कुंवारी साली चुपके से तालाब में

कुंवारी साली को घर में चुपके से चीरने के बाद तालाब के अंधेरे में बार-बार नंगा बाँधकर दोनों छेदों में खून और वीर्य भर देने वाली एक पागल कर देने वाली हवस भरी सच्ची दास्तान sali xxx stories hindi।

मेरा नाम राहुल वर्मा है। उम्र 28 साल। राजस्थान के एक छोटे कस्बे से हूँ। शरीर कसा हुआ, कंधे चौड़े, हाइट 5’9″, और मेरा औजार 7.5 इंच का मोटा और नसों वाला। कई औरतों को मैंने तोड़ा है – भाभियाँ, गर्लफ्रेंड्स, दोस्त की बहनें। लेकिन जो रात मैंने अपनी भाभी की छोटी साली के साथ बिताई, वो अब भी मेरे खून में जलती है।

साल 2018 की बात है। मेरे बड़े भाई की शादी हुई थी। शादी के दस दिन बाद भाभी की छोटी साली हमारे घर आई। नाम था अंजलि। उम्र 23। गोरी, गोल-मटोल चेहरा, लंबे काले बाल, और शरीर ऐसा कि देखने वाले की साँस अटक जाए। ऊँचे स्तन, पतली कमर, और गोल-गोल नितंब। पहली नज़र में ही लग रहा था कि ये अभी तक किसी मर्द की नहीं हुई। कुंवारी। सलोनी। भूखी।

अंजलि जब से आई, मुझे घूरती रहती। आँखों में वो भूख थी जो छुपाती नहीं। मैं समझ गया था – इसकी चूत लंड माँग रही है। मैंने भी जवाब में नज़रें घुमाईं। हल्की-हल्की बातें, हँसना, छूना। वो शरमाती, फिर मुस्कुराती। बारिश का मौसम था। घर में सिर्फ़ मैं और माँ रह गए थे। बाकी सब रिश्तेदारों की शादी में चले गए थे।
रात के साढ़े नौ बजे अंजलि वापस आई। माँ ने पूछा, “खाना खाओगी?”

“नहीं आंटी, वहाँ खा लिया।”
मैं अंदर वाले कमरे में भाभी के बिस्तर पर लेटा था। अंजलि माँ के साथ टीवी देखने बैठ गई। ग्यारह बजे माँ सो गईं। अंजलि टीवी छोड़कर मेरे कमरे में आ गई।
“राहुल जी… क्या कर रहे हो?”

मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “तुम्हारा इंतज़ार।”
वो हँसी। फिर बिस्तर के किनारे बैठ गई। लाइट अचानक गुल हो गई। तेज़ बारिश। अंधेरा। अंजलि डर के मारे या मौका देखकर मेरे बगल में लेट गई।
“यहाँ मत लेटो। माँ जाग गईं तो…”

“वो गहरी नींद में हैं। मैंने देखा।”
मैं उठा, बाथरूम के बहाने माँ के कमरे में गया। सच में सोई हुई थीं। वापस आकर बिस्तर पर लेट गया। दीवार की तरफ़ करवट ली। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
कुछ देर बाद मैंने करवट बदली। अंजलि मेरी तरफ़ मुँह किए जाग रही थी। आँखें चमक रही थीं। मैंने कंधे पर हाथ रखा।
“क्या हुआ?”

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वो चुप।
मैंने हाथ धीरे से उसके सीने की तरफ़ बढ़ाया। कुर्ते के ऊपर से ही उसके नरम स्तन छू गए। उसने आँखें बंद कर लीं। कोई मना नहीं। मैंने एक स्तन दबाया। फिर दूसरा। वो धीरे से कराह उठी।
“आवाज़ मत निकाल… माँ सुन लेंगी।”
मैं उसके ऊपर चढ़ गया। कुर्ते के ऊपर से ही स्तन मुँह में भर लिए। चूसने लगा। जीभ घुमाई। दाँत से हल्के से काटा। अंजलि का शरीर ऐंठने लगा। मैंने हाथ उसकी कमर के नीचे ले जाकर सलवार के अंदर डाल दिया। पैंटी गीली थी। चूत फूली हुई, गर्म और चिकनी। उंगली से फाड़ की कोशिश की तो वो तड़प उठी।
“अह… दर्द…”

“चुप। सहन कर।”
मैंने कुर्ता ऊपर कर दिया। स्तन नंगे हो गए। गुलाबी निप्पल खड़े। मैंने दोनों को मुँह में भर-भर कर चूसा, काटा, खींचा। अंजलि ने मुँह पर हाथ रख लिया। सलवार का नाड़ा खोला। नीचे सरकाया। पैंटी भी फाड़ दी। अंधेरे में भी उसकी चिकनी चूत चमक रही थी।
“लंड चूस।”

“नहीं… मुँह में नहीं…”
मैंने उसके बाल पकड़कर सिर नीचे झुका दिया। “चूस। वरना माँ को जगा दूँगा।”
अंजलि काँपते हुए मुँह खोला। मैंने लंड उसके होठों पर रखा। वो हिचकिचाई। मैंने सिर दबाया। आधा लंड उसके गले में धंस गया। वो उबकाई। आँखों से आँसू निकले। मैंने बाल और कसकर पकड़े और जोर से धकेलने लगा। गला रगड़ता रहा। थूक टपकने लगा। दो मिनट बाद मैंने निकाला।
“अब खुद हिला।”

उसने काँपते हाथों से लंड पकड़ा। मैंने उसकी चूत में दो उंगलियाँ घुसा दीं। अंदर तक। वो चीखी। मैंने मुँह दबा दिया। उंगलियाँ अंदर-बाहर करने लगा। तीसरी उंगली भी घुसा दी। चूत फैल रही थी। खून की एक बूंद उंगली पर लग गई। कुंवारी थी।
“अब लेगी।”
मैंने उसके पैर फैलाए। घुटने छाती तक दबाए। लंड चूत पर रखा। थूक लगाया। फिर एक जोरदार धक्का मारा। सुपारी ने फाड़ते हुए एंट्री ली। अंजलि की आँखें फट गईं। आँसू बहने लगे। उसने अपने मुँह पर तकिया दबा लिया। मैंने पूरा लंड अंदर धकेल दिया। एक ही बार में।
“आह… फट गई… निकाल… दर्द…”

“सहन कर। अभी तो शुरू हुई है।”
मैंने कमर हिलानी शुरू की। धीरे नहीं। जोर-जोर से। चूत चीख रही थी। हर धक्के पर खून और पानी मिला। मैंने उसके दोनों हाथ पकड़कर सिर के ऊपर दबा दिए। स्तनों को दाँतों से काटने लगा। निप्पल को खींचा।
“तेरी चूत मेरी है। समझी?”

वो सिर हिला रही थी। रो रही थी। लेकिन कमर अपनी मर्ज़ी से हिलाने लगी थी।
पाँच मिनट बाद मैंने लंड निकाला। अंजलि को पलटा। घुटनों के बल बिठाया। सिर तकिए पर दबाया। नितंब ऊपर। चूत पूरी खुली। मैंने फिर से घुसाया। इस बार और गहरा। हाथ से उसकी कमर पकड़कर जोर-जोर से पेलने लगा। थप्पड़ मारे नितंबों पर। लाल हो गए। फिर और जोर से।
“आह… राहुल… धीरे…”

“धीरे नहीं। आज पूरी फाड़ूँगा।”
मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। कमर और तेज़ हिलाई। चूत की आवाज़ – थप-थप-थप – पूरे कमरे में गूँज रही थी। बारिश की आवाज़ उसे ढक रही थी। मैंने एक हाथ आगे ले जाकर उसकी चूत की ऊपर वाली गांठ दबाई। उंगली से रगड़ा। अंजलि का शरीर काँपने लगा। वो झड़ गई। चूत में पानी की धार छोड़ी। मैंने लंड बाहर नहीं निकाला। और तेज़ पेलने लगा।
दूसरी बार झड़ने के बाद मैंने लंड उसके मुँह में ठूंस दिया। “चूस। अपना खून चख।”

अंजलि रोते-रोते चूसने लगी। मैंने गले तक धकेल दिया। साँस बंद हो गई तो निकाला। फिर से घुसाया। तीसरी बार जब लंड खड़ा हुआ तो मैंने उसे फिर से घोड़ी बना दिया। इस बार और क्रूर। नितंबों पर थप्पड़। कमर पर नाखून। स्तनों को पीछे से पकड़कर मरोड़ा।
“तेरी चूत इतनी टाइट है… फट जाएगी आज।”

मैंने पूरा जोर लगाकर पेलना शुरू किया। हर धक्का इतना गहरा कि उसके पेट तक महसूस हो। अंजलि अब सिर्फ़ कराह रही थी। दर्द और मज़े का मिश्रण। मैंने उसके मुँह में अपनी उंगलियाँ ठूंस दीं। वो चूसने लगी।
रात के दो बज गए थे। मैंने आखिरी बार लंड अंदर रखा और पूरा वीर्य उसकी चूत में उड़ेल दिया। गरम। गाढ़ा। अंजलि का शरीर थरथरा रहा था। मैं ऊपर ही लेटा रहा। लंड अंदर।
दस मिनट बाद लंड फिर खड़ा हो गया। मैंने निकाला। अंजलि को पीठ के बल लिटाया। पैर उसके कंधों पर रखे। चूत पूरी खुली और लाल। मैंने फिर से घुसाया। इस बार और बर्बर।
“आज रात तू मेरी रंडी है। समझी?”

“हाँ… राहुल… तुम्हारी…”
मैंने उसके गले पर हाथ रखा। हल्का दबाया। साँस फूलने लगी। चूत और कस गई। मैंने और जोर लगाया। गला दबाए रखा। आँखें लाल हो गईं। फिर छोड़ा। वो हाँफने लगी। मैंने फिर दबाया। इस बार और देर तक। चूत में लंड धंसता रहा।
तीसरी बार जब झड़ा तो वीर्य उसके पेट और स्तनों पर गिरा। मैंने लंड उसके मुँह में दे दिया। “चाट सब।”
अंजलि ने जीभ से चाटा। आँसू और वीर्य मिलाकर।
सुबह चार बजे मैंने कहा, “अब जा। माँ के पास सो।”
वो उठने को हुई तो मैंने फिर से पकड़ लिया। “एक बार और।”

इस बार मैंने उसे दीवार से सटाया। एक पैर ऊपर उठाया। खड़े-खड़े पेलने लगा। चूत अब ढीली पड़ चुकी थी लेकिन फिर भी टाइट। खून और वीर्य मिलाकर फिसल रहा था। मैंने उसके दोनों स्तन पकड़कर मरोड़े। निप्पल को दाँतों से काटा।
“चिल्ला मत। वरना घर वाले सुन लेंगे और तुझे सबके सामने नंगा कर दूँगा।”
अंजलि ने मुँह बंद रखा। सिर्फ़ आँखों से पानी बह रहा था। मैंने आखिरी बार पूरा लंड अंदर दबाया और वीर्य फिर से चूत में छोड़ दिया।
पाँच बज गए थे। अंजलि काँपते हुए कपड़े पहनने लगी। चूत से खून और वीर्य रिस रहा था। सलवार गीली हो गई। मैंने कहा, “कल फिर आना। आज रात अधूरी रही।”
वो सिर हिलाकर चली गई।
सुबह जब मैं उठा तो अंजलि किचन में माँ के साथ थी। चाय लेकर आई। मैंने हाथ पकड़कर खींचा।
“किसके दूध की चाय है?”

वो फुसफुसाई, “मेरे…”
मैंने उसके होठों पर जोर से चुंबन लिया। जीभ घुसाई। माँ की आवाज़ आई तो वो भाग गई।
उसी दिन शाम को अंजलि अपने घर चली गई। लेकिन वो रात मेरे दिमाग से नहीं गई। उसकी फटी हुई चूत, उसके आँसू, उसके गले की घरघराहट, उसके नितंबों पर मेरे थप्पड़ों के निशान – सब याद हैं।
मैंने बाद में कई बार कोशिश की उससे मिलने की। एक बार मिला भी। रात के अंधेरे में उसके घर के पीछे। वहाँ भी मैंने उसे दीवार से सटाकर उसी बर्बरता से चोदा। इस बार उसने खुद पैर फैलाए और कहा, “आज और जोर से फाड़ना।”

अब जब भी बारिश होती है, मुझे वो रात याद आती है। जब एक कुंवारी लड़की की चूत को मैंने अपने लंड से चीर दिया था। जब उसने दर्द में रोते हुए भी कमर हिलाई थी। जब उसने मेरा वीर्य चाटा था।
ये मेरी सच्ची कहानी है। और हर बार जब मैं इसे दोहराता हूँ, मेरा लंड फिर से खड़ा हो जाता है।
अंजलि अगर कभी ये पढ़े… तो जान ले, तेरी चूत अभी भी मेरी है।
जारी…
अंजलि चली गई थी, लेकिन उसकी फटी हुई चूत की गंध मेरे हाथों पर कई दिनों तक चिपकी रही। मैं रोज़ रात उसी बिस्तर पर लेटकर अपनी मुट्ठी से लंड मसलता और उसकी कराहें सुनता। दो हफ़्ते बाद मुझे उसके गाँव जाने का मौका मिला। भाभी के मामा की तबियत खराब थी, सो मैं अकेला गया। रात के ग्यारह बजे अंजलि खुद मुझे गाँव के किनारे वाले पुराने तालाब के पास बुला ले गई। अंधेरा गाढ़ा था। आसपास कोई नहीं। सिर्फ़ मेंढक की टर्र-टर्र और दूर से कुत्तों का भौंकना।

वो पेड़ के नीचे खड़ी थी। काला कुर्ता-सलवार। बाल खुले। आँखों में वही भूख। मैंने बिना एक शब्द कहे उसके बाल पकड़कर पीछे खींचे और मुँह उसके गले पर लगा दिया। दाँतों से मांस दबाया। वो कराह उठी।
“आज कोई माँ नहीं है। आज तू पूरी तरह मेरी रंडी बनेगी।”

मैंने उसके कुर्ते को दोनों हाथों से चीर दिया। बटन उड़ गए। स्तन बाहर निकल आए। मैंने एक निप्पल मुँह में भरकर जोर से काटा। खून की एक बूंद निकली। अंजलि चीखी। मैंने दूसरा भी काटा। फिर दोनों स्तनों को मुट्ठी में कसकर मरोड़ा। नाखून गड़ा दिए। वो घुटनों के बल बैठ गई। आँसू बह रहे थे लेकिन उसने खुद ही अपना सलवार नीचे सरका दिया।

“नंगी हो जा। पूरी।”
उसने पैंटी भी उतार दी। चूत अभी भी सूजी हुई थी। पिछले हफ़्ते के निशान बाकी थे। मैंने उसे घास पर पेट के बल लिटा दिया। हाथ पीछे करके दोनों कलाई एक साथ पकड़ लीं। अपना बेल्ट निकाला और उसके हाथ बाँध दिए। कसकर। फिर उसी बेल्ट से उसकी आँखें ढक दीं।
“अब तू कुछ नहीं देखेगी। सिर्फ़ महसूस करेगी।”

मैंने उसके नितंबों को जोर से थप्पड़ मारा। एक, दो, तीन… लगातार। लाल हो गए। फिर और जोर से। हाथ की छाप उभर आई। अंजलि मुँह गाड़कर चीख रही थी। मैंने अपनी उंगलियाँ उसकी चूत में घुसा दीं – तीन एक साथ। अंदर तक। खून और पानी मिलाकर निकालने लगा। फिर चौथी उंगली भी धकेल दी। मुट्ठी बनाने की कोशिश की। चूत फैल रही थी, चीख रही थी।
“आह… राहुल… फट जाएगी…”

“फटनी चाहिए। आज मैं तेरी चूत को इतना चौड़ा कर दूँगा कि मेरा मुट्ठी अंदर चली जाए।”
मैंने लंड बाहर निकाला। पहले उसके मुँह में ठूंस दिया। आँखें बँधी होने की वजह से वो अंधेरे में ही मुँह खोलती रही। मैंने बाल पकड़कर गले तक धकेल दिया। साँस रुक गई तो थोड़ा निकाला, फिर और गहरा। थूक उसकी ठुड्डी से टपकने लगा। दो मिनट बाद मैंने निकाला और सीधे उसकी चूत पर रख दिया।

एक ही धक्के में पूरा लंड अंदर। अंजलि का शरीर उछल पड़ा। मैंने उसके बाँधे हुए हाथों को और कस लिया और कमर ऐसी गति से हिलानी शुरू की जैसे कोई मशीन हो। हर धक्का इतना जोरदार कि उसकी हड्डियाँ खड़खड़ा रही थीं। नितंबों पर थप्पड़ पड़ते रहे। मैंने एक हाथ आगे ले जाकर उसकी गर्दन दबाई। साँस फूलने दी। चूत और कस गई। मैंने और जोर लगाया।
“तेरी यह चूत अब सिर्फ़ मेरे लंड के लिए है। किसी और ने छुआ तो काट दूँगा।”
वो सिर हिला रही थी। रो रही थी। लेकिन उसकी चूत पानी छोड़ रही थी। मैंने लंड निकाला और उसकी गांड पर रख दिया।
“नहीं… वहाँ मत…”
“चुप। आज दोनों छेद मेरे हैं।”

मैंने थूक लगाया और धीरे-धीरे सुपारी अंदर धकेलनी शुरू की। अंजलि चीख पड़ी। मैंने उसका मुँह गाँव की मिट्टी में दबा दिया। आधा लंड गांड में घुस चुका था। मैंने एक झटके में बाकी भी धकेल दिया। पूरा। अंजलि का शरीर काँप रहा था। मैंने दोनों छेद बारी-बारी से भरे। कभी चूत, कभी गांड। हर बार पूरा अंदर तक। बेल्ट से बाँधे हाथ और कस दिए। आँखों पर पट्टी इतनी कस दी कि दर्द होने लगा।
मैंने उसे पलटा। पीठ के बल। पैर उसके कंधों तक मोड़ दिए। चूत और गांड दोनों खुले। मैंने लंड चूत में डाला और दो उंगलियाँ गांड में। फिर लंड गांड में और उंगलियाँ चूत में। अंजलि पागलों की तरह कराह रही थी। मैंने उसके स्तनों को दाँतों से काटना शुरू किया। निप्पल को खींचकर मरोड़ा। खून की धारें निकल आईं। मैंने चाटा।

“आज तेरा खून भी मेरा है।”
रात के डेढ़ बज गए होंगे। मैंने उसे घुटनों के बल बिठाया। हाथ अभी भी बँधे। आँखें ढकी। मैंने लंड उसके मुँह में फिर से ठूंस दिया और गले तक पेलने लगा। इस बार और देर तक। जब उसका चेहरा लाल हो गया और आँसू पट्टी से रिसने लगे तब निकाला। वो हाँफ रही थी। मैंने तुरंत चूत में डाल दिया और आखिरी जोर लगाया। पूरा वीर्य उसकी कोख में उड़ेल दिया। इतना कि बाहर निकलकर जाँघों से होता हुआ घास तक गिरने लगा।

मैंने बेल्ट खोली। आँखों की पट्टी हटाई। अंजलि की आँखें सूजी हुई थीं। होंठ फटे। स्तनों पर दाँतों के निशान। नितंब लाल। चूत और गांड दोनों से खून और वीर्य रिस रहा था।
“अब तू रोज़ रात को यहीं आएगी। समझी?”
वो सिर हिला नहीं पाई। बस काँप रही थी। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर उठाया और अपने लंड को उसके चेहरे पर रगड़ा।
“चाट। साफ़ कर।”

उसने जीभ निकाली। वीर्य, खून और मिट्टी मिलाकर चाटने लगी। मैंने फिर से लंड उसके गले में धकेल दिया। एक मिनट बाद निकाला और उसके चेहरे पर थूक दिया।
“अब जा। और याद रख… अगली बार मैं तेरे दोनों छेदों में एक साथ कुछ और घुसाऊँगा।”
अंजलि काँपते हुए कपड़े समेटने लगी। कुर्ता फटा हुआ था। उसने जैसे-तैसे लपेटा। चलते समय उसकी जाँघों से खून की धारें टपक रही थीं। मैंने उसके नितंब पर एक आखिरी जोरदार थप्पड़ मारा।
“मेरी रंडी। मेरी फटी हुई चूत वाली रंडी।”
वो लड़खड़ाती हुई अंधेरे में गायब हो गई।

मैं वहीं घास पर बैठ गया। लंड अभी भी तन कर खड़ा था। खून और वीर्य से लथ-पथ। मैंने मुट्ठी से दो बार और झड़ लिया। हर बार अंजलि की चीखें कानों में गूँजती रहीं।
उसके बाद की तीन रातें मैं उसी तालाब के किनारे गया। हर बार अंजलि आई। हर बार मैंने उसे और क्रूर तरीकों से तोड़ा। एक रात मैंने उसकी दोनों टाँगें अलग-अलग बाँध दीं। पेड़ की जड़ों से। चूत पूरी खुली। मैंने लकड़ी का एक पतला डंडा उसकी चूत में घुसाया। अंदर-बाहर किया। फिर गांड में। वो रोती रही, भीगती रही, फिर भी अगली रात फिर आ गई।

चौथी रात जब मैं पहुँचा तो वो पहले से नंगी खड़ी थी। हाथ पीछे बाँधे हुए। आँखों में पट्टी। मुँह में अपना ही कपड़ा ठूँसा हुआ। मैंने कुछ नहीं कहा। बस लंड निकाला और उसकी चूत में पूरा धकेल दिया। इस बार कोई धीरे नहीं। सीधा जानवरों वाला जोर। हर धक्के पर उसकी छाती घास में रगड़ खा रही थी। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और गले में अपना हाथ कस दिया। साँस लगभग बंद। चूत में लंड धंसता रहा। जब उसका शरीर ऐंठने लगा तो मैंने छोड़ा। वो हवा के लिए हाँफी। मैंने फिर दबाया।

उस रात मैंने उसके अंदर तीन बार वीर्य भरा। चूत, गांड और मुँह। आखिर में जब वो घास पर बेहोश जैसी पड़ी थी, मैंने उसके पूरे शरीर पर अपना वीर्य फैला दिया। स्तन, पेट, चेहरा, बाल… सब। फिर उसके कान में फुसफुसाया,
“अब तू हमेशा के लिए मेरी है। तेरी चूत, तेरी गांड, तेरा खून… सब मेरा। कभी किसी और के पास गई तो मैं तुझे यहाँ के कुत्तों के आगे नंगा बाँध दूँगा।”

अंजलि की आँखों से आँसू बह रहे थे। लेकिन उसके होठों पर एक छोटी सी मुस्कान भी थी।
मैं उठा। कपड़े पहने। और अंधेरे में चल दिया। पीछे मुड़कर देखा तो वो अभी भी उसी पोज़ में पड़ी थी – टाँगें खुली, चूत से सफेद और लाल धारें रिसती हुई, शरीर पर मेरे निशान।

उसके बाद मैं शहर लौट आया। लेकिन हर बारिश की रात, हर अंधेरा कमरा, हर अकेला बिस्तर मुझे उसी तालाब के किनारे ले जाता है। जहाँ मैंने एक कुंवारी लड़की को अपनी रंडी बनाया। जहाँ मैंने उसकी चूत को इतना फाड़ा कि अब वो मेरे लंड के बिना रह नहीं पाती।
और मैं जानता हूँ… वो अभी भी वहीं किसी रात मेरा इंतज़ार कर रही होगी। नंगी। बाँधी हुई। आँखों पर पट्टी। मुँह में कपड़ा। और चूत खुली… मेरे लंड के लिए।
क्योंकि एक बार जो चूत मैं फाड़ दूँ, वो फिर कभी किसी और की नहीं हो सकती।

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