सौतेली माँ की सच्ची हार

रोहन ने सौतेली माँ सुनीता को रातों में इस कदर तोड़ा कि उनका शरीर हमेशा के लिए उसका गुलाम बन गया। दर्द में भी वे और माँगती रहीं। stepmom sex stories

नमस्ते दोस्तो,
मेरा नाम रोहन है। मैं चंडीगढ़ में सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता हूँ। उम्र 25 साल है। शरीर मज़बूत और कसा हुआ है। लंड की लंबाई 8.5 इंच है, मोटाई औसत से ज़्यादा। यह कहानी मेरी सौतेली माँ के साथ हुई उन घटनाओं की है जो मेरे जीवन को हमेशा के लिए बदल गईं।
मेरी असली माँ की मृत्यु मेरे जन्म के कुछ महीनों बाद हो गई थी। पापा ने दो साल बाद दूसरी शादी कर ली। सौतेली माँ का नाम सुनीता है।

उनकी उम्र 38 साल है। पापा 52 के हैं। सुनीता जी का शरीर भरा हुआ, कमर पतली, छातियाँ 36 साइज़ की भारी और गोल, कमर 28, और हिप्स 38। गांड उभरी हुई, गोल और सख्त। त्वचा गोरी और चिकनी। वे दिखने में 30 से ज़्यादा नहीं लगतीं।

हमारा घर हिमाचल के एक छोटे कस्बे में है। घर में पापा, सुनीता जी, मेरी छोटी बहन (18 साल) और छोटा भाई (15 साल) रहते हैं। पापा की तबीयत खराब रहने के कारण मैं बाहर काम करता हूँ और घर का खर्च चलाता हूँ। घर पर ज़्यादातर सुनीता जी ही संभालती हैं।

पिछले महीने मैं चार दिन की छुट्टी लेकर घर आया। पापा को अस्पताल ले जाना था। घर पहुँचते ही सब खुश हुए। मैंने सबके लिए तोहफे लाए थे। सुनीता जी ने मुझे गले लगाया। उनका शरीर मेरे सीने से सटा। उनकी छातियाँ मेरे सीने पर दब गईं। उस पल मेरा लंड हल्का सा सख्त हो गया। मैंने जल्दी से अलग हो गया।

मेरा कमरा घर के पिछले हिस्से में है। उसी कमरे में सुनीता जी का सामान भी रखा रहता है। अलमारी खोलते ही उनके कपड़े गिर पड़े। नीचे ब्रा और पैंटी पड़ी थी। ब्रा 36C की थी, पैंटी 38 साइज़ की। मैंने उन्हें उठाया और सूँघा। उनमें उनके शरीर की गंध थी। तभी सुनीता जी कमरे में आ गईं। मेरे हाथ में उनकी ब्रा थी। वे चुप रहीं। बस नज़रें मिलाईं और मुस्कुरा दीं। फिर बाहर चली गईं।

रात को सब सो गए। मैं बाथरूम गया। दीवार में एक छोटी खिड़की है जिससे नहाते हुए व्यक्ति का ऊपरी हिस्सा दिख जाता है। सुनीता जी नहाने गई थीं। उन्होंने ब्लाउज़ और साड़ी उतारी। काली ब्रा में उनकी छातियाँ तनी हुई थीं। फिर ब्रा खोली। भारी, गोल स्तन बाहर आ गए। निप्पल कड़े थे। उन्होंने नीचे बैठकर पानी डाला तो नज़र छिप गई। मेरा लंड पूरी तरह खड़ा हो चुका था। मैंने जल्दी से बाहर निकलकर अपने कमरे में जाकर मुठ मारी। पहली बार माँ की कल्पना करके इतना तेज़ पानी छोड़ा।

अगले दिन पापा और भाई अस्पताल गए। बहन कॉलेज चली गई। घर में सिर्फ मैं और सुनीता जी थे। सुबह हल्की बारिश शुरू हुई। सुनीता जी ने हल्के गुलाबी रंग का सूट पहना था। उन्होंने छत पर कपड़े सुखाने बुलाया। हम दोनों छत पर गए। बारिश तेज़ हो गई। दोनों भीग गए।
सुनीता जी का सूट शरीर से चिपक गया। ब्रा के ऊपर से निप्पल साफ दिख रहे थे। पीछे से उनकी गांड गोल और उभरी हुई नज़र आ रही थी। उन्होंने पैंटी नहीं पहनी थी। गीले कपड़े में गांड की दरार साफ दिखाई दे रही थी। मेरा लंड लोअर में तन गया। मैंने छुपाने की कोशिश की लेकिन सुनीता जी ने पीछे मुड़कर देखा। उनकी नज़र मेरे उभार पर ठहर गई।

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वे पास आईं। बोलीं, “रोहन… ये क्या है?”
मैं चुप रहा। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और अपने गीले स्तनों पर रखा। “छू… ज़ोर से।”
मैंने दबाया। भारी और मुलायम। निप्पल को उंगलियों से मरोड़ा। सुनीता जी की साँस तेज़ हो गई। उन्होंने मेरा लोअर नीचे खींचा। 8.5 इंच का कड़ा लंड बाहर निकल आया। उन्होंने उसे हाथ में लिया और धीरे-धीरे सहलाया।
“इतना बड़ा… पापा से भी मोटा है।”

बारिश में भीगे-भीगे उन्होंने घुटनों के बल बैठकर लंड को मुँह में ले लिया। गला तक धकेला। मैंने उनके बाल पकड़कर जोर से धकेला। वे गैग होने लगीं लेकिन रुकने का नाम नहीं ले रहीं थीं। थूक और बारिश का पानी मिला हुआ उनके गले से बह रहा था। मैंने उनके मुँह में जोर-जोर से पेनिट्रेट किया। 10 मिनट तक लगातार। फिर खींचकर उनके चेहरे पर पानी छोड़ दिया। आँखों, नाक, मुँह सब पर। सुनीता जी ने जीभ निकालकर चाटा।

नीचे कमरे में ले गए। दरवाज़ा बंद किया। सुनीता जी ने खुद अपने कपड़े फाड़ दिए। नंगी खड़ी हो गईं। छातियाँ, पेट, गांड, चूत सब गीला। मैंने उन्हें बिस्तर पर धकेला। हाथ ऊपर करके उनके कलाई बाँध दिए। रस्सी से कसकर। पैर फैला दिए।
मैंने उनकी चूत में दो उंगलियाँ डालीं। पहले से गीली थी। उंगलियाँ अंदर घुमाईं, फिर तीन कर दीं। जोर से अंदर-बाहर। सुनीता जी कराह रही थीं। “और ज़ोर… दर्द कर…।”

मैंने चूत पर थप्पड़ मारा। लाल हो गई। फिर गांड पर। लगातार 20 थप्पड़। गांड जलने लगी। उन्होंने और माँगा। मैंने उनकी गांड के छेद में उंगली डाली। पहले एक, फिर दो। उन्होंने दर्द में चीख निकाली लेकिन कलाई बाँधी होने के कारण हिल नहीं पाईं।
लंड को चूत में धकेला। एक झटके में पूरा। सुनीता जी की आँखें फटी रह गईं। “आह… फट गया…।” मैंने रुकने का नाम नहीं लिया। जोर-जोर से ठोका। बिस्तर चरमरा रहा था। उनकी छातियों को मुट्ठी में पकड़कर मरोड़ा। निप्पल को दाँतों से काटा। खून की कुछ बूँदें निकलीं। उन्होंने और जोर से कराहना शुरू कर दिया।

मैंने पोजीशन बदली। उन्हें घुटनों के बल किया। कलाई अभी भी बाँधी हुई। पीछे से चूत में फिर से घुसाया। एक हाथ से उनके बाल खींचे, दूसरे से गर्दन दबाई। साँस फूलने लगी लेकिन वे “और… और मार…” चिल्ला रही थीं। मैंने गांड में थूक लगाकर लंड घुसाया। पहले आधा, फिर पूरा। गांड की दीवारें कस रही थीं। मैंने बिना रुके 15 मिनट तक गांड मारी। सुनीता जी के आँसू बह रहे थे लेकिन चेहरे पर मुस्कान थी।

मैंने रस्सी खोली। उन्हें पलटा। चेहरे के ऊपर बैठ गया। लंड उनके मुँह में ठूंस दिया। नाक बंद करके गला तक। वे साँस नहीं ले पा रही थीं। आँखों से पानी बह रहा था। जब छोड़ता तो वे खांसतीं और फिर खुद मुँह खोल देतीं। मैंने उनके गले में पानी छोड़ दिया। उन्होंने निगल लिया।
रात भर ये सिलसिला चला। मैंने उन्हें दीवार से सटाकर खड़ा करके मारा। टेबल पर लिटाकर। फर्श पर घसीटकर। हर बार ज्यादा क्रूर। उनके शरीर पर मेरे नाखूनों के निशान, दाँतों के निशान, थप्पड़ों के लाल निशान पड़ गए। सुनीता जी हर दर्द को चूम रही थीं। “रोहन… तुम मेरा मालिक हो… जितना चाहो तोड़ो…”

सुबह तक उनकी चूत और गांड दोनों सूज गई थीं। वे बिस्तर पर पड़ी कराह रही थीं। मैंने उनके बालों में उंगलियाँ फेरते हुए कहा, “अब से जब भी घर आऊँगा, तुम मेरे लिए तैयार रहोगी। नंगी। और जो कहूँगी करोगी।”
सुनीता जी ने सिर हिलाया। “हाँ… बेटा… जितना चाहो… जितना क्रूर चाहो…”
उस दिन के बाद हर छुट्टी पर यही होता है। कभी रस्सी से बाँधकर छत से लटकाया, कभी आँखों पर पट्टी बाँधकर घंटों तड़पाया, कभी उनके स्तनों पर मोमबत्ती का मोम गिराया। हर बार वे और गिरीं, और मेरी हो गईं।

पापा को कुछ पता नहीं। बहन-भाई को कुछ नहीं। सिर्फ मैं और सुनीता जी जानते हैं कि इस घर की दीवारों के पीछे क्या होता है।
उस सुबह के बाद से घर का माहौल हमेशा के लिए बदल गया।
पापा अस्पताल से लौटे तो सुनीता जी ने चेहरे पर सामान्य मुस्कान लगा रखी थी। उनके शरीर पर मेरे छोड़े हुए निशान साड़ी और ब्लाउज़ के नीचे छिपे थे। लेकिन रात को जब सब सो गए, वे चुपचाप मेरे कमरे में आ गईं। दरवाज़ा बंद करते ही उन्होंने साड़ी खोल दी। नंगी खड़ी हो गईं। छातियों पर अभी भी मेरे दाँतों के निशान लाल थे। गांड पर थप्पड़ों के निशान काले पड़ने लगे थे।

“मालिक… आज क्या करना है?”
मैंने जवाब में कुछ नहीं कहा। बस उन्हें बालों से पकड़कर ज़मीन पर घसीटा। कमरे के कोने में लोहे का एक पुराना खंभा था। मैंने उनकी दोनों कलाई पीछे करके उस खंभे से बाँध दी। पैर फैलाकर टखनों को भी बाँध दिया। वे बिलकुल फैल गईं। चूत और गांड पूरी तरह खुली।
मैंने एक पतली बेल्ट निकाली। पहले उनकी जाँघों पर मारी। फिर गांड पर। हर थप्पड़ के साथ उनकी त्वचा लाल से बैंगनी होती गई। सुनीता जी दाँत भींचकर सह रही थीं। आँखों से आँसू बह रहे थे लेकिन मुँह से सिर्फ एक शब्द निकल रहा था— “और…”

मैंने बेल्ट उनके स्तनों पर मारी। निप्पल सूज गए। फिर मैंने एक मोटी मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम उनकी छातियों पर गिराया। वे चीखीं। शरीर ऐंठा। लेकिन खंभे से बँधी होने के कारण हिल नहीं पाईं। मैंने मोम उनके निप्पल पर जमा होने दिया। फिर ठंडा होने से पहले नाखून से खुरच दिया। दर्द से उनकी आँखें बंद हो गईं।

लंड पहले से ही फौलाद की तरह तना हुआ था। मैंने उनके मुँह में ठूंस दिया। गला तक। नाक बंद कर दी। वे साँस लेने के लिए संघर्ष कर रही थीं। गले की मांसपेशियाँ मेरे लंड को कस रही थीं। जब मैंने छोड़ा तो वे खांसते हुए थूक और लार गिरा रही थीं। मैंने फिर से धकेला। इस बार और गहरा। उनके गले में उभार दिख रहा था।
फिर मैंने उनकी चूत में पूरा लंड एक झटके में घुसा दिया। वे चीखीं। मैंने रुकने का नाम नहीं लिया। खंभे को पकड़कर पूरी ताकत से ठोका। हर धक्के के साथ उनका शरीर आगे-पीछे हो रहा था। कलाई की रस्सी मांस में धँस गई थी। खून की पतली लकीरें बहने लगीं।

मैंने पोजीशन बदली। गांड में घुसा। पहले बिना थूक के। दर्द से उनकी आवाज़ बंद हो गई। फिर भी मैंने पूरा अंदर तक धकेल दिया। गांड की दीवारें फटने के कगार पर थीं। मैंने उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और कान में कहा—
“आज तुम्हारी गांड को इतना फाड़ूँगा कि कल बैठ भी नहीं पाओगी।”

और वैसा ही किया। बीस मिनट तक लगातार। जब मैंने पानी छोड़ा तो उनके अंदर ही। गर्म वीर्य गांड से बाहर रिस रहा था।
रस्सी खोली तो वे ज़मीन पर गिर पड़ीं। शरीर काँप रहा था। मैंने उन्हें उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया। फिर भी काम खत्म नहीं हुआ था। मैंने उनकी दोनों टाँगें उनके कंधों तक मोड़ दीं। चूत और गांड दोनों खुली। मैंने बारी-बारी से दोनों में मारा। कभी चूत, कभी गांड। जब एक थक जाती तो दूसरी। सुनीता जी अब सिर्फ कराह रही थीं। बोलने की शक्ति नहीं बची थी।

सुबह चार बजे मैं रुका। उनका पूरा शरीर नीले-काले निशानों से भरा था। चूत और गांड दोनों सूजी हुई, लाल, और वीर्य से लथपथ। मैंने उनके बाल सहलाते हुए कहा—
“अब से हर रात यही होगा। जब तक पापा घर में हैं, चुप रहना। लेकिन मेरा कमरा खाली देखते ही आ जाना। नंगी। और तैयार।”
सुनीता जी ने कमज़ोर आवाज़ में जवाब दिया, “जैसी आज्ञा… मालिक।”

अगले तीन दिन यही सिलसिला चला। हर रात ज्यादा क्रूर। एक रात मैंने उनकी आँखों पर काली पट्टी बाँधी। कानों में रुई ठूँस दी। फिर पूरे शरीर पर बर्फ रगड़ी। जब त्वचा सुन्न हो गई तो गर्म मोम गिराया। दर्द का अंतर इतना तेज़ था कि वे बेहोश होने के कगार पर पहुँच गईं। मैंने पानी के छींटे मारकर जगाया और फिर से शुरू कर दिया।

एक रात मैंने उन्हें उलटा लटकाया। पैर ऊपर, सिर नीचे। खून सर में चढ़ गया था। उस हालत में मैंने उनके मुँह में लंड ठूँसा और गला फाड़ने की हद तक मारा। वीर्य उनके गले में ही छोड़ दिया। वे निगल नहीं पाईं। बहुत सारा बाहर निकल आया और उनके चेहरे पर बह गया।
चौथे दिन मुझे वापस चंडीगढ़ जाना था। सुबह के समय सुनीता जी मेरे कमरे में आईं। शरीर अभी भी दर्द से काँप रहा था। उन्होंने मेरे पैर छूए और कहा—

“मालिक… अगली बार जब आना… तो रस्सी मोटी लाना। और चाबुक भी। मैं और सह सकती हूँ। जितना तोड़ना है, तोड़ दो। मैं तुम्हारी हूँ… सिर्फ तुम्हारी।”
मैंने उनके बाल पकड़कर चेहरा ऊपर उठाया। उनकी आँखों में डर और वासना दोनों थे।
“अगली बार तुम्हें इतना तोड़ूँगा कि तुम खुद माँगोगी कि अब और मत मारो। लेकिन मैं तब भी मारता रहूँगा।”
सुनीता जी की आँखों में आँसू आ गए। लेकिन मुस्कान भी थी।
“धन्यवाद… मालिक।”

मैंने उन्हें आखिरी बार दीवार से सटाया। एक हाथ से गर्दन दबाई, दूसरे से चूत में तीन उंगलियाँ डालकर जोर से मरोड़ा। वे काँपते हुए पानी छोड़ने लगीं। मैंने उनके मुँह पर हाथ रख दिया ताकि आवाज़ बाहर न जाए। जब उनका शरीर ढीला पड़ा तो मैंने छोड़ा।
दरवाज़े से बाहर निकलते समय मैंने पीछे मुड़कर देखा। सुनीता जी ज़मीन पर गिरी हुई थीं। शरीर पर मेरे बनाए हुए निशान चमक रहे थे। उनकी टाँगें अभी भी फैली हुई थीं। चूत से मेरा वीर्य रिस रहा था।

मैं मुस्कुराया।
अगली छुट्टी तक सिर्फ इंतज़ार था। और इस बार मैं और ज्यादा क्रूर योजनाएँ लेकर आने वाला था। चाबुक, मोटी रस्सी, क्लैंप, और कुछ धातु के औज़ार। सुनीता जी को पता भी नहीं था कि उनका शरीर अब सिर्फ मेरे खेल का मैदान बन चुका है।
और वह खेल अब कभी खत्म नहीं होने वाला था।

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