इंदौर के घर में अठारह साल के रोहन ने छब्बीस साल की काया को रातों में रस्सियों से बाँधकर चाबुक और मुट्ठी से इतना कुचला कि उसकी सूजी चूत और खून से सनी गांड हमेशा के लिए सिर्फ उसी की हो गई lusty web sex story ।
मेरा नाम रोहन है। उम्र अठारह साल। बारहवीं पास करके घर पर बैठा था। पापा की ट्रांसफर हो गई थी जयपुर से इंदौर। नया शहर, नया घर, नई जिंदगी। भैया अमित शादी करके तीन साल हो गए थे। वो पुणे में आईटी कंपनी में जॉब करते थे, महीने में एक-दो बार ही आते थे। उनकी बीवी काया… भाभी। उम्र छब्बीस साल। जिस्म 36-28-40। लंबे घने बाल, गहरी काली आँखें, मोटे होंठ और एक ऐसी कमर जो सलवार पहनने पर भी साफ दिख जाती। कोई बच्चा नहीं था। घर में सब कहते थे कि शायद काया में ही कोई कमी है। भैया का भी शुरू होते ही खत्म हो जाता था, पर बात कोई खुलकर नहीं करता था।
मैंने भाभी को पहले सिर्फ भाभी की नजर से देखा। फिर एक दिन सब बदल गया।
घर में पेंटिंग का काम चल रहा था। मेरा बाथरूम बंद था। मम्मी-पापा के कमरे का शावर खराब। भाभी के कमरे में बड़ा शावर था। भाभी रसोई में खाना बना रही थीं। मैंने पीछे से जाकर कहा, “भाभी, नहाने दे दो आपके बाथरूम में।” वो मुस्कुराईं और सिर हिला दिया।
बाथरूम का दरवाजा बंद किया। शावर चालू किया। नजर गई कपड़ों पर। काली लेस वाली ब्रा और मैचिंग पैंटी धुलने के लिए रखी हुई थी। मेरा लंड तुरंत सख्त हो गया। मैंने पैंटी उठाई। सूँघा। मादक गंध। सफेद दाग चिपके हुए। जीभ निकालकर चाट लिया। स्वाद मुँह में फैल गया।
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फिर ब्रा पहनी। पैंटी टाँगों में चढ़ाई। सलवार-कमीज भी पहन ली। आईने में खुद को देखा। लग रहा था जैसे काया ही बन गया हूँ। हाथ सलवार में डालकर लंड हिलाने लगा। साबुन उठाया जो भाभी छिपाकर रखती थी। लंड पर रगड़ा और जोर-जोर से हिलाया। पूरा माल भाभी की सलवार में छोड़ दिया। कपड़े उतारे, नहाया और बाहर निकला।
उस दिन के बाद भाभी मेरी नजर में सिर्फ रंडी रह गईं। हर रात सपनों में उन्हें नोचता, बाँधता, चोदता। उनकी पैंटी चुराने लगा। मुठ मारकर धोकर वापस रख देता। एक शाम छत पर खड़ा था। भाभी कपड़े सुखा रही थीं। सफेद दाग देखकर रगड़ने लगीं। उनकी नजर मुझ पर पड़ी। शक हो गया था।
फिर छूना शुरू किया। खाना निकालते समय पीछे से जाकर गांड छू देता। वो इग्नोर करतीं। एक दिन मम्मी ने बुलाया। मैं उनके कमरे में गया। बाथरूम में शावर चल रहा था। बेड पर पैंटी पड़ी थी। पैंटी लंड पर लपेट ली। छेद से झाँका। भाभी कुर्ती पहने नहा रही थीं। पानी से भीगी लाल ब्रा सफेद कपड़े में साफ दिख रही थी। एक हाथ अंदर था। उंगली कर रही थीं। मैंने उसी पैंटी में माल छोड़ दिया और भाग आया।
एक हफ्ता बात नहीं की। फिर एक रात मैसेज आया—“मेरे कमरे में आ।”
दरवाजा खुला था। काया बैठी थीं। गहरा लाल रंग की साड़ी, ब्लाउज के नीचे ब्रा नहीं, होंठों पर चटक लाल लिपस्टिक। बाल खुले। उन्होंने गुस्से से कहा, “लगता है तेरी जवानी काबू में नहीं है।”
मैं रो पड़ा। “भाभी माफ कर दो… गलती हो गई।”
वो हँसीं। जोर-जोर से। “मगरमच्छ के आँसू मत बहा। सब मेरे नाम की मारते हैं। एक शर्त पर छोड़ सकती हूँ।”
“क्या?”
“मुझे वो दे जो तेरा भैया कभी नहीं दे सकता। संतान। उसका शुरू होते ही खत्म हो जाता है। और मुझे सब पता है… तू मेरे कपड़ों के साथ क्या-क्या करता है।”
मैं कुछ कह पाता उससे पहले उन्होंने साड़ी का पल्लू गिराया। ब्लाउज के बटन खोले। मोटे गोल चूचे बाहर आ गए। निप्पल काले और कड़े। फिर पेटीकोट का नाड़ा खींचा। नंगी खड़ी हो गईं। चूत पर घने बाल। पहले से गीली।
उन्होंने मेरे बाल पकड़कर अपने दोनों टाँगों के बीच धकेल दिया। “चाट।”
मैंने जीभ निकाली। चूत पर लगाई। खट्टी-मीठी गंध। वो जोर से मेरे सिर को दबा रही थीं। साँस घुटने लगी। फिर बेड पर लिटा दिया। खुद ऊपर बैठ गईं। चूत मेरे मुँह पर रगड़ने लगीं। फव्वारा निकला। मैंने पूरा पी लिया। वो निढाल होकर गिर गईं।
“अब अपनी भाभी को माँ बना। आज से काया तेरी बीवी।”
मेरा लंड लोहे जैसा हो चुका था। मैंने लोअर सरकाया। छह इंच का मोटा लंड उनके मुँह में ठूंस दिया। गले तक। आँखों से आँसू आ गए। फिर बाल पकड़कर सोफे पर पटक दिया। घोड़ी बनाकर पीछे से घुसाया। एक झटके में पूरा अंदर।
“आह्ह… भड़वे… फाड़ दे… भाभीचोद…”
मैंने थप्पड़ मारा। गांड पर। लाल हो गई। फिर चोटी पकड़कर जोर-जोर से ठोका। चूत इतनी टाइट कि लग रहा था आज तक चुदी ही नहीं। तीन बार झाड़ चुकीं। फिर सीधा करके टाँगें कंधों पर रखीं। निप्पल काटे। खरोंचे।
“अहह… पतिदेव… आराम से… जलन हो रही है…”
मैंने नहीं सुना। और तेज ठोका। आखिर में पूरा बीज उनके अंदर छोड़ दिया। उन्होंने गले लगा लिया।
उस रात और भी हुआ। मैंने उनकी दोनों कलाई साड़ी से बाँध दीं। आँखों पर ब्लाउज बाँधा। गांड में उंगली डाली। फिर लंड। वो चीख रही थीं पर रोक नहीं रही थीं। “और… और मार… रंडी बना दे अपनी भाभी को…”
सुबह चार बजे उन्होंने उठाया। चूमा। “अब अपने कमरे जा। कब तक भाभी का दूध पिएगा?” हँसीं।
कुछ दिनों बाद उल्टियाँ शुरू हो गईं। डॉक्टर के पास गईं। मिठाई का डिब्बा लेकर आईं। मुस्कान चेहरे पर। घर में जश्न हुआ। सबको लगा भैया का बच्चा है।
पर सच सिर्फ हम दोनों जानते थे।
नौ महीने बाद बेटा हुआ। आज वो पाँच साल का है। नाम अर्जुन। सब कहते हैं अमित का बेटा है। काया अब भी जब अकेली होती है तो मुझे कमरे में बुलाती है। कभी बाँधती है, कभी खुद बँध जाती है। कभी चाबुक से पीटती है, कभी मेरे हाथों से पिटवाती है। कभी चूत में खीरा डालकर मुझे दिखाती है, कभी मेरे लंड को घंटों चूसती रहती है।
एक रात भैया आने वाले थे। काया ने मुझे बेड पर लिटाया। दोनों कलाई और टाँगें बाँध दीं। मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम निप्पल पर गिराया। मैं कराह उठा। फिर चूत पर बैठ गईं और रगड़ने लगीं। “आज तेरा माल अंदर लेना है… कल तेरा भैया आएगा… उसे लगेगा उसका है।”
मैंने झाड़ दिया। पूरा अंदर।
सुबह भैया आए। काया ने सामान्य व्यवहार किया। रात को भैया सो गए। काया मेरे कमरे में आई। नंगी। हाथ में रस्सी और काला टेप। “आज पूरी रात तेरी है… जितना चाहे उतना बर्बर बन… मुझे तोड़ना है।”
मैंने तोड़ा। घंटों। गांड फाड़ी। चूत में मुट्ठी डाली। गले दबाकर चोदा। वो रोईं, भीखीं, गालियाँ दीं, फिर और माँगा।
अब सालों बीत गए। अर्जुन स्कूल जाता है। भैया अभी भी महीने में एक बार आते हैं। और हर बार जब वो जाते हैं, काया मेरे कमरे का दरवाजा खोलती है। आँखों में वही भूख। शरीर में वही आग।
और मैं… हर बार उसी आग में जलता हूँ। उसी रस्सी से बाँधता हूँ। उसी बर्बरता से चोदता हूँ। क्योंकि वो मेरी भाभी नहीं… मेरी रखैल है। मेरी बीवी है। मेरी रंडी है। और मैं उसका मालिक।
रात के बारह बज चुके थे। घर में सन्नाटा। अर्जुन अपने कमरे में सो रहा था। भैया पुणे लौट चुके थे। काया का कमरा अधखुला था। मैं अंदर घुसा। वो बेड पर नंगी लेटी थीं। दोनों कलाई पहले से रस्सी से बँधी हुईं, सिरहाने से बाँध रखी थीं। टाँगें फैली हुईं। चूत पहले से लाल और सूजी हुई। कल रात की मार का निशान अभी भी गांड पर साफ दिख रहा था।
उन्होंने आँखें खोलीं। आवाज में भूख थी, “आज और बर्बर बन। मुझे तोड़ना है पूरी तरह। कोई रहम नहीं।”
मैंने दरवाजा बंद किया। कुंडी लगाई। कैबिनेट से काला चमड़े का चाबुक निकाला जो मैंने खुद मँगवाया था। साथ में लोहे की हथकड़ियाँ, मोटी रस्सी, और एक बड़ा काला डिल्डो। काया की आँखें चमक उठीं।
पहले मैंने उनकी आँखों पर काला टेप लगा दिया। फिर मुँह में बड़ा गैग ठूंस दिया। साँस सिर्फ नाक से। दोनों टाँगें और ऊपर खींचकर बेड के कोनों से बाँध दीं। पूरा शरीर वी आकार में तन गया। चूत और गांड पूरी तरह खुली।
चाबुक उठाया। पहले गांड पर। एक जोरदार वार। काया की कमर उछली। गैग में से दबी चीख निकली। दूसरा वार। तीसरा। गांड लाल हो गई, फूल गई। मैंने रुककर हाथ फेरा। गर्म और काँपती हुई त्वचा। फिर चूत पर सीधा वार। होठों पर चाबुक लगा। काया ने जोर से कराहट भरी। मैंने लगातार दस वार किए। चूत सूज गई, पानी निकलने लगा।
“रंडी… तेरी चूत सिर्फ मार खाने के लिए बनी है,” मैंने गुर्राते हुए कहा।
फिर डिल्डो लिया। पूरा तेल लगाकर चूत में एक झटके में घुसा दिया। काया की कमर तन गई। मैंने डिल्डो को अंदर-बाहर करना शुरू किया। जोर-जोर से। इतनी तेज कि बेड हिलने लगा। दूसरी हाथ से निप्पल पकड़कर मोड़ा। काया की आँखों से आँसू बह रहे थे टेप के नीचे। गैग से लार टपक रही थी।
डिल्डो निकालकर गांड में ठूंस दिया। पहले उंगली से फैलाया, फिर पूरा। काया ने जोर से सिर हिलाया। दर्द साफ था। मैंने नहीं सुना। गांड में डिल्डो घुमाते हुए चूत में तीन उँगलियाँ डाल दीं। मुट्ठी बनाने की कोशिश की। धीरे-धीरे पूरा हाथ अंदर। काया की चूत फैल गई। मैंने मुट्ठी घुमाई। अंदर की दीवारें काँप रही थीं।
“देख… तेरी कोख मेरे हाथ में है,” मैंने कहा और मुट्ठी और अंदर धकेली।
काया का शरीर काँप रहा था। एक बार झाड़ दी। पानी मेरे हाथ पर बहने लगा। मैंने मुट्ठी निकाली और चाबुक फिर से उठाया। अब चूचों पर। निप्पल पर सीधे वार। काले निप्पल और लाल हो गए। मैंने दोनों निप्पल पकड़कर खींचे। इतने जोर से कि काया की छाती ऊपर उठ गई।
फिर गैग निकाला। काया हाँफ रही थीं। “रोहन… और… मुझे और तोड़… मुझे कुत्ता बना…”
मैंने रस्सी खोली। उन्हें फर्श पर गिराया। चारों तरफ से बाँधकर कुत्ते की तरह बना दिया। गर्दन में रस्सी का फंदा। मैंने फंदा खींचा। काया रेंगने लगी। मैंने पीछे से लंड निकाला और गांड में एक झटके में पूरा घुसा दिया। दोनों हाथों से कमर पकड़कर जोर-जोर से ठोका। हर ठोके के साथ फंदा और कसता गया। काया की साँस रुक-रुककर चल रही थी।
“भोंक… रंडी भोंक,” मैंने हुक्म दिया।
काया ने कुत्ते जैसी आवाज निकाली। मैंने और तेज ठोका। गांड से खून की हल्की रेखा बहने लगी। मैंने नहीं रोका। पूरा माल गांड में छोड़ दिया। फिर लंड निकालकर उनके मुँह में ठूंस दिया। “चाट… अपना खून और मेरा माल दोनों।”
काया ने जीभ निकाली। चाटा। आँखों में आँसू। मैंने बाल पकड़कर गले तक ठोका। काया की आँखें लाल हो गईं। लार और खून मिलाकर बह रहा था।
रात के दो बज गए थे। मैंने उन्हें बेड पर वापस लिटाया। इस बार हाथ-पाँव अलग-अलग बाँधे। मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम निप्पल पर गिराया। काया चीखी। फिर चूत पर। मोम जमा होकर सफेद परत बन गई। मैंने मोम को नख से खुरचा। संवेदनशील त्वचा और जल गई।
फिर मैंने अपना लंड चूत में डाला। इस बार धीरे। बहुत गहरा। हर इंच महसूस कराते हुए। काया रो रही थीं। “पतिदेव… और अंदर… कोख फाड़ दो…”
मैंने टाँगें कंधों तक मोड़ दीं। पूरा वजन डालकर ठोका। गर्भाशय तक पहुँच रहा था। काया की आँखें पलटने लगीं। तीन बार झाड़ चुकीं। चौथी बार जब वो झाड़ीं तो मैंने भी अपना बीज उनकी कोख में छोड़ दिया। इतना कि बाहर निकलने लगा।
सुबह चार बजे मैंने रस्सियाँ खोलीं। काया की कलाई और टखनों पर गहरे निशान थे। गांड और चूत सूजी हुई। निप्पल पर मोम और चाबुक के निशान। मैंने उन्हें नहलाया। धीरे-धीरे साबुन लगाया। काया मेरी छाती से चिपककर रो रही थीं। “तुमने मुझे पूरी तरह अपना बना लिया… अब मैं सिर्फ तुम्हारी रंडी हूँ… भैया के आने तक हर रात ऐसे ही तोड़ना…”
मैंने उनके बाल सहलाए। “हर रात। जब तक तेरी चूत मेरे लंड की आदी न हो जाए। जब तक तेरी गांड मेरे चाबुक की भूखी न हो जाए।”
अगले दिन काया सामान्य दिखने की कोशिश कर रही थीं। सलवार-कमीज में। पर चलते समय दर्द साफ था। अर्जुन स्कूल गया। मम्मी बाजार चली गईं। काया मेरे कमरे में आईं। दरवाजा बंद किया। घुटनों के बल बैठ गईं। “आज दिन में… मुझे इस्तेमाल करो। जैसे कोई सस्ती रंडी।”
मैंने उन्हें खिड़की के पास खड़ा किया। पर्दा आधा खुला। सड़क दिख रही थी। मैंने पीछे से सलवार उतारी। ब्रा ऊपर उठाई। चूचे खिड़की की तरफ। फिर लंड चूत में डालकर जोर-जोर से ठोका। काया की चूचे काँच से टकरा रहे थे। कोई देख ले तो? डर और मजा दोनों।
मैंने उनके बाल पकड़कर खींचे। “चिल्ला… जोर से चिल्ला… साली रंडी।”
काया चिल्लाई। “आह्ह… भाभीचोद… फाड़ दे… मुझे कुतिया बना दे…”
मैंने गांड पर थप्पड़ मारे। लाल निशान। फिर चूत से निकालकर गांड में डाल दिया। काया की टाँगें काँपने लगीं। मैंने पूरा माल गांड में छोड़ दिया। फिर उन्हें घुटनों पर बिठाकर लंड साफ करवाया।
शाम को अर्जुन घर आया। काया ने सामान्य व्यवहार किया। रात को फिर वही। इस बार मैंने उन्हें अलमारी में बंद किया। अंधेरे में। सिर्फ एक छोटा सा छेद। मैंने छेद से लंड डालकर उनके मुँह में ठोका। घंटों। काया की गर्दन अकड़ गई। जब निकाला तो लार से लथपथ थीं।
फिर बेड पर। इस बार मैंने उनकी चूत में बर्फ के टुकड़े डाले। ठंडक से काया तड़प उठीं। फिर गर्म मोम। फिर चाबुक। फिर मुट्ठी। काया की चूत अब इतनी फैल चुकी थी कि मेरी मुट्ठी आसानी से चली जाती। मैंने मुट्ठी घुमाते हुए कहा, “ये चूत अब सिर्फ मेरे हाथ और लंड के लिए है। भैया का छोटा सा लंड इसमें खो जाएगा।”
काया ने सिर हिलाया। आँसू बह रहे थे। “हाँ… सिर्फ तुम्हारा… मुझे और बर्बरता दो… मुझे तोड़ते रहो…”
रात भर चलता रहा। सुबह काया की हालत खराब थी। चल नहीं पा रही थीं। मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया। पैर फैलाए। चूत और गांड में मरहम लगाया। काया मेरी उंगलियों को अंदर खींच रही थीं। “थोड़ा और… दर्द अच्छा लग रहा है…”
मैंने उंगली और अंदर डाली। “जल्दी ठीक हो जा। कल रात नया खेल है। आज मैंने नई रस्सियाँ और एक बिजली वाला वाइब्रेटर मँगवाया है। तुझे रात भर झाड़ते रहूँगा। जब तक तू बेहोश न हो जाए।”
काया की आँखों में चमक थी। “इंतजार रहेगा… मेरे मालिक।”
और इस तरह हर रात नई बर्बरता। नई पीड़ा। नया अपमान। काया अब सिर्फ मेरी रखैल नहीं रह गई थीं। वो मेरी तोड़ी हुई, रौंदी हुई, पूरी तरह से मेरी गुलाम बन चुकी थीं। और मैं… हर रात उनके शरीर पर अपना नाम लिखता जा रहा था। चाबुक से, दाँतों से, लंड से।
कहानी अभी भी खत्म नहीं हुई। क्योंकि जब तक काया की साँस चल रही है, रोहन की भूख खत्म नहीं होने वाली।
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