आधी रात ऊँची छत पर नंगी बाँधी संपत्ति शहर की रोशनी में खड़ी रही। नीचे भीड़ जुटती गई। मालिक ने गिनती करवाई, भरा और अगले सफर में बंद ट्रक का नया हुक्म सुना दिया।
दर्पणों वाला कमरा बिल्कुल अलग था। चारों दीवारें, छत और फर्श तक बड़े-बड़े साफ दर्पण लगे थे। कोई कोना नहीं, कोई अंधेरा नहीं। हर दिशा में अनन्या की नंगी काया के सैकड़ों टुकड़े दिख रहे थे। बीच में एक लोहे का ढांचा खड़ा था। चेन, कॉलर, वजन सब तैयार।
रुद्रक्ष ने अनन्या को अंदर घसीटा। दरवाजा बंद होते ही कमरा सिर्फ उनकी दो सांसों और दर्पणों की ठंडी चमक से भर गया। उसने अनन्या के हाथ ऊपर बाँध दिए। पैर फैलाकर टखनों में भारी वजन लगा दिए। कॉलर की चेन छत से कस दी। अब अनन्या बीचोंबीच लटक रही थी। हर तरफ उसकी ही थकी, खून के निशानों वाली सूरत देख रही थी।
रुद्रक्ष उसके पीछे खड़ा हो गया। ठंडी आवाज दर्पणों में गूँजी।
“आज तू खुद को देखेगी। हर वार, हर धक्का, हर गिरना। जब तक तू रो-रोकर न बोल दे कि अब काफी है। लेकिन मैं तब भी नहीं रुकूँगा।”
उसने पहली छड़ी उठाई। नितंबों पर वार शुरू हुआ। एक… दो… तीन… हर वार के साथ अनन्या की चीख निकली और दर्पणों में उसकी ही चीखती हुई सैकड़ों सूरतें दिखीं। खून की लकीरें बहने लगीं। रुद्रक्ष रुका नहीं। बीस, तीस, चालीस। नितंब सूजकर फटने को हो गए। अनन्या दर्पण में अपनी ही बैंगनी काया देख रही थी।
छड़ी नीचे गिरी। रुद्रक्ष ने दोनों हाथों से नितंब फैलाए। मुट्ठी बिना रुके अंदर धकेल दी। अनन्या की आवाज फट गई। दर्पणों में उसकी मुट्ठी खाती हुई सूरत हर कोने में दिख रही थी। रुद्रक्ष ने मुट्ठी घुमाई, अंदर-बाहर की। खून और पानी दोनों बहने लगे। फिर मुट्ठी निकाली और तुरंत लंड गाँड में धँस गया। जड़ तक।
वह पेलने लगा। अनन्या के बाल पकड़कर सिर ऊपर उठाया ताकि वह दर्पण में अपनी ही खुली हुई गाँड और अपने ही दर्द भरे चेहरे को देखती रहे। हर धक्के के साथ दर्पणों में सैकड़ों अनन्या काँप रही थीं।
“देख। तू कैसे खुल रही है। बोल, कितनी बार मुट्ठी गई?”
“छह… सात…” आवाज टूट रही थी।
रुद्रक्ष ने लय तेज कर दी। एक हाथ से निप्पल मरोड़े, दूसरे से चूत में चार उंगलियाँ घुसा दीं। दोहरी गति। अनन्या का शरीर ढांचे पर झूल रहा था। दर्पणों में उसकी सैकड़ों काया एक साथ तड़प रही थीं। अचानक रुद्रक्ष रुका। लंड अंदर ही रखा।
“गिर। अपनी ही आँखों के सामने गिर।”
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अनन्या ने सिर हिलाया। रुद्रक्ष ने उंगलियाँ और जोर से मोड़ीं और लंड पूरा अंदर धकेला। अनन्या का शरीर अकड़ गया। एक लंबी चीख निकली। पानी की धारें बह निकलीं। वह गिर गई। दर्पणों में उसकी काँपती हुई सैकड़ों सूरतें एक साथ गिरती दिखीं।
रुद्रक्ष रुका नहीं। वह पेलता रहा। अनन्या की संवेदनशीलता चरम पर थी। हर धक्का अब दर्द और मजबूर कंपन दोनों ला रहा था। आखिरकार वह गाँड में झड़ गया। गर्म पानी भर गया। लंड निकाला। उंगलियों से पानी उठाकर अनन्या के मुँह में ठूंसा।
“निगल। और दर्पण में देख। कैसे निगल रही है तू।”
अनन्या ने निगल लिया। दर्पणों में उसकी सैकड़ों सूरतें एक साथ निगलती दिख रही थीं।
रुद्रक्ष ने बंधन नहीं खोले। वह घूमकर अनन्या के सामने आ गया। नई छड़ी उठाई। इस बार जांघों के अंदरूनी हिस्से पर वार किए। संवेदनशील जगह। हर वार के साथ अनन्या की चीख और तेज होती गई। खून की नई धारें बहने लगीं। फिर उसने चूत में मुट्ठी डाली। पूरा। घुमाया। अनन्या अब सिर्फ सिसक रही थी। आवाज बैठ चुकी थी।
“माँग। बोल अब काफी है।”
अनन्या के होठ काँपे। “काफी… हो गया… सर…”
रुद्रक्ष हँसा। ठंडी हँसी। “नहीं। अभी नहीं।”
उसने मुट्ठी निकाली और लंड चूत में धकेल दिया। जोरदार धक्के। अनन्या का शरीर फिर से झूलने लगा। दर्पणों में सैकड़ों अनन्या एक साथ भरी जा रही थीं। रुद्रक्ष ने बाल खींचकर सिर घुमाया ताकि वह हर कोने में अपनी ही टूटती सूरत देखे। जब वह दूसरी बार गिरी तो रुद्रक्ष ने लंड अंदर रखते हुए उसके कान में कहा,
“फिर से माँग।”
“काफी… रुद्रक्ष सर… अब नहीं…”
“फिर से।”
अनन्या रोते हुए दोहराती रही। रुद्रक्ष हर बार और तेज पेलता। तीसरी बार गिरने के बाद उसने अंदर ही झड़ गया। पानी भर गया। लंड निकालकर अनन्या के चेहरे पर मल दिया। दर्पणों में उसकी सैकड़ों सूरतें चमक रहे पानी से सनी दिख रही थीं।
रुद्रक्ष ने बंधन थोड़े ढीले किए लेकिन पूरी तरह नहीं खोले। वह कुर्सी पर बैठ गया। सिगार जलाई। धुआँ दर्पणों में फैलने लगा।
“आज तूने तीन बार माँगा। अगली बार जब माँगेगी तो मैं और लंबा खींचूँगा। समझी?”
अनन्या काँपते हुए सिर हिलाया। शरीर अब लगभग जवाब नहीं दे रहा था। लेकिन दर्पणों में उसकी सैकड़ों आँखें अभी भी खुली थीं।
रुद्रक्ष उठा। पास आया। ठंडी उंगलियों से उसका गाल सहलाया।
“नया नियम। आज से तू रोज़ रात इस कमरे में एक घंटा बिताएगी। अकेली। दर्पणों के बीच। खुद को देखती हुई। अपनी उंगलियों से, अपनी मुट्ठी से। मैं बाहर से देखूँगा। अगर कोई दिन तूने आँखें बंद कर लीं या कम जोर से तोड़ा तो अगली बार मैं तुझे यहाँ बारह घंटे बाँध दूँगा।”
अनन्या की साँसें तेज चल रही थीं। शरीर जल रहा था। लेकिन अंदर वह खालीपन अब अपनी ही टूटती सूरत देखने की भूख बन चुका था।
रुद्रक्ष ने दरवाजा खोला। बाहर जाते हुए आवाज और ठंडी हो गई।
“अगले हफ्ते मैं तुझे एक खुली छत पर ले जाऊँगा। रात के बारह बजे। शहर की लाइटें नीचे होंगी। तू नंगी बाँधी होगी। और मैं तय करूँगा कि नीचे सड़क पर खड़े लोग तुझे देखें या नहीं। तू सिर्फ खड़ी रहेगी। और गिनेगी कि कितनी निगाहें तुझे छू रही हैं।”
अनन्या की आँखें दर्पणों में अपनी ही डरी हुई सैकड़ों सूरतों में खो गईं। नया डर। नई भूख। चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ शरीर और यादों का नहीं, उसकी अपनी निगाह और शहर की निगाहों का भी होने वाला था। और अगली छत पहले से कहीं ज्यादा खुली और क्रूर होने वाली थी।
रात के बारह बजने में दस मिनट बाकी थे। रुद्रक्ष ने अनन्या को काली गाड़ी की फर्श पर लिटा रखा था। कोई कपड़ा नहीं। सिर्फ कॉलर और चेन। शरीर पर दर्पण वाले कमरे के ताजे निशान अभी भी जल रहे थे। गाड़ी ऊँची इमारत के पीछे रुकी। लिफ्ट से सीधा छत पर।
छत खुली थी। चारों तरफ शहर की लाइटें जल रही थीं। नीचे सड़क पर गाड़ियाँ और लोग छोटे-छोटे खिलौनों जैसे दिख रहे थे। बीच में एक लोहे का खंभा गाड़ा गया था। रुद्रक्ष ने अनन्या को खंभे से बाँध दिया। हाथ ऊपर। पैर फैलाए। वजन भारी। अब वह नंगी, रोशनी में, शहर के बीचोंबीच खड़ी थी। हवा ठंडी थी। निप्पल तन गए। पुराने सिगरेट के दाग और खून के निशान चमक रहे थे।
रुद्रक्ष उसके पास खड़ा हो गया। आवाज कम थी लेकिन साफ।
“नीचे लोग हैं। मैं तय करूँगा कि रोशनी बढ़े या कम हो। तू गिनेगी। हर निगाह का नंबर। समझी?”
अनन्या ने काँपते हुए सिर हिलाया।
रुद्रक्ष ने रिमोट दबाया। छत की तेज रोशनी जल उठी। अनन्या की नंगी काया अचानक शहर के सामने आ गई। नीचे कुछ गाड़ियाँ रुकीं। कुछ लोग रुके। निगाहें ऊपर उठीं। अनन्या की आवाज काँपी।
“एक… दो… तीन…”
रुद्रक्ष ने छड़ी उठाई। नितंबों पर वार शुरू किए। हर वार के साथ अनन्या की चीख हवा में गूँजी। नीचे और लोग इकट्ठा होने लगे। गिनती जारी रही। “सात… आठ… नौ…” खून की लकीरें बहने लगीं। रुद्रक्ष रुका नहीं। बीस वार बाद छड़ी नीचे गिरी।
उसने दोनों हाथों से नितंब फैलाए। मुट्ठी अंदर धकेल दी। अनन्या की चीख और तेज हो गई। नीचे सड़क पर अब भीड़ बढ़ रही थी। कुछ लोग मोबाइल निकाल रहे थे। रुद्रक्ष ने मुट्ठी घुमाई। अनन्या गिनती जारी रखे हुए थी। “चौदह… पंद्रह…”
मुट्ठी निकली। लंड गाँड में धँस गया। जड़ तक। रुद्रक्ष पेलने लगा। हर धक्के के साथ अनन्या का शरीर खंभे से टकरा रहा था। शहर की लाइटें उसकी काँपती काया पर पड़ रही थीं। गिनती टूट-टूटकर निकल रही थी। “इक्कीस… बाईस…”
रुद्रक्ष ने एक हाथ से निप्पल मरोड़े। दूसरे से चूत में उंगलियाँ घुसा दीं। दोहरी गति। अनन्या की आवाज अब सिर्फ काँपती गिनती और सिसकियों में रह गई थी। नीचे भीड़ और घनी हो गई। कुछ लोग चिल्ला रहे थे। रुद्रक्ष ने रिमोट से रोशनी और तेज कर दी। अनन्या पूरी तरह उजागर हो गई।
“गिर। शहर के सामने गिर।”
रुद्रक्ष ने उंगलियाँ मोड़ीं और लंड पूरा अंदर धकेला। अनन्या का शरीर अकड़ गया। एक लंबी चीख निकली। पानी की धारें जांघों पर बहने लगीं। वह गिर गई। गिनती रुक गई। नीचे तालियाँ और सीटियाँ गूँजने लगीं।
रुद्रक्ष रुका नहीं। वह पेलता रहा। अनन्या की संवेदनशीलता चरम पर थी। हर धक्का अब शहर की निगाहों के नीचे असहनीय बन चुका था। आखिरकार वह गाँड में झड़ गया। गर्म पानी भर गया। लंड निकाला। उंगलियों से पानी उठाकर अनन्या के मुँह में ठूंसा।
“निगल। सबके सामने।”
अनन्या ने निगल लिया। नीचे से और आवाजें आने लगीं।
रुद्रक्ष ने बंधन नहीं खोले। वह खंभे के पास खड़ा रहा। सिगार जलाई। धुआँ हवा में उड़ने लगा। अनन्या लटक रही थी। खून और पानी फर्श पर टपक रहा था। नीचे भीड़ अभी भी खड़ी थी।
“अब बता। कितनी निगाहें गिनीं?”
अनन्या की आवाज टूटी हुई थी। “सैंतीस…”
“झूठ। मैंने गिनती की। बावन। सजा।”
उसने छड़ी फिर उठाई। जांघों के अंदरूनी हिस्से पर वार शुरू किए। हर वार के साथ अनन्या की चीख शहर में गूँज रही थी। खून की नई धारें बहने लगीं। फिर उसने चूत में लंड धकेल दिया। जोर से। गहराई तक। अनन्या अब सिर्फ सिसक रही थी। गिनती भूल चुकी थी। रुद्रक्ष पेलता रहा जब तक वह दूसरी बार नहीं गिर गई। फिर अंदर ही झड़ गया।
लंड निकालकर अनन्या के चेहरे पर मल दिया। शहर की रोशनी में उसका चेहरा चमक रहा था।
रुद्रक्ष ने रिमोट से रोशनी कम कर दी। भीड़ धीरे-धीरे तितर-बितर होने लगी। उसने अनन्या के बंधन खोले। वह ढेर हो गई। रुद्रक्ष ने उसे बालों से खींचकर गाड़ी तक घसीटा। फर्श पर लिटा दिया।
घर पहुँचते ही शीशे वाले कमरे में बाँध दिया। शरीर पर छत के सारे निशान धधक रहे थे।
“अब नया नियम।”
रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठ गया। सिगार की राख गिराई।
“आज से तू रोज़ रात बारह बजे छत पर खड़ी होगी। अकेली। बाँधी हुई। मैं नीचे से देखूँगा। तू गिनेगी कि कितनी निगाहें तुझे छूती हैं। सुबह आकर बताएगी। गलती हुई या कम गिनी तो फिर से शहर के सामने लंड और मुट्ठी दोनों एक साथ दूँगा।”
अनन्या फर्श पर पड़ी काँप रही थी। शरीर जल रहा था। लेकिन अंदर वह खालीपन अब शहर की निगाहों की भूख बन चुका था।
रुद्रक्ष ने आखिरी कश लिया। आवाज और ठंडी हो गई।
“अगले हफ्ते मैं तुझे एक बंद ट्रक में डाल दूँगा। अंदर सिर्फ अंधेरा होगा। तू नंगी बाँधी होगी। ट्रक शहर में घूमेगा। कभी-कभी दरवाजा खुल जाएगा। कोई अजनबी चढ़ आएगा। वह तुझे छूएगा, भरेगा, कुछ भी करेगा। तू सिर्फ सहेगी। और हर रुकने पर गिनती बताएगी। ट्रक तीन घंटे चलेगा। समझी?”
अनन्या की आँखें अंधेरे में खुली रह गईं। नया डर। नई भूख। चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ छत और दर्पणों का नहीं, चलते ट्रक और अजनबियों के हाथों का भी होने वाला था। और अगला सफर पहले से कहीं ज्यादा अंधा और क्रूर होने वाला था।
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