अजय रेखा की साँसें रोकता है, मुट्ठी गांड में धकेलता है, निप्पल क्लिप से चीरता है। खून-लार मिला वीर्य उसके गले में उतरता है। शादीशुदा औरत खुद को रंडी बनाकर बार-बार टूटने आती है। हर रात और क्रूर।
रात के अँधेरे में जयपुर की बाहरी बायपास सड़क पर अजय की काली एसयूवी तेज़ी से भाग रही थी। अजय की उम्र 26 साल थी। लंबा-चौड़ा कद, कसी हुई मांसपेशियाँ, साँवला लेकिन चमकदार रंग, और नीचे 8.2 इंच का मोटा, नसों से भरा लंड जो हमेशा आधे-अधूरे खड़े रहने की आदत रखता था। वह उदयपुर से जयपुर लौट रहा था।
उसके साथ सीट पर बैठी थी रेखा — उम्र 38 साल, लेकिन जिस्म ऐसा कि 30 का भी न लगे। गोरा रंग, भारी-भरकम 38 साइज़ के गोल-मटोल स्तन, पतली कमर, और विशाल, मुलायम, हिलती-डुलती गांड। रेखा जयपुर के एक बड़े बिल्डर की बीवी थी, लेकिन पति हमेशा बाहर रहता था। आज वह अपने मायके से लौट रही थी और अजय के पिता के पुराने दोस्त की सिफारिश पर अजय उसे छोड़ने जा रहा था।
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शुरुआत में बातें मामूली थीं। लेकिन रेखा की नज़र बार-बार अजय की जांघों पर टिक जाती। अजय ने जानबूझकर अपनी जीन्स के ज़िप को थोड़ा खुला रखा था। रेखा की साँसें भारी होने लगीं। अचानक रेखा ने हाथ बढ़ाकर अजय की जांघ दबाई।
“इतना बड़ा है क्या नीचे?” उसकी आवाज़ में भूख थी।
अजय ने हँसते हुए कार की स्पीड घटाई और एक सुनसान सर्विस रोड पर मोड़ लिया। पेड़ों के घने झुरमुट में कार रोक दी। हेडलाइट बंद की। अंधेरा छा गया।
“उतार,” अजय ने सीधा आदेश दिया। कोई मिठास नहीं, सिर्फ हुक्म।
रेखा काँप उठी, लेकिन उसकी आँखों में उत्तेजना चमक उठी। उसने अपनी काली साड़ी का पल्लू गिराया। ब्लाउज के हुक खोले। 38 साइज़ के भारी स्तन बाहर आ गए — बड़े, सख्त निप्पल, हल्के भूरे रंग के। अजय ने एक हाथ से उसके बाल पकड़े और ज़ोर से पीछे खींचे।
“मुँह खोल।”
रेखा ने मुँह खोला। अजय ने अपनी जीन्स और अंडरवियर एक झटके में नीचे सरकाए। 8.2 इंच का मोटा, गरम लंड बाहर निकला। रेखा की आँखें फटी रह गईं। अजय ने उसके मुँह में लंड ठूंस दिया — पूरा नहीं, आधा। रेखा की आँखों में आँसू आ गए। अजय ने उसके बाल और ज़ोर से पकड़े और धक्के मारने लगा। गला भर गया। रेखा की लार टपकने लगी। अजय ने और गहराई तक धकेला। रेखा की साँसें रुकने लगीं, लेकिन अजय नहीं रुका। वह उसके मुँह को सिर्फ एक छेद की तरह इस्तेमाल कर रहा था।
“चूस, और ज़ोर से। दाँत लगाए तो मुँह तोड़ दूँगा।”
रेखा ने आँखें बंद करके चूसा। गला घुट रहा था, लेकिन वह रुक नहीं रही थी। अजय ने दस मिनट तक उसके मुँह को बर्बरता से इस्तेमाल किया। फिर अचानक लंड बाहर निकाला। रेखा हाँफ रही थी, आँसू और लार से चेहरा भीगा हुआ।
अजय ने पीछे की सीट खोल दी। “पेट के बल लेट। गांड ऊपर।”
रेखा ने वैसा ही किया। अजय ने उसकी साड़ी ऊपर की और पैंटी फाड़ दी। विशाल, गोल गांड सामने थी। अजय ने एक जोर का थप्पड़ मारा। रेखा चिल्लाई। दूसरा थप्पड़ और ज़ोर का। गांड लाल हो गई। अजय ने दोनों गालों को फैलाया और थूक लगाकर अपनी उंगली उसकी गांड की सूखी छेद में धकेल दी। रेखा दर्द से चीखी।
“चुप। दर्द सह। तूने खुद माँगा था।”
उंगली अंदर-बाहर होने लगी। फिर दो उंगलियाँ। रेखा की आवाज़ दब गई। अजय ने थूक और रेखा की ही चूत का रस लेकर उसकी गांड को गीला किया। फिर अपना लंड उसकी गांड पर टिकाया।
“अब रो मत।”
एक क्रूर धक्के के साथ आधा लंड उसकी गांड में घुस गया। रेखा की चीख कार के शीशे तोड़ने वाली थी। अजय ने रुककर नहीं देखा। पूरा लंड अंदर धकेल दिया। रेखा का शरीर काँप रहा था। अजय ने उसके बाल पकड़े और कुत्ते की तरह उसकी गांड चुदाने लगा। हर धक्का निर्दयी था। गांड की दीवारें फटने वाली थीं। रेखा रो रही थी, लेकिन उसकी चूत पानी छोड़ रही थी।
अजय ने बीस मिनट तक उसकी गांड बर्बरता से चोदी। फिर लंड बाहर निकाला। रेखा की गांड से खून की हल्की धार टपक रही थी। अजय ने उसे पलट दिया।
“अब चूत।”
रेखा की चूत पहले से गीली थी। अजय ने बिना किसी तैयारी के पूरा लंड एक झटके में अंदर घुसा दिया। रेखा फिर चिल्लाई। अजय ने उसके दोनों पैर अपने कंधों पर रखे और पूरे वजन के साथ धक्के मारने लगा। हर धक्के पर रेखा का शरीर हिलता। स्तन उछल रहे थे। अजय ने दोनों निप्पलों को ज़ोर से मरोड़ा। रेखा दर्द और मज़े के मिश्रण में पागल हो रही थी।
“बोल, तू क्या है?”
“मैं… मैं तुम्हारी कुतिया हूँ…” रेखा ने सिसकते हुए कहा।
“और ज़ोर से।”
“मैं तुम्हारी रंडी हूँ! मेरी गांड और चूत दोनों तुम्हारी हैं!”
अजय ने और तेज़ चुदाई की। फिर अचानक रुक गया। लंड बाहर निकाला। रेखा हताश नज़रों से देखने लगी। अजय ने अपनी बेल्ट निकाली और रेखा के दोनों हाथों को कार की सीट के हेडरेस्ट से बाँध दिया। फिर उसकी आँखों पर अपनी टी-शर्ट बाँध दी। अंधेरा।
अब अजय ने धीरे-धीरे खेल शुरू किया। कभी लंड उसकी चूत के मुँह पर रगड़ता, कभी अचानक अंदर घुसा देता। रेखा हर बार चीखती। अजय ने अपनी उंगलियाँ उसकी गांड में डाल रखीं और चूत में लंड। दोनों छेद एक साथ भरे हुए। रेखा पागल हो रही थी।
“कृपया… मुझे झड़ने दो…”
“जब मैं कहूँगा तब।”
अजय ने उसकी चूत से लंड निकाला और फिर से मुँह में ठूंस दिया। रेखा की आँखों पर पट्टी थी, हाथ बँधे थे। वह सिर्फ मुँह से काम कर सकती थी। अजय ने उसके गले तक लंड धकेला और रोके रखा। रेखा की साँसें पूरी तरह रुक गईं। दस सेकंड… पंद्रह… फिर अजय ने बाहर निकाला। रेखा खाँसते हुए साँस लेने लगी।
अजय ने फिर उसकी चूत में लंड घुसाया। इस बार गति इतनी तेज़ थी कि कार हिल रही थी। रेखा की चीखें और सिसकियाँ एक हो गई थीं। अजय ने उसके गले पर हाथ रखा और हल्का दबाया। रेखा की आँखें पट्टी के नीचे फटी हुई थीं। साँस कम पड़ रही थी, लेकिन चूत और ज़ोर से सिकुड़ रही थी।
अचानक रेखा का शरीर ऐंठ गया। वह जोर से काँपी और झड़ गई। उसकी चूत से पानी की धार छूटी। अजय नहीं रुका। वह उसके ऑर्गेज्म के दौरान और तेज़ चुदाई करता रहा। रेखा की आवाज़ अब सिर्फ रोने जैसी रह गई थी।
अजय ने लंड बाहर निकाला, पट्टी हटाई, और रेखा के मुँह में फिर से ठूंस दिया। इस बार वह खुद झड़ने वाला था। रेखा की आँखों में आँसू थे, लेकिन उसने मुँह खोले रखा। अजय ने उसके बाल पकड़े और अंतिम धक्कों के साथ उसके गले में वीर्य छोड़ दिया। इतना ज्यादा कि रेखा निगल नहीं पाई। वीर्य उसके मुँह से बाहर निकलकर गर्दन और स्तनों पर बहने लगा।
अजय ने लंड बाहर निकाला। रेखा हाँफ रही थी। अजय ने उसके हाथ खोले। रेखा तुरंत उसके पैरों पर गिर पड़ी और लंड को चाटने लगी — सफाई करने की मुद्रा में। अजय ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“अच्छी कुतिया।”
रेखा ने सिर उठाया। आँखों में अभी भी आँसू थे, लेकिन मुस्कान भी थी।
“और… और करो,” उसने फुसफुसाया।
अजय ने हँसकर सिर हिलाया। “रात अभी बाकी है।”
उसने कार फिर से स्टार्ट की। रेखा अभी भी नंगी थी, सिर्फ साड़ी का टुकड़ा शरीर पर लपेटे हुए। अजय ने उसे आगे की सीट पर बिठाया और खुद ड्राइव करने लगा। लेकिन उसकी एक हाथ रेखा की चूत में था — उंगलियाँ अंदर-बाहर कर रहा था। रेखा बार-बार काँप रही थी।
जयपुर शहर में प्रवेश करते समय अजय ने एक पुराने गेस्ट हाउस में कमरा लिया। कमरे में घुसते ही उसने रेखा को दीवार से सटाया और फिर से उसकी गांड में लंड घुसा दिया। इस बार खड़े-खड़े। रेखा की चीखें दीवारों से टकरा रही थीं। अजय ने उसके बाल पकड़कर आईने के सामने किया।
“देख अपने को। कैसी लग रही है।”
रेखा ने आईने में देखा — चेहरा लार और आँसुओं से भीगा, स्तन पर दांतों के निशान, गांड लाल और सूजी हुई, चूत से पानी टपक रहा। अजय उसके पीछे बर्बरता से धक्के मार रहा था।
रात भर यह सिलसिला चला। कभी बिस्तर पर, कभी फर्श पर, कभी बाथरूम में। अजय ने रेखा को बाँधा, थप्पड़ मारे, गला दबाया, दोनों छेद एक साथ भरे, और बार-बार उसके मुँह में वीर्य छोड़ा। रेखा हर बार और माँगती रही।
सुबह चार बजे जब अजय थककर लेटा, रेखा उसके सीने पर लेटी हुई उसके लंड को धीरे-धीरे चाट रही थी।
“अगली बार और सख्त करना,” उसने फुसफुसाया। “मुझे तोड़ना।”
अजय ने उसकी ठोड़ी उठाई और आँखों में देखा।
“तू अब मेरी है। जब बोलूँगा, आना होगा। नहीं आई तो खुद आकर खींचकर ले जाऊँगा।”
रेखा ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में डर और दीवानगी दोनों थे।
सूरज निकलने से पहले अजय ने उसे उसके घर के पास छोड़ दिया। रेखा गाड़ी से उतरते समय काँप रही थी। चलना मुश्किल हो रहा था। लेकिन जाते-जाते उसने मुड़कर देखा और होंठ चाटे।
अजय ने गाड़ी स्टार्ट की और धीरे-धीरे गली से निकल गया। रेखा अभी भी पीछे खड़ी थी, साड़ी ठीक करते हुए, लेकिन उसकी चाल में लंगड़ापन साफ दिख रहा था। गांड और चूत दोनों अभी भी जल रही थीं। अजय ने रियरव्यू मिरर में उसे देखा और मुस्कुराया। खेल खत्म नहीं हुआ था। यह तो सिर्फ पहला राउंड था।
दो दिन बाद रात के ग्यारह बजे अजय का फोन बजा। स्क्रीन पर रेखा का नंबर चमक रहा था। उसने पिक अप किया तो दूसरी तरफ से सिर्फ भारी साँसें सुनाई दीं।
“बोल,” अजय ने ठंडे स्वर में कहा।
“मैं… मैं आ नहीं सकती घर से। पति आज रात घर है,” रेखा की आवाज़ काँप रही थी।
“तो फिर फोन क्यों किया?”
“क्योंकि… क्योंकि मेरी चूत जल रही है। तुम्हारे बिना। मुझे दर्द चाहिए। कृपया…”
अजय ने हँसते हुए कहा, “कल दोपहर दो बजे पुराने गेस्ट हाउस के कमरा नंबर 7 में आना। देर हुई तो सजा और बढ़ेगी।”
अगले दिन रेखा ठीक दो बजे कमरे में दाखिल हुई। उसने साधारण सलवार कमीज पहनी थी, लेकिन अंदर कुछ नहीं था। अजय कमरे में पहले से मौजूद था। दरवाजा बंद होते ही उसने रेखा के बाल पकड़कर दीवार से सटा दिया।
“कपड़े उतार। सब।”
रेखा ने तेजी से कपड़े उतारे। नंगी खड़ी थी। अजय ने उसकी जाँच की — स्तनों पर अभी भी पिछले दांतों के हल्के निशान, गांड पर थप्पड़ों के निशान फीके पड़ चुके थे। अजय ने बेल्ट निकाली और रेखा के दोनों हाथों को पीठ के पीछे बाँध दिया। फिर उसकी आँखों पर काला कपड़ा बाँधा।
“अब तू सिर्फ सुनेगी और सहेगी।”
अजय ने रेखा को बिस्तर पर पेट के बल लिटाया। उसके पैर फैलाए और दोनों टखनों को बिस्तर के पायों से बाँध दिया। रेखा पूरी तरह फैली हुई, बेबस। अजय ने ठंडा लुब्रिकेंट उसकी गांड की छेद पर डाला। फिर बिना किसी चेतावनी के दो उंगलियाँ अंदर धकेल दीं। रेखा चिल्लाई। अजय ने उंगलियों को घुमाते हुए और गहराई तक पहुँचाया, फिर तीसरी उंगली जोड़ दी। रेखा की गांड फैल रही थी, दर्द से उसका शरीर ऐंठ रहा था।
“शांत रह। वरना और डालूँगा।”
अजय ने चार उंगलियाँ अंदर कर दीं। रेखा की चीख दब गई। अजय ने मुट्ठी बंद करके धीरे-धीरे गांड में घुसाना शुरू किया। रेखा रो पड़ी। आँसू आँखों की पट्टी भिगो रहे थे। अजय की मुट्ठी आधी अंदर तक पहुँच चुकी थी। वह रुका नहीं। पूरी मुट्ठी अंदर धकेल दी। रेखा का शरीर काँप रहा था, साँसें रुक-रुक कर आ रही थीं। अजय ने मुट्ठी को अंदर-बाहर करना शुरू किया — धीरे, फिर तेज। रेखा की गांड अब खुली हुई गुफा जैसी लग रही थी।
बीस मिनट बाद अजय ने मुट्ठी निकाली। रेखा की गांड से लुब्रिकेंट और हल्का खून मिला हुआ रस बह रहा था। अजय ने तुरंत अपना 8.2 इंच का मोटा लंड उसकी गांड में धकेल दिया। पूरा एक झटके में। रेखा की चीख कमरे में गूँज उठी। अजय ने उसके बाल पकड़े और कुत्ते की तरह बर्बरता से चुदाने लगा। हर धक्का इतना जोरदार था कि बिस्तर की कराह सुनाई दे रही थी। रेखा की आवाज़ अब सिर्फ अस्पष्ट सिसकियों में बदल चुकी थी।
अजय ने अचानक लंड बाहर निकाला, रेखा को पलटा, आँखों की पट्टी हटाई और उसके मुँह में लंड ठूंस दिया। रेखा की आँखें अभी भी आँसुओं से भरी थीं। अजय ने उसके गले तक लंड धकेला और रोके रखा। रेखा की साँसें पूरी तरह बंद हो गईं। तीस सेकंड… चालीस… रेखा का चेहरा लाल हो गया, आँखें फटी हुईं। अजय ने बाहर निकाला।
रेखा जोर-जोर से खाँसते हुए साँस लेने लगी, लेकिन अजय ने फिर से लंड मुँह में डाल दिया और वीर्य की पहली धार उसके गले में छोड़ दी। रेखा निगल नहीं पाई। वीर्य मुँह से बाहर निकलकर ठोड़ी और गर्दन पर बहने लगा।
अजय ने रेखा के हाथ खोले लेकिन पैर अभी भी बँधे थे। उसने रेखा की चूत पर थूका और बिना किसी कोमलता के पूरा लंड अंदर घुसा दिया। रेखा फिर चिल्लाई। अजय ने उसके गले पर हाथ रखा और हल्का दबाते हुए चुदाई शुरू की। रेखा की आँखें भय और उत्तेजना से फटी हुई थीं। अजय की उंगलियाँ उसके गले पर दबाव बढ़ाती जा रही थीं। रेखा की साँसें कम पड़ रही थीं, लेकिन उसकी चूत अजय के लंड को और जोर से सिकोड़ रही थी।
“झड़ना मत,” अजय ने हुक्म दिया। “जब तक मैं न कहूँ।”
लेकिन रेखा का शरीर उसके काबू में नहीं था। वह जोर से काँपी और झड़ गई। उसकी चूत से पानी की धार छूटी, बिस्तर गीला हो गया। अजय ने गुस्से में उसके गाल पर जोर का थप्पड़ मारा।
“अवज्ञा की सजा।”
अजय ने लंड बाहर निकाला, रेखा के पैर खोले और उसे खड़ा किया। फिर कमरे के कोने में रखे लकड़ी के छोटे स्टूल पर उसे बैठाया। रेखा की गांड अभी भी खुली और दर्द कर रही थी। अजय ने उसके दोनों हाथों को फिर से बाँधा और उसके स्तनों पर क्लिप्स लगा दिए — छोटे-छोटे मेटल क्लिप्स जो निप्पलों को कसकर दबा रहे थे। रेखा दर्द से चीखी। अजय ने क्लिप्स की चेन खींचकर और कस दिया।
फिर उसने रेखा की चूत में एक मोटा, नसों वाला डिल्डो धकेल दिया — अपने लंड से भी थोड़ा मोटा। रेखा की आँखें फटी रह गईं। अजय ने डिल्डो को अंदर छोड़ दिया और खुद उसके मुँह में अपना लंड डालकर फिर से बर्बरता से मुँह चुदाने लगा। रेखा के गले से अजीब आवाजें निकल रही थीं। अजय ने उसके बाल पकड़े और अंतिम धक्कों के साथ दूसरी बार उसके मुँह में वीर्य छोड़ दिया। इस बार रेखा ने पूरा निगलने की कोशिश की, लेकिन आधा बाहर निकल गया।
अजय ने डिल्डो निकाला। रेखा की चूत अब पूरी तरह खुली और लाल थी। अजय ने उसे बिस्तर पर लिटाया, उसके पैर कंधों तक उठाए और फिर से अपनी गांड में लंड घुसा दिया। इस बार वह और निर्दयी था। हर धक्के के साथ रेखा की चीखें तेज होती जा रही थीं। अजय ने उसके निप्पलों के क्लिप्स को खींच-खींचकर मरोड़ा। रेखा रो रही थी, लेकिन उसकी चूत फिर से गीली हो रही थी।
रात के तीन बजे तक अजय ने रेखा के दोनों छेदों को बारी-बारी से बर्बाद किया। बीच-बीच में वह उसे थप्पड़ मारता, गला दबाता, बाल खींचता और उसके मुँह में थूकता। रेखा हर बार “और” माँगती रही। आखिरकार जब अजय थककर बिस्तर पर लेटा तो रेखा उसके पैरों के पास घुटनों के बल बैठ गई और उसके लंड को चाटने लगी — सफाई की मुद्रा में, आँखों में अभी भी आँसू और दीवानगी।
“अगली बार और कुछ नया करना,” रेखा ने फुसफुसाते हुए कहा। “मुझे पूरी तरह तोड़ना। मैं सह लूँगी।”
अजय ने उसका चेहरा ऊपर उठाया और आँखों में देखा।
“तू अब सिर्फ मेरी रंडी है। जब बोलूँगा, आना होगा। इनकार किया तो खुद आकर तेरे पति के सामने खींचकर ले जाऊँगा।”
रेखा ने सिर हिलाया। उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“मैं आऊँगी… हमेशा।”
सुबह होते-होते अजय ने रेखा को फिर से नहलाया, कपड़े पहनाए और गेस्ट हाउस से बाहर निकाला। गाड़ी में बैठते समय रेखा की गांड अभी भी जल रही थी। अजय ने उसका हाथ अपनी जांघ पर रखा और जोर से दबाया।
“अगली मुलाकात तीन दिन बाद। तब तक अपनी चूत और गांड में कुछ मत डालना। सिर्फ मेरे लिए खुली रखना।”
रेखा ने सिर हिलाया। आँखों में डर था, लेकिन उससे कहीं ज्यादा भूख थी।
अजय ने गाड़ी स्टार्ट की। रियरव्यू मिरर में रेखा को देखता रहा जब तक वह गली के मोड़ पर गायब नहीं हो गई। उसकी मुस्कान और गहरी हो गई।
खेल अब और गहरा होने वाला था। अगली बार सिर्फ शरीर नहीं, उसकी पूरी हस्ती तोड़नी थी। और रेखा खुद उसके लिए तैयार खड़ी थी।
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