एक जवान लड़के का शरीर पूरी तरह उसके कब्जे में। पिंजरा बंद, चेन कसी, साँस रुकती बार-बार। दर्द और भूख एक साथ। रात भर वो तय करती रही कि कब मिलेगा और कब नहीं।
मैं कबीर हूँ, तमिलनाडु के कोयंबटूर शहर से। इंजीनियरिंग के तीसरे साल में हूँ। घर का माहौल हमेशा से बहुत सख्त रहा। पापा रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर हैं, मम्मी स्कूल प्रिंसिपल। बचपन से ही हर चीज पर पाबंदी। सेक्स की बात तो कभी किसी के मुँह से निकली ही नहीं। कोई अनुभव भी नहीं था। सिर्फ रात के अँधेरे में फोन की स्क्रीन पर गंदी कहानियाँ पढ़ता और सोचता कि काश मेरी जिंदगी में भी कुछ ऐसा हो जाए जो खून को उबाल दे।
फिर वो दिन आया जो आज भी मेरी हड्डियों में बसता है।
सुनीता नाम की औरत मेरी मौसी की बेटी की सास है। उम्र में बड़ी, करीब 38 साल की। शादी के दो साल बाद ही उनके पति दुबई चले गए थे और तब से सिर्फ साल में एक बार आते हैं। सुनीता हमारे घर से महज पंद्रह मिनट की दूरी पर एक छोटी सी कॉलोनी में रहती हैं। वो पास के एक प्राइवेट कॉलेज में कंप्यूटर साइंस की लेक्चरर हैं। रोज सुबह स्कूटी पर निकलती हैं और शाम को लौटती हुई अक्सर हमारे घर के सामने से गुजरती हैं।
मैं उन्हें हमेशा आदर से देखता था। वो भी मुझे छोटे भाई की तरह प्यार करती थीं। लेकिन एक गर्मियों की दोपहर ने सब कुछ हमेशा के लिए बदल दिया।
उस दिन कॉलेज से तीन बजे लौटा। घर खाली था। मम्मी-पापा किसी रिश्तेदार के यहाँ गए हुए थे। मैंने अपना कमरा बंद किया, शर्ट उतारी और बाथरूम की तरफ बढ़ा। तभी नजर गई हैंगर पर टंगी एक काली साड़ी और गहरे लाल रंग के ब्लाउज पर। बाथरूम से पानी की आवाज आ रही थी। कोई नहा रहा था। दिल जोर से धड़का। मैंने धीरे से ब्लाउज उठाया और नाक के पास ले गया। उसमें एक तेज, मीठी स्त्री सुगंध थी—पसीने और साबुन की मिली-जुली खुशबू। मेरा लंड तुरंत सख्त हो गया, जींस के अंदर फड़कने लगा।
मैंने जल्दी कपड़े बदले और बाहर निकल आया। मम्मी के फोन से पता चला कि सुनीता मंदिर जा रही हैं इसलिए यहीं नहा लीं। थोड़ी देर बाद वो मेरे कमरे से निकलीं। काली साड़ी पहने, लाल ब्लाउज में उनकी छाती और भी उभरी हुई लग रही थी। नहाने के बाद चेहरा गुलाबी था, बाल गीले। मैं पहली बार उन्हें उस नजर से देख रहा था। नीचे कुछ हिल रहा था जो छिपाना मुश्किल हो रहा था।
उस दिन से मेरे दिमाग में सिर्फ वही बस गई।
तीन दिन बाद मौका मिला। मम्मी-पापा तीन दिन के लिए चेन्नई गए थे। मैं स्टडी लीव पर अकेला घर पर था। शाम को मैंने लैपटॉप पर एक बहुत ही गंदी ब्लू फिल्म चालू की। सिर्फ शॉर्ट्स पहने, बिना शर्ट। कमरे का दरवाजा आधा खुला छोड़ दिया था। फिल्म में एक औरत को रस्सियों से बाँधकर पीटा जा रहा था, उसके मुँह में गैग था और आदमी पीछे से बेतहाशा ठोक रहा था। मैं पूरी तरह उत्तेजित था, सुनीता के बारे में सोच-सोचकर अपने लंड को सहला रहा था।
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अचानक दरवाजा जोर से खुला। सुनीता खड़ी थीं। उनकी नजर स्क्रीन पर पड़ी, फिर मेरे शॉर्ट्स पर उभरे हुए लंड पर। चेहरा लाल हो गया। मैं घबराकर खड़ा हो गया। वो कुछ सेकंड वैसे ही खड़ी रहीं, फिर बिना एक शब्द कहे बाहर चली गईं।
मैंने जल्दी लैपटॉप बंद किया, जींस पहन ली और ड्रॉइंग रूम में गया। सुनीता सोफे पर बैठी थीं। माथा पसीने से गीला था। मैं पास गया और धीमी आवाज में बोला, “सॉरी… आप बिना बताए आ गईं।”
उन्होंने सिर झुकाए रखा। “नहीं कबीर… मुझे बिना पूछे अंदर नहीं आना चाहिए था।”
मेरा लंड अभी भी जींस में सख्त था। उन्होंने नजर उठाई और सीधे वहाँ देखा। फिर तेजी से नजर फेर ली। थोड़ी देर बाद वो मेरे कमरे में आईं। बेड पर पड़ी फिल्म की सीडी कवर देख ली जिसमें एक औरत को चेन से बाँधकर चाबुक मारा जा रहा था। उन्होंने कुछ नहीं कहा, सिर्फ “बाय” कहकर चली गईं।
रात भर मैंने बार-बार मुठ मारी। सुनीता के बड़े स्तन, उनकी कमर, उनकी जाँघें—सब दिमाग में घूम रहे थे।
अगली सुबह सात बजते-बजते डोरबेल बजी। नींद में दरवाजा खोला तो सुनीता खड़ी थीं। हल्की बैंगनी रंग की नाईटी में। ब्रेस्ट साफ उभरे हुए थे, निप्पल के निशान दिख रहे थे। हाथ में ब्रेड और अंडे का पैकेट था। “तुम्हारे नाश्ते के लिए लाई हूँ,” मुस्कुराते हुए बोलीं।
वो किचन में गईं, चाय बनाई और मेरे कमरे में ले आईं। बातें सामान्य थीं जैसे कल कुछ हुआ ही नहीं। फिर वो मेरे अटैच्ड बाथरूम में गईं। अंदर कल रात का वीर्य फर्श पर सूख चुका था, खुशबू अभी भी बाकी थी। बाहर आकर उन्होंने मेरी आँखों में देखा और धीमी आवाज में पूछा, “कल रात काफी मजा आया था क्या?”
मेरा लंड तुरंत खड़ा हो गया। उन्होंने नोटिस कर लिया। मैं बाथरूम की तरफ बढ़ा लेकिन उन्होंने मेरी कलाई पकड़ ली। कान के पास आकर फुसफुसाईं, “मैं मदद कर सकती हूँ… अगर तुम वाकई चाहो।”
मैंने उन्हें कसकर गले लगा लिया। पहली बार किसी औरत का शरीर इतने करीब से छुआ था। उनके नरम स्तन मेरी छाती से दब गए। मैंने उनके गाल पर किस किया। उन्होंने मेरे होंठों को जोर से चूस लिया। जीभ अंदर घुस गई। हम बेड पर गिर पड़े।
मैंने उनकी पीठ सहलाई, फिर हाथ नीचे सरकाकर उनकी कमर पकड़ी। मेरा सख्त लंड उनके पेट से टकरा रहा था। मैंने धीरे से ब्रेस्ट पर हाथ रखा। बहुत नरम और गर्म। मसलने लगा। वो भी मेरे होंठ चूस रही थीं। मैंने नाईटी ऊपर की। उनकी जाँघें चिकनी और मोटी थीं। “उतार दूँ?” मैंने पूछा।
उन्होंने आँखें बंद करके सिर हिलाया। नाईटी उतर गई। अब सिर्फ काली ब्रा और मैचिंग पैंटी में थीं। मैंने ब्रा के हुक खोले। बड़े-बड़े गोल स्तन बाहर निकल आए। गुलाबी निप्पल पहले से ही खड़े थे। मैंने एक को मुँह में ले लिया, जोर से चूसा, दाँतों से हल्का काटा। वो कराह उठीं।
उन्होंने मेरी शॉर्ट्स में हाथ डाल दिया। लंड को पकड़कर सहलाने लगीं। “इतना मोटा… और लंबा भी,” साँस लेते हुए बोलीं। मैंने शॉर्ट्स उतार दी। पूरा नंगा हो गया। सुनीता झुकीं और मेरे लंड को मुँह में ले लिया। गर्म जीभ ने सिर को चाटा, फिर गहराई तक ले गईं।
गले तक। मैंने उनके बाल पकड़ लिए और धीरे-धीरे धक्के देने लगा। वो गैग कर रही थीं लेकिन रुक नहीं रहीं थीं। प्रीकम उनके मुँह में जा रहा था। कुछ ही मिनट में मैं बर्दाश्त नहीं कर पाया। जोर से धक्का दिया और पूरा वीर्य उनके गले में उड़ेल दिया। उन्होंने निगल लिया, कुछ बाहर निकलकर ठोड़ी पर बह गया।
मैंने उन्हें बेड पर लिटाया। पैंटी खींचकर उतार दी। उनकी चूत बालों वाली थी, पूरी तरह भीगी हुई। मैंने उंगलियाँ अंदर घुसाईं। दो उंगलियाँ। फिर तीन। वो कराह रही थीं, कूल्हे उठा रही थीं। मैंने नीचे मुँह लगाया। जीभ से उनकी चूत चाटी, चूसा, क्लिट को दाँतों से हल्का काटा। वो चीखने लगीं। “अंदर डाल… जल्दी…”
मैंने लंड उनकी चूत पर रखा और एक झटके में पूरा घुसा दिया। बहुत टाइट थी। उन्होंने जोर से चीख मारी। मैंने रुककर नहीं पूछा। सीधे तेज धक्के देने लगा। बेड चरमरा रहा था। उनकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी। मैंने उनके दोनों हाथ पकड़कर सिर के ऊपर दबा दिए। और तेज ठोका। हर धक्के के साथ उनकी चूत से पानी निकल रहा था।
मैंने उन्हें पलट दिया। कुत्ते की तरह। पीछे से घुसाया। एक हाथ से उनके बाल पकड़कर खींचे, दूसरे से कमर। और तेज। उनकी गांड पर थप्पड़ मारा। जोर का। लाल निशान पड़ गया। फिर और मारा। वो कराह रही थीं, “और जोर से… और…”
मैंने उनकी गांड के छेद पर थूक लगाया और एक उंगली घुसा दी। फिर दो। वो सिसकने लगीं लेकिन कूल्हे पीछे धकेल रही थीं। मैंने लंड चूत से निकाला और गांड के छेद पर रखा। धीरे-धीरे दबाव डाला। वो चिल्ला उठीं। मैंने रुककर नहीं पूछा। आहिस्ता-आहिस्ता पूरा घुसा दिया। बहुत टाइट। मैंने उनके बाल और जोर से खींचे और गांड में धक्के देने लगा। हर धक्के के साथ वो चीख रही थीं। मैंने उनके मुँह में अपनी उंगलियाँ ठूँस दीं ताकि आवाज दबे।
थोड़ी देर बाद मैंने फिर चूत में डाल लिया। अब दोनों छेद इस्तेमाल कर रहा था। एक हाथ से उनके स्तन मसल रहा था, निप्पल को मोड़ रहा था। वो रो रही थीं लेकिन रुकने को नहीं कह रही थीं। मैंने उनकी गर्दन पीछे से दबाई। हल्का गला घोंटते हुए ठोका। उनका चेहरा लाल हो गया, आँखों में पानी आ गया। मैंने और जोर लगाया।
आखिर में मैं बाहर निकला और उनके चेहरे पर वीर्य उड़ेल दिया। आँखों पर, मुँह पर, बालों पर। उन्होंने जीभ निकालकर चाटा। फिर मैंने उन्हें घुटनों के बल बैठाया और बाकी वीर्य उनके मुँह में भर दिया। उन्होंने निगल लिया।
हम दोनों पसीने से लथपथ थे। मैंने उन्हें बाथरूम में खींचा। नहाने के दौरान फिर से हो गया। इस बार मैंने उन्हें दीवार से सटाया। एक टांग ऊपर उठाकर खड़े-खड़े ठोका। उनकी पीठ दीवार से रगड़ खा रही थी। मैंने उनके गले पर दाँत गड़ाए, कंधे पर काटा। लाल निशान पड़ गए। फिर से गांड में डाला। इस बार बिना थूक के। वो सिसक रही थीं लेकिन कूल्हे मिला रही थीं।
नाश्ते के बाद वो अपने घर चली गईं। शाम को फोन आया। आवाज में थकान थी। “ये गलत है कबीर… हम रिश्ते में क्या हैं।” मैंने भी हाँ कहा। दोनों ने फैसला किया कि दोबारा नहीं होगा।
लेकिन दो दिन बाद फिर डोरबेल बजी। इस बार वो काले रंग की टाइट जींस और लो नेक टॉप में थीं। अंदर आते ही उन्होंने मेरा लंड पकड़ लिया। “आज मैं तय करूँगी,” उन्होंने कहा।
उन्होंने मुझे बेड पर लिटाया। हाथ-पैर रस्सी से बाँध दिए जो उन्होंने अपने बैग से निकाली थी। आँखों पर पट्टी बाँधी। फिर मेरा लंड मुँह में लिया और बहुत देर तक चूसा, लेकिन निकलने नहीं दिया। जब मैं लगभग पहुँचने वाला होता तो रोक देतीं। तीन बार ऐसा किया। मैं छटपटा रहा था। फिर उन्होंने मेरे लंड पर बैठ गईं। उल्टी करके। अपनी गांड में डाल लिया। खुद ऊपर-नीचे होने लगीं। मेरे मुँह पर बैठकर अपनी चूत रगदने लगीं। मैं साँस नहीं ले पा रहा था। उन्होंने मेरे बाल पकड़कर और जोर से दबाया।
फिर उन्होंने चाबुक निकाला। छोटी सी चमड़े की। मेरे सीने पर मारी। फिर जाँघों पर। फिर लंड के पास। दर्द और मजे का मिश्रण पागल कर रहा था। आँखों की पट्टी खोली तो देखा वो मुस्कुरा रही हैं। “अब तुम मेरा इस्तेमाल करो जैसे चाहो,” उन्होंने कहा।
मैंने रस्सियाँ खोलीं। उन्हें पेट के बल लिटाया। हाथ पीछे बाँधे। गांड उठाई और बिना किसी तैयारी के पूरा लंड गांड में घुसा दिया। जोर-जोर से ठोका। हर धक्के के साथ उनकी चीख निकल रही थी। मैंने उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। गला दबाया। चाबुक से उनकी गांड पर मारा। लाल निशान पड़ गए। फिर चूत में डाला। दोनों छेद बारी-बारी से इस्तेमाल किए। आखिर में उनके मुँह में लंड ठूँस दिया और गले तक वीर्य उड़ेल दिया। वो खाँस रही थीं लेकिन निगल लिया।
उस रात हमने तीन बार और किया। हर बार और क्रूर। मैंने उनके निप्पल पर क्लिप लगाई जो उन्होंने खुद लाई थीं। दर्द से उनकी आँखों में आँसू आ गए लेकिन वो और मँगवा रही थीं। मैंने उनकी चूत में मुट्ठी तक उंगलियाँ घुसाईं। वो चीख रही थीं, काँप रही थीं, फिर भी “और” कह रही थीं।
सुबह जब वो जाने लगीं तो उनके शरीर पर दर्जनों निशान थे। गले पर, स्तनों पर, जाँघों पर, गांड पर। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “अगली बार और कठोर लाना।”
आज भी सुनीता हमारे घर आती हैं। मैं उन्हें इज्जत देता हूँ। बाहर से सब कुछ पहले जैसा ही है। लेकिन जब भी अकेले मिलते हैं, दरवाजा बंद होते ही सब बदल जाता है। रस्सियाँ, चाबुक, गैग, क्लिप—सब तैयार रहते हैं। कभी वो मालकिन बनती हैं, कभी मैं। कभी दर्द इतना होता है कि आँसू निकल आते हैं, कभी मजा इतना कि होश उड़ जाते हैं।
सुनीता ने मेरे गले की चेन और कस दी। पिंजरे में बंद लंड पहले से ही सख्त था, धातु ठंडी और कसकर दब रही थी। चाबी उनके गले में झूल रही थी। उन्होंने मुझे फर्श पर घुटनों के बल बैठाया और चाबुक उठाया।
“आज रात ये ताला नहीं खुलेगा,” उनकी आवाज ठंडी थी। “चाहे तुम रोओ, चीखो या पसीने में नहा जाओ।”
पहला वार पीठ पर पड़ा। त्वचा जल उठी। दूसरा जाँघ पर। तीसरा ठीक पिंजरे के ऊपर, जानबूझकर। दर्द ने लंड को और सख्त कर दिया, लेकिन पिंजरा बाहर निकलने नहीं दे रहा था। उन्होंने मेरे दोनों निप्पल पकड़कर मोटी धातु की क्लिपें लगा दीं। फिर अंडकोश पर भी एक छोटी क्लिप। दर्द इतना तेज था कि आँखों से आँसू बहने लगे।
सुनीता ने मेरे बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और अपना मुँह मेरे मुँह पर रख दिया। जीभ अंदर घुसाई, दाँत से निचला होंठ काटा। खून का स्वाद आ गया। फिर उन्होंने मुझे पेट के बल गिराया। चेन को बेड के पाये से बाँध दिया। अब हिलने की कोई गुंजाइश नहीं थी।
उन्होंने ल्यूब की जगह सिर्फ थूक का इस्तेमाल किया। दो उंगलियाँ गांड में ठूँसीं, फिर तीन। कोई नरमी नहीं। फिर मोटा काला डिल्डो एक झटके में अंदर धकेल दिया। पूरा। मैं चेन खींच रहा था, लेकिन रस्सी नहीं टूटी। उन्होंने डिल्डो को अंदर ही छोड़कर चाबुक से गांड पर मारना शुरू किया। एक के बाद एक। हर वार के साथ डिल्डो और गहराई में धँस रहा था। गांड जल रही थी, लाल हो चुकी थी।
बीस मिनट बाद उन्होंने डिल्डो निकाला और खुद मेरे ऊपर सवार हो गईं। अपनी चूत मेरे मुँह पर रख दी। “चाट। साफ कर।” पूरा वजन। साँस बंद। मैं जीभ चला रहा था जबकि वो अपनी चूत रगद रही थीं। पानी मेरे चेहरे पर बह रहा था। जब मैं लगभग बेहोश होने वाला था तभी थोड़ा सा उठाया, फिर दोबारा दबा दिया।
फिर वो घूमीं। उल्टी करके पिंजरे के ऊपर बैठ गईं। धातु के सरकने की आवाज आ रही थी। उन्होंने अपनी गांड के छेद को पिंजरे के ऊपर रगदा। “देखो कैसे तरस रहा है… लेकिन आज नहीं मिलेगा।”
रात भर यही सिलसिला चला। कभी चाबुक, कभी क्लिपें और कसना, कभी उनका मुँह मेरे कान में—“तुम सिर्फ मांस हो। मेरा मांस।” कभी वो मेरे चेहरे पर बैठकर पानी छोड़तीं, कभी मेरे बाल पकड़कर सिर फर्श पर पटकतीं।
सुबह चार बजे उन्होंने आखिरकार चाबी निकाली। पिंजरा खोला। लंड बैंगनी और सूजा हुआ था। उन्होंने उसे मुँह में लिया और सिर्फ तीन झटके दिए। मैं फट पड़ा। पूरा वीर्य उनके गले में। उन्होंने निगल लिया, फिर मेरे चेहरे पर थूक दिया।
चेन खोली। मेरे गले पर उंगलियों के गहरे निशान थे। निप्पल सूजे हुए, गांड जल रही थी। सुनीता मुस्कुराईं।
“अगली बार और लंबी चेन लाऊँगी। और एक बड़ा पिंजरा। समझे?”
मैं फर्श पर पड़ा हाँफ रहा था। बोलने की ताकत नहीं थी। सिर्फ सिर हिलाया।
वो नहाकर तैयार हो गईं। दरवाजे पर रुकीं और बिना पीछे देखे बोलीं, “तुम अब सिर्फ मेरे हो। बाकी दुनिया के लिए मर चुके हो।”
दरवाजा बंद हो गया। कमरे में सिर्फ मेरे शरीर की जलन और चेन की हल्की खनक बाकी रह गई थी।
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