रस्सियों में जकड़ी निशा की चूत फाड़ी, गांड में लंड ठोका, मोम और चाबुक से शरीर जलाया। गला दबाकर बर्बर चुदाई में दर्द उसकी नई साँस बन गई। हर बार और क्रूर।
मैं हमेशा से ही उन रिश्तों को पसंद करता हूँ जहाँ सिर्फ प्यार नहीं, बल्कि भूख, दर्द और नियंत्रण भी हो। जहाँ शरीर सिर्फ छुआ नहीं जाता, बल्कि तोड़ा और फिर से जोड़ा जाता है। मेरी प्रेमिकाएँ भी वैसी ही हैं—भूखी, बेकाबू और प्रयोगों के लिए हमेशा तैयार। लेकिन जो कुछ मनाली में हुआ, वह किसी भी पिछले अनुभव से कहीं आगे था।
मैं दिल्ली से मनाली गया था, सर्दियों की शुरुआत में। मेरा काम जल्दी खत्म हो गया था इसलिए मैं अपने पुराने कॉलेज फ्रेंड के घर रुका। घर पहाड़ी ढलान पर था, लकड़ी का, ठंडी हवा में साँस लेता हुआ। वहाँ उसकी छोटी बहन निशा रहती थी। उम्र चौबीस। गोरी, लंबी, बाल कंधों तक काले और घने। कॉलेज खत्म करके अब शहर में कोई जॉब ढूँढ रही थी, लेकिन अभी घर पर ही थी। शरीर ऐसा कि जींस में भी कमर साफ नजर आती थी, स्तन भारी और गोल, निप्पल्स ठंड में हमेशा थोड़े तने हुए।
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पहले दिन मैंने सिर्फ देखा। वह किचन में चाय बना रही थी, बैकलेस स्वेटर में। जब मुड़ी तो उसकी पीठ की नाली साफ दिखी। मेरी नजरें उसके शरीर पर चिपक गईं। वह मुझसे ज्यादा बात नहीं करती थी, लेकिन जब करती तो आँखें कुछ सेकंड ज्यादा रुक जातीं। रात को जब सब सो गए, मैं बालकनी में सिगरेट पी रहा था। वह भी आई, कंबल ओढ़े। ठंडी हवा में उसके होंठ काँप रहे थे।
“तुम बहुत देर तक जागते हो,” उसने कहा।
मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “और तुम बहुत जल्दी सो जाती हो।”
उसने कंबल थोड़ा खोला। अंदर सिर्फ एक पतली नाइटी थी। स्तनों का उभार साफ था। मैंने एक कदम बढ़ाया। उसने पीछे नहीं हटी। मेरा हाथ
उसकी कमर पर गया, फिर नीचे। उसने साँस रोकी। मैंने उसके नितंबों को जोर से दबाया। वह सिसकी।
“यह गलत है,” उसने फुसफुसाया, लेकिन उसका शरीर मेरे हाथ में और धँस गया।
मैंने उसके बाल पकड़े और सिर पीछे खींचा। गर्दन पर दाँत गड़ाए। वह काँपी। मेरा दूसरा हाथ उसकी जाँघों के बीच चला गया। पैंटी पहले से गीली थी।
मैंने दो उँगलियाँ अंदर धकेल दीं। वह चिल्लाई, लेकिन मैंने मुँह दबा दिया। उँगलियाँ तेजी से अंदर-बाहर करने लगा। उसकी चूत तंग थी, दीवारें सिकुड़ रही थीं। जब वह आने वाली थी, मैंने उँगलियाँ निकाल लीं। वह अधूरी रह गई, साँसें भारी।
“कल रात,” मैंने कहा, “जब सब सो जाएँ।”
अगले दिन घर खाली था। फ्रेंड ऑफिस गया था, माता-पिता शहर गए हुए। सिर्फ हम दोनों। मैंने दरवाजा बंद किया। निशा बेडरूम में किताब पढ़ रही थी। मैंने उसके पास जाकर किताब छीन ली और फर्श पर फेंक दी। वह उठने वाली थी कि मैंने उसके बाल पकड़कर बिस्तर पर धकेल दिया।
“कपड़े उतार,” मैंने आदेश दिया।
उसने हिचकिचाया। मैंने थप्पड़ मारा—गाल पर जोरदार। लाल निशान पड़ गया। आँखों में पानी आ गया लेकिन उसने स्वेटर उतार दिया। ब्रा के बिना स्तन झूल गए। बड़े, भारी, निप्पल्स गहरे गुलाबी और लंबे। मैंने उन्हें दोनों हाथों से पकड़ा और जोर से निचोड़ा। वह कराह उठी। फिर मैंने एक निप्पल मुँह में लिया और दाँतों से काटा। दर्द में वह चीखी। मैंने और जोर से काटा। खून की एक बूँद निकली। मैंने चाट लिया।
“और उतार,” मैंने कहा।
उसने जींस और पैंटी उतार दी। चूत मुंडाई हुई थी, गुलाबी और चमकदार। मैंने उसे घुटनों के बल करवाया। उसके हाथ पीछे बाँध दिए बेल्ट से। फिर अपना पेंटा खोला। मेरा लंड पहले से ही कठोर था—मोटा, नसों से भरा, सिर चमकता हुआ। मैंने उसे उसके मुँह के सामने रखा।
“चूस।”
उसने हिचकिचाते हुए होंठ खोले। मैंने बाल पकड़कर पूरा लंड उसके गले तक धकेल दिया। वह घुटी, आँसू बहने लगे, लेकिन मैंने बाहर नहीं निकाला। गला सिकुड़ रहा था, लार बह रही थी। मैंने उसके सिर को आगे-पीछे किया। जब वह साँस नहीं ले पा रही थी तब बाहर निकाला। उसने खांसी ली। फिर से धकेल दिया। इस बार और गहरा। उसकी आँखें लाल हो गईं।
मैंने उसे पलट दिया। हाथ अभी भी बँधे थे। मैंने उसके नितंबों पर जोरदार थप्पड़ मारे—एक, दो, पाँच, दस। लाल हो गए, गर्म। फिर मैंने अपनी उँगलियाँ उसकी चूत में धकेलीं—तीन एक साथ। तंग थी। उसने चीख मारी। मैंने चौथी भी अंदर कर दी। उसकी हाइमन पहले ही थोड़ी फटी हुई थी, लेकिन मैंने पूरी तरह फाड़ दी। खून की धार बह निकली। उसने दर्द से काँपते हुए कहा, “रुको… दर्द हो रहा है…”
मैंने नहीं रुका। उँगलियाँ और तेजी से चलाईं। खून और पानी मिला। फिर मैंने अपना लंड उसके होल पर रखा। धीरे नहीं। एक झटके में आधा अंदर कर दिया। वह चीखी। मैंने उसके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया। फिर पूरा धकेल दिया। उसकी चूत फटती हुई महसूस हुई। दीवारें मेरे लंड को काट रही थीं। मैंने बाहर निकाला और फिर जोर से ठोका। हर धक्के पर उसका शरीर आगे सरक रहा था। मैंने उसके बाल पकड़कर खींचे और और गहरा धकेला।
“दर्द सह,” मैंने कहा, “यह तुम्हारा काम है।”
उसने सिर हिलाया, आँसू बह रहे थे, लेकिन उसकी चूत सिकुड़-सिकुड़ कर मेरे लंड को निगल रही थी। मैंने गति बढ़ाई। बिस्तर चरमरा रहा था। उसके नितंबों पर थप्पड़ पड़ रहे थे। जब मैं करीब आया तो बाहर निकालकर उसके मुँह में ठेल दिया। उसने पूरा निगल लिया। गर्म वीर्य उसके गले में गया। कुछ बाहर निकला, मैंने उसके चेहरे पर मल दिया।
रात को फिर से। इस बार मैंने उसे रस्सी से बिस्तर के चारों कोनों से बाँध दिया। पैर फैले हुए, चूत खुली। मैंने मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम उसकी छाती पर गिराया। वह तड़पी। फिर निप्पल्स पर। फिर पेट पर। फिर चूत के ऊपर। दर्द में वह रो रही थी लेकिन गीली भी हो रही थी। मैंने उसके क्लिट पर ठंडी बर्फ रखी, फिर गर्म मोम। उसके शरीर में ऐंठन दौड़ गई।
फिर मैंने उसे डॉगी स्टाइल में लिया। इस बार गांड में। पहले उँगली, फिर दो, फिर लंड का सिर। वह चिल्लाई। मैंने धीरे-धीरे पूरा अंदर धकेला। तंग, गर्म, खून मिला। मैंने जोर से ठोकना शुरू किया। हर धक्के पर उसका शरीर काँप रहा था। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और कान में कहा, “तुम मेरी हो। सिर्फ मेरी। जब चाहूँ इस्तेमाल करूँगा।”
उसने सिर हिलाया। आँसू और लार मिलाकर। मैंने पूरा वीर्य उसकी गांड में छोड़ दिया। फिर निकाला और चूत में फिर से डाल दिया। वह अब दर्द और मजे के बीच में थी। जब आई तो उसके शरीर में बिजली दौड़ गई, चूत मेरे लंड को इतनी जोर से निचोड़ा कि मुझे भी रोकना मुश्किल हो गया।
अगले तीन दिन घर में सिर्फ हम दोनों थे। मैंने उसे हर जगह लिया—किचन की काउंटर पर, बालकनी में ठंडी हवा में नंगी, शावर में दीवार से सटाकर। कभी उसके मुँह में कपड़ा ठूँसकर, कभी आँखों पर पट्टी बाँधकर। कभी उसके स्तनों पर क्लैंप लगाकर, कभी चूत में वाइब्रेटर डालकर छोड़ दिया घंटों के लिए। वह रोती थी, भीख माँगती थी, फिर खुद ही मेरे पास आती थी।
एक रात मैंने उसे कुर्सी पर बिठाया, पैर बाँधे, और उसके सामने बैठकर अपना लंड हिलाया। जब वीर्य निकला तो उसके चेहरे, बालों, स्तनों पर गिरा। उसने चाटा। फिर मैंने उसे फर्श पर घुटनों के बल करवाया और पीछे से फिर से लिया—इस बार इतनी बर्बरता से कि उसके घुटने छिल गए, चूत सूज गई, लेकिन वह रुकने को नहीं कह रही थी।
जब मेरे फ्रेंड लौटे, हमने साफ किया। निशा अब मुझसे आँख मिलाती है तो उसके अंदर वही भूख दिखती है। वह शादीशुदा नहीं है अभी, लेकिन जब भी मौका मिलता है—दिल्ली में या मनाली में—वह मेरे पास आती है। और हर बार मैं उसे तोड़ता हूँ। कभी धीरे, कभी इतनी क्रूरता से कि उसके शरीर पर निशान हफ्तों तक रहते हैं। वह सहती है। बल्कि माँगती है।
मैं दिल्ली लौट आया था, लेकिन निशा का शरीर मेरे दिमाग से नहीं निकला। उसके सूजे हुए निप्पल्स, फटी हुई चूत, खून से सनी गांड—सब याद थे। तीन हफ्ते बाद उसने खुद मैसेज किया। “मैं आ रही हूँ। तैयार रहना।”
वह रात ग्यारह बजे मेरे फ्लैट पहुँची। दरवाजा खोला तो वह काले कोट में खड़ी थी। कोट के नीचे कुछ नहीं। सिर्फ गर्दन में एक पतली चेन और कलाई पर चमड़े के कफ। आँखों में वही भूख थी जो मनाली में देखी थी।
मैंने उसे अंदर खींचा और कोट फर्श पर गिरा दिया। उसका शरीर ठंडा था। मैंने उसके बाल पकड़कर दीवार से सटा दिया। मुँह उसके गले पर लगाया और दाँत गड़ा दिए। उसने सिसकी ली। मैंने और जोर से काटा। खून की धार निकली। मैंने चाटा और फिर उसके निप्पल को मुँह में लेकर इतना जोर से चूसा कि वह काँपने लगी।
“घुटनों पर,” मैंने कहा।
वह फर्श पर बैठ गई। मैंने अपना पेंटा खोला। लंड पहले से कठोर था—नसों से भरा, सिर चमकता हुआ। मैंने उसके बाल पकड़कर मुँह में ठेल दिया। पूरा। गले तक। वह घुटी, आँसू बहे, लेकिन मैंने बाहर नहीं निकाला। उसके नाक से साँस लेते हुए मैंने सिर आगे-पीछे किया। जब वह नीली पड़ने लगी तब बाहर निकाला। लार की धार उसके ठोड़ी से स्तनों तक बह रही थी।
मैंने उसे उठाया और बेडरूम में ले गया। बिस्तर के सिरहाने पहले से रस्सियाँ बँधी थीं। मैंने उसके हाथ ऊपर बाँध दिए, पैर फैलाकर टखनों से बाँध दिए। चूत पूरी तरह खुली। मैंने मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम उसकी छाती पर गिराया। वह तड़पी। फिर निप्पल्स पर—सीधा। दर्द में वह चीखी। मैंने मुँह दबा दिया। फिर पेट पर, जाँघों पर, और आखिर में चूत के ऊपर। गर्म मोम उसके क्लिट पर गिरा। उसके शरीर में ऐंठन दौड़ गई।
मैंने ठंडी बर्फ का टुकड़ा लिया और उसके क्लिट पर रगड़ा। फिर गर्म मोम। फिर बर्फ। वह रो रही थी, लेकिन चूत से पानी बह रहा था। मैंने तीन उँगलियाँ एक साथ अंदर धकेल दीं। तंग थी। दीवारें सिकुड़ रही थीं। मैंने चौथी भी अंदर कर दी। खून की धार फिर निकली। उसने दर्द से काँपते हुए कहा, “रुको… बहुत हो रहा है…”
मैंने नहीं रुका। उँगलियाँ और तेजी से चलाईं। फिर अपना लंड उसके होल पर रखा। एक झटके में पूरा अंदर। वह चीखी। मैंने उसके मुँह में अंडरवियर ठूँस दिया। फिर ठोकना शुरू किया—जोरदार, गहरा, बिना रुकے۔ हर धक्के पर उसका शरीर आगे सरक रहा था। रस्सियाँ खिंच रही थीं। मैंने उसके स्तनों को पकड़कर निचोड़ा, निप्पल्स को मोड़ा। दर्द और मजे के बीच वह तड़प रही थी।
जब मैं करीब आया तो बाहर निकालकर उसके चेहरे पर वीर्य छोड़ दिया। आँखों में, बालों में, मुँह में। उसने चाटा। फिर मैंने उसे खोल दिया और कुर्सी पर बिठाया। पैर बाँधे, हाथ पीछे। मैंने वाइब्रेटर उसकी चूत में डाल दिया और चालू कर दिया—सबसे तेज स्पीड पर। वह तड़पने लगी। मैंने उसके निप्पल्स पर क्लैंप लगा दिए। चेन खींचकर जोर से खींचा। वह चिल्लाई। वाइब्रेटर अंदर घूम रहा था। मैंने उसे आधे घंटे तक ऐसे ही छोड़ दिया। वह तीन बार आई, हर बार जोर से, शरीर काँपता हुआ। चौथी बार जब आने वाली थी, मैंने वाइब्रेटर निकाल लिया। अधूरी रह गई। आँसू बह रहे थे।
“भीख माँग,” मैंने कहा।
उसने फुसफुसाया, “कृपया… अंदर डालो… मुझे चाहिए…”
मैंने उसे फर्श पर घुटनों के बल करवाया। गांड ऊपर। मैंने पहले उँगली डाली, फिर दो, फिर तीन। फिर अपना लंड। धीरे नहीं। एक झटके में पूरा। वह चिल्लाई। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और ठोकना शुरू किया।
हर धक्के पर उसके नितंबों पर थप्पड़। लाल हो गए। मैंने और जोर से मारा। निशान पड़ गए। उसकी गांड तंग थी, खून मिला हुआ। मैंने पूरा वीर्य अंदर छोड़ दिया। फिर निकाला और चूत में फिर से डाल दिया। इस बार और बर्बरता से। बिस्तर नहीं, फर्श पर। उसके घुटने छिल गए, कोहनियाँ खरोंच गईं। वह रो रही थी लेकिन हिप्स पीछे धकेल रही थी।
रातभर चलता रहा। कभी उसके मुँह में, कभी चूत में, कभी गांड में। कभी मैंने उसके स्तनों को रस्सी से बाँधा और खींचा। कभी उसके क्लिट पर क्लैंप लगाया और छोड़ दिया। सुबह जब वह उठी तो शरीर पर नीले-काले निशान थे। चूत सूजी हुई, गांड लाल, निप्पल्स कटे हुए। उसने दर्पण में देखा और मुस्कुराई।
“फिर से,” उसने कहा।
मैंने उसे शावर में ले जाकर दीवार से सटा दिया। ठंडे पानी के नीचे। लंड फिर से कठोर। मैंने उसके पैर उठाए और एक झटके में अंदर कर दिया। पानी बह रहा था, खून बह रहा था, वीर्य बह रहा था। मैंने उसके गले पर हाथ रखा और हल्का दबाया। उसकी आँखें लाल हो गईं। मैंने और जोर से ठोका। जब आई तो उसके शरीर में बिजली दौड़ गई। मैंने भी उसी समय उसके अंदर छोड़ दिया।
दोपहर तक वह चल नहीं पा रही थी। मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया, पैर फैलाए, और बर्फ के टुकड़े उसकी चूत में डाल दिए। वह तड़पी। फिर गर्म तेल। फिर अपनी उँगलियाँ। फिर लंड। इस बार मैंने उसे मिशनरी में लिया, आँखों में आँखें डालकर। हर धक्के पर उसके स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। मैंने निप्पल्स को दाँतों से पकड़ा और खींचा। खून निकला। उसने आँसू पोंछते हुए कहा, “और जोर से… मुझे तोड़ दो…”
मैंने तोड़ दिया। रस्सियों से बाँधा, आँखों पर पट्टी, मुँह में गेंद। फिर उसके शरीर पर मोम, क्लैंप, थप्पड़, चाबुक। चाबुक के निशान उसकी पीठ, नितंबों, जाँघों पर पड़ गए। खून की पतली धारें। मैंने चाटा। फिर लंड उसकी फटी हुई चूत में डालकर इतनी बर्बरता से ठोका कि बिस्तर की लकड़ी चरमरा गई। वह चीख नहीं सकती थी। सिर्फ शरीर तड़प रहा था।
जब वीर्य निकला तो मैंने उसके मुँह की गेंद हटाई और पूरा उसके गले में ठेल दिया। उसने निगल लिया। आँसू और लार मिलाकर।
शाम को जब वह जाने वाली थी, मैंने उसके कलाई पर चमड़े का कफ बाँध दिया। “यह याद रहे,” मैंने कहा, “तुम मेरी हो। जब चाहूँ बुलाऊँगा। और हर बार पहले से ज्यादा तोड़ूँगा।”
उसने सिर हिलाया। आँखों में डर था, लेकिन भूख ज्यादा। दरवाजे पर खड़ी होकर उसने कहा, “अगली बार… और क्रूर बनना।”
मैंने दरवाजा बंद किया। उसके शरीर की महक अभी भी कमरे में थी—पसीना, खून, वीर्य, मोम। मैं जानता था कि यह खत्म नहीं हुआ। यह तो शुरुआत थी। निशा अब सिर्फ एक लड़की नहीं थी। वह मेरी चीज थी। जिसे जब चाहूँ इस्तेमाल करूँ, तोड़ूँ, फिर से जोड़ूँ। और वह खुद माँगती रहेगी। क्योंकि कुछ भूखें इतनी गहरी होती हैं कि दर्द ही उनका खाना बन जाता है।
माँ की दोनों छेदों की बर्बर लूट