दो खूबसूरत लड़कियों को रस्सियों, चाबुक, गर्म मोम और बर्बर चुदाई से पूरी तरह तोड़कर अपनी हवस की गुलाम बनाने वाली क्रूर, दर्दनाक और बेहद गंदी कहानी।
उन दिनों की बात है जब मैं कानपुर के पुराने सिविल लाइन्स इलाके में एक दो मंजिला मकान में किराये पर रहता था। मकान के मालिक परिवार नीचे वाले हिस्से में रहते थे और ऊपर वाले हिस्से में तीन कमरे किराये पर दिए गए थे। एक कमरे में मैं अकेला रहता था। दूसरे कमरे में दो लड़कियाँ थीं—प्रिया और अनन्या। तीसरे कमरे में एक भाई-बहन रहते थे, लेकिन उनकी कहानी अलग है। प्रिया और अनन्या दोनों लखनऊ से आई थीं। दोनों मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी कर रही थीं। उम्र दोनों की बाईस-तेईस साल के आसपास थी।
प्रिया देखने में इतनी खूबसूरत थी कि पहली नजर में ही दिल धड़कने लगता था। गोरा रंग, लंबे काले बाल जो कमर तक लहराते थे, तीखे होंठ और आँखें जो शर्म और हिम्मत दोनों एक साथ दिखाती थीं। उसकी बॉडी भरी हुई थी—भारी स्तन, पतली कमर, गोल कूल्हे। अनन्या भी सुंदर थी, लेकिन प्रिया के आगे फीकी पड़ जाती थी। प्रिया अक्सर स्कर्ट और टाइट शर्ट पहनती थी। गर्मी के दिनों में शाम देर से होती थी। मैं छत पर बैठने की आदत डाल चुका था। वहाँ से प्रिया का कमरा साफ दिखता था।
प्रिया की क्लास दो बजे खत्म होती थी। तीन बजे तक घर पहुँच जाती थी। मैं शाम को छत पर जाता तो अक्सर उसे कमरे के बाहर बालकनी में बैठा देखता। बात करने का मौका ढूँढता रहता। एक दिन मौका मिल ही गया। प्रिया ने कहा, “मुझे एक दोस्त को ईमेल भेजना है, लेकिन मुझे नहीं आता। क्या आप मदद करेंगे?”
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मैंने कहा, “हाँ।” पास ही एक साइबर कैफे था। हम दोनों गए। मैं उसे सिखा रहा था। बार-बार मेरे हाथ उसके हाथ से छू जाते। उसकी उंगलियाँ इतनी मुलायम थीं कि दिल चाहता था कि पकड़ लूँ। एक बार मैंने हल्के से पकड़ भी लिया। प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, “सॉरी कहने की जरूरत नहीं। सिखा रहे हो तो हाथ छू जाए तो क्या हुआ।”
उस दिन से मैं बेचैन हो गया। अगले दिन उसकी क्लास के बाहर पहुँच गया। अनन्या उसके साथ थी। अनन्या ने कुछ कहा और अलग दिशा में चली गई। प्रिया ऑटो की तरफ बढ़ी तो मैंने बाइक रोकी और कहा, “घर जा रही हो तो मेरे साथ चलो।” प्रिया बिना कुछ कहे पीछे बैठ गई। बाइक पर उसके स्तन बार-बार मेरी पीठ से टकरा रहे थे। गर्मी और पसीने में वह स्पर्श और भी तीव्र लग रहा था।
मैंने कहा, “प्रिया, तुम बहुत खूबसूरत हो। आज सिर्फ तुमसे बात करने आया हूँ।”
प्रिया हँसी और बोली, “तुम भी अच्छे लगते हो। मैं भी बात करना चाहती थी, लेकिन तुम कभी शुरू नहीं करते थे। अनन्या जान गई थी इसलिए अलग हो गई।”
घर पहुँचे। शाम होने का इंतजार करने लगा। शाम को छत पर गया। प्रिया बाहर बैठी थी। अनन्या अंदर सो रही थी। प्रिया ने मुझे पास बुलाया। थोड़ी देर बाद चाय लेकर आई। मैंने कप थामा और एक हाथ उसके हाथ पर रख दिया। प्रिया मुस्कुराई, कुछ नहीं बोली।
शाम का समय था। आसपास की छतों पर लोग थे। मैंने उसका गाल छुआ, होंठों तक हाथ ले गया। प्रिया बोली, “क्या कर रहे हो राजत… अनन्या देख लेगी।”
रात ग्यारह बजे मैं फिर छत पर गया। प्रिया के कमरे की रोशनी जल रही थी। साढ़े ग्यारह बजे वह बाहर आई। मुझे देखकर चौंकी। “आप यहाँ क्या कर रहे हैं?”
मैंने कहा, “बिना तुम्हारे रहा नहीं जा रहा।” और उसे अपनी बाँहों में खींच लिया। प्रिया ने विरोध किया, “कोई देख लेगा।” मैंने उसके होंठों पर कब्जा कर लिया। पहले मना किया, फिर खुद मेरे होंठ चूसने लगी। स्कर्ट और शर्ट में थी। उसके स्तन मेरी छाती से दब रहे थे। मैंने पीछे से पकड़ा, गले पर होंठ रखे और उसके स्तनों को जोर से मसलने लगा। प्रिया सिसकने लगी, “आह… धीरे… उह्ह…”
मैंने उसे गोद में उठाया और सबसे ऊपरी छत पर ले गया। वहाँ अंधेरा था। चाँदनी थोड़ी-बहुत थी। प्रिया मेरे सीने से चिपक गई और बेतहाशा चूमने लगी। “राजत… मैं तुमसे प्यार करती हूँ…” मैंने उसके शर्ट के बटन एक-एक करके खोले। नीचे कुछ नहीं पहना था। उसके भारी, सख्त स्तन बाहर आ गए। निप्पल काले और खड़े थे। मैंने मुँह लगाकर चूसना शुरू किया। प्रिया कराह उठी, “मेरे स्तनों का दूध पी लो… जोर से चूसो…”
मैंने एक हाथ उसकी जाँघ पर फेरते हुए स्कर्ट खोल दी। उसने खुद स्कर्ट उतार दी। काली पैंटी में उसकी चिकनी, मुलायम योनि उभरी हुई थी। मैंने पैंटी फाड़ दी। चाँदनी में उसकी गीली, चिकनी चूत चमक रही थी। मैंने जीभ से चाटना शुरू किया। प्रिया की कमर उछलने लगी। “आआह… चूस लो… पूरा… साहिल नहीं… राजत… चूस लो मेरी चूत का रस…” उसकी योनि से पानी बहने लगा। मैंने जीभ अंदर डाल दी। प्रिया ने मेरे सिर को दोनों हाथों से दबा रखा था।
फिर वह मेरे लिंग को पकड़ने लगी। उसका हाथ पूरा नहीं घेर पा रहा था। उसने झुककर चूमा, चाटा। मैंने उसे लिटाया, टाँगें फैलाईं। एक उँगली अंदर डाली। बहुत टाइट थी। धीरे-धीरे दो उँगली। प्रिया दर्द से काँप रही थी, फिर मजा आने लगा। मैंने लिंग उसके छेद पर रखा और धीरे से दबाव दिया। प्रिया चिल्लाई, “नहीं… दर्द… मत करो…” मैंने और दबाया। आधा अंदर गया। वह रोने जैसी आवाज में बोली, “मर जाऊँगी… रहने दो…”
मैंने दो मिनट रोके रखा। जब दर्द थोड़ा कम हुआ तो एक जोरदार धक्का मारा। पूरा लिंग उसकी टाइट चूत में धंस गया। प्रिया की चीख छत पर गूँज गई। मैंने रुका रहा। उसके होंठ चूमे। जब वह थोड़ी शांत हुई तो धीरे-धीरे हिलाना शुरू किया। प्रिया की आँखों में आँसू थे, लेकिन कमर हिलाने लगी। “जोर से… फाड़ दो… मेरी चूत सिर्फ तुम्हारी है…”
मैंने रफ्तार बढ़ाई। उसके स्तनों को मुँह में लेकर चूसते हुए धक्के मार रहा था। प्रिया के नाखून मेरी पीठ में गड़ गए। अचानक उसकी कमर तेज हिलने लगी। “आज मेरी चूत फाड़ दो… जोर से… आआह्ह्ह…” उसने दोनों पैरों से मेरी कमर जकड़ ली और झड़ गई। उसकी योनि सिकुड़-सिकुड़कर मेरे लिंग को निचोड़ रही थी। मैंने और जोर लगाया। कुछ ही देर में मैं भी उसके अंदर झड़ गया। वीर्य उसकी चूत में भर गया, बाहर निकलने लगा।
हम नंगे लेटे रहे। प्रिया मेरे कंधे पर सिर रखकर साँस ले रही थी। रात में एक बार फिर मैंने उसे चोदा। इस बार और ज्यादा जोर से। उसने खुद टाँगें फैलाकर कहा, “और अंदर… और गहरा…” सुबह पाँच बजे हल्की रोशनी में हम नीचे आए। अनन्या जाग चुकी थी। हमें देखकर हँसी और बोली, “रात भर सोए नहीं क्या?” प्रिया शर्माकर कमरे में घुस गई।
उसके बाद दस दिन तक हर रात हम ऊपरी छत पर मिलते रहे। प्रिया की भूख बढ़ती जा रही थी। एक रात मैंने रस्सी लाई। प्रिया की दोनों कलाई बाँध दी। उसे घुटनों के बल बिठाया। उसके मुँह में अपना लिंग ठूँस दिया। वह गला भरकर चूस रही थी, आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन रुकने को नहीं कह रही थी। मैंने उसके बाल पकड़कर और गहरा धकेला। फिर पीछे से घुस गया। उसके कूल्हों को इतनी जोर से पकड़ा कि निशान पड़ गए। हर धक्के के साथ उसके स्तन हवा में झूल रहे थे। प्रिया चीख रही थी, “मारो… और जोर से मारो… मेरी चूत फाड़ दो…”
एक रात अनन्या ने हमें देख लिया। अगले दिन उसने अकेले में मुझसे कहा, “मैं भी चाहती हूँ। प्रिया की तरह।”
रात को तीनों छत पर थे। प्रिया और अनन्या दोनों नंगी। मैंने प्रिया को रस्सी से बाँधा, उसके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया। अनन्या को घुटनों के बल बिठाया और पीछे से घुसा। अनन्या की चूत भी टाइट थी, लेकिन प्रिया जितनी नहीं। मैं अनन्या को चोद रहा था और प्रिया को देख रहा था। प्रिया की आँखें लाल थीं, वह कराह रही थी। मैंने अनन्या के बाल खींचे, उसके गले पर हाथ रखा और जोर-जोर से धक्के मारे। अनन्या चीख रही थी, “राजत… और गहरा… मार डालो…”
फिर प्रिया को खोला। दोनों को एक साथ लिया। प्रिया नीचे, अनन्या ऊपर। मैंने प्रिया की चूत में लिंग डाला और अनन्या के मुँह में। फिर जगह बदली। प्रिया के मुँह में और अनन्या की गाँड में। अनन्या पहली बार गाँड में ले रही थी। दर्द से चीख रही थी, लेकिन रुकने नहीं दी। मैंने उसके मुँह पर हाथ रखा और पूरा अंदर धकेल दिया। अनन्या का शरीर काँप रहा था। प्रिया नीचे से अनन्या के स्तन चूस रही थी।
रात भर खेल चलता रहा। मैंने दोनों को बाँधा, चाबुक की जगह बेल्ट से पीटा। उनके कूल्हों और जाँघों पर लाल निशान पड़ गए। दोनों की आँखों में आँसू थे, लेकिन दोनों मांग रही थीं, “और… और सख्ती से…” मैंने प्रिया की चूत में मुट्ठी तक उँगली डाली। वह चीखती रही, फिर झड़ गई। अनन्या को उल्टा लटकाया और उसके मुँह में वीर्य उड़ेल दिया।
सुबह होते-होते दोनों थककर गिर पड़ीं। उनके शरीर पर काटने के निशान, रस्सी के निशान, वीर्य के धब्बे। प्रिया ने मेरे कान में कहा, “अब हम तुम्हारी गुलाम हैं। जितना चाहो उतना इस्तेमाल करो।”
अगले कई हफ्तों तक यही सिलसिला चला। कभी सिर्फ प्रिया, कभी सिर्फ अनन्या, कभी दोनों। मैंने उन्हें अलग-अलग तरह से बांधा—हाथ पीछे, टाँगें फैली हुई, मुँह में गेंद। कभी छत पर, कभी मेरे कमरे में, कभी रात के अंधेरे में सड़क किनारे पार्क में। हर बार और ज्यादा बर्बर, और ज्यादा दर्द, और ज्यादा मजा।
प्रिया की चूत अब इतनी इस्तेमाल हो चुकी थी कि आसानी से पूरा लिंग समा जाता, लेकिन फिर भी वह टाइट लगती थी। अनन्या की गाँड नियमित रूप से ली जाने लगी। दोनों की भूख बढ़ती गई। वे खुद रस्सी लातीं, खुद बाँधने को कहतीं, खुद पीटने को कहतीं।
एक रात मैंने दोनों को एक साथ बाँधा। प्रिया की चूत में और अनन्या की गाँड में एक साथ दो लिंगों जैसा अहसास देने के लिए उँगलियाँ और लिंग दोनों इस्तेमाल किए। दोनों चीख रही थीं, रो रही थीं, लेकिन झड़ती जा रही थीं। आखिर में मैंने दोनों के मुँह में वीर्य उड़ेल दिया। वे चाटती रहीं, निगलती रहीं।
सुबह जब सूरज निकला, दोनों मेरे पैरों के पास नंगी लेटी थीं। शरीर पर नीले-लाल निशान। आँखों में संतुष्टि और भूख दोनों। प्रिया ने धीरे से कहा, “राजत… अब हम कभी वापस नहीं जा सकतीं। तुमने हमें तोड़ दिया है। और हम यही चाहती हैं।”
मैंने उनके बाल सहलाए। कहानी वहीं खत्म नहीं हुई। आने वाले महीनों में और भी कई रातें आईं। और भी गहरी, और भी क्रूर, और भी तीव्र। लेकिन वह पहली रात, जब प्रिया की टाइट चूत में पहली बार पूरा लिंग धंसा था और उसकी चीख छत पर गूँजी थी—वही याद सबसे ज्यादा रह गई।
प्रिया और अनन्या अब सिर्फ मेरी थीं। पूरी तरह। बिना किसी सीमा के।
अगले हफ्ते से मैंने उनके लिए नई नियम बना दिए। दोनों को अपने कमरे में बुलाया। दरवाजा बंद किया। खिड़कियाँ भी। अनन्या पहले आई, फिर प्रिया। दोनों नंगी खड़ी थीं। मैंने कहा, “आज से तुम दोनों मेरी संपत्ति हो। बात करने की इजाजत नहीं। सिर्फ आज्ञा मानोगी। समझी?”
प्रिया ने सिर झुकाया। अनन्या की आँखों में डर और उत्तेजना दोनों थे। मैंने दीवार से लोहे की कड़ियाँ निकालीं जो मैंने पहले से लगवा रखी थीं। प्रिया की दोनों कलाई ऊपर खींचकर बाँध दी। उसके पैर भी फैलाकर फर्श की कड़ियों से जकड़ दिए। अनन्या को उसके सामने घुटनों के बल बैठाया और उसके हाथ पीछे बाँध दिए।
मैंने बेल्ट निकाली। मोटी, चौड़ी। प्रिया की पीठ पर पहला झटका मारा। चमड़ी लाल हो गई। दूसरा झटका और जोर से। प्रिया की चीख रुंध गई क्योंकि मुँह में कपड़ा ठूँसा हुआ था। तीसरा, चौथा, पाँचवाँ। उसकी पीठ पर लाल धारियाँ उभर आईं। अनन्या देख रही थी, काँप रही थी। मैंने अनन्या के बाल पकड़े और उसके मुँह में अपना लिंग ठूँस दिया। “चूस। गहरा। अगर दांत लगाए तो तुझे भी वही मिलेगा।”
अनन्या की आँखों से आँसू बह रहे थे। गला भरकर वह लिंग चूस रही थी। मैंने उसके सिर को दोनों हाथों से पकड़कर और अंदर धकेला। उसकी नाक मेरे पेट से टकरा रही थी। साँस फूल रही थी। मैंने प्रिया की तरफ देखा। उसकी योनि पहले से गीली हो चुकी थी। मैंने एक उँगली उसकी चूत में डालकर बाहर निकाली और अनन्या के मुँह पर लगा दी। “चाट।”
फिर बेल्ट अनन्या की पीठ पर भी चली। तीन झटके। चार। उसकी चीख मेरे लिंग के इर्द-गिर्द दब गई। मैंने दोनों को खोला नहीं। प्रिया को उल्टा कर दिया—सिर नीचे, गाँड ऊपर। उसकी दोनों टाँगें और ज्यादा फैला दीं। मैंने मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम उसकी पीठ पर टपकाया। प्रिया का शरीर ऐंठ गया। फिर उसकी गाँड की दरार पर। फिर योनि के होंठों पर। वह कराह रही थी, काँप रही थी।
मैंने अपना लिंग उसकी टाइट गाँड पर रखा। थूक लगाया। धीरे से दबाव दिया। प्रिया की आँखें फटी की फटी रह गईं। आधा अंदर गया तो वह रोने लगी। पूरा धंसाया तो उसकी चीख दीवारों से टकराई। मैंने रुके बिना धक्के शुरू कर दिए। हर धक्के के साथ उसकी कड़ियाँ खनक रही थीं। अनन्या को पास खींचकर उसके मुँह में फिर से लिंग ठूँस दिया—प्रिया की गाँड से निकाले हुए। अनन्या चाट रही थी, गंदी गंदी।
रात भर यही चला। प्रिया की गाँड, फिर चूत, फिर अनन्या की चूत, फिर उसकी गाँड। दोनों की चमड़ी पर बेल्ट के निशान, मोम के धब्बे, नाखूनों के निशान। आखिर में मैंने दोनों के मुँह खोले और वीर्य उनके चेहरों पर उड़ेल दिया। आँखों में, बालों में, जीभ पर। “चाटो। एक-दूसरे का चेहरा साफ करो।”
वे चाटती रहीं। एक-दूसरे के होंठ चाटते हुए। मैंने तस्वीरें खींची। दोनों को दिखाया। “ये तुम्हारी नई जिंदगी है।”
अगली रात और ज्यादा। मैंने लोहे की चेन लाई। प्रिया के गर्दन में कॉलर पहनाया। चेन अनन्या के कॉलर से जोड़ दी। दोनों को घसीटते हुए छत पर ले गया। ठंडी हवा में नंगी। मैंने प्रिया को दीवार से सटाया। उसके पैर ऊपर उठाए—एक कंधे पर, एक हाथ में। और पूरा लिंग उसकी चूत में एक झटके में धंसा दिया। प्रिया चीखी। अनन्या चेन से बँधी हुई पास खड़ी रो रही थी। मैंने अनन्या के बाल पकड़े और उसके मुँह को प्रिया की योनि पर दबा दिया। “चाट जब मैं चोदूं।”
अनन्या की जीभ मेरे लिंग और प्रिया की चूत के बीच फिसल रही थी। हर धक्के के साथ प्रिया की चीखें तेज हो रही थीं। मैंने रफ्तार बढ़ाई। प्रिया झड़ गई। उसका पानी अनन्या के चेहरे पर बह गया। मैंने प्रिया को छोड़कर अनन्या को पकड़ा। उसे दीवार से सटाया और गाँड में घुस गया। अनन्या की चीख इतनी तेज थी कि पड़ोसी सुन सकते थे। मैंने उसका मुँह दबाया। पूरा अंदर। धक्के। जोर के। उसकी गाँड फटने जैसी लग रही थी। प्रिया घुटनों के बल बैठकर अनन्या के स्तन चूस रही थी।
सुबह होने तक दोनों की गाँड और चूत सूज चुकी थीं। चल नहीं पा रही थीं। मैंने उन्हें अपने कमरे में लिटाया। पैर फैलाए। बर्फ के टुकड़े उनकी योनि और गाँड में डाले। वे सिसक रही थीं। फिर गर्म पानी। फिर फिर से बर्फ। दर्द और राहत का खेल।
तीसरे दिन मैंने नई चीज लाई। मोटी लकड़ी की छड़ी। और एक लोहे का रॉड। प्रिया को चारपाई पर लिटाया। हाथ-पैर बाँधे। छड़ी से उसकी जाँघों के अंदरूनी हिस्से पर मारा। फिर योनि के होंठों पर हल्के-हल्के। फिर जोर से। प्रिया रो रही थी। “और… और मारो…” मैंने रॉड उसकी चूत में डाला। ठंडा लोहा। अंदर-बाहर। फिर गाँड में। अनन्या को उसके ऊपर बिठाया—चेहरा प्रिया की योनि पर, गाँड मेरे सामने।
मैंने अनन्या की गाँड में रॉड डाला और साथ ही अपना लिंग प्रिया के मुँह में। दोनों एक साथ चीख रही थीं।
रात के दो बजे तक खेल चला। मैंने दोनों को उल्टा लटकाया—पैर ऊपर, सिर नीचे। खून सिर में जमा हो रहा था। मैंने उनकी योनियों में बारी-बारी से घुसा। गुरुत्वाकर्षण से और गहरा जा रहा था। दोनों की चीखें दबी हुई थीं क्योंकि मुँह में गेंद थी। जब मैं झड़ा तो वीर्य उनके चेहरों पर गिरने लगा। नीचे से ऊपर की तरफ।
एक हफ्ते बाद मैंने उन्हें बाहर ले जाने का फैसला किया। रात के बारह बजे। दोनों को लंबा कोट पहनाया। नीचे नंगी। कॉलर और चेन। कार में बिठाया। शहर के बाहर एक पुराने गोदाम में ले गया। अकेला, अंधेरा। मैंने पहले से रस्सियाँ, चेन, चाबुक, मोमबत्तियाँ, और एक लकड़ी का घोड़ा जैसा स्टैंड रख छोड़ा था।
प्रिया को स्टैंड पर बैठाया। पैर फैले। योनि खुली। अनन्या को उसके सामने घुटनों के बल। मैंने चाबुक निकाला। पतला, तेज। प्रिया की जाँघों पर। स्तनों पर। योनि के पास। हर झटके के साथ उसकी चीख गूँज रही थी। अनन्या को मजबूर किया कि वह प्रिया की योनि चाटे जबकि मैं चाबुक मार रहा हूँ। फिर अनन्या को स्टैंड पर बिठाया। प्रिया को उसके पीछे। मैंने प्रिया की गाँड में लिंग डाला और अनन्या की चूत में उँगलियाँ। दोनों एक साथ हिल रही थीं।
मैंने मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम अनन्या के स्तनों पर टपकाया। निप्पलों पर। वह चीख रही थी। प्रिया को मजबूर किया कि वह मोम चाटे। फिर मैंने दोनों को फर्श पर लिटाया। एक के ऊपर एक। प्रिया नीचे, अनन्या ऊपर। मैंने प्रिया की चूत में घुसा। अनन्या की गाँड में उँगलियाँ। फिर जगह बदली। दोनों की गाँड बारी-बारी से। इतनी जोर से कि उनके शरीर फर्श पर रगड़ खा रहे थे।
आखिर में मैंने दोनों को खड़ा किया। दीवार से सटाया। हाथ ऊपर बाँधे। चाबुक से पीठ, कूल्हे, जाँघें। लाल धारियाँ। खून की कुछ बूँदें। फिर मैंने दोनों की योनियों में एक साथ दो उँगलियाँ और लिंग। प्रिया झड़ गई। अनन्या झड़ गई। मैंने उनके बाल पकड़े और दोनों के मुँह में बारी-बारी से वीर्य उड़ेल दिया। वे निगल रही थीं। गिरी हुई बूँदें चाट रही थीं।
वापस घर आए तो सुबह के चार बज रहे थे। दोनों मुश्किल से चल पा रही थीं। मैंने उन्हें नहलाया। ठंडा पानी। फिर गर्म। उनके शरीर पर निशान गिनने लगा। प्रिया की पीठ पर सत्रह धारियाँ। अनन्या की जाँघों पर ग्यारह। दोनों की गाँड सूजी हुई। योनि लाल और फूल गई।
मैंने कहा, “अब से हर रात यही होगा। कभी हल्का, कभी इससे भी ज्यादा। अगर कभी मना किया तो सजा और बढ़ेगी।”
प्रिया ने मेरे पैर छुए। अनन्या भी। दोनों ने कहा, “हम तैयार हैं। जितना चाहो उतना तोड़ो।”
अगले महीनों में खेल और गहरा होता गया। कभी मैंने उन्हें सार्वजनिक जगहों पर ले जाकर छोटा-मोटा अपमान किया—पार्क में रात को, कार में, छत पर पड़ोसियों के सोते समय। कभी घर में ही कई घंटों तक बाँधकर छोड़ दिया। भूखी-प्यासी। सिर्फ मेरी आज्ञा का इंतजार। कभी एक को दूसरे पर छोड़ दिया—प्रिया अनन्या को चाबुक मारे, अनन्या प्रिया की गाँड में उँगलियाँ डाले। मैं देखता रहता।
एक रात मैंने दोनों को पूरी तरह तोड़ने का फैसला किया। कमरे में अंधेरा। सिर्फ एक लाल बत्ती। दोनों को फर्श पर लिटाया। हाथ-पैर फैलाकर बाँधे। मैंने एक मोटी मोमबत्ती उनकी योनि में डाली—प्रिया की। दूसरी अनन्या की गाँड में। जलाई। मोम अंदर पिघलकर बहने लगा। वे चीख रही थीं। मैंने उनके मुँह बंद किए। फिर चाबुक। फिर अपना लिंग। बारी-बारी से दोनों की हर जगह। घंटों तक। जब वे थककर बेहोश जैसी हो गईं तब मैं रुका। उनके शरीर पर वीर्य, मोम, पसीना, आँसू।
सुबह जब रोशनी आई तो दोनों अभी भी बँधी हुई थीं। आँखें खुली हुई। लेकिन उनमें कोई विरोध नहीं। सिर्फ समर्पण। प्रिया ने धीरे से कहा, “राजत… अब हम कुछ नहीं रहे। सिर्फ तुम्हारी चीज।”
अनन्या ने भी सिर हिलाया।
मैंने उनकी रस्सियाँ खोलीं। दोनों मेरे पैरों पर गिर पड़ीं। मैंने उनके बाल सहलाए। बाहर सूरज निकल रहा था। लेकिन हमारे कमरे में अभी भी अंधेरा था। और वह अंधेरा आने वाले कई सालों तक रहने वाला था।
प्रिया और अनन्या की गुलामी अब सिर्फ शरीर की नहीं रह गई थी। मन की भी हो चुकी थी। और मैंने तय कर लिया था कि इसे कभी खत्म नहीं होने दूँगा। हर रात नई सजा, नया दर्द, नया मजा। उनके शरीर पर नए निशान। उनकी आँखों में नई भूख।
और कहानी यहीं नहीं रुकी। वह तो बस शुरू हुई थी।
माँ की दोनों छेदों की बर्बर लूट