साली की बर्बादी में पत्नी की हिस्सेदारी

अरविंद ने शादीशुदा साली काजल को बार-बार तोड़ा। नेहा की जलन ने साथ दिया। खून बहता रहा, चीखें गूँजती रहीं और तीनों की वासना ने हर सीमा पार कर दी Sali ki chudai ।

मित्रों, मेरा नाम अरविंद है। मैं कानपुर, उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूँ। उम्र अट्ठाईस साल। मेरी पत्नी का नाम नेहा है, उम्र छब्बीस। और उसकी छोटी बहन का नाम काजल, उम्र तेईस। हम तीनों की यह कहानी उन्हीं दिनों की है जब मेरी शादी को महज चार महीने ही हुए थे। हम एक छोटे से किराये के फ्लैट में रहते थे—दो कमरे, एक रसोई और बाथरूम। गर्मी का मौसम था, पसीना और वासना दोनों चरम पर।

नेहा बहुत ही जोशीली और वफादार पत्नी थी। रोज रात को सोने से पहले वह मेरे पूरे शरीर की तेल मालिश करती थी। खासकर मेरे लंड को—मोटी, लंबी, नसों से भरी हुई वह चीज जो हमेशा उसकी हथेलियों में फिट बैठती थी। वह कहती थी, “अरविंद, तुम्हारा यह हथियार मुझे पागल कर देता है।” मैं भी उसके साथ घंटों खेलता। लेकिन उस गर्मी की एक रात सब कुछ बदल गया।

काजल हमारे घर आई हुई थी। उसकी शादी तय हो चुकी थी, तीन महीने बाद। वह चंचल, तीखी जुबान वाली और जिज्ञासु लड़की थी। एक ही कमरे में तीनों सोते थे। उस रात नेहा मुझे तेल लगा रही थी। मैं सिर्फ एक पतली लुंगी में था, नीचे कुछ नहीं। काजल भी बैठ गई और नेहा से बोली, “दीदी, मैं भी मदद करूँ?” नेहा मुस्कुराई, “हाँ, छाती और कंधे दबा दो।”
काजल के हाथ मेरे सीने पर पड़े। उसकी उंगलियाँ मेरे निप्पल्स को धीरे-धीरे घुमा रही थीं। मैंने आँखें बंद कर लीं। लंड लुंगी के अंदर फूलने लगा। नेहा जाँघों तक पहुँच चुकी थी। उसने लुंगी हटाई और मेरे खड़े लंड को दोनों हाथों से पकड़ लिया। तेल लगाते हुए वह ऊपर-नीचे करने लगी। दीवार पर लंड की लंबी छाया पड़ रही थी।

मैंने काजल से कहा, “उधर दीवार देखो।” काजल की नज़र पड़ी तो वह चौंक गई, “बाप रे! जीजा, यह क्या है? इतना…?” नेहा ने लुंगी डाल दी और हँसी, “ये ऐसे ही शरारत करते रहते हैं।” मैंने कहा, “साली तो आधी पत्नी होती है। कुछ तो सीख ले, शादी के बाद काम आएगा।” काजल शरमा गई लेकिन उसकी नज़र बार-बार मेरे लंड पर जा रही थी।

रात को तीनों एक बिस्तर पर लेटे। नेहा बीच में, काजल उसके पास। मैं नींद का इंतजार करता रहा। जब नेहा की साँसें गहरी हो गईं, मैंने धीरे से हाथ बढ़ाया। काजल की चूचियाँ—नरम, गोल, अभी तक किसी मर्द के छूने से अनछुई। मैंने एक को दबाया। वह सहम गई लेकिन हिली नहीं। दूसरा दबाया। उसकी साँस तेज हो गई। मैंने और जोर से मसला। निप्पल कड़ा हो गया। मेरा लंड पूरी तरह खड़ा था, नेहा की कमर से सटा हुआ।

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मैं नेहा के ऊपर चढ़ गया और काजल के होठों पर मुँह रख दिया। जीभ घुसाई। नेहा जाग गई। उसने मेरा हाथ पकड़ा, “अरविंद! क्या पागलपन है? मेरी बहन को मत छू! अगर मैं न जगती तो… तू कितना हरामी है!” काजल उठकर बाथरूम चली गई। मैंने नेहा को चूमा, उसकी चूचियाँ मसलीं और बोला, “आज दोनों चाहिएं। बुला उसे।” नेहा गुस्से में थी, “नहीं! उसकी झिल्ली फटेगी तो ससुराल वाले शक करेंगे। तेरा लंड बहुत मोटा है, बेचारी बर्बाद हो जाएगी। मेरे साथ जो चाहे कर, उसे छोड़।”

मैंने उसी रात नेहा को ही चोदा—जोर-जोर से, उसके बाल पकड़कर, पीठ पर थप्पड़ मारते हुए। वह कराह रही थी लेकिन मना नहीं कर रही थी।
अगले दिन नेहा बाजार गई। मैं ऑफिस से जल्दी लौटा। काजल अकेली थी। मैंने पूछा, “कल रात क्यों भाग गई?” वह बोली, “दीदी जग गई थी, शर्म आई।” मैंने उसे दीवार से सटाया, होठों पर मुँह रख दिया। जीभ घुसाई, दाँत से होंठ काटे। उसने विरोध किया, “जीजा… दीदी आ जाएंगी…” लेकिन मैंने उसका हाथ अपने पैंट के ऊपर रखा। चेन खोली, लंड बाहर निकाला। वह देखती रह गई—बारह इंच लंबा, कलाई जितना मोटा, नसें फूली हुई।

“पकड़,” मैंने कहा। उसने पकड़ा। मुट्ठी में पूरा नहीं आ रहा था। “चाट।” वह झुकी। जीभ से चाटा, फिर मुँह में लिया। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर आगे धकेला। गले तक। वह घुटने टेककर रह गई, आँखों से पानी निकल रहा था लेकिन चूसती रही। मैंने कहा, “आज पूरी लेगी। झिल्ली तोड़ दूँगा।” वह सिर हिला रही थी लेकिन मुँह से लंड नहीं निकाल रही थी।

दरवाजा खुला रह गया था। नेहा अंदर आई। देखा—काजल घुटनों पर, मेरा लंड उसके मुँह में। नेहा का चेहरा लाल हो गया। उसने काजल के गाल पर दो जोरदार थप्पड़ जड़े, “छिनार! अपने जीजा के लंड पर मरती है?” काजल रोने लगी, “मैंने मना किया था… ये नहीं माने!” मैंने नेहा का हाथ पकड़ा, “घर की बात है। अब जो हो चुका सो हो चुका।” नेहा ने दोनों को गालियाँ दीं फिर चुप हो गई। रात का खाना चुपचाप खाया।

रात को फिर एक बिस्तर। नेहा ने अचानक कहा, “काजल, आज तू मालिश कर। मुझे थकान है। मैं सो जाऊँ तो मत जगाना।” काजल मेरे पैर दबाने लगी। थोड़ी देर बाद नेहा की साँसें गहरी हो गईं। मैंने लुंगी हटाई। काजल ने लंड पर तेल लगाया, दोनों हाथों से ऊपर-नीचे किया। मैंने उसकी सलवार की डोरी खोली। उंगली उसकी चूत पर रखी—बालों वाली, बंद, गीली नहीं। उसने रोका, “इतना बड़ा… नहीं सह पाऊँगी।” मैंने कहा, “नेहा भी यही कहती थी। एक बार दर्द, फिर मजा।”

हम 69 में आ गए। मैंने उसकी चूत चाटी—स्वाद कच्चा, नया। उसने मेरा लंड मुँह में लिया, गले तक। दोनों झड़ गए एक-दूसरे के मुँह में। फिर मैंने उसे चित लिटाया। थूक लगाया अपने लंड पर और उसकी चूत पर। सिर अंदर धकेला। नहीं घुसा। और जोर। काजल की आँखों से आँसू बहने लगे। मैंने मुँह उसके मुँह पर रख दिया ताकि चीख न निकले। एक जोरदार धक्का—झिल्ली फटी। खून निकला। काजल चिल्लाई, “माँ… मर गई… दीदी बचाओ!”

नेहा जाग गई। बत्ती जलाई। बेडशीट पर खून के धब्बे। काजल की चूत से खून रिस रहा था, मेरे लंड पर भी। नेहा रो पड़ी, “तूने उसकी सील तोड़ दी! निर्दयी!” मैंने जवाब दिया, “तू भी पहली रात रोई थी। अब चुप रह और हमें मजा लेने दे।” मैंने फिर धक्का मारा। पूरा लंड अंदर। काजल चीख रही थी, नाखून मेरे पीठ में गड़ा रही थी। मैंने उसके दोनों हाथ पकड़कर सिर के ऊपर बाँध दिए—बिस्तर की रस्सी से। पैर फैलाए। और जोर से पेलने लगा।

“ऊई… दर्द… निकाल… जीजा…” वह सिसक रही थी। मैंने उसके गले पर हाथ रखा, हल्का दबाया। “सह। आज तेरी असली शुरुआत है।” नेहा रो रही थी लेकिन उसकी चूत भी गीली हो चुकी थी—मैंने देखा। मैंने कहा, “आ, तू भी आ जा।” नेहा झिझकी लेकिन आई। मैंने काजल के अंदर ही रहते हुए नेहा को चूमा, उसकी चूचियाँ मसलीं। फिर लंड निकाला—खून लगा हुआ—और नेहा की चूत में घुसा दिया। नेहा कराह उठी। काजल देख रही थी, आँसू पोंछते हुए।

मैंने दोनों को बारी-बारी चोदा। काजल की बाँधी हुई कलाइयाँ लाल हो गई थीं। मैंने उसके निप्पल्स को दाँतों से काटा, थप्पड़ मारे उसकी जाँघों पर। खून और पसीने की गंध। जब मैं काजल में झड़ने वाला था तो और गहरा धकेला, उसके गर्भ तक। वह बेहोश सी हो गई। फिर नेहा में। रात भर यही सिलसिला चला—बाँधना, पीटना, जबरदस्ती घुसाना, गला दबाना, बाल खींचना।

सुबह काजल देर तक सोई रही। मैं बाजार से केले और फल लाया। उसे जगाया, केला दिया। वह बोली, “नहीं… अब डर लगता है… इतना बड़ा…” नेहा ने मुस्कुराकर केला ले लिया। काजल दो महीने और रही। हर रात। कभी रस्सी से बाँधकर, कभी नेहा के सामने घुटनों पर बिठाकर चूसवाकर, कभी दोनों बहनों को एक साथ लिटाकर बारी-बारी से। कभी काजल की चूत में उंगलियाँ घुसाकर फैलाते हुए, कभी उसके मुँह में लंड ठूँसकर साँस रोकते हुए।

एक रात मैंने दोनों को एक-दूसरे के सामने नंगा किया। नेहा को काजल की चूत चाटने को कहा। पहले मना किया, फिर किया। काजल रो रही थी लेकिन नेहा की जीभ पर प्रतिक्रिया दे रही थी। मैंने पीछे से काजल को पेलते हुए नेहा के बाल पकड़े। खून अब नहीं निकलता था लेकिन दर्द की आवाजें वही थीं। मैंने काजल की गांड भी ली—जबरदस्ती, तेल लगाकर। वह चीखी, “नहीं… वहाँ नहीं…” लेकिन मैंने रस्सी से और कस दिया। पूरा अंदर। नेहा देखती रही, अपनी उंगलियों से खुद को सहलाती हुई।

हर दिन नया तरीका। कभी काजल को खड़े होकर दीवार से सटाकर, कभी बिस्तर के किनारे लटकाकर, कभी नेहा के ऊपर लिटाकर दोनों को एक साथ। मैं उनके शरीर पर थप्पड़ के निशान छोड़ता, दाँतों के निशान, रस्सी के निशान। काजल की आँखों में डर और वासना दोनों थे। नेहा की आँखों में जलन और उत्तेजना। मैं कहता, “तुम दोनों मेरी हो। शादी के बाद भी काजल जब आएगी, यही होगा।”
दो महीने बाद काजल अपने घर लौटी। उसकी शादी हुई। लेकिन उन दो महीनों की यादें—खून, चीखें, बाँधना, जबरदस्ती, दोनों बहनों का एक साथ होना—वे कभी नहीं गईं। नेहा अब भी हर रात मालिश करती है। और कभी-कभी फोन पर काजल की आवाज आती है, धीमी सी, “जीजा… याद है न…”

काजल की शादी के बाद भी कहानी खत्म नहीं हुई। तीन महीने बीत गए थे। एक शाम फोन आया। काजल की आवाज काँप रही थी, “जीजा… मुझे तुम्हारी जरूरत है। पति कुछ नहीं कर पाता। वह छोटा है, नरम है। तुम्हारा वाला याद आता है… दर्द वाला वाला।” नेहा पास बैठी सुन रही थी। उसकी आँखों में जलन थी लेकिन चूत पहले से गीली हो चुकी थी। मैंने कहा, “आ जा। रात भर के लिए।”
काजल अगली सुबह आई। साड़ी में, सिंदूर लगाए, लेकिन आँखों में वही पुरानी भूख। नेहा ने दरवाजा खोला तो दोनों बहनें एक पल के लिए एक-दूसरे को घूरती रहीं। फिर नेहा ने काजल का हाथ पकड़ा और अंदर खींच लिया। मैं बैठक में इंतजार कर रहा था। लुंगी में, लंड पहले से आधा खड़ा।

काजल घुटनों के बल मेरे सामने बैठ गई। “जीजा, बाँध लो मुझे जैसे पहले। आज पूरा बर्बाद कर दो।” नेहा ने रस्सियाँ निकालीं—मोटी, खुरदरी। हमने काजल को बिस्तर पर लिटाया। दोनों हाथ सिर के ऊपर बाँधे, पैर चौड़े फैलाकर टखनों को बिस्तर के पाए से कस दिए। मुँह में कपड़ा ठूँस दिया ताकि चीखें दब जाएँ। नेहा ने उसकी साड़ी फाड़ दी। चूचियाँ बाहर निकलीं—शादी के बाद थोड़ी भारी हो गई थीं। मैंने दोनों निप्पल्स को चिमटे से दबाया। काजल की कमर उछली, आँखों से आँसू बहने लगे।

मैंने लंड निकाला और उसके मुँह के कपड़े हटाकर गले तक ठूँस दिया। नेहा पीछे से उसकी चूत में तीन उंगलियाँ घुसा रही थी—जोर-जोर से, नाखून गड़ाते हुए। “साली, अब तू घरवाली बन गई फिर भी जीजा के लंड पर मरती है,” नेहा गुर्राई। काजल घुट रही थी लेकिन मुँह नहीं हटा रही थी। मैंने बाल पकड़कर और गहरा धकेला। थूक और आँसू उसके गालों पर बह रहे थे।

फिर मैंने लंड निकाला और सीधे उसकी चूत में एक झटके में घुसा दिया। शादी के बाद भी वह कसी हुई थी। खून नहीं निकला लेकिन दर्द की आवाज कपड़े के बावजूद निकल रही थी। मैंने उसके गले पर हाथ रखा और दबाया। साँस फूलने लगी। नेहा ने उसके निप्पल्स को और कसकर मरोड़ा। मैं धक्के मार रहा था—तेज, गहरा, क्रूर। हर धक्के के साथ बिस्तर चरमरा रहा था। काजल की बाँधी हुई कलाईयाँ लाल हो गईं, रस्सी मांस में धँस गई।

आधा घंटा लगातार पेलने के बाद मैंने लंड निकाला और नेहा को नीचे लिटाया। काजल अभी भी बाँधी हुई थी। मैंने नेहा की चूत में घुसाया और काजल के मुँह को नेहा की चूत के पास ले जाकर कहा, “चाट। अपनी दीदी का पानी पी।” काजल ने जीभ निकाली। नेहा कराह उठी। मैं दोनों को एक साथ इस्तेमाल कर रहा था—एक में लंड, दूसरी की जीभ। फिर मैंने काजल की गांड में तेल डाला। उंगली घुसाई, फिर दो, फिर तीन। वह तड़प रही थी। रस्सी इतनी कसी थी कि हाथ-पैर सुन्न पड़ने लगे थे।

मैंने अपना लंड उसकी गांड में धकेला। धीरे नहीं—एक ही झटके में आधा। काजल की आँखें फटी की फटी रह गईं। मैंने और जोर लगाया। पूरा अंदर। नेहा उसके बाल पकड़े हुए थी और उसके मुँह में अपनी चूत रगड़ रही थी। “ले साली, अब दोनों छेद बर्बाद हो गए,” मैंने कहा। धक्के तेज होते गए। काजल की गांड से खून की पतली लकीरें निकलने लगीं। मैंने गला और दबाया। उसका चेहरा लाल हो गया, नसें फूलीं। जब वह बेहोशी की कगार पर थी तब छोड़ा। साँस लेते ही वह सिसकने लगी।

रात भर यही सिलसिला चला। कभी काजल को उल्टा लटकाया—सिर नीचे, पैर ऊपर रस्सी से। लंड उसके मुँह में ठूँसा और नेहा नीचे से उसकी चूत और गांड में उंगलियाँ और वैक्यूम जैसा कुछ घुमाती रही। कभी दोनों बहनों को एक-दूसरे के सामने बाँधा। नेहा को काजल की चूत पर बैठने को मजबूर किया जबकि मैं पीछे से नेहा को पेल रहा था। थप्पड़, चिमटे, मोमबत्ती के गर्म मोम—सब इस्तेमाल किया। काजल की पीठ पर मोम की बूंदें गिराईं। वह चीखती रही लेकिन रस्सी नहीं टूटी।

सुबह चार बजे मैं दोनों के मुँह में एक साथ झड़ा। काजल की आँखें सूजी हुई थीं, कलाईयाँ छिल गई थीं, चूत और गांड सूजी हुई, खून और वीर्य मिला हुआ। नेहा खुद भी थक चुकी थी लेकिन उसकी आँखों में संतुष्टि थी। हमने काजल को खोला। वह बिस्तर पर गिर पड़ी। मैंने पानी पिलाया। वह फुसफुसाई, “जीजा… और… कल रात फिर…”

अगले तीन दिन काजल रुकी। हर दिन नया अत्याचार। एक दिन हमने उसे कुत्ते की तरह रस्सी से बाँधा—गर्दन में पट्टा, हाथ पीछे। फर्श पर घुटनों के बल घसीटा। नेहा उसके पीछे चल रही थी और छड़ी से जाँघों पर मार रही थी। लाल निशान पड़ गए। मैंने उसके मुँह में लंड ठूँसा और नेहा ने पीछे से वैजाइना में एक मोटा खीरा घुसा दिया। काजल रो रही थी, गिड़गिड़ा रही थी लेकिन पट्टा इतना कसा था कि भाग नहीं सकती थी।

दूसरे दिन आईने के सामने। काजल को खड़ा करके हाथ ऊपर बाँधे। मैंने उसके पूरे शरीर पर बेल्ट से मारते हुए चोदा। हर थप्पड़ के साथ लंड और गहरा जाता। नेहा नीचे बैठकर उसके पैर चाट रही थी और कभी-कभी चिमटे से निप्पल्स दबा रही थी। काजल की चीखें पूरे फ्लैट में गूँज रही थीं। पड़ोसी शायद सुन रहे होंगे लेकिन हमें कोई परवाह नहीं थी।

तीसरे दिन अंतिम। हमने दोनों बहनों को एक साथ बाँधा—एक-दूसरे के सामने, छाती से छाती सटाकर। रस्सी इतनी कसी कि साँस लेना भी मुश्किल। मैंने बीच में आकर दोनों की चूतों में बारी-बारी लंड घुसाया। कभी एक में पूरा, कभी दूसरी में। दोनों की चीखें मिलकर एक हो गई थीं। आखिर में मैंने काजल की गांड में और नेहा की चूत में एक साथ उंगलियाँ घुसाकर दोनों को एक साथ झड़ने पर मजबूर किया। फिर अपना लंड दोनों के मुँह में डालकर अंतिम बार झड़ा।

काजल जब लौटी तो चल नहीं पा रही थी ठीक से। नेहा ने उसे स्टेशन तक छोड़ा। फोन पर बाद में काजल ने कहा, “पति को शक हो गया खून देखकर… लेकिन मैंने कह दिया कि गिर गई थी। जीजा, अगली बार और बुरा करना… और क्रूर।”
नेहा अब हर रात मुझे मालिश करते हुए कहती है, “कल काजल को फिर बुलाएँ? उसकी चीखें सुनकर मेरी चूत पागल हो जाती है।” मैं उसके बाल पकड़कर लंड उसके मुँह में ठूँस देता हूँ और जवाब देता हूँ, “बुलाएँगे। और इस बार रस्सी के साथ चेन भी रखेंगे। और मोमबत्ती। और छड़ी।”

कहानी अभी भी जारी है। हर बार काजल आती है तो दर्द और गहरा होता है, बाँधना और कसा होता है, चीखें और लंबी होती हैं। नेहा की जलन और वासना दोनों बढ़ती जाती हैं। और मैं… मैं दोनों बहनों को टुकड़े-टुकड़े करके इस्तेमाल करता हूँ। कोई सीमा नहीं, कोई दया नहीं। सिर्फ रस्सी, खून, थप्पड़, गला दबाना और वो लंड जो दोनों को बार-बार तोड़ता है।
यह अंत नहीं है। अगली बार और भी भयानक होगा।

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