जमाई ने सास को छत पर sasu maa ko choda story

जमाई ने सास को छत पर बाँधकर हुक और चाबुक से शरीर चीर डाला। खून, मोम और पेशाब में नहाई औरत बार-बार माँगती रही—और गहरा काटो, हड्डी तक पहुँचो। हर रात नई यातना, कोई सीमा नहीं sasu maa ko choda story ।

मैंने अपनी शादी तब की जब मेरी उम्र सिर्फ उन्नीस साल थी। नाम है मेरा अरनव शर्मा। रहने वाला हूँ मैं उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे मेरठ के पास बसे गाँव सलूकी से। मेरे पिता की मृत्यु बचपन में हो गई थी और माँ की तबियत हमेशा खराब रहती थी। दादाजी ने जबरदस्ती शादी का फैसला लिया। मेरी पत्नी का नाम है कविता। वो मुझसे चार साल बड़ी थी—तेईस साल की। उसका परिवार काफी अमीर था। उसका बाप रामेश्वर यादव गांव का सबसे बड़ा जमींदार था और माँ का नाम सुमित्रा देवी। सुमित्रा देवी की उम्र उन दिनों पैंतालीस साल थी।

मेरा अपना शरीर बचपन की गलतियों की वजह से कमजोर पड़ गया था। मेरा लंड सिर्फ साढ़े तीन इंच लंबा और डेढ़ इंच मोटा रह गया था। पतला, छोटा, जैसे कोई मुरझाया हुआ डंठल। कविता शादी के पहले रात से ही नाखुश थी। वो बार-बार कहती—“इतना छोटा? इससे क्या होगा?” पर घरवालों के दबाव में शादी हो ही गई।

सुमित्रा देवी… वो औरत। पैंतालीस साल की उम्र में भी उनका शरीर ऐसा था जैसे तीस की हो। भारी-भरकम स्तन, गोल-मटोल जांघें, और चूतड़ इतने मोटे कि साड़ी के नीचे से भी उभार साफ दिखता। वो हमेशा घर में सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट पहनती थीं। निप्पल्स अक्सर ब्लाउज से बाहर निकलकर तने रहते। मैं पहली बार जब ससुराल गया तो उनकी छाती देखकर मेरा छोटा सा लंड खुद-ब-खुद तन गया।
होली का दिन था। कविता और मैं ससुराल पहुँचे। सुमित्रा देवी ने दरवाजा बंद रखा था। “गाँव के बुड्ढे ठरकी हैं,” उन्होंने कहा, “होली खेलने की तमीज नहीं। इसलिए अकेले खेलती हूँ।”

रामेश्वर यादव और मैंने हँसकर पूछा—“हमारे साथ भी नहीं?”
वो मुस्कुराईं और बात टाल दी। शरबत और पकवान लाईं। फिर होली शुरू हुई।
पहले तो रंग। उन्होंने मेरे नए कपड़ों पर ही लाल गुलाल फेंक दिया। मैंने उनके गाल पर रंग मला। उनकी त्वचा इतनी नरम थी कि उंगलियाँ डूब गईं। फिर कीचड़ वाली होली। रामेश्वर ने व्यवस्था पहले से कर रखी थी। कविता को मैंने पकड़कर गड्ढे में धकेल दिया। उसकी साड़ी फट गई, स्तन बाहर आ गए। वो शर्म से भाग गई अंदर।

फिर सुमित्रा देवी ने मुझे कीचड़ में धकेल दिया और खुद भी ऊपर गिर पड़ीं। उनके विशाल स्तन मेरे चेहरे पर आ गए। मैं साँस भी नहीं ले पा रहा था। रामेश्वर पास में खड़ा हँस रहा था। सुमित्रा ने मेरे टी-शर्ट के अंदर हाथ डालकर मेरे निप्पल्स को जोर से मरोड़ा। दर्द हुआ पर मेरा लंड तन गया। मैंने उनकी जांघ पर हाथ फेरा। पेटीकोट गीला था। नीचे कोई पैंटी नहीं थी। उनकी चूत की गर्मी मेरे हाथ पर महसूस हुई।
दो घंटे बाद सब हौदी में नहाने गए। रामेश्वर मेला देखने चला गया। कविता थककर सो गई। मैंने सुमित्रा से पूछा—“आज रात कुछ खास इंतजाम?”

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वो हँसीं—“क्या फरमाइश है जमाई?”
“शराब।”
वो चुप रहीं। फिर धीरे से बोलीं—“पापा से छुपकर कभी-कभी पीती हूँ। आज… ठीक है।”
रात नौ बजे। कविता को भांग मिलाकर सुला दिया गया था। रामेश्वर खेत पर सोने चला गया। हम दोनों छत पर बिस्तर लेकर चले गए। चाँदनी रात। सुमित्रा ने सफेद ब्लाउज और काला पेटीकोट पहना था। मैंने हाफ बोतल बीपी निकाली। दो पैग पीते ही उनकी आँखें लाल हो गईं।
“दूसरा बच्चा क्यों नहीं?” मैंने पूछा।

वो चुप रहीं। फिर आँसू भरकर बोलीं—“तुम्हारे ससुर की माँ ने उन्हें कुछ खिलाया था। अंग काम करना बंद हो गया। डॉक्टर ने कहा अब बाप नहीं बन सकते। सालों से… सिर्फ गांड मारते हैं। चूत छूते तक नहीं।”
मैंने उनका हाथ पकड़ा। “आज रात सब भूल जाओ।”

तीसरा पैग। सिगरेट। वो धुआँ छोड़तीं और मैं उनका मुँह चूम लेता। उनकी साँस में शराब और तंबाकू की महक। मैंने ब्लाउज के हुक खोले। विशाल, लटकते हुए स्तन बाहर आ गए। निप्पल्स काले, मोटे, एक इंच लंबे। मैंने एक को मुँह में लिया और जोर से चूसा। सुमित्रा चीख पड़ीं—“आह… जोर से… दाँत से काटो!”
मैंने काटा। खून की बूंद निकली। वो और जोर से कराहने लगीं। मैंने दूसरा स्तन भी मुँह में भर लिया और दोनों को एक साथ मसलने लगा। उनके नाखून मेरी पीठ पर गड़ गए।

पेटीकोट ऊपर खिसकाया। झाँट घनी, काली, गीली। चूत इतनी मोटी और फैली हुई कि दो उंगलियाँ आसानी से घुस गईं। अंदर गरम और चिपचिपा। मैंने तीसरी उंगली भी घुसा दी और जोर से धक्का दिया। सुमित्रा की कमर उछल गई। “और अंदर… पूरा हाथ डाल दे… फाड़ दे!”
मैंने चार उंगलियाँ अंदर ठूँस दीं। उनकी चूत चिल्ला उठी। पानी की धार निकलने लगी। मैंने मुँह लगा दिया। जीभ से क्लिटोरिस को चाटा, दाँत से काटा। सुमित्रा पागल हो गईं। दोनों टाँगें मेरे सिर पर लपेट लीं और जोर से दबाया। “चाट… मूत भी पी जा… सब पी जा!”
मैंने पिया। नमकीन, गरम। फिर उन्हें पलट दिया। गांड के दो बड़े गोले। बीच में गहरा छेद। मैंने जीभ अंदर घुसा दी। सुमित्रा चीख रही थीं—“तुम्हारे बाप ने हजारों बार मारा है… अब तुम मारो… और गहरा!”

मैंने अपना छोटा लंड निकाला। सुमित्रा ने देखा और हँसी—“इतना छोटा? रिंकी… मतलब कविता कैसे सहती होगी?”
मैंने उनके मुँह में ठूँस दिया। “चूस। जोर से चूस। दाँत लगा।”
वो चूसने लगीं। गला तक। थूक बह रहा था। मैंने उनके बाल पकड़कर सिर को आगे-पीछे किया। गला बैठ गया उनका। आँखों से आँसू निकलने लगे। मैंने और जोर से घुसाया। “निगल… सब निगल!”
फिर मैंने उन्हें घोड़ी बना लिया। चूत में लंड डाला। छोटा होने के बावजूद मैंने पूरा जोर लगाया। कमर पकड़कर जोर-जोर से पेलने लगा। हर धक्के पर उनकी गांड थपथपाई। पहले हल्के, फिर जोर से। लाल निशान पड़ गए। सुमित्रा चीख रही थीं—“और जोर… मार… जैसे कुत्ता मारता है!”

मैंने उनकी गांड में भी उंगली घुसा दी। दो उंगलियाँ। तीन। फिर लंड चूत से निकालकर गांड में ठूँस दिया। सुमित्रा की आवाज बदल गई। दर्द की चीख। “निकल… मत निकाल… अंदर ही छोड़… पूरा पानी अंदर!”
मैंने पेलते हुए उनके बाल पकड़ लिए और सिर पीछे खींचा। दूसरा हाथ उनके गले पर कस गया। साँस रुकने लगी उनकी। आँखें बाहर निकलने लगीं। मैंने और जोर लगाया। गांड फटने जैसी आवाज आ रही थी। खून की बूंदें लंड पर लग गईं। सुमित्रा की शरीर काँप रहा था। मैंने आखिरी धक्का दिया और पूरा पानी उनकी गांड के अंदर छोड़ दिया।

वो ढेर हो गईं। साँस फूल रही थी। मैंने उन्हें फिर पलट दिया। चूत अभी भी खुली हुई थी। मैंने मुँह लगाकर अपना और उनका मिला-जुला पानी चाटा। फिर स्तनों पर बैठ गया और लंड उनके मुँह में फिर से डाल दिया। “साफ कर। चाट।”
सुमित्रा ने आँखें बंद करके चाटा। थूक और वीर्य मिलाकर निगला। मैंने उनके गाल पर थप्पड़ मारा। “और जोर से। कुतिया की तरह।”
रात भर ये सिलसिला चला। कभी चूत, कभी गांड, कभी मुँह। मैंने उनके निप्पल्स को रस्सी से बाँध दिया और खींचा। दर्द से वो रोने लगीं पर मना नहीं किया। मैंने उनकी चूत में मोमबत्ती घुसाई और जलाई। मोम उनकी त्वचा पर गिरता रहा। सुमित्रा पागलों की तरह कराह रही थीं।

सुबह चार बजे। कविता अभी सोई हुई थी। मैंने सुमित्रा को उनके कमरे में छोड़ दिया। उनके शरीर पर नीले-काले निशान, खून के धब्बे, और वीर्य की परत। वो मुस्कुराईं—“अगली होली… और बुरा करना। इस बार तो सिर्फ शुरुआत थी।”
मैं नीचे आया। कविता अभी भी सोई थी। मेरा छोटा लंड अभी भी तना हुआ था। दिमाग में सिर्फ सुमित्रा के विशाल स्तन, फैली हुई चूत और खून से सनी गांड घूम रही थी।

उस रात के बाद सब कुछ बदल गया। हर महीने जब मैं ससुराल जाता, सुमित्रा रात को छत पर बुला लेतीं। कभी रस्सी से बाँधतीं, कभी चाबुक से पीटतीं, कभी मुझे कुत्ते की तरह घसीटतीं। कभी वो मुझे बाँधतीं और खुद ऊपर बैठकर चूत रगड़तीं जब तक कि मैं रोने नहीं लगता। कभी मैं उनके मुँह में पेशाब करता और वो पी जातीं।
एक बार रामेश्वर अचानक आ गए। उन्होंने देखा। पर कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुराए और चले गए। बाद में सुमित्रा ने बताया—“वो जानते हैं। और मजे लेते हैं। कभी-कभी वो भी शामिल हो जाते हैं।”

अब तीनों। रामेश्वर मुझे बाँधते, सुमित्रा मेरे लंड को चाटतीं, और रामेश्वर उनकी गांड मारते। फिर बारी बदलती। दर्द, खून, वीर्य, पेशाब… सब मिल जाता।
कविता को कुछ पता नहीं। वो सोचती है उसकी माँ सिर्फ होली पर रंग खेलती है।
रातें लंबी होती गईं। हर महीने जब मैं सलूकी पहुँचता, सुमित्रा देवी पहले से तैयार रहतीं। छत का बिस्तर अब सिर्फ सोने के लिए नहीं था। वहाँ लोहे की कड़ियाँ लगी थीं, मोटी रस्सियाँ लटकी थीं, और एक छोटी सी लकड़ी की पेटी जिसमें चाबुक, क्लैंप, मोमबत्तियाँ और लोहे के हुक रखे रहते।

एक रात कविता गहरी नींद में थी। रामेश्वर खेत से लौटे तो सीधे छत पर आ गए। सुमित्रा पहले से नंगी थीं। उनके स्तनों पर पिछले हफ्ते के काले निशान अभी भी साफ दिख रहे थे। निप्पल्स पर लोहे के क्लैंप लगे थे, जिनसे पतली चेन लटक रही थी। मैंने चेन पकड़ी और जोर से खींचा। सुमित्रा की कमर झुक गई, आँखों से आँसू निकल आए, पर मुँह से सिर्फ एक शब्द निकला—“और…”

रामेश्वर ने मुझे इशारा किया। मैंने सुमित्रा को चारपाई पर लिटाया। हाथ-पैर चारों ओर कड़ियों से बाँध दिए। पैर इतने फैलाए कि चूत पूरी तरह खुल गई। अंदर अभी भी पिछले वीर्य के धब्बे सूखे पड़े थे। मैंने दो उंगलियाँ घुसाईं, फिर तीन, फिर पूरा हाथ। सुमित्रा की चीख छत चीर गई। “फाड़… पूरा डाल… हड्डी तक पहुँच!”

मैंने मुट्ठी बंद की और अंदर धकेल दी। उनकी चूत की दीवारें फटने लगीं। खून की धार निकल आई। रामेश्वर ने उनका मुँह दबाया ताकि आवाज कम हो। मैंने मुट्ठी अंदर घुमाई। सुमित्रा का शरीर ऐंठ गया। पेशाब की धार छूट गई। मैंने हाथ बाहर निकाला तो खून और पानी मिला हुआ था। रामेश्वर ने झुककर चाटा। “मीठा हो गया है आज,” उन्होंने कहा।
फिर बारी गांड की थी। मैंने लोहे का हुक लिया—वही हुक जो जानवर बाँधने के काम आता है। नोक पर तेल लगाया और धीरे-धीरे उनके गुदा में धकेलना शुरू किया। सुमित्रा की आँखें फटी की फटी रह गईं। हुक अंदर जाता गया। जब आधा घुस चुका था तो मैंने घुमाया। उनकी गांड से खून निकलने लगा। रामेश्वर ने चाबुक उठाया और उनकी जांघों पर मारना शुरू किया। हर प्रहार पर मांस लाल होता गया, फिर फटने लगा।

मैंने हुक पूरा अंदर ठूँस दिया। हैंडल बाहर लटक रहा था। सुमित्रा अब बोल नहीं पा रही थीं। सिर्फ गले से अजीब सी आवाजें निकल रही थीं। मैंने अपना लंड उनके मुँह में ठूँस दिया। गला तक। उन्होंने दाँत गड़ा दिए। दर्द हुआ तो मैंने और जोर से धक्का दिया। नाक से खून निकल आया उनका। मैंने बाल पकड़कर सिर को आगे-पीछे किया। हर बार गला बैठता, फिर खुलता। थूक, खून और वीर्य सब मिलकर उनके सीने पर बह रहा था।

रामेश्वर ने चाबुक नीचे रखा और खुद उनके ऊपर चढ़ गए। उन्होंने मेरा लंड उनके मुँह से निकाला और अपनी गांड में ठूँस दिया। सुमित्रा की आँखें फटी रह गईं। दो लंड—एक मुँह में, एक गांड में। मैंने क्लैंप की चेन फिर खींची। निप्पल्स लगभग फटने वाले थे। खून की बूंदें टपकने लगीं। सुमित्रा का शरीर काँप रहा था। मैंने आखिरी जोर लगाया और उनके गले में पानी छोड़ दिया। उन्होंने निगला। फिर खँसी। खून मिला थूक फर्श पर गिरने लगा।

रामेश्वर भी झड़ गए। उन्होंने हुक बाहर निकाला। गांड का छेद अब इतना फैल चुका था कि तीन उंगलियाँ आसानी से घुस रही थीं। मैंने उंगलियाँ अंदर डालीं और फैलाया। फिर अपना लंड फिर से घुसा दिया। इस बार बिना किसी हिचक के पूरी ताकत से पेलने लगा। हर धक्के पर सुमित्रा की कमर उठती और गिरती। चाबुक फिर उठा। पीठ पर, कंधों पर, स्तनों पर। लाल निशान काले पड़ने लगे। एक जगह त्वचा फट गई। खून की पतली धार पीठ पर बहने लगी।

मैंने उन्हें कड़ियों से खोला। शरीर ढीला पड़ चुका था। मैंने उन्हें घसीटकर छत के किनारे ले गया। वहाँ एक लोहे का पाइप था। मैंने उनके हाथ पाइप से बाँध दिए। पैर जमीन पर। फिर पीछे से चूत में घुसा। एक हाथ से बाल पकड़े, दूसरे से गला। साँस रुकने लगी। चेहरा लाल हो गया, फिर बैंगनी। आँखें ऊपर पलटने लगीं। मैंने छोड़ा। उन्होंने जोर से साँस ली। फिर मैंने दोबारा दबाया। इस बार और देर तक। जब छोड़ता तो वो काँपतीं और मेरे लंड को और जोर से जकड़ लेतीं।

रामेश्वर ने मोमबत्ती जलाई। पिघला मोम उनके स्तनों पर गिराया। सुमित्रा चीखीं। मोम ठंडा होते ही सख्त हो गया। फिर दूसरी बत्ती। इस बार चूत के ऊपर। मोम अंदर तक पहुँचा। जलन इतनी तेज थी कि उनकी टाँगें काँपने लगीं। मैंने मोम को उंगली से अंदर धकेला और लंड फिर से घुसा दिया। गर्म मोम और खून मिलाकर चिकनाई बना रहा था।

रात के दो बज चुके थे। कविता नीचे सोई हुई थी। हम तीनों छत पर। सुमित्रा अब बोलने लायक नहीं रहीं। सिर्फ आँखों से इशारा करतीं—“और…”
मैंने उन्हें चारपाई पर लिटाया। पैर कंधों तक मोड़ दिए। चूत और गांड दोनों खुले। मैंने एक साथ दो उंगलियाँ चूत में, दो गांड में डालकर फैलाया। फिर लंड बारी-बारी से दोनों में घुसाता रहा। रामेश्वर उनके मुँह में पेशाब करने लगे। सुमित्रा पी गईं। गले से आवाज आ रही थी जैसे कोई डूब रहा हो।

आखिर में मैं थक गया। लंड सुन्न पड़ चुका था। सुमित्रा का शरीर अब सिर्फ एक चीथड़ा लग रहा था—खून, वीर्य, पेशाब, मोम और चाबुक के निशानों से ढका। मैंने उनके बाल सहलाए। वो मुस्कुराईं। फटी हुई आवाज में बोलीं—“अगली बार… लोहे की छड़ अंदर तक… और आग…”
मैंने सिर हिलाया।
सुबह चार बजे हमने उन्हें साफ किया। घावों पर दवा लगाई। कपड़े पहनाए। नीचे कमरे में लिटा दिया। कविता जब उठी तो माँ को बुखार बताकर बिस्तर पर ही रखा गया।

मैं मेरठ लौट आया। पर दिमाग में सिर्फ वो रात घूमती रही। हुक की ठंडक, चाबुक की आवाज, खून का स्वाद, और सुमित्रा की फटी हुई आँखें जो बार-बार कहती थीं—“हड्डियाँ तोड़ दो।”
अगले महीने फिर जाना है। इस बार पेटी में नई चीजें रखी हैं—लोहे की छड़, मोटी चेन, और एक छोटी सी आरी। सुमित्रा जानती हैं। उन्होंने खुद सूची बनाई थी।

और मैं जानता हूँ कि जब छत का दरवाजा बंद होगा, तो फिर से वही खेल शुरू होगा। दर्द का, खून का, और उस भूख का जो कभी नहीं मिटती।
कविता पूछती है—“माँ की तबियत कैसी है?”
मैं मुस्कुराकर कहता हूँ—“बिल्कुल ठीक। बस थोड़ी कमजोरी है।”
सच तो ये है कि कमजोरी नहीं, भूख है। और वो भूख अब मेरी भी हो चुकी है।

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