पति की गैरहाजरी में साठ साल का चौकीदार और उसका मोटा लंड वाला बेटा मिलकर गोरी बीवी को रस्सियों से बाँधकर पीटते, मुट्ठी ठूंसते, दोनों छेद एक साथ फाड़ते और पेशाब पिलाते हुए पूरी तरह तोड़ देते हैं।
यह कहानी दिल्ली के एक पुराने मकान में शुरू होती है, जहाँ विक्रम और उसकी पत्नी अंजलि रहते थे। विक्रम चालीस साल का था, काम के सिलसिले में अक्सर बाहर रहता था। अंजलि अट्ठाईस साल की गोरी-चिट्टी औरत थी, लंबे बाल, गोल-मटोल शरीर, भारी स्तन और मांसल जाँघें। उनके घर के सामने कॉलोनी का मुख्य गेट था, जहाँ साठ साल का बूढ़ा चौकीदार हरिप्रसाद बैठता था। काला, झुर्रियों वाला चेहरा, सफेद दाढ़ी, पतला शरीर लेकिन मजबूत हाथ।
विक्रम दो दिन के लिए बाहर जा रहा था। उसने हरिप्रसाद से कहा, “रात को गेट के पास मत बैठना, घर के सामने ही रहना। अंजलि अकेली होगी।” हरिप्रसाद ने सिर हिलाया। विक्रम चला गया।
रात के दस बजे हरिप्रसाद घर के सामने कुर्सी पर बैठ गया। अंजलि ने दरवाजा खोला, हाथ में चाय का कप। उसने छोटी नाइटी पहनी थी, जो जाँघों के बीच तक आती थी। “लो बाबा, चाय पी लो।” हरिप्रसाद ने कप लिया, आँखें अंजलि के स्तनों पर टिकी रहीं। “मैडम, आप तो दिन-ब-दिन और खूबसूरत हो रही हो। साहब की किस्मत।”
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अंजलि मुस्कुराई। “किस्मत? वो तो मुझे देखते भी नहीं। तुम ही देखो अगर देखना हो।” उसने दरवाजा और खोला। “अंदर आ जाओ, डर लग रहा है।”
हरिप्रसाद अंदर घुसा। अंजलि ने उसे सोफे पर बैठाया। वह उसके सामने खड़ी हो गई, नाइटी ऊपर कर दी। नीचे काली पैंटी, ऊपर नंगे स्तन। “देखो बाबा, ये तुम्हारे लिए हैं। तुम बूढ़े हो, गंदे हो, पसीने से तर। मुझे ऐसे ही मर्द चाहिए।”
हरिप्रसाद उठ खड़ा हुआ। उसने अंजलि का हाथ पकड़ा और जोर से खींचा। “मैडम, आज मैं सिर्फ देखने नहीं आया। आज मैं तुम्हें अपनी मालकिन बनाऊँगा और तुम मेरी गुलाम।” अंजलि की आँखों में चमक आई। “तो बना लो। जितना चाहो क्रूर बनो।”
हरिप्रसाद ने रसोई से रस्सी निकाली। अंजलि के हाथ पीछे बाँध दिए। फिर उसकी नाइटी फाड़ दी। स्तन बाहर निकल आए—बड़े, सख्त निप्पल। उसने एक निप्पल को मुँह में लिया और दाँतों से काटा। अंजलि चीखी, लेकिन मुस्कुराई। “और जोर से काटो बाबा।” हरिप्रसाद ने दूसरा निप्पल भी काटा, फिर दोनों स्तनों को हाथों से दबाया यहाँ तक कि उंगलियों के निशान पड़ गए।
वह अंजलि को घुटनों पर गिरा दिया। “अपना मुँह खोल।” अंजलि ने मुँह खोला। हरिप्रसाद ने अपनी पैंट खोली। काला, मोटा, नसों वाला लंड बाहर निकला—सात इंच लंबा, मोटा। उसने अंजलि के मुँह में ठूंस दिया। “चूस, गंदी रंडी। पूरा निगल।” अंजलि की आँखों से पानी आने लगा, लेकिन उसने लंड को गले तक पहुँचाया। हरिप्रसाद ने उसके बाल पकड़कर जोर-जोर से धक्के मारे। लंड गले में अटक रहा था, अंजलि घुट रही थी, लेकिन हरिप्रसाद नहीं रुका। थूक मुँह से बहने लगा, आँखों से आँसू।
जब अंजलि का चेहरा लाल हो गया तो उसने लंड निकाला। “अब लेट जा।” अंजलि सोफे पर लेटी। हरिप्रसाद ने उसकी पैंटी फाड़ दी। चूत पूरी तरह से खुली—गुलाबी, गीली, बाल साफ। उसने तीन उंगलियाँ एक साथ अंदर डाल दीं और जोर से अंदर-बाहर करने लगा। अंजलि चीख रही थी। “बाबा… दर्द… और करो।” हरिप्रसाद ने चौथी उंगली भी डाल दी। चूत फैल गई। फिर उसने अपना मुँह लगाया। जीभ अंदर घुसाई, क्लिट को दाँतों से काटा, चूसा। अंजलि का शरीर काँप उठा। वह झड़ गई, पानी हरिप्रसाद के मुँह पर गिरने लगा।
हरिप्रसाद उठा। “अब असली सजा।” उसने अंजलि को पलटा, गांड ऊपर की। दोनों हाथ बाँधे हुए थे। उसने अपनी हथेली से गांड पर जोर का थप्पड़ मारा। लाल निशान पड़ गया। फिर दूसरा, तीसरा। अंजलि रो रही थी, लेकिन “और… और मारो” कह रही थी। हरिप्रसाद ने बीस थप्पड़ मारे। गांड जल रही थी। फिर उसने अपनी उंगली गांड के छेद में घुसा दी। अंजलि चीखी। “बाबा… वो जगह… धीरे…” लेकिन हरिप्रसाद ने दूसरी उंगली भी डाल दी और जोर से फैलाया।
तब उसने अपना लंड चूत में धकेल दिया। एक झटके में पूरा अंदर। अंजलि की चीख निकल गई। हरिप्रसाद ने कमर पकड़कर जोर-जोर से धक्के मारने शुरू किए। हर धक्के के साथ अंजलि का शरीर आगे-पीछे हो रहा था। “चुद, गंदी बीवी। अपने पति को भूल जा।” अंजलि चिल्ला रही थी, “चोदो बाबा… तोड़ दो मेरी चूत।” हरिप्रसाद ने गति बढ़ाई। लंड चूत से पानी निकाल रहा था। फिर उसने लंड निकाला और गांड के छेद में ठूंस दिया। अंजलि की आँखें फटी रह गईं। दर्द से शरीर ऐंठ गया। हरिप्रसाद नहीं रुका। पूरा लंड अंदर-बाहर कर रहा था। अंजलि रो रही थी, लेकिन उसके मुँह से “और गहरा” निकल रहा था।
हरिप्रसाद ने अंजलि को खड़ा किया, हाथ अभी भी बाँधे। उसने उसे दीवार से सटाया। एक पैर ऊपर उठाया और फिर से चूत में लंड घुसाया। खड़े-खड़े चुदाई। हरिप्रसाद के हाथ अंजलि के गले पर थे। हल्का दबा रहा था। अंजलि की साँस उखड़ रही थी, चेहरा लाल। “मर जाऊँगी बाबा…” हरिप्रसाद मुस्कुराया। “मर, लेकिन चुदते हुए मर।” उसने और जोर से दबाया, साथ ही कमर चलाता रहा। अंजलि झड़ गई, शरीर ढीला पड़ गया, लेकिन हरिप्रसाद ने उसे संभाला और धक्के जारी रखे।
फिर वह अंजलि को फर्श पर गिरा दिया। हाथ खोल दिए। “अब खुद सवार हो।” अंजलि ने लंड पर बैठ गई। ऊपर-नीचे होने लगी। हरिप्रसाद ने उसके स्तन पकड़कर जोर से मरोड़े। निप्पल से खून की बूंद निकल आई। अंजलि चीखी, लेकिन रुक नहीं। वह और तेज उछल रही थी। हरिप्रसाद नीचे से धक्के मार रहा था। दोनों के शरीर पसीने से चमक रहे थे। हरिप्रसाद का काला शरीर अंजलि के गोरे शरीर से चिपक रहा था।
अचानक हरिप्रसाद ने अंजलि को नीचे दबाया। डॉगी स्टाइल में फिर से लंड गांड में डाल दिया। एक हाथ से उसके बाल पकड़े, दूसरे से गला। “आज तुम मेरी कुतिया हो। समझी?” अंजलि ने सिर हिलाया। हरिप्रसाद ने जोर का धक्का मारा और अपना माल अंजलि की गांड में छोड़ दिया। गर्म वीर्य अंदर भर गया। अंजलि का शरीर काँप रहा था।
हरिप्रसाद थककर लेट गया। अंजलि उसके पास लेटी। उसके शरीर पर थप्पड़ों के निशान, काटने के निशान, रस्सी के निशान। वह मुस्कुरा रही थी। “बाबा, ये तो शुरुआत है। कल रात और क्रूर बनना। मुझे रस्सी से बाँधना, चाबुक मारना, जितना चाहो अपमान करना।”
हरिप्रसाद ने उसकी ठुड्डी पकड़ी। “कल तुम्हें मैं पूरा दिन बाँधकर रखूँगा। मुँह में कपड़ा ठूंसकर। जब चाहूँगा चुदूँगा, जब चाहूँगा पीटूंगा। तुम सिर्फ रोना और चुदना।” अंजलि की आँखों में भूख थी। “हाँ बाबा। मैं तुम्हारी गुलाम हूँ।”
सुबह विक्रम का फोन आया। अंजलि ने सामान्य आवाज में बात की। हरिप्रसाद बगल में बैठा उसका स्तन मरोड़ रहा था। फोन कटते ही अंजलि मुड़ी और हरिप्रसाद के लंड को फिर मुँह में ले लिया।
दो दिन तक यही सिलसिला चला। हरिप्रसाद ने अंजलि को घर के हर कोने में चोदा—रसोई की मेज पर, बाथरूम में, बालकनी में जहाँ बाहर से कोई देख सकता था। उसने उसे बाँधा, पीटा, गला दबाया, मुँह में पेशाब किया, गांड में मुट्ठी तक घुसाई।
अंजलि हर बार और माँगती रही।
जब विक्रम वापस आया तो अंजलि सामान्य लग रही थी। लेकिन रात को जब विक्रम सोया, अंजलि चुपके से बालकनी में गई। हरिप्रसाद वहाँ खड़ा था। अंजलि ने अपनी साड़ी ऊपर की और दीवार से सटकर गांड पेश की। हरिप्रसाद ने बिना एक शब्द कहे अपना लंड अंदर डाल दिया। विक्रम के सोते हुए घर में, बूढ़े चौकीदार की क्रूर चुदाई चल रही थी।
अगले हफ्ते हरिप्रसाद गाँव चला गया। लेकिन जाने से पहले उसने अंजलि के शरीर पर अपने दाँतों से निशान छोड़ दिए थे—ऐसे निशान जो महीनों तक नहीं मिटे। अंजलि रात-रात भर जागकर उन निशानों को सहलाती और उस गंदे, क्रूर, बूढ़े आदमी की याद में अपनी उंगलियाँ चूत में घुमाती रहती।
कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। हरिप्रसाद और उसका बेटा रमेश अंदर घुसे। रमेश तीस साल का था, पिता से लंबा, काले शरीर पर मांस की परतें, और जाँघों के बीच लटका हुआ मोटा, काला लंड जो पैंट के अंदर से ही उभरा दिख रहा था। अंजलि घुटनों पर बैठी दोनों को देख रही थी। उसने अपनी साड़ी की पल्लू हटा दी। नंगे स्तन, निप्पल अभी भी पुराने काटने के निशानों से लाल।
हरिप्रसाद ने दरवाजा बंद किया और कुंडी लगा दी। “आज तुम दोनों की हो। कोई रहम नहीं।” रमेश मुस्कुराया। उसने अपनी पैंट खोली। लंड बाहर निकला—नौ इंच लंबा, कलाई जितना मोटा, नसें फूली हुई, सिर काला और चमकदार। अंजलि की साँस रुक गई। हरिप्रसाद ने भी अपना लंड निकाला। दोनों एक साथ अंजलि के मुँह के सामने खड़े हो गए।
“खोल मुँह, कुतिया।” अंजलि ने मुँह खोला। रमेश ने पहले अपना मोटा लंड ठूंस दिया। गला फटने लगा। अंजलि की आँखों से तुरंत आँसू बहने लगे। रमेश ने बाल पकड़कर जोर के धक्के मारे। लंड गले की दीवार से रगड़ खा रहा था। थूक मुँह के कोनों से बहने लगा। फिर हरिप्रसाद ने भी अपना लंड अंदर डालने की कोशिश की। दोनों लंड एक साथ अंजलि के मुँह में। होंठ फटने के कगार पर। अंजलि घुट रही थी, लेकिन दोनों नहीं रुके। रमेश ने और गहरा धकेला। अंजलि का चेहरा नीला पड़ने लगा। तब जाकर उन्होंने निकाला।
अंजलि फर्श पर गिर पड़ी, खाँसती हुई। हरिप्रसाद ने उसके बाल पकड़कर खींचा। “उठ। अब असली खेल शुरू होता है।” उन्होंने अंजलि को बेडरूम में घसीटा। रमेश ने बिस्तर के चारों कोनों से मोटी रस्सियाँ निकालीं। अंजलि को पेट के बल लिटाया। हाथ-पैर फैलाकर बाँध दिए। रस्सियाँ इतनी कसीं कि कलाई और टखनों पर खून उतर आया।
हरिप्रसाद ने रसोई से चमड़े का पुराना बेल्ट निकाला। पहला वार अंजलि की गांड पर पड़ा। तेज आवाज। लाल धारी। अंजलि चीखी। दूसरा वार। तीसरा। रमेश गिन रहा था। “दस… बीस… तीस…” तीस वार के बाद गांड पूरी लाल और सूजी हुई थी। कुछ जगहों से खून की बूंदें रिस रही थीं। हरिप्रसाद रुका नहीं। उसने बेल्ट को दोहरा करके और जोर से मारा। अंजलि रो रही थी, शरीर ऐंठ रहा था, लेकिन रस्सियाँ नहीं छोड़ रही थीं।
फिर रमेश आगे बढ़ा। उसने अपनी मोटी उंगलियाँ अंजलि की चूत में ठूंस दीं। चार उंगलियाँ एक साथ। चूत फैली। अंजलि चिल्लाई। रमेश ने मुट्ठी बंद की और धीरे-धीरे पूरी मुट्ठी अंदर धकेल दी। अंजलि की चीख घर में गूंज गई। मुट्ठी चूत के अंदर घूम रही थी। रमेश बाहर निकालता और फिर जोर से धकेलता। हर बार अंजलि का शरीर उछलता। पानी और खून मिलाजुला द्रव बहने लगा।
हरिप्रसाद ने अंजलि का मुँह पकड़ा और अपना लंड फिर से ठूंस दिया। इस बार वह पेशाब करने लगा। गर्म पेशाब अंजलि के गले में जा रहा था। अंजलि निगलने की कोशिश कर रही थी, लेकिन बहुत सारा बाहर निकलकर चेहरे और स्तनों पर बह रहा था। रमेश हँस रहा था। “पी ले, गंदी रंडी। बाप का पेशाब।”
जब पेशाब खत्म हुआ तो रमेश ने अपनी मुट्ठी निकाली। चूत अब खुली गुफा जैसी लग रही थी। उसने अपना मोटा लंड वहाँ धकेल दिया। एक झटके में पूरा अंदर। अंजलि की आँखें फटी रह गईं। रमेश ने कमर पकड़कर जानवरों की तरह धक्के मारने शुरू किए। हर धक्के के साथ अंजलि का शरीर आगे खिसकता। बिस्तर चरमरा रहा था। हरिप्रसाद ने अंजलि के बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और अपना लंड उसके मुँह में फिर से डाल दिया। दोनों छेद भरे हुए।
रमेश अचानक रुका। उसने लंड निकाला और गांड के सूजे हुए छेद पर लगाया। “अब यहाँ।” अंजलि ने सिर हिलाने की कोशिश की, लेकिन हरिप्रसाद के लंड की वजह से नहीं हो पाया। रमेश ने जोर का धक्का मारा। गांड का छेद फटा। खून निकला। रमेश नहीं रुका। पूरा लंड अंदर-बाहर कर रहा था। अंजलि की चीखें दबी-दबी आ रही थीं। हरिप्रसाद ने मुँह से लंड निकाला और अंजलि के कान में फुसफुसाया, “आज तुम्हारी गांड और चूत दोनों फट जाएँगी। और तुम माँगोगी और।”
उन्होंने अंजलि को रस्सियों से खोला, लेकिन सिर्फ इसलिए कि नई पोजीशन में बाँध सकें। अंजलि को उल्टा लटकाया—सिर नीचे, पैर ऊपर, रस्सियों से छत के पंखे के हुक से। खून सिर में चढ़ गया। रमेश ने नीचे से खड़े होकर अपना लंड अंजलि के मुँह में ठूंस दिया। गुरुत्वाकर्षण की वजह से लंड और गहरा चला गया। अंजलि का गला फूल गया। हरिप्रसाद ने पीछे से चूत और गांड दोनों में बारी-बारी से लंड डाला। कभी चूत, कभी गांड। खून और पानी फर्श पर टपक रहा था।
आधे घंटे बाद उन्होंने अंजलि को उतारा। वह चल नहीं सकती थी। शरीर पर नीले-काले निशान, रस्सी के गहरे घाव, स्तनों पर दाँतों के निशान, जाँघों पर बेल्ट के निशान। रमेश ने उसे गोद में उठाया और बाथरूम ले गया। वहाँ ठंडे पानी से नहलाया, लेकिन नहलाने के बहाने फिर से उंगलियाँ और लंड अंदर डाले। हरिप्रसाद ने अंजलि के बाल पकड़कर सिर शौचालय में झुका दिया। “चाट।” अंजलि ने जीभ निकाली। दोनों ने बारी-बारी से उसका मुँह इस्तेमाल किया—कभी लंड, कभी पेशाब, कभी थूक।
रात के तीन बजे तक खेल चला। अंजलि को फिर बिस्तर पर लिटाया। इस बार दोनों एक साथ अंदर। रमेश चूत में, हरिप्रसाद गांड में। डबल पेनिट्रेशन। अंजलि का शरीर बीच में दब गया। दोनों लंड अंदर रगड़ खा रहे थे। अंजलि अब चीख भी नहीं सकती थी। सिर्फ घरघराहट। रमेश ने गला दबाया। हरिप्रसाद ने निप्पल काटे। दोनों ने एक साथ झड़ने का फैसला किया। गर्म वीर्य दोनों छेदों में भर गया। इतना कि बाहर बहने लगा।
वे थककर लेट गए। अंजलि बीच में थी। उसके मुँह से खून और वीर्य मिलाजुला थूक बह रहा था। रमेश ने उसकी जाँघ सहलाते हुए कहा, “कल सुबह फिर से। आज तो सिर्फ वार्म-अप था।”
हरिप्रसाद ने अंजलि का चेहरा घुमाया। “तुम्हारे पति को फोन करना। बोलना कि तुम बीमार हो। तीन दिन और चाहिए हमें।” अंजलि ने कमजोर आवाज में “हाँ” कहा। उसकी आँखों में अभी भी भूख थी। दर्द के बावजूद वह दोनों के लंड को हाथ से सहला रही थी।
सुबह विक्रम का फोन आया। अंजलि ने कर्कश आवाज में कहा कि तेज बुखार है, डॉक्टर ने आराम करने को कहा है। विक्रम मान गया। फोन कटते ही रमेश ने अंजलि को फिर से घुटनों पर गिरा दिया। “अब सुबह का नाश्ता।” दोनों लंड फिर से उसके मुँह में ठूंस दिए गए।
अगले तीन दिन घर नरक बन गया। उन्होंने अंजलि को कुत्ते की तरह पट्टा पहनाया। घर के अंदर घसीटा। फर्श पर रेंगने को मजबूर किया।
खाना कुत्ते की तरह चाटने को कहा। जब अंजलि थक जाती तो बेल्ट से जगाते। उन्होंने मोमबत्ती जलाकर उसके स्तनों और चूत पर मोम गिराया। गर्म मोम से शरीर जल रहा था। फिर ठंडे बर्फ के टुकड़े उसी जगह रगड़े। दर्द का उतार-चढ़ाव अंजलि को पागल कर रहा था।
एक बार उन्होंने अंजलि को बालकनी में लिटा दिया। रात के अँधेरे में। रस्सियों से बाँधकर। मुँह में कपड़ा ठूंसा। रमेश और हरिप्रसाद बारी-बारी से उसे चोदते रहे जबकि नीचे सड़क पर लोग गुजर रहे थे। अंजलि की आँखों में डर और उत्तेजना दोनों थे। कोई ऊपर देख ले तो? लेकिन कोई नहीं देखा।
तीसरे दिन की रात उन्होंने अंतिम खेल खेला। अंजलि को पूरी तरह नंगा करके घर के बीचोंबीच खड़ा किया। हाथ ऊपर बाँधे। आँखों पर पट्टी। फिर दोनों ने बारी-बारी से हर संवेदनशील जगह पर वार किए—चुभन, थप्पड़, काटना, खरोंचना। अंत में दोनों ने एक साथ झड़कर उसका पूरा शरीर वीर्य से नहला दिया। चेहरा, बाल, स्तन, चूत, गांड—सब चिपचिपा।
सुबह जब विक्रम आने वाला था, उन्होंने अंजलि को नहलाया, कपड़े पहनाए, मेकअप लगाया। निशान छुपा दिए। अंजलि दरवाजे तक आई। हरिप्रसाद ने उसके कान में कहा, “अगली बार और लाऊँगा। मेरे दोस्त भी। तब तुम सच में टूट जाओगी।”
अंजलि ने दरवाजा खोला। आँखों में वही भूख थी। “इंतजार रहेगा बाबा।”
दरवाजा बंद हुआ। हरिप्रसाद और रमेश अंधेरे में गायब हो गए। अंजलि अंदर खड़ी मुस्कुरा रही थी। उसके शरीर पर छिपे निशान जल रहे थे, और वह जानती थी कि यह अंत नहीं, नई शुरुआत है।
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