गर्भवती मौसी का टूटा शरीर

जोधपुर का अमीर भतीजा अपनी गर्भवती मौसी को रात-रात भर रस्सियों में जकड़कर तोड़ता है। दूध निचोड़ता, हर छेद भरता और उसके पेट पर अपना हक जमाता है जब तक वह पूरी तरह हार नहीं जाती।

रविंद्र सिंह राठौर की उम्र सिर्फ 23 साल थी, लेकिन शरीर ऐसा जैसे कोई पुराना पहलवान। छह फुट दो इंच लंबा, चौड़ा सीना, और जांघें इतनी मोटी कि जींस फटने को तैयार रहती। लंड की लंबाई साढ़े दस इंच और मोटाई कलाई जितनी। राजस्थान के जोधपुर के एक बहुत अमीर ठाकुर परिवार का इकलौता बेटा। पिता की मौत हो चुकी थी, माँ विदेश में रहती थी। गर्मी की छुट्टियों में वह उदयपुर में अपनी मौसी के घर आया।

मौसी का नाम सुनीता था। उम्र 38 साल। गोरी चमड़ी, लंबे काले बाल, और स्तन इतने भारी कि ब्लाउज हमेशा तनकर रहता। कमर पतली, कूल्हे चौड़े, और योनि के बाल हमेशा वैक्स किए हुए। उसके पति, यानी रविंद्र के मौसा, हर महीने दिल्ली जाते थे “बिज़नेस” के नाम पर। असल में वहाँ महँगी विदेशी लड़कियाँ बुलाते थे।

उस साल मौसा ने कहा, “सुनीता, मैं तीन दिन के लिए दिल्ली जा रहा हूँ। रवि को साथ ले चलो। होटल में रुकना।” सुनीता मना नहीं कर सकी।
वे उदयपुर से दिल्ली पहुँचे। मौसा ने पांच सितारा होटल में दो कमरे बुक किए। एक कमरा रविंद्र के लिए, दूसरा अपना। लेकिन पहली रात ही मौसा ने रविंद्र से कहा, “बेटा, आज तू मौसी के साथ सो। मैंने दो रूसी लड़कियाँ बुलाई हैं। मौसी को मत बताना।”

रविंद्र के मन में पहले से ही कुछ और चल रहा था। उसने मौसा के बैग से दो काले चमड़े के कफ, एक मोटी बेल्ट, और एक बोतल लुब्रिकेंट चुरा ली।
रात के ग्यारह बजे रविंद्र मौसी के कमरे में गया। सुनीता साड़ी में सोफे पर बैठी टीवी देख रही थी। रविंद्र ने दरवाज़ा बंद किया और कुंडी लगा दी।
“मौसी…” उसने धीरे से कहा।

सुनीता मुड़ी। रविंद्र नंगा खड़ा था। लंड पूरी तरह तना हुआ, नसों से भरा, सिर लाल और चमकदार।
सुनीता की आँखें फटी रह गईं। “रवि… तू पागल हो गया है क्या?”
रविंद्र ने जवाब नहीं दिया। वह आगे बढ़ा, सुनीता के बाल पकड़कर पीछे खींचे और उसके मुँह पर अपना लंड ठोक दिया।
“चूस।”

सुनीता ने मना किया, लेकिन रविंद्र ने दोनों हाथ उसके सिर के पीछे जकड़ लिए और लंड गले तक घुसेड़ दिया। सुनीता की आँखों से आँसू निकलने लगे, लार टपकने लगी, लेकिन रविंद्र नहीं रुका। वह गहराई तक ठोकता रहा। जब सुनीता की साँस फूलने लगी तो उसने लंड बाहर निकाला।
“कपड़े उतार।”

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सुनीता काँप रही थी। रविंद्र ने खुद साड़ी खींचकर फाड़ दी। ब्लाउज के हुक तोड़ दिए। ब्रा काट दी। पैंटी फाड़कर फेंक दी। सुनीता पूरी नंगी खड़ी थी। स्तन भारी-भारी, निप्पल काले और कड़े। योनि चिकनी, होंठ थोड़े फूले हुए।
रविंद्र ने उसे पलंग पर धकेल दिया। दोनों हाथ ऊपर करके काले चमड़े के कफ से बाँध दिए। पैर भी फैलाकर बेल्ट से बाँध दिए। सुनीता बिलकुल बेबस हो गई।
“रवि… मत कर… मैं तेरी मौसी हूँ…”
रविंद्र ने मुस्कुराते हुए कहा, “आज से तू मेरी रंडी है।”

उसने लुब्रिकेंट की बोतल खोली और सुनीता की योनि पर डाल दी। फिर दो उंगलियाँ अंदर घुसा दीं। सुनीता चीखी। रविंद्र ने तीसरी उंगली भी डाल दी और तेजी से अंदर-बाहर करने लगा। सुनीता की योनि से पानी निकलने लगा।
फिर रविंद्र ने अपना लंड उसके मुँह में फिर से ठोक दिया। इस बार और गहरा। सुनीता की गर्दन में उभार दिखने लगा। रविंद्र ने दस मिनट तक मुँह चोदा। जब लंड पूरी तरह लार से गीला हो गया तो उसने सुनीता की टाँगें और चौड़ी की।
लंड का सिर योनि पर रखा और एक झटके में आधा घुसेड़ दिया।

सुनीता जोर से चिल्लाई। “नहीं… बहुत बड़ा है… फट जाएगी…”
रविंद्र ने जवाब में पूरा लंड अंदर धकेल दिया। सुनीता की आँखें बंद हो गईं। योनि खिंचकर लाल हो गई। रविंद्र ने कोई रहम नहीं किया। वह जानवर की तरह ठोकने लगा। हर ठोकर पर सुनीता का शरीर हिलता, स्तन उछलते, और मुँह से आवाज़ें निकलतीं।
बीस मिनट बाद सुनीता का पहला ऑर्गैज़्म आया। उसका शरीर ऐंठ गया, योनि ने लंड को कसकर पकड़ लिया। लेकिन रविंद्र रुका नहीं। उसने पोजीशन बदली। सुनीता को घुटनों के बल किया और पीछे से घुसाया। इस बार और गहरा।

सुनीता रो रही थी, लेकिन रविंद्र ने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींच लिया। “चिल्ला… जितना चाहे चिल्ला। कोई नहीं आएगा।”
वह और तेज़ हो गया। कमरा ठोकने की आवाज़ से गूँज रहा था। सुनीता का दूसरा ऑर्गैज़्म आया, फिर तीसरा। उसके पैर काँपने लगे। रविंद्र ने अचानक लंड बाहर निकाला और सुनीता की गांड पर रख दिया।
“नहीं… वहाँ मत… कभी नहीं किया…”

रविंद्र ने लुब्रिकेंट डाला और धीरे-धीरे दबाव डाला। सिर अंदर गया। सुनीता चीख उठी। रविंद्र ने और दबाव दिया। आधा लंड गांड में घुस गया। सुनीता तड़प रही थी। रविंद्र ने पूरा लंड अंदर धकेल दिया।
अब वह गांड चोदने लगा। पहले धीरे, फिर तेज़। सुनीता का चेहरा तकिए में दब गया। दर्द और मज़े का मिश्रण उसे पागल कर रहा था। तीस मिनट बाद रविंद्र ने गांड के अंदर ही वीर्य छोड़ दिया। गरम-गरम, गाढ़ा।

सुनीता थककर गिर पड़ी। लेकिन रविंद्र का लंड अभी भी तना हुआ था। उसने सुनीता के मुँह में लंड डालकर साफ कराया।
रात भर उसने सुनीता को चार बार चोदा। कभी मुँह, कभी योनि, कभी गांड। सुनीता के शरीर पर लाल निशान पड़ गए। कलाई और टखनों पर कफ के निशान। स्तनों पर दाँत के निशान।
सुबह जब मौसा आया तो रविंद्र पहले ही कमरे में वापस जा चुका था। सुनीता बिस्तर पर लेटी हुई थी, आँखें सूजी हुई, शरीर पर निशान। मौसा ने कुछ नहीं पूछा। वह खुद दो विदेशी लड़कियों के साथ रात बिताकर आया था।

अगले तीन दिन रविंद्र ने सुनीता को अपनी इच्छा का गुलाम बना लिया। दिन में घूमने जाते, रात को होटल में। रविंद्र ने सुनीता को बेल्ट से पीटा, बालों से घसीटा, और हर छेद में वीर्य भरा। सुनीता अब खुद मांगने लगी थी।
चौथे दिन जब वे जोधपुर लौटे तो सुनीता की चाल बदल चुकी थी। वह अब रविंद्र के सामने झुक जाती। जब भी मौसा दिल्ली जाता, रविंद्र सुनीता के कमरे में रात भर रहता।

एक साल बाद सुनीता गर्भवती हुई। मौसा को लगा अपना बच्चा है। लेकिन रविंद्र जानता था। वह मुस्कुराता रहा।
अब जब भी रविंद्र जोधपुर आता है, सुनीता दरवाज़ा बंद कर लेती है और घुटनों के बल बैठ जाती है।
क्योंकि अब वह सिर्फ मौसी नहीं रह गई थी। वह रविंद्र की निजी, तोड़ी-मरोड़ी, इस्तेमाल की हुई रंडी बन चुकी थी।

एक साल बीत चुका था। सुनीता का पेट अब सातवें महीने में था। पेट बाहर निकला हुआ, स्तन और भारी हो गए थे, निप्पल काले और मोटे। लेकिन रविंद्र की भूख कम नहीं हुई थी। मौसा फिर दिल्ली गया था तीन दिन के लिए। रविंद्र ने सुनीता के कमरे का दरवाज़ा बंद किया और कुंडी लगा दी।

सुनीता बिस्तर पर लेटी थी। रविंद्र ने उसके सामने खड़े होकर अपनी पैंट खोली। लंड पहले से तना हुआ था—साढ़े दस इंच, मोटी नसें फूली हुई, सिर चमकदार। उसने सुनीता के बाल पकड़कर सिर उठाया और लंड उसके मुँह में ठोक दिया।
“चूस, रंडी। आज पूरा निगलना पड़ेगा।”

सुनीता ने मुँह खोला। रविंद्र ने दोनों हाथ उसके सिर के पीछे जकड़ लिए और गहराई तक घुसेड़ने लगा। सुनीता की गर्दन में उभार दिखने लगा। लार टपक रही थी, आँखों से पानी। रविंद्र ने पंद्रह मिनट तक मुँह चोदा। जब लंड पूरी तरह गीला हो गया तो उसने बाहर निकाला।
उसने सुनीता को पलंग से खींचकर फर्श पर गिरा दिया। पेट के बल लिटाया। दोनों हाथ पीछे करके मोटे रस्से से बाँध दिए। फिर टाँगें फैलाकर घुटनों को भी बाँध दिया। सुनीता बिल्कुल बेबस हो गई—हाथ-पैर बंधे, पेट नीचे दबा हुआ।

रविंद्र ने काली चमड़े की बेल्ट निकाली। पहली चोट सुनीता की गांड पर पड़ी। जोर की आवाज़। सुनीता चीखी। दूसरी चोट, तीसरी, चौथी। गांड लाल हो गई, फूल गई। रविंद्र ने दस बार मारी। हर बार सुनीता का शरीर काँपता। फिर उसने बेल्ट फेंकी और लुब्रिकेंट की मोटी धारा गांड पर डाल दी।

लंड का सिर गांड के छेद पर रखा और दबाव दिया। सुनीता चिल्लाई—“नहीं… फट जाएगी…” लेकिन रविंद्र ने एक झटके में आधा लंड घुसेड़ दिया। सुनीता की चीख घर में गूँज गई। रविंद्र ने और दबाव दिया। पूरा लंड अंदर चला गया। गांड खिंचकर फटी हुई लग रही थी।
अब वह जानवर की तरह ठोकने लगा। हर ठोकर पर सुनीता का पेट फर्श से रगड़ता, स्तन दबते, और मुँह से दर्द भरी आवाज़ें निकलतीं। रविंद्र ने बाल पकड़कर सिर पीछे खींच लिया। “चिल्ला… जितना चाहे चिल्ला। तू मेरी गर्भवती रंडी है।”

बीस मिनट बाद उसने गांड के अंदर ही वीर्य छोड़ दिया। गरम, गाढ़ा, भरपूर। लंड बाहर निकाला तो वीर्य गांड से बहने लगा। रविंद्र ने सुनीता को पलटा। अब वह पीठ के बल लेटी थी, हाथ-पैर अभी भी बंधे। पेट बाहर निकला हुआ। रविंद्र ने उसके स्तन पकड़कर जोर से मसले। निप्पल को दाँतों से काटा। खून की बूँद निकली। सुनीता कराह उठी।

फिर रविंद्र ने लंड योनि पर रखा। गर्भवती होने के बावजूद वह रुका नहीं। एक झटके में पूरा लंड अंदर धकेल दिया। सुनीता की आँखें फटी रह गईं। योनि खिंचकर लाल हो गई। रविंद्र ने तेजी से ठोकना शुरू किया। हर ठोकर पर सुनीता का पेट हिलता। स्तन उछलते। रविंद्र ने दोनों स्तन पकड़कर निचोड़ा। दूध की धार निकलने लगी। उसने मुँह लगाकर चूसा। गरम दूध उसके मुँह में भर गया।
“आज दूध भी निकालूँगा, रंडी।”

वह और तेज़ हो गया। सुनीता का पहला ऑर्गैज़्म आया—शरीर ऐंठ गया, योनि ने लंड को कस लिया। लेकिन रविंद्र रुका नहीं। उसने पोजीशन बदली। सुनीता को घुटनों के बल किया (हाथ अभी भी बंधे) और पीछे से योनि में घुसाया। इस बार और गहरा। एक हाथ से बाल पकड़े, दूसरे से स्तन मसले। दूध फर्श पर गिर रहा था।

तीस मिनट बाद दूसरा ऑर्गैज़्म। सुनीता का शरीर काँप रहा था। रविंद्र ने लंड बाहर निकाला और उसके मुँह में ठोक दिया। “साफ कर।” सुनीता ने लार और वीर्य मिलाकर चाटा। रविंद्र ने फिर से गांड में घुसाया। इस बार बिना लुब्रिकेंट के। दर्द असहनीय था। सुनीता रो रही थी, लेकिन रविंद्र नहीं रुका। वह गांड चोदता रहा जब तक तीसरी बार वीर्य नहीं छोड़ दिया।

रात के दो बज गए थे। रविंद्र ने रस्से खोले। सुनीता की कलाई और टखनों पर गहरे लाल निशान थे। गांड सूजी हुई, योनि से वीर्य बह रहा था, स्तनों पर दाँत के निशान और दूध के धब्बे। रविंद्र ने उसे बिस्तर पर उठाकर लिटा दिया। खुद उसके बगल में लेट गया। लंड अभी भी आधा तना हुआ था।

सुबह चार बजे रविंद्र फिर जाग गया। सुनीता सो रही थी। उसने उसके मुँह में लंड डाल दिया। सुनीता आधी नींद में चूसने लगी। रविंद्र ने सिर पकड़कर गहराई तक ठोका। जब लंड पूरा खड़ा हो गया तो उसने सुनीता को जगाया। “उठ, रंडी। अब बाथरूम में।”
उसने सुनीता को बाथरूम में घसीटा। बाथटब में पानी भरा। सुनीता को पानी में बैठाया। खुद भी उतर गया। लंड सुनीता के मुँह में ठोक दिया।

पानी में डुबो-डुबोकर मुँह चोदा। सुनीता की साँस फूल रही थी। फिर उसने सुनीता को किनारे पर झुकाया। गांड बाहर निकली हुई। लंड फिर से गांड में घुसा दिया। पानी छलक रहा था। ठोकने की आवाज़ बाथरूम में गूँज रही थी। सुनीता की चीखें दब गईं क्योंकि रविंद्र ने उसका मुँह पानी में दबा रखा था।

जब उसने चौथी बार वीर्य छोड़ा तो सुनीता का शरीर ढीला पड़ गया। रविंद्र ने उसे बाहर निकाला, तौलिये से पोछा और बिस्तर पर लिटा दिया। खुद उसके स्तन चूसने लगा। दूध निकालता रहा जब तक दोनों स्तन खाली नहीं हो गए।
दोपहर तक रविंद्र ने सुनीता को छह बार चोदा। कभी मुँह, कभी योनि, कभी गांड। कभी बेल्ट से पीटा, कभी बालों से घसीटा, कभी गर्भवती पेट पर हल्के थप्पड़ मारे। सुनीता अब बोल भी नहीं पा रही थी। सिर्फ कराहती और रोती।

शाम को रविंद्र ने एक नया खेल शुरू किया। उसने सुनीता के दोनों निप्पल में छोटे क्लिप्स लगा दिए। फिर योनि के होंठों में भी। दर्द से सुनीता तड़प उठी। रविंद्र ने लंड योनि में घुसाया और क्लिप्स को खींचने लगा। हर ठोकर के साथ क्लिप्स खिंचते, दर्द बढ़ता। सुनीता पागल हो रही थी। ऑर्गैज़्म इतने जोर का आया कि वह बेहोश होने वाली थी। रविंद्र ने फिर भी नहीं रोका। उसने क्लिप्स हटाए और गांड में लंड डाल दिया। इस बार उल्टा—योनि में उंगलियाँ, गांड में लंड। दोनों छेद एक साथ भर दिए।

रात भर यही चला। सुनीता के शरीर पर अब और निशान थे—कलिप्स के, दाँतों के, बेल्ट के। वीर्य उसके हर छेद से बह रहा था। दूध के धब्बे बिस्तर पर फैले हुए।
तीसरे दिन सुबह मौसा का फोन आया। वह शाम को लौट रहा था। रविंद्र ने सुनीता को आखिरी बार चोदा। इस बार सबसे क्रूर तरीके से। सुनीता को पलंग के पाये से बाँधा। हाथ-पैर फैलाए। लंड बारी-बारी से तीनों छेदों में ठोका। आखिर में गांड के अंदर ही इतना वीर्य छोड़ा कि बाहर निकलने लगा। फिर मुँह में डालकर साफ कराया।

जब मौसा आया तो सुनीता बिस्तर पर लेटी थी। आँखें सूजी, होंठ फटे, शरीर पर छिपे निशान। मौसा ने कुछ नहीं पूछा। वह खुद थका हुआ था।
रविंद्र चला गया। लेकिन जाते-जाते सुनीता के कान में फुसफुसाया—“अगली बार और बड़ा खिलौना लाऊँगा। तू मेरी गर्भवती रंडी है। हमेशा रहेगी।”

सुनीता ने कुछ नहीं कहा। उसकी आँखों में अब डर नहीं, सिर्फ समर्पण था। पेट में बच्चा किक मार रहा था। और वह जानती थी—जब भी रविंद्र आएगा, दरवाज़ा बंद होगा, रस्से निकलेंगे, और वह फिर से तोड़ी-मरोड़ी जाएगी।
क्योंकि अब सुनीता सिर्फ मौसी नहीं थी। वह रविंद्र की निजी, गर्भवती, बेबस, इस्तेमाल की हुई गुलाम रंडी बन चुकी थी—और इस बार और भी गहराई तक।

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