ऊपरी मंजिल का काला कमरा

दिल्ली के ऊपरी कमरे में कज़िन सारा को आर्यन ने रस्सियों से जकड़कर अपनी मर्जी का खिलौना बना लिया। मोम की जलन, गला दबने की साँसें और रात भर चलने वाली सज़ा ने उसके शरीर को हमेशा के लिए बदल दिया।

मेरा नाम आर्यन है। मैं दिल्ली में रहता हूँ। उम्र 26 साल। रंग गोरा, शरीर मजबूत, कद 5 फीट 11 इंच। लंड का साइज 8.5 इंच जब खड़ा होता है, मोटा और नसों वाला। पाँच साल पहले जब मैं 21 का था और मेरी कज़िन सारा 24 की थी, तब पहली बार उसके साथ हुआ। सारा गाँव से आई थी लेकिन शहर में रहने के बाद उसका शरीर और बातें दोनों बदल चुके थे। फिगर 36-24-36, बड़े-बड़े स्तन, पतली कमर, गोल गाँड और घनी काली जघन बालों वाली चुत।

उस साल परिवार की शादी के बाद सारा हमारे घर दिल्ली आ गई थी कुछ दिनों के लिए। शॉपिंग और घूमने का बहाना था। घर में कमरे कम थे। माँ-बाप दूसरे कमरे में सो गए। हम दोनों एक ही बेडरूम में। बिस्तर बड़ा था लेकिन रात का अँधेरा और चुप्पी दोनों को काबू में नहीं रख पाई।

रात के 1 बजे अँधेरे में मेरी नींद खुली। लंड पूरा खड़ा था। सारा मेरी तरफ पीठ करके सोई हुई थी। सलवार-कमीज में। मैंने धीरे से अपना हाथ उसकी कमर पर रखा। गर्म शरीर। फिर हाथ ऊपर बढ़ाकर उसके स्तनों को कपड़ों के ऊपर से दबाया। टाइट और भारी। निप्पल पहले से ही सख्त थे। मैंने और जोर से दबाया। सारा हिली लेकिन नींद का नाटक जारी रखा।

मैंने कमीज ऊपर की। ब्रा खोली। दोनों स्तन बाहर निकाले। एक हाथ से एक स्तन को जोर-जोर से मसलने लगा, दूसरे हाथ से निप्पल को घुमाया और खींचा। सारा की साँसें तेज हो गईं। उसने धीरे से कहा, “आर्यन… मत…” लेकिन आवाज में विरोध नहीं था। मैंने उसके मुँह पर हाथ रखा और फुसफुसाया, “चुप रह। कोई सुन लेगा।”

फिर मैंने उसके सलवार को नीचे खींचा। पैंटी भी। उसकी चुत पूरी नंगी हो गई। बाल घने थे, चुत की फांक पहले से ही गीली। मैंने दो उँगलियाँ अंदर घुसा दीं। सख्त और गर्म। वर्जिन नहीं थी लेकिन टाइट थी। उँगलियाँ अंदर-बाहर करने लगा। जोर से। सारा की जाँघें काँपने लगीं। उसने मेरे हाथ को पकड़ने की कोशिश की लेकिन मैंने और तेज फिंगरिंग की। तीसरी उँगली भी डाल दी। चुत की दीवारें खिंच रही थीं।

मैं उसके ऊपर चढ़ गया। लंड उसके मुँह के पास ले गया। “चूस,” मैंने कहा। सारा ने पहले मना किया। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर को अपनी तरफ खींचा और लंड उसके होठों पर रगड़ा। “खोल मुँह।” उसने आहिस्ते से खोला। मैंने पूरा लंड उसके गले तक धकेल दिया। सारा ने गला घुटने की आवाज निकाली। आँखों से पानी आने लगा। मैंने उसके बाल और कसकर पकड़े और मुँह की चुदाई शुरू कर दी। जोर-जोर से। गला में लंड अटक रहा था। थूक बहने लगा। मैंने कई बार पूरा बाहर निकाला और फिर एक झटके में गले तक पहुँचा दिया। सारा की साँसें फूल रही थीं लेकिन मैं नहीं रुका।

जब लंड पूरी तरह गीला हो गया तो मैंने उसे पेट के बल लिटाया। गाँड ऊपर की। दोनों हाथों से गाँड की फांक खोली। चुत चमक रही थी। मैंने लंड चुत के मुँह पर रखा और एक ही धक्के में आधा अंदर घुसा दिया। सारा चिल्लाई। मैंने उसका मुँह तकिए से दबा दिया। फिर पूरा लंड अंदर धकेल दिया। चुत फटने जैसी लग रही थी। मैंने जोर-जोर से धक्के लगाने शुरू किए। बेड चरमरा रहा था। हर धक्के के साथ सारा की गाँड हिल रही थी। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और कान में कहा, “तेरी चुत मेरी है आज से। जितना चाहूँ उतना दूँगा।”

मैंने लय तेज कर दी। लंड पूरा अंदर-बाहर हो रहा था। चुत की आवाजें कमरे में गूँज रही थीं। सारा के नाखून चादर में गड़ गए। मैंने उसके दोनों हाथ पीछे बाँध दिए अपनी बेल्ट से। अब वह बिल्कुल बेबस थी। मैंने और जोर से चुदाई की। स्तनों को नीचे से पकड़कर मसलते हुए। निप्पलों को मोड़ते हुए। सारा रोने जैसी आवाजें निकाल रही थी लेकिन चुत और गीली हो रही थी।

फिर मैंने लंड निकाला और उसकी गाँड की तरफ देखा। गाँड का छेद छोटा था। मैंने थूक लगाकर एक उँगली अंदर डाली। सारा ने सिर हिलाया। “नहीं… वहाँ मत…” मैंने दूसरी उँगली डाली और फैलाने लगा। फिर लंड का सिर गाँड पर रखा और धीरे-धीरे दबाव दिया। सारा चीखी। मैंने एक हाथ उसके मुँह पर रखा और लंड आधा अंदर घुसा दिया। गाँड की दीवारें सख्त थीं। मैंने और धक्का दिया। पूरा लंड अंदर चला गया। सारा का शरीर काँप रहा था।

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मैंने गाँड की चुदाई शुरू की। पहले धीरे, फिर जोर से। हर धक्के के साथ सारा का शरीर आगे खिसक रहा था। मैंने उसके कंधे पकड़कर खींचा और और गहराई तक पहुँचा। लंड गाँड में पूरी तरह गायब हो रहा था। सारा की आँखों से आँसू बह रहे थे लेकिन चुत से पानी टपक रहा था। मैंने एक हाथ नीचे ले जाकर उसकी चुत में उँगलियाँ घुसा दीं और दोनों जगह एक साथ इस्तेमाल करने लगा।

बहुत देर तक गाँड चोदी। जब लगा कि जल्दी निकलने वाला हूँ तो लंड निकाला और सारा को पलट दिया। उसके चेहरे पर बैठ गया। “चाट,” मैंने कहा। सारा ने जीभ निकाली। मैंने अपना लंड उसके मुँह में डालकर आखिरी धक्के लगाए और पूरा पानी उसके गले में उतार दिया। सारा ने निगलने की कोशिश की लेकिन कुछ बाहर भी निकल आया। मैंने उसके चेहरे पर बाकी बचा हुआ लगा दिया।

रात अभी खत्म नहीं हुई थी। मैंने उसे फिर से पेट के बल लिटाया। इस बार दोनों हाथ और पैर बाँध दिए। चुत और गाँड दोनों खुले। मैंने बेल्ट से उसकी गाँड पर कुछ थप्पड़ मारे। लाल हो गई। फिर लंड फिर से चुत में डाल दिया और बिना रुके चुदाने लगा। सारा अब बिल्कुल ढीली पड़ चुकी थी। केवल हल्की-हल्की आवाजें निकल रही थीं। मैंने उसके स्तनों को नीचे से पकड़कर ऊपर खींचा और निप्पलों को दाँतों से काटा। हल्के निशान पड़ गए।

सुबह होने वाली थी। मैंने आखिरी राउंड में उसे घोड़ी बनाकर रखा। बाल पकड़कर खींचे और पूरे जोर से धक्के लगाए। चुत की दीवारें अब ढीली पड़ने लगी थीं लेकिन फिर भी टाइट महसूस हो रही थीं। मैंने अंदर ही अंदर पानी छोड़ दिया। पूरा। सारा की चुत से सफेद पानी बाहर निकल रहा था।

मैंने बंधन खोले। सारा बिस्तर पर पड़ी हुई थी। शरीर पर निशान, चेहरे पर सूखा पानी, चुत और गाँड दोनों लाल और सूजी हुई। मैंने उसके पास लेट गया और उसके कान में कहा, “अब से जब भी मौका मिलेगा, यही होगा। और अगली बार और जोर से।”
सारा ने कुछ नहीं कहा। केवल साँस ले रही थी। बाहर हल्की रोशनी आने लगी थी। परिवार जगने वाला था। हम दोनों ने कपड़े पहन लिए। सारा ने सलवार पहनी तो उसके चेहरे पर दर्द की रेखाएँ थीं। लेकिन आँखों में एक अजीब सी चमक भी थी।

उसके बाद के दिनों में भी कई रातें ऐसी ही बीतीं। कभी बाथरूम में, कभी रात के खाने के बाद जब सब सो जाते। कभी मैंने उसे कुर्सी पर बाँधकर चोदा, कभी उसके मुँह में कपड़ा ठूँसकर। कभी उसके स्तनों पर मोमबत्ती के मोम गिराए, कभी उसकी चुत में बर्फ के टुकड़े डाले और फिर गर्म लंड से भरा। सारा हर बार सहती रही। कभी विरोध करती तो और जोर से मिलता।

एक रात मैंने उसे पूरी तरह नंगा करके खिड़की के पास खड़ा किया। बाहर गली की रोशनी आ रही थी। किसी के देखने का डर। मैंने पीछे से उसकी गाँड चोदी और उसके गले में हाथ डालकर हल्का दबाया। सारा की आँखें बंद हो गईं। जब छोड़ दिया तो उसने गहरी साँस ली और फुसफुसाया, “और…”

दिल्ली की उन रातों ने हमें दोनों को बदल दिया। सारा गाँव वापस चली गई लेकिन फोन पर कभी-कभी संदेश आते रहते। और जब भी वह शहर आती, कमरा वही होता, बिस्तर वही, और रातें और भी काली, और भी जोरदार।
अब जब कभी अँधेरा होता है तो वह रात याद आ जाती है। जब पहली बार उसके बाल पकड़े थे, जब पहली बार उसकी गाँड में पूरा लंड धकेल दिया था, जब उसके मुँह से निकलने वाली आवाजें तकिए में दब गई थीं। और हर बार लंड अपने आप खड़ा हो जाता है।

उस पहली रात के बाद सारा गाँव नहीं गई। परिवार के सामने बहाना बना लिया कि शहर में कुछ कोर्स करना है। माँ-बाप खुश हो गए। घर में एक अलग कमरा खाली था ऊपर की मंजिल पर। वही हमारा नया अड्डा बन गया। दरवाजे पर ताला, खिड़कियों पर भारी पर्दे, और अंदर सिर्फ एक बड़ा बेड, एक लोहे की कुर्सी, रस्सियाँ, बेल्ट, मोमबत्तियाँ और कुछ और चीजें जो मैंने चुपके से खरीदी थीं।

दूसरी रात ही मैंने उसे पूरी तरह नंगा किया। कपड़े फाड़कर फेंक दिए। सारा खड़ी थी, हाथ नीचे, आँखें झुकी हुई। मैंने उसके बालों में उंगलियाँ फँसाईं और सिर पीछे खींचा। “आज से तू मेरी कुतिया है। बोल।” उसने धीरे से कहा, “हाँ… मैं तुम्हारी कुतिया हूँ।” मैंने जोर से थप्पड़ मारा उसके गाल पर। लाल निशान पड़ गया। “जोर से बोल।” उसने आवाज उठाई, “मैं तुम्हारी कुतिया हूँ।”

मैंने उसे कुर्सी पर बिठाया। दोनों हाथ पीछे बाँध दिए मोटी रस्सी से। पैर भी कुर्सी के पायों से बाँध दिए। चुत और गाँड पूरी तरह खुली। मैंने उसके सामने खड़े होकर लंड निकाला और उसके चेहरे पर थप्पड़ मारने लगा लंड से। फिर मुँह में ठूँस दिया। इस बार कोई नरमी नहीं। गले तक धकेल दिया और रोके रखा। सारा की आँखें लाल हो गईं, नाक से पानी बहने लगा, गले से घरघराहट निकल रही थी। जब छोड़ा तो वह जोर-जोर से खाँसने लगी। थूक और लार उसके स्तनों पर गिरे।

मैंने मोमबत्ती जलाई। पहले उसके बाएँ स्तन पर गर्म मोम गिराया। सारा चीखी। मोम सख्त होकर निप्पल पर जम गया। फिर दाएँ पर। फिर पेट पर। फिर सीधे चुत के ऊपर। गर्म मोम बालों और फांक पर गिरा। सारा कुर्सी पर तड़पने लगी लेकिन रस्सियाँ कस गईं। मैंने और मोम गिराया, इस बार गाँड की फांक में। उसकी चीखें कमरे में गूँज रही थीं लेकिन पर्दे और ताले के बाहर कोई आवाज नहीं जा रही थी।

मोम ठंडा होने के बाद मैंने उसके बाल पकड़कर कुर्सी समेत खींचा और बेड के पास ले गया। रस्सियाँ खोलीं तो उसके हाथ-पैर सुन्न हो चुके थे। मैंने उसे बेड पर पेट के बल फेंका। गाँड ऊपर। दोनों हाथ फिर से पीछे बाँध दिए, इस बार ज्यादा कसकर। फिर एक पतली बेल्ट ली और उसकी गाँड पर लगातार थप्पड़ मारने लगा। एक… दो… दस… बीस। गाँड लाल हो गई, जगह-जगह सूजन आ गई। सारा रो रही थी लेकिन आवाज दबाए हुए। मैंने बेल्ट उसके मुँह में ठूँस दी। “काट इसे अगर दर्द सह नहीं सकती।”

फिर लंड निकाला और बिना किसी तैयारी के उसकी गाँड में धकेल दिया। सूखी थी। सारा की कमर उछली। मैंने दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़ी और पूरा वजन डालकर अंदर घुसाया। गाँड की दीवारें फटने जैसी लग रही थीं। मैंने जोर-जोर से धक्के लगाने शुरू किए। हर धक्के के साथ सारा का शरीर बेड पर रगड़ खा रहा था। स्तन नीचे दब रहे थे। मैंने एक हाथ आगे बढ़ाकर उसकी चुत में तीन उंगलियाँ एक साथ घुसा दीं और जोर से फिंगरिंग करने लगा। गाँड और चुत दोनों एक साथ इस्तेमाल हो रहे थे।

बहुत देर तक यही चला। जब लंड निकालने पर खून की हल्की रेखा दिखी तो मैं रुका नहीं। और जोर से चुदाई की। सारा की आवाजें अब सिसकियों में बदल चुकी थीं। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पूरा पीछे खींचा और कान में कहा, “तेरी गाँड अब मेरी मुट्ठी में है। जब चाहूँ फाड़ दूँगा।” फिर पानी छोड़ दिया अंदर ही। गर्म और गाढ़ा। निकालने पर सफेद पानी खून मिली धार के साथ बाहर बहने लगा।

मैंने उसे पलटा। चेहरा सूजा हुआ, आँखें लाल, होठ कटे हुए। मैंने उसके मुँह में लंड डालकर साफ करवाया। “चाट साफ। अपना खून और मेरा पानी दोनों।” सारा ने जीभ निकाली और चाटने लगी। मैंने उसका सिर पकड़कर और गहराई तक पहुँचाया जब तक वह लगभग बेहोश नहीं हो गई।

उस रात और भी हुआ। मैंने उसकी चुत में बर्फ के टुकड़े ठूँस दिए। ठंड से उसकी कमर सिकुड़ गई। फिर तुरंत गर्म लंड डालकर चुदाई की। ठंड और गर्मी के बीच सारा पागल होने वाली थी। फिर मैंने उसके निप्पलों पर क्लिप लगाए। छोटे-छोटे धातु के। खींचने पर वह चीखती। मैंने क्लिप पकड़कर खींचे और उसी समय लंड उसकी चुत में दागा। दर्द और मजे का मिश्रण उसके चेहरे पर साफ दिख रहा था।

सुबह तक सारा का शरीर निशानों से भरा था। गाँड बैंगनी, स्तनों पर मोम के निशान, कलाई और टखनों पर रस्सी के गहरे निशान, चुत और गाँड दोनों सूजे हुए। मैंने उसे नहलाया। पानी की धार उसके जख्मों पर पड़ी तो वह काँप उठी। फिर तौलिया से पोंछा और बेड पर लिटा दिया। “आराम कर। शाम को फिर से शुरू करेंगे।”

शाम को सच में फिर शुरू हुआ। इस बार मैंने उसे खड़ा करके दीवार से सटाया। हाथ ऊपर बाँध दिए। पैर फैलाए। मैंने पीछे से उसकी चुत में लंड डाला और एक हाथ उसके गले पर रखा। हल्का दबाव। साँस रोकने जितना। सारा की आँखें फटी की फटी रह गईं। मैंने दबाव बढ़ाया और धक्के तेज किए। जब लगा कि वह बेहोश होने वाली है तो छोड़ा। वह हवा के लिए मुँह खोलकर हाँफने लगी। फिर दोबारा गला दबाया। इस बार ज्यादा देर। उसके शरीर में ऐंठन होने लगी। चुत की मांसपेशियाँ अपने आप लंड को जकड़ रही थीं। मैंने उसी समय पानी छोड़ दिया अंदर।

रात के तीसरे पहर मैंने एक नया खेल शुरू किया। सारा को चारों खाने गिराया। कुत्ते की तरह। गर्दन में चमड़े का पट्टा बाँधा। मैंने पट्टा पकड़कर खींचा और पीछे से गाँड में लंड ठोका। “रेंग। कमरे में घूम।” सारा रेंगने लगी। हर दो कदम पर मैं धक्का देता। लंड अंदर ही अंदर हिले। जब वह कोने तक पहुँची तो मैंने पट्टा और खींचा और जोर से चुदाई शुरू कर दी। फर्श पर उसके घुटने छिल गए। स्तन फर्श से रगड़ खा रहे थे।

मैंने उसे उठाया और बेड पर लिटाया। इस बार दोनों पैर उसके कंधों तक मोड़ दिए। चुत पूरी खुली। मैंने लंड रखा और बिना रुके एक ही बार में पूरा अंदर गाड़ दिया। सारा की चीख निकल गई। मैंने मुँह बंद किया अपने हाथ से और लगातार तेज-तेज धक्के लगाए। बेड की हेडबोर्ड दीवार से टकरा रही थी। सारा के नाखून मेरी पीठ में गड़ गए लेकिन मैं रुका नहीं। जब पानी निकला तो मैंने लंड चुत में ही रोके रखा और पूरा अंदर ही छोड़ दिया। निकालने पर पानी की धार चुत से बाहर फूटी।

उसके बाद के हफ्तों में और क्रूरता बढ़ती गई। कभी मैंने उसकी चुत में मोटी मोमबत्ती अंदर तक ठूँस दी और जलाकर रखा। मोम पिघलकर अंदर जमा। कभी उसके स्तनों को रस्सी से बाँधकर लटका दिया और नीचे से चुदाई की। कभी उसके मुँह में गेंद जैसा कपड़ा ठूँसकर पूरा चेहरा टेप से बंद कर दिया और फिर घंटों तक इस्तेमाल किया। सारा हर बार सहती। कभी आँखों में आँसू होते, कभी चुत से पानी की बाढ़। लेकिन इनकार कभी नहीं किया।

एक रात मैंने उसे पूरी तरह तोड़ने का फैसला किया। कमरे में सिर्फ एक बल्ब जल रहा था। सारा नंगी, हाथ-पैर फैलाकर बेड पर बाँधी हुई। मैंने उसके ऊपर मोमबत्तियों का एक पूरा सेट जलाया और एक-एक करके शरीर के हर संवेदनशील हिस्से पर गिराया। स्तन, पेट, जाँघें, चुत, गाँड, यहाँ तक कि तलवे तक। सारा चीखती रही जब तक आवाज बैठ नहीं गई। फिर मैंने लंड निकाला और उसकी थकी हुई चुत में डाल दिया। अब कोई प्रतिरोध नहीं था। शरीर ढीला पड़ा था। मैंने जितना जोर चाहता उतना लगाया। गाँड में भी। मुँह में भी। रात भर।

सुबह जब रस्सियाँ खोलीं तो सारा उठ भी नहीं पाई। मैंने उसे गोद में उठाया, बाथटब में भरा गर्म पानी और उसके जख्मी शरीर को धीरे से पानी में उतारा। उसने मेरी ओर देखा। आँखों में दर्द था, थकान थी, लेकिन उसके साथ कुछ और भी था। एक अजीब सी भूख। उसने फुसफुसाया, “अगली बार… और ज्यादा तोड़ना।”

मैंने उसके बाल सहलाए और कहा, “तू मेरी है। जब तक चाहूँगा तोड़ता रहूँगा। और तू हर बार और गहरी गिरेगी।”
दिल्ली की उस ऊपरी मंजिल के कमरे में समय रुक सा गया था। बाहर दुनिया चल रही थी। अंदर सिर्फ दर्द, सिसकियाँ, रस्सियों की घरघराहट, मांसपेशियों के फटने की आवाज और दो शरीर जो एक-दूसरे को खत्म करने पर तुले थे। सारा अब सिर्फ सहने वाली नहीं रही थी। कभी-कभी वह खुद रस्सी लाकर मेरे हाथ में पकड़ा देती। कभी खुद घुटनों के बल बैठ जाती और मुँह खोल देती। कभी अपनी गाँड फैलाकर खड़ी हो जाती और कहती, “आज यहीं से शुरू करो।”

और मैं हर बार उससे आगे निकल जाता। क्योंकि कुछ रिश्ते खून से नहीं, खून बहने से बनते हैं। और हम दोनों उसी रास्ते पर थे जहाँ वापसी नाम की कोई चीज बाकी नहीं बची थी।

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