “ब्लाउज खोलो।” रजनी ने दो हुक खोले। बगल में थर्मामीटर लगाते समय विकास की उँगलियाँ उसके स्तन के नरम हिस्से को छू गईं। रजनी ने पल्लू से ढक लिया, लेकिन विकास ने पेट दबाया—साड़ी के अंदर हाथ डालकर।
“दो इंजेक्शन लगेंगे। कूल्हे में।”
रजनी का चेहरा फक पड़ा। “हाथ में दे दीजिए ना साहब… डर लगता है।”
“नहीं। ये इंजेक्शन सिर्फ कूल्हे में लगते हैं। सैंडल उतारो, पर्दे के पीछे लेट जाओ।”
रजनी काँपती हुई अंदर गई। पेटीकोट का नाड़ा खोला। विकास ने दो सिरिंज लोड कीं—एक 2ml, दूसरी 3ml। पर्दे के पीछे रजनी उलटी लेटी थी। काला ब्लाउज, गोरी पीठ, काली साड़ी।
“साड़ी नीचे करो।”
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रजनी ने थोड़ी सी खिसकाई। विकास ने खुद पकड़कर और नीचे खींचा। पिंक फूलदार पैंटी दिखी। कूल्हे की दरार साफ नजर आ रही थी। आधा दायाँ कूल्हा नंगा।
“मुँह आगे करो। कमर ढीली छोड़ो।”
कॉटन से रगड़ा। फिर सुई।
“आउच!” रजनी चीखी।
सुई पूरी अंदर घुसी। प्लंजर धीरे-धीरे दबा। 1ml पर सिसकी, 2ml पर “निकालो… निकालो…”। विकास ने सुई निकाली और हाथ से जोर-जोर से मलने लगा—पैंटी के ऊपर से। फिर पैंटी थोड़ी ऊपर खींचकर नंगी त्वचा पर मल दिया।
दूसरा इंजेक्शन। बायाँ कूल्हा। सुई घुसी।
“आह… मम्मी… दर्द!”
3ml पूरा। रजनी रो पड़ी। आँसू बह रहे थे। विकास ने फिर एक मिनट तक जोर से मला। पैंटी के अंदर उँगली फिसलाकर गोल-गोल घुमाया।
बाहर आकर दवा दी और नंबर। रात 10:40 पर अनजान नंबर से मैसेज—“साहब, बहुत दर्द हो रहा है पुट्ठे में।”
चैट शुरू हुई। अगले दिन रजनी फिर आई। पीली लेगिंग, लाल कुर्ता। आज थोड़ी बेशर्म। पर्दे के पीछे लेटी। विकास ने कुर्ता ऊपर किया, लेगिंग तीन-चौथाई नीचे खींची। क्लीवेज साफ। सुई घुसी तो फिर रोना।
“बहुत जोर से लगाते हो आप…”
धीरे-धीरे बातें बढ़ीं। रजनी विधवा थी। पति सरकारी नौकरी में थे, कोरोना में चल बसे। अनुकम्पा पर क्लर्क बनी थी। पति की याद में रोती। विकास ने सांत्वना दी। दोस्ती गहरी हुई। फिर जीएफ। चैट में गंदी बातें। फोन पर रजनी की साँसें भारी हो जातीं। मिलने पर विकास ने उसके स्तन दबाए—कपड़ों के ऊपर से, फिर अंदर से।
जन्मदिन पर रजनी ने पूछा—“क्या चाहिए?”
“वही जो हर आदमी चाहता है।”
रात 7:30 बजे रजनी और अमन विकास के घर आए। सफेद लेगिंग, नीला कुर्ता। अमन को मोबाइल देकर बेडरूम में ले गए। दरवाजा बंद।
दीवार से सटाकर चुंबन। जीभ अंदर। हाथ स्तनों पर। कुर्ता उतारा। काली ब्रा। हुक खोला। भारी स्तन आजाद। चूसने लगा—निप्पल को दाँतों से दबाकर। रजनी कराह उठी।
लेगिंग नीचे। वैक्स की हुई साफ चूत। लाल पैंटी। पैंटी भी फेंकी। विकास नंगा।
“कंडोम…”
“नहीं। गर्भनिरोधक इंजेक्शन लगा दूँगा। तीन महीने आराम।”
रजनी काँपी। “पहली और आखिरी बार…”
लंड चूत पर सटाया। दोनों हाथ उसके हाथ पकड़े। स्तन मसलते हुए जोर लगाया। 1 इंच अंदर।
“आह… दर्द!”
फिर जोर। 2 इंच। रजनी छटपटाई। चीखी। विकास ने मुँह दबा दिया। फिर पूरी 6 इंच धकेल दी। टाइट चूत फटी जैसी। आँसू बह रहे थे।
“रो मत। सह ले।”
धीरे-धीरे धक्के। फिर तेज। बिस्तर चरमराया। 5 मिनट बाद बाहर निकालकर पेट पर वीर्य गिराया।
दूसरा राउंड। इस बार रजनी को हाथ-पैर बाँध दिए—बेड की चारों खंभों से। रूमाल मुँह में ठूँस दिया। चूत में फिर घुसा। इस बार और गहरा। कूल्हों को पकड़कर जोर-जोर से पेलने लगा। हर धक्के पर रजनी की आँखों से आँसू।
फिर गांड।
“नहीं… वहाँ मत…”
विकास ने थूक लगाया। लंड गांड के छेद पर रखा। जोर।
“आआआह!”
रजनी का शरीर अकड़ गया। 1 इंच। फिर 2। पूरा अंदर। खून की हल्की धार। विकास ने नहीं रोका। गांड में धक्के मारते हुए स्तन नोचने लगा। निप्पल को दाँतों से काटा। रजनी की चीखें रूमाल में दब गईं।
तीसरा राउंड। चूत और गांड दोनों बारी-बारी। बीच-बीच में थप्पड़। गाल पर, कूल्हे पर, स्तन पर। लाल निशान पड़ गए।
“तुम मेरी हो। जब चाहूँगा, जहाँ चाहूँगा।”
रात भर चला। सुबह रजनी को छोड़ते समय विकास ने उसके कूल्हे पर फिर से सुई चुभा दी—सिर्फ दर्द के लिए।
“याद रहेगा।”
रजनी लंगड़ाती हुई घर गई। लेकिन अगले हफ्ते फिर आई। अब खुद मांगने लगी—और दर्द, और जोर, और बंधन।
विकास का क्लिनिक अब सिर्फ इलाज का नहीं रह गया था। रजनी हर हफ्ते आती। कभी हाथ बाँधकर, कभी मुँह में गैग, कभी कूल्हों पर बेल्ट के निशान। इंजेक्शन सिर्फ बहाना बन गए। असली नशा दर्द और कब्जे का था।
एक रात विकास ने उसे पूरा नंगा करके क्लिनिक की बेंच पर लिटाया। हाथ-पैर बाँधे। दो सुइयाँ एक साथ—दोनों कूल्हों में। फिर लंड गांड में। रजनी की आवाज बंद कर दी गई थी। सिर्फ आँखें बोल रही थीं—दर्द, शर्म, और फिर अजीब सी भूख।
कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। रजनी अब विकास की थी—शरीर, दर्द, और हर रात। गाँव में डॉक्टर साहब का नाम और भी गहराई से लिया जाने लगा। लेकिन कोई नहीं जानता था कि पर्दे के पीछे क्या होता है।
रजनी घर लौटती तो बेटा सोया होता। वह चुपचाप लेट जाती। कूल्हों में जलन, गांड में दर्द, लेकिन मुँह पर एक अजीब सी मुस्कान।
रात के अँधेरे में रजनी अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी। बेटा अमन गहरी नींद में था। उसके कूल्हों में अभी भी जलन थी, गांड में सूजन और दर्द। लेकिन दिमाग में विकास की आवाज गूँज रही थी—“तुम मेरी हो। जब चाहूँगा, जहाँ चाहूँगा।”
अगली सुबह रजनी ऑफिस गई, लेकिन शरीर हर कदम पर चीख रहा था। दोपहर को विकास का मैसेज आया—“आज रात 9 बजे क्लिनिक। अकेला आना। बेटा घर पर छोड़ देना।”
रजनी का दिल जोर-जोर से धड़का। वह जानती थी कि आज सिर्फ इंजेक्शन नहीं होगा।
रात 9:05 पर वह क्लिनिक पहुँची। विकास पहले से इंतजार में था। दरवाजा बंद किया, ताला लगाया। पर्दा पूरी तरह गिरा दिया।
“कपड़े उतारो। सब।”
रजनी काँपती हुई नंगी हो गई। विकास ने उसकी कलाई पकड़कर पीछे की बेंच पर धकेल दिया। मोटी रस्सी निकाली। दोनों हाथ पीछे बाँध दिए, इतने कसकर कि खून का संचार लगभग रुक गया। फिर पैर फैलाकर बेंच के दोनों सिरों से बाँध दिए। रजनी की चूत और गांड पूरी तरह खुली और बेबस।
विकास ने दो बड़ी सिरिंज लोड कीं—एक में दर्द बढ़ाने वाली दवा, दूसरी में सिर्फ पानी मिला खारा घोल।
“आज सिर्फ इलाज नहीं। आज सबक।”
पहले सुई दाएँ कूल्हे में। धीरे नहीं, एक झटके में पूरी नीडल अंदर। रजनी चीखी। विकास ने प्लंजर एकदम दबा दिया। जलन इतनी तेज थी कि रजनी की आँखें फटी की फटी रह गईं। फिर बायाँ कूल्हा। वही बर्बरता।
सुइयाँ निकालकर उसने दोनों कूल्हों को जोर-जोर से थप्पड़ मारे। लाल निशान उभर आए। फिर बेल्ट निकाली।
“गिनती कर।”
पहला थप्पड़ गांड पर।
“एक…” रजनी की आवाज काँप रही थी।
दूसरा, तीसरा… दस तक। हर थप्पड़ पर गांड जल रही थी, सूज रही थी। ग्यारहवें पर रजनी रो पड़ी। विकास रुका नहीं। बीस। पच्चीस। तीस। गांड लाल हो चुकी थी, जगह-जगह नीले निशान।
फिर उसने रजनी के मुँह में अपना लंड ठूँस दिया।
“चूस। और गहरी।”
रजनी की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वह मजबूर थी। विकास ने उसके बाल पकड़कर सर को आगे-पीछे किया। गला तक लंड घुसाया। रजनी ने उबकाई दी, लेकिन विकास रुका नहीं। जब तक उसकी इच्छा नहीं हुई, लंड बाहर नहीं निकाला।
फिर वह रजनी के पीछे गया। थूक की जगह उसने अपना थूक नहीं, बल्कि रजनी की ही लार और आँसू मिलाकर गांड के छेद पर लगाया। लंड रखा।
“अब सह।”
एक जोरदार धक्का। आधा लंड एकदम अंदर। रजनी की चीख क्लिनिक में गूँज उठी। विकास ने दूसरा धक्का मारा—पूरा। गांड फटने जैसी दर्द। खून की हल्की धार बेन्च पर गिरने लगी। विकास ने परवाह नहीं की। वह जोर-जोर से पेलने लगा। हर धक्के पर रजनी का शरीर आगे खिसकता, रस्सियाँ कसीं पड़तीं।
बीच में उसने रजनी के स्तन नोचे। निप्पल को दाँतों से काटा यहाँ तक कि खून की बूँदें निकलीं। रजनी चीख रही थी, लेकिन विकास की गति और तेज हो गई।
“बोल, तू किसकी है?”
“आप… आपकी…”
“जोर से!”
“मैं आपकी रांड हूँ… आपकी गुलाम…”
विकास ने लंड बाहर निकाला। रजनी की गांड खुली और लहूलुहान थी। उसने तुरंत चूत में घुसा दिया। टाइट और गीली। लेकिन आज कोई दया नहीं। वह दोनों छेदों में बारी-बारी से घुसता रहा—कभी गांड, कभी चूत। बीच-बीच में थप्पड़, बाल खींचना, गर्दन दबाना।
जब रजनी की आवाज कमजोर पड़ने लगी तो उसने उसके मुँह में फिर लंड ठूँस दिया और गांड में उँगलियाँ घुमाईं—तीन उँगलियाँ एक साथ। रजनी का शरीर ऐंठ गया।
घंटों चला। विकास ने तीन बार वीर्य गिराया—एक बार मुँह में, एक बार गांड में, एक बार चेहरे पर। रजनी को पोंछने तक की इजाजत नहीं दी। वीर्य उसके चेहरे, स्तनों और कूल्हों पर सूखने दिया।
आखिर में रस्सियाँ खोलीं। रजनी बेंच से गिर पड़ी। पैर काँप रहे थे, खड़े होने की ताकत नहीं। विकास ने उसे बालों से खींचकर उठाया और अपने लंड पर फिर से बैठा दिया—गांड में।
“अब खुद उछलो।”
रजनी रोते-रोते ऊपर-नीचे होने लगी। हर बार लंड और गहरा जाता। विकास ने उसके दोनों निप्पल पकड़कर मरोड़े।
जब उसकी इच्छा पूरी हुई तो उसने रजनी को फर्श पर धकेल दिया।
“कल फिर आना। और अगली बार और ज्यादा सहने के लिए तैयार रहना।”
रजनी लंगड़ाती, काँपती हुई घर पहुँची। बेटा सोया था। वह बाथरूम में गई, आईने में खुद को देखा—गांड पर बेल्ट के निशान, स्तनों पर दाँतों के निशान, कलाई पर रस्सी के गहरे लाल निशान, चेहरे पर सूखा वीर्य।
लेकिन अंदर कुछ और था। दर्द के नीचे एक अजीब सी भूख।
अगले तीन दिन वह ऑफिस नहीं गई। शरीर इतना टूटा हुआ था। चौथे दिन विकास का मैसेज—“आज रात। घर पर आ। अमन को किसी के यहाँ छोड़ देना।”
रात को विकास के घर। इस बार और सामान तैयार था—काला चमड़े का कॉलर, चेन, मोटी मोमबत्ती, दो बड़े क्लैंप, और एक मोटी लकड़ी की छड़ी।
रजनी नंगी होते ही कॉलर पहना दिया गया। चेन दीवार के हुक से बाँध दी। हाथ सिर के ऊपर।
विकास ने मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम उसके स्तनों पर टपकाया। रजनी चीखी। फिर निप्पल पर क्लैंप लगाए—इतने कसकर कि आँसू अपने आप बहने लगे।
छड़ी से गांड और जाँघों पर मार। हर चोट पर गिनती। पचास तक। गांड सूजकर बैंगनी हो गई।
फिर विकास ने उसे कुत्ते की तरह चारों हाथ-पैरों पर बैठाया। चेन पकड़कर घसीटा। लंड गांड में डालकर कमरे में घुमाता रहा। बीच-बीच में चूत में उँगलियाँ, मुँह में लंड, बालों से खींचना।
रात भर चलता रहा। कभी बेड पर, कभी फर्श पर, कभी दीवार से सटाकर। रजनी कई बार बेहोश होने के करीब पहुँची, लेकिन विकास ने पानी के छींटे मारकर जगाया और फिर शुरू कर दिया।
सुबह जब छोड़ा तो रजनी चल नहीं सकती थी। विकास ने खुद उसे नहलाया, लेकिन नहलाते समय भी उँगलियाँ गांड और चूत में घुमाईं, निप्पल मरोड़े।
“अब तू सिर्फ मेरी है। गाँव में कोई और तुझे छू भी नहीं सकता। समझी?”
रजनी ने सिर्फ सिर हिलाया। आँसू अभी भी बह रहे थे, लेकिन आँखों में अब सिर्फ समर्पण था।
उस दिन के बाद रजनी की जिंदगी बदल गई। हफ्ते में तीन-चार रातें विकास के पास बीततीं। कभी क्लिनिक में, कभी उसके घर में। हर बार नया दर्द, नया अपमान, नई सीमा।
एक रात विकास ने उसे पूरा बाँधकर अलमारी में बंद कर दिया—सिर्फ साँस लेने लायक जगह। दो घंटे बाद निकाला तो रजनी का शरीर पसीने और पेशाब से लथपथ था। फिर भी लंड उसके मुँह में ठूँस दिया।
दूसरी रात मोटी मोमबत्ती गांड में डालकर जलाई। गर्म मोम अंदर तक गया। रजनी की चीखें घर में गूँजती रहीं।
तीसरी रात दोनों कूल्हों में इंजेक्शन के बाद बिजली के तार से हल्के झटके। शरीर ऐंठता रहा, लेकिन विकास मुस्कुराता रहा।
रजनी अब खुद मांगने लगी। “और मारो… और कसकर बाँधो… और गहरा…”
विकास शर्मा अब सिर्फ डॉक्टर नहीं रह गया था। वह रजनी का मालिक था। और रजनी—बरहिया की सबसे वफादार, सबसे टूटी हुई, सबसे भूखी गुलाम।
हर रात खत्म होने के बाद जब रजनी घर लौटती, बेटा सोया होता। वह चुपचाप लेट जाती। शरीर दर्द से चीखता, लेकिन मन में एक ही बात गूँजती—“मैं उसकी हूँ… पूरी तरह… हमेशा के लिए।”