रुद्रक्ष-अनन्या भाग 2:

मालिक ने अपनी संपत्ति को कुत्तों के साथ बंद कर रात बिताई। सुबह जूते चाटने का नया हुक्म दिया और अगले तीन दिन किसी और के हवाले करने का फैसला सुनाया।

रुद्रक्ष की अनन्या 1

सुबह की पहली रोशनी काली खिड़की से छनकर आई तो अनन्या अभी भी फर्श पर पड़ी हुई थी। शरीर हर जगह जल रहा था। नितंबों पर खून की सूखी धारियाँ चिपक गई थीं। चूत सूजी हुई और चिपचिपी। गर्दन का कॉलर मांस में धँसा हुआ। टखनों की चेन हिलते ही खनक उठती।
दरवाजा खुला। रुद्रक्ष अंदर आया। काली कमीज, काली पैंट, ठंडी आँखें। उसके हाथ में एक लंबा काला बॉक्स था। उसने बॉक्स फर्श पर पटक दिया।

“उठ।”
अनन्या ने कोशिश की। शरीर नहीं माना। रुद्रक्ष ने बालों से खींचकर खड़ा कर दिया। दर्द से उसकी आँखें फट गईं।
“आज पार्टी है। तैयारी शुरू।”
उसने बॉक्स खोला। अंदर चमकदार लोहे की जंजीरें, तेज नोक वाला कॉलर, छोटे-छोटे धातु के क्लैंप, एक पतला लंबा प्लग और काला चमड़े का मुखौटा था जिसमें सिर्फ आँखों और मुँह के छेद थे।

रुद्रक्ष ने पहले पुराना कॉलर खोला। गर्दन पर लाल गहरी रेखा उभर आई थी। नए कॉलर को कसकर बाँधा। अंदर की तरफ तेज काँटे थे जो हर सांस के साथ मांस में चुभते। अनन्या ने दर्द भरी सिसकी ली।
“चुप। आवाज निकाली तो जीभ काट दूँगा।”

उसने दोनों निप्पलों पर धातु के क्लैंप लगाए। स्प्रिंग इतने सख्त थे कि निप्पल तुरंत सूज गए और बैंगनी पड़ने लगे। अनन्या का शरीर काँप उठा। रुद्रक्ष ने चेन से दोनों क्लैंप को कॉलर से जोड़ दिया। हर बार सिर हिलने पर निप्पल खिंचते।
फिर उसने अनन्या को पेट के बल झुकाया। गुदा के छेद पर थूक लगाया और पतला लंबा प्लग एक ही धक्के में अंदर धकेल दिया। अनन्या की चीख दब गई। प्लग के सिरे पर छोटा सा घंटी जैसा हिस्सा था जो हर कदम पर हिलता।

“आज तू बिल्कुल नंगी रहेगी। बस ये सब। और ये मुखौटा।”
मुखौटा पहनाया। सिर्फ आँखें और मुँह खुले। बाकी चेहरा ढका। अनन्या की पहचान मिट गई। अब वह सिर्फ नंबर तीन थी।
रुद्रक्ष ने उसकी कमर में एक मोटी चेन बाँधी और खुद के हाथ से पकड़ ली।
“चल।”

बड़ी काली गाड़ी में अनन्या को फर्श पर बैठाया गया। चेन रुद्रक्ष के पैर से बंधी थी। गाड़ी चलते ही प्लग हर धक्के के साथ अंदर हिलता। निप्पल क्लैंप खिंचते। अनन्या होंठ काटे बैठी रही।
एक घंटे बाद गाड़ी रुकी। विशाल बंगले के पीछे वाले गेट से उन्हें ले जाया गया। अंदर संगीत और हँसी की आवाजें आ रही थीं। रुद्रक्ष ने अनन्या को सीधे बड़े हॉल में घसीटा।

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हॉल में लगभग तीस लोग थे। पुरुष, कुछ महिलाएँ। सब अमीर, सब ठंडे। जैसे ही अनन्या अंदर आई, बातें थम गईं। नंगी शरीर, खून के निशान, क्लैंप, प्लग, मुखौटा। चेन रुद्रक्ष के हाथ में।
रुद्रक्ष की आवाज हॉल में गूँजी।

“यह मेरी नई संपत्ति है। नंबर तीन। आज रात तुम सब इसे छू सकते हो। जितना चाहो। लेकिन काटना मेरा हक है। समझे?”
हँसी और सहमति की आवाजें उठीं।
रुद्रक्ष ने चेन को हॉल के बीच लगे लोहे के खंभे से बाँध दिया। अनन्या खंभे से बंधी नंगी खड़ी थी। प्लग अभी भी अंदर। निप्पल खिंचे हुए।
पहला आदमी आया। मोटा, चश्मा लगाए। उसने अनन्या के स्तनों को जोर से मसला। क्लैंप और दबे। फिर उंगलियाँ चूत में घुसा दीं। तीन उंगलियाँ एक साथ। अनन्या ने दर्द से दाँत भींचे।

दूसरा आया। उसने प्लग को पकड़कर अंदर-बाहर किया। घंटी की आवाज हॉल में गूँजने लगी। फिर उसने अपना लंड निकाला और अनन्या के मुँह में ठूंस दिया। गले तक। अनन्या की आँखों से पानी बहने लगा।
एक महिला आई। उसने सिगरेट जलाई और अनन्या की जांघ के अंदरूनी हिस्से पर बुझा दी। मांस जलने की आवाज आई। अनन्या की चीख मुँह में भरे लंड से दब गई।

रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठा सिगार पी रहा था। ठंडी आँखों से सब देख रहा था। कभी-कभी सिर हिलाकर इजाजत देता।
एक लंबे आदमी ने अनन्या को खंभे से थोड़ा ढीला किया और पीछे से घुस गया। चूत पहले से सूजी हुई थी। फिर भी वह जोर-जोर से पेलने लगा। हर धक्के के साथ प्लग और गहराई में जा रहा था। अनन्या का शरीर खंभे से टकरा रहा था। निप्पल क्लैंप खिंच-खिंचकर खून की बूँदें गिरा रहे थे।

दूसरे ने उसका मुँह लिया। तीसरे ने स्तन। एक ने उसके बाल पकड़कर थूका। थूक मुखौटे पर बह रहा था।
रुद्रक्ष उठा। वह धीरे-धीरे पास आया। सब हट गए। उसने अनन्या के मुँह से लंड निकाला और खुद अपना निकालकर गले तक धकेल दिया। एक हाथ से क्लैंप को और कस दिया। निप्पल लगभग फटने को थे।

“देख इन्हें। ये सब तुझे इस्तेमाल कर रहे हैं। और तू खड़ी है। क्योंकि मैंने कहा। बोल, तू क्या है?”
अनन्या के मुँह में लंड था। आवाज नहीं निकल रही थी। रुद्रक्ष ने बाल खींचे।
“बोल।”
“मैं… आपकी संपत्ति… नंबर तीन…”
“जोर से।”
“मैं रुद्रक्ष मल्होत्रा की संपत्ति हूँ… नंबर तीन… इस्तेमाल के लिए…”
हॉल में तालियाँ गूँजीं।

रुद्रक्ष ने लंड निकाला। अनन्या के चेहरे पर थूक दिया। फिर उसने प्लग बाहर निकाला। गुदा का छेद खुला और काँप रहा था। उसने अपना लंड वहाँ रख दिया और एक ही धक्के में अंदर धकेल दिया। अनन्या की चीख हॉल में गूँज उठी। रुद्रक्ष ने कमर पकड़कर पागलों की तरह पेलना शुरू किया। हर धक्का इतना गहरा था कि अनन्या का शरीर खंभे से रगड़ खा रहा था।

“आज रात ये सब तुझे भरेंगे। मुँह में, चूत में, गाँड में। और तू सब लेगी। क्योंकि तू मेरी है।”
वह अंदर ही झड़ गया। फिर निकाला और अनन्या को फर्श पर घुटनों के बल बैठा दिया।
“मुँह खोल। सब आएँ। एक-एक करके।”

लोग कतार में लग गए। एक के बाद एक अनन्या के मुँह में झड़ने लगे। कोई चूत में, कोई गाँड में। अनन्या का चेहरा, स्तन, जांघें सब उनके पानी से चमक रहे थे। मुखौटा चिपचिपा हो चुका था। आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे लेकिन शरीर अब विरोध नहीं कर रहा था। सिर्फ काँप रहा था।

जब आखिरी आदमी भी निपट गया तो रुद्रक्ष ने चेन खोली। अनन्या ढेर हो गई। शरीर हिल नहीं रहा था। सिर्फ साँसें तेज थीं।
रुद्रक्ष ने उसे बालों से खींचकर खड़ा किया।
“अब आखिरी हिस्सा।”

उसे बंगले के पीछे वाले छोटे से कमरे में ले जाया गया। कमरे में दो बड़े काले कुत्ते जंजीरों से बंधे थे। गंध तेज थी। कुत्ते भौंकने लगे।
रुद्रक्ष ने अनन्या को बीच में बैठाया। उसकी चेन को फर्श के रिंग से बाँध दिया। इतनी लंबी कि वह थोड़ा सरक सके लेकिन भाग न सके।
“पूरी रात यहीं। ये दोनों तुझे सूँघेंगे, चाटेंगे, शायद और भी कुछ करेंगे। मैं सुबह आकर देखूँगा।”
उसने दरवाजा बंद कर दिया। अंधेरा। कुत्तों की साँसें करीब आ रही थीं। गरम जीभ अनन्या की जांघ पर लगी। फिर चूत पर। अनन्या का शरीर सिहर उठा।

बाहर रुद्रक्ष की आवाज सुनाई दी।
“नंबर तीन। याद रख। कल से नया नियम। तू जब भी पानी पीएगी, पहले मेरे जूते चाटोगी। भूल गई तो जीभ में छेद करवा दूँगा।”
अनन्या अंधेरे में पड़ी रही। कुत्तों की जीभ उसके शरीर पर फिर रही थी। दर्द, अपमान, खालीपन और एक अजीब सी भूख सब मिलकर उसे अंदर से खा रहे थे।

रात लंबी होने वाली थी। और तोड़ना अभी भी जारी था।
अंधेरे कमरे में कुत्तों की गरम साँसें अनन्या के शरीर पर पड़ रही थीं। दोनों बड़े काले कुत्ते जंजीरों की सीमा में उसके करीब आ चुके थे। एक की जीभ उसकी जांघ के अंदरूनी हिस्से पर फिर रही थी। दूसरी जीभ सीधे उसकी सूजी हुई चूत पर लग गई। गर्म, खुरदुरी, बार-बार। अनन्या का शरीर काँप उठा। वह चेन की हद तक पीछे सरकना चाहती थी लेकिन फर्श का रिंग उसे रोक रहा था।

कुत्ता और नजदीक आया। उसकी ठंडी नाक अनन्या के गुदा के खुले छेद पर दब गई। फिर जीभ अंदर घुसने लगी। अनन्या ने दाँत भींचे। आवाज निकालने की हिम्मत नहीं थी। रुद्रक्ष की आखिरी बात कानों में गूँज रही थी—नया नियम। जूते चाटना। जीभ में छेद।
दूसरा कुत्ता उसके चेहरे के पास आ गया। गरम साँस मुखौटे के छेदों से अंदर जा रही थी। उसने अनन्या के मुँह के खुले हिस्से पर जीभ फेर दी। लार बहने लगी। अनन्या ने सिर घुमाया तो कॉलर के काँटे गर्दन में और धँस गए। खून की ताजी बूँदें टपकने लगीं।

समय रुक सा गया था। कुत्ते बारी-बारी से उसके शरीर को चाट रहे थे। चूत, गुदा, स्तन, जांघें। खुरदुरी जीभ बार-बार सूजी हुई जगहों पर फिरती। अनन्या का शरीर अपनी मर्जी के खिलाफ प्रतिक्रिया दे रहा था। चूत हल्की-हल्की भींच रही थी। निप्पल क्लैंप अभी भी कसे हुए थे और हर हिलने पर खिंचते। दर्द और एक गंदी सी गर्मी दोनों एक साथ चल रहे थे।

अचानक एक कुत्ता उसके ऊपर चढ़ने की कोशिश करने लगा। भारी शरीर। अनन्या ने जोर से साँस ली। चेन खनक उठी। कुत्ते की लिंग उसकी जांघ से रगड़ खा रही थी। वह और करीब आने की कोशिश कर रहा था। अनन्या की आँखें अंधेरे में फटी की फटी रह गईं। वह रेंगकर थोड़ा सरकी लेकिन रिंग ने रोक लिया। कुत्ता भौंका। आवाज कमरे में गूँज उठी।

दूसरे कुत्ते ने उसकी चूत पर और जोर से जीभ दबानी शुरू कर दी। अंदर तक। अनन्या का शरीर अकड़ गया। वह होंठ काटे हुए लेटी रही। आँसू मुखौटे के अंदर बह रहे थे। रात कितनी बीत चुकी थी पता नहीं। बस अंधेरा, गंध, जीभ और दर्द।

कभी-कभी कुत्ते रुक जाते और बस उसके करीब बैठकर साँस लेते। फिर अचानक फिर से शुरू। एक बार तो एक कुत्ते ने उसके निप्पल क्लैंप को दाँतों में पकड़ लिया और हल्का सा खींचा। अनन्या की दबी चीख निकल गई। खून की नई धार बह निकली।
रात के आखिरी पहर में दरवाजे पर कदमों की आवाज आई। चाबी घूमी। रोशनी जल उठी। अनन्या की आँखें सिकुड़ गईं। रुद्रक्ष अंदर खड़ा था। काली कमीज, ठंडी आँखें। उसके पीछे दो नौकर खड़े थे।

रुद्रक्ष ने कुत्तों को हुक्म दिया। दोनों पीछे हट गए। वह धीरे-धीरे अनन्या के पास आया। जूते की नोक से उसके गाल को ठोकर मारी।
“रात कैसी कटी नंबर तीन?”

अनन्या कुछ नहीं बोली। मुखौटा चिपचिपा हो चुका था। शरीर पर कुत्तों की लार सूखकर चमक रही थी। चूत और गुदा लाल और सूजे हुए।
रुद्रक्ष झुका। उसने मुखौटा खींचकर फेंक दिया। अनन्या का चेहरा सामने आया—सूजा हुआ, आँसुओं और लार से सना, आँखों के नीचे काले घेरे।
“बोल।”
“ठीक… रही…” आवाज टूटी हुई थी।

रुद्रक्ष हँसा। ठंडी हँसी। “झूठ। तू डरती रही। और तेरी चूत गीली भी हुई। मैं जानता हूँ।”
उसने अनन्या को बालों से खींचकर खड़ा किया। शरीर काँप रहा था। पैर नहीं संभल रहे थे। रुद्रक्ष ने खुद ही उसे संभाला और कमरे से बाहर घसीटते हुए ले गया।

नए कमरे में एक बड़ा लोहे का ढांचा रखा था। अनन्या को उस पर पेट के बल लिटाया गया। हाथ-पैर फैलाकर बाँध दिए गए। कॉलर की चेन ऊपर की रिंग से कस दी गई ताकि सिर ऊपर न उठ सके।
रुद्रक्ष ने क्लैंप खोले। निप्पल इतने सूज गए थे कि छूते ही अनन्या तड़प उठी। उसने दोनों निप्पलों को अपनी उंगलियों से दबाया और मरोड़ा।
“आज नया सबक। तू जब भी पानी माँगेगी, पहले मेरे जूते चाटेगी। साफ। जीभ से। समझी?”
अनन्या ने काँपती आवाज में कहा, “हाँ…”

“अभ्यास अभी।”
रुद्रक्ष ने अपना दाहिना जूता अनन्या के मुँह के पास रख दिया। धूल और कुत्तों की गंध मिली हुई।
“चाट।”

अनन्या ने जीभ निकाली। जूते के ऊपर फेरने लगी। रुद्रक्ष ने बाल पकड़कर और जोर से दबाया। “पूरा। तलवा भी। किनारें भी।”
अनन्या की जीभ तलवे पर फिर रही थी। गंदा स्वाद मुँह में फैल गया। रुद्रक्ष ने दूसरा जूता भी उसी तरह चटवाया। जब दोनों साफ हो गए तो उसने अनन्या के मुँह में दो उंगलियाँ ठूंस दीं।
“अब निगल। जो कुछ चाटा है।”

अनन्या ने निगल लिया।
रुद्रक्ष ने पीछे हटकर एक मोटी काली छड़ी उठाई। बिना किसी चेतावनी के नितंबों पर वार शुरू कर दिए। एक… दो… तीन… हर वार के साथ मांस फटने जैसी आवाज। खून की नई लकीरें बहने लगीं। अनन्या चीख रही थी लेकिन आवाज दबाए हुए। बीस वार बाद रुद्रक्ष रुका। नितंबों पर बैंगनी और लाल का नक्शा बन चुका था।

उसने छड़ी नीचे रखी। दोनों हाथों से नितंब फैलाए। गुदा का छेद अभी भी खुला और काँप रहा था। उसने थूक लगाया और तीन उंगलियाँ एक साथ अंदर धकेल दीं। अनन्या की कमर उछली। रुद्रक्ष ने उंगलियाँ अंदर-बाहर करने लगे। जोर से। गहराई तक।
“कल रात कुत्तों ने इसे चाटा। आज मैं इसे फैलाऊँगा। यहाँ तक कि तू खुद माँगेगी कि कुछ बड़ा अंदर डालूँ।”

उंगलियाँ निकालकर उसने अपना लंड निकाला। एक ही धक्के में गुदा में धँस गया। अनन्या की चीख निकल गई। रुद्रक्ष ने कमर पकड़कर पेलना शुरू किया। हर धक्का क्रूर। पूरा अंदर, पूरा बाहर। अनन्या का शरीर ढांचे पर रगड़ खा रहा था। निप्पल फर्श से रगड़ खा रहे थे।
“बोल। किसकी गाँड है?”
“आपकी… रुद्रक्ष सर की…”
“जोर से।”

“रुद्रक्ष मल्होत्रा की संपत्ति की गाँड… नंबर तीन की…”
वह और तेज हो गया। एक हाथ से उसने अनन्या के बाल खींचे, दूसरे से कमर दबाई। लंड हर बार जड़ तक जा रहा था। अनन्या की आवाज अब सिर्फ अस्पष्ट सिसकियों में बदल चुकी थी। दर्द इतना था कि आँखों के आगे अंधेरा छा रहा था। लेकिन शरीर फिर से प्रतिक्रिया दे रहा था। चूत से पानी बहने लगा था।

रुद्रक्ष अचानक रुका। लंड अंदर ही रखा। उसने धीरे से कमर घुमाई।
“गिर। अभी। मेरी आवाज पर।”
अनन्या ने सिर हिलाया। “नहीं… हो नहीं रहा…”

रुद्रक्ष ने एक हाथ आगे बढ़ाकर उसकी चूत में दो उंगलियाँ घुसा दीं और जोर से दबाना शुरू किया। साथ में गुदा में लंड और गहराई तक धकेला।
“गिर। नहीं तो मैं तुझे यहाँ बाँधकर छोड़ दूँगा और नौकरों को बुला लूँगा। वे बारी-बारी से तुझे भरेंगे।”
अनन्या का शरीर अकड़ गया। एक लंबी काँपती चीख निकली। चूत धड़कने लगी। पानी की धार उंगलियों पर बहने लगी। वह गिर गई। जोर से। पूरे शरीर में कंपन।

रुद्रक्ष ने मुस्कुराते हुए पेलना जारी रखा। अनन्या की संवेदनशीलता चरम पर थी। हर धक्का अब असहनीय था। वह रो रही थी लेकिन शरीर खुद ही पीछे धकेल रहा था। रुद्रक्ष ने आखिरी कुछ धक्के और क्रूरता से दिए फिर अंदर ही झड़ गया। गर्म पानी की धार गुदा में भर गई।
उसने लंड निकाला। पानी बाहर रिसने लगा। रुद्रक्ष ने उंगलियों से उसे उठाया और अनन्या के मुँह में ठूंस दिया।
“निगल। अपना और मेरा दोनों।”

अनन्या ने निगल लिया।
रुद्रक्ष ने उसके बंधन खोले। अनन्या फर्श पर ढेर हो गई। शरीर हिल नहीं रहा था। रुद्रक्ष खड़ा रहा। सिगार जलाई। धुआँ ऊपर उठ रहा था।
“आज से नया नियम और जुड़ गया। हर सुबह तू मेरे जूते चाटेगी। फिर मेरे लंड को मुँह में लेगी। बिना पानी के। बिना नहाए। जैसे की है वैसे। समझी?”

अनन्या ने काँपते हुए सिर हिलाया।
रुद्रक्ष ने उसका गाल सहलाया। उस स्पर्श में कोई नरमी नहीं थी।
“और एक बात। अगले हफ्ते मैं तुझे अपने व्यापारिक पार्टनर के पास भेजूँगा। तीन दिन। वह तुझे जैसे चाहे इस्तेमाल करेगा। लौटकर जब तू आएगी तो मुझे सब विस्तार से बताना होगा। एक भी बात छिपाई तो जीभ काट लूँगा।”

अनन्या की आँखें फटी रह गईं। नया डर। नई परत। लेकिन शरीर के अंदर वह खालीपन फिर से उभर आया। वह भूख जो दर्द माँगती थी।
रुद्रक्ष कमरे से बाहर जाने लगा। दरवाजे पर रुककर बोला।
“आराम कर ले। दो घंटे बाद नौकर तुझे नहलाने आएंगे। ठंडे पानी से। और याद रख—तू अब सिर्फ मेरी संपत्ति है। नंबर तीन। इच्छाएँ तेरी नहीं। सिर्फ मेरी आज्ञा।”

दरवाजा बंद हो गया। अनन्या फर्श पर पड़ी रही। शरीर दर्द से चीख रहा था। गुदा से पानी रिस रहा था। निप्पल जल रहे थे। लेकिन दिमाग में एक ही बात घूम रही थी—तीन दिन… किसी और के पास… फिर लौटकर सब बताना…
चेन हल्की सी खनकी। कमरे में सिर्फ उसकी भारी साँसें गूँज रही थीं। और कहीं बहुत गहराई में वह अजीब भूख फिर से जाग रही थी। तोड़ना अभी भी जारी था। और अगला पड़ाव और काला होने वाला था।

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