शहर की अंधेरी खिड़की पर खड़ा शैतान

काव्या की अकेली रातें टूट गईं जब जहाजी विक्रम फिर से दरवाजे पर खड़ा हुआ। रस्सियाँ, गला दबाना, गर्म मोम और बेबस शरीर की चीखें… इस बार वह छोड़ने वाला नहीं था। हर साँस दर्द बन गई।

नमस्कार दोस्तों, मेरा नाम काव्या है। आज मैं आपको अपनी जिंदगी की वो रातें सुना रही हूँ जो अब भी मेरे शरीर में आग की तरह जलती हैं। वो घटनाएँ इतनी कड़वी, इतनी क्रूर और इतनी गहरी थीं कि याद करते ही मेरी जाँघें काँपने लगती हैं।

उस साल मैं 23 साल की थी। मेरे पिता की ट्रांसफर हो गई थी छोटे शहर से एक दूरदराज के पहाड़ी इलाके में। माँ-बाप दोनों सरकारी अस्पताल में ड्यूटी पर थे, भाई की परीक्षाएँ चल रही थीं। दीवाली के आसपास घर खाली पड़ने वाला था। तभी मेरी मौसी नीलिमा ने फोन किया। उनकी उम्र 41 साल थी, पति विक्रम 45 के। विक्रम मर्चेंट नेवी में कैप्टन थे—6 फुट 2 इंच लंबे, चौड़े कंधे, काली घनी दाढ़ी, और शरीर ऐसा कि कोई भी औरत एक नजर में गीली हो जाए। वो साल में आठ महीने समुद्र पर रहते थे और चार महीने घर।

मौसी का परिवार भी उसी पहाड़ी इलाके के पास एक पुराने बंगले में जा रहा था। मौसी ने कहा, “काव्या, तू भी हमारे साथ चल। वहाँ हवा साफ है, आराम मिलेगा।” मैं राजी हो गई। उनके बेटे रोहन की उम्र मेरे बराबर ही थी—23। हम दोनों अच्छे दोस्त थे।
बंगला पुराना था। पीछे की तरफ नौकर रमेश और उसकी नई दुल्हन सीमा का छोटा सा कमरा था। सीमा 22 साल की, गोरी, भरी हुई छातियाँ, पतली कमर। रमेश को अचानक अपने गाँव में पिता की बीमारी का फोन आ गया। वो चला गया। सीमा अकेली रह गई। दो दिन बाद मौसी और रोहन को मौसी की देवरानी की गोदभराई के लिए पास के कस्बे जाना था। विक्रम और मैं बंगले पर रुक गए। सीमा भी थी।

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पहली रात सब शांत रहा। दूसरी रात करीब एक बजे मेरी आँख खुली। विक्रम बिस्तर पर नहीं थे। किचन की तरफ गई तो देखा—सीमा के कमरे की खिड़की से हल्की रोशनी और धीमी आवाजें आ रही थीं। मैं चुपके से खिड़की के पास गई। अंदर विक्रम पूरी तरह नंगे, सीमा को चटाई पर पेट के बल लिटाए हुए थे। उनके मोटे, लंबे, काले लंड को सीमा की तंग गांड में जबरदस्ती घुसाए हुए थे। सीमा की आँखों में आँसू थे, मुँह में कपड़ा ठूंस रखा था। विक्रम उसके बाल पकड़कर पीछे खींच रहे थे और जोर-जोर से धक्के मार रहे थे। हर धक्के पर सीमा की छातियाँ फर्श पर रगड़ खा रही थीं।

“चुप… वरना सब सुन लेंगे,” विक्रम फुसफुसा रहे थे। सीमा की गांड लाल हो चुकी थी। विक्रम ने एक हाथ से उसकी गर्दन दबाई और दूसरे से उसके गाल पर थप्पड़ मारे। फिर उन्होंने अपना लंड बाहर निकाला, सीमा को पलट दिया और उसके मुँह में जबरदस्ती घुसा दिया। सीमा घुट रही थी, लेकिन विक्रम उसके सिर को दोनों हाथों से पकड़कर अपनी कमर हिला रहे थे। थूक और आँसू सीमा के चेहरे पर बह रहे थे।
मैं वहीं खड़ी देख रही थी। मेरी साँसें तेज हो गई थीं। विक्रम ने अचानक सिर उठाया और मेरी तरफ देखा। हमारी नजरें मिलीं। मैं भागकर अपने कमरे में चली गई और सोने का नाटक करने लगी।

आधे घंटे बाद विक्रम आए। बिस्तर पर लेटे और मेरी तरफ मुड़े। “देख लिया ना?” उनकी आवाज ठंडी थी। मैं चुप रही। उन्होंने मेरा कंबल खींच लिया। मैंने विरोध किया तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर मोड़ दिया। दर्द से मेरी आँखें भर आईं।
“चिल्लाना मत। रोहन और नीलिमा नहीं हैं। सीमा भी अब चुप रहेगी।”

उन्होंने मेरी नाईटसूट ऊपर कर दी। ब्रा नहीं थी। उनकी ठंडी उंगलियाँ मेरे निप्पलों पर बंद हो गईं और जोर से मरोड़ने लगीं। मैंने धक्का दिया तो उन्होंने मेरा गला दबाया। साँस रुकने लगी। फिर उन्होंने मेरे होंठों पर जोर से काटा। खून निकला।
“आज से तू मेरी है। जो कहूँगी वो करेगी।”

उन्होंने मेरी पैंट और पैंटी एक साथ खींचकर उतार दी। मेरी जाँघों को जोर से फैलाया। उनकी दो उंगलियाँ बिना किसी तैयारी के अंदर घुस गईं। दर्द इतना तेज था कि मैं चीखना चाहती थी, लेकिन उनके हाथ ने मेरे मुँह को बंद रखा। उंगलियाँ अंदर-बाहर होती रहीं, फिर तीन हो गईं। उन्होंने मेरे क्लिटोरिस को अपने अंगूठे से दबाकर रगड़ना शुरू किया—दर्द और सुख का मिश्रण।

फिर उन्होंने अपना लंड निकाला। वह मोटा, नसों से भरा, और पहले से भी सख्त था। उन्होंने मेरे मुँह के पास लाकर कहा, “चाट। अच्छे से।” मैंने इनकार किया तो उन्होंने मेरे बाल पकड़कर सिर खींचा और लंड मेरे गले तक ठूंस दिया। मैं उल्टी जैसी करने लगी, लेकिन उन्होंने रुकने नहीं दिया। गला जल रहा था, आँखों से पानी बह रहा था।

जब उन्होंने बाहर निकाला तो मेरा चेहरा थूक और लार से तर था। फिर उन्होंने मुझे पेट के बल पलट दिया। मेरे हाथ पीछे बाँध दिए एक रूमाल से। मेरे घुटनों को फैलाया और अपना लंड मेरी चूत के मुँह पर रखा।
“अब रो मत। ले।”

एक जोरदार धक्के में पूरा लंड अंदर घुस गया। दर्द ऐसा कि मेरी दृष्टि धुँधली पड़ गई। विक्रम ने मेरे कूल्हों को दोनों हाथों से पकड़ा और बेतहाशा धक्के मारने लगे। हर धक्के पर उनका शरीर मेरे शरीर से टकराता, उनकी दाढ़ी मेरी पीठ पर रगड़ खाती। उन्होंने मेरे बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और कान में कहा, “तेरी मौसी को पता चला तो क्या होगा? सोच। तू चुप रहेगी।”

धक्के और तेज हो गए। उन्होंने एक हाथ से मेरी गांड के छेद में उंगली घुसा दी। दर्द दोगुना हो गया। फिर उन्होंने लंड बाहर निकाला, थूक लगाया और गांड में घुसाने की कोशिश की। मैंने विरोध किया तो उन्होंने मेरे गाल पर जोरदार थप्पड़ मारा। दूसरी बार में लंड आधा घुस गया। मैं चीखी, लेकिन आवाज दब गई। विक्रम ने पूरा लंड अंदर धकेल दिया और गांड चोदने लगे। दर्द इतना था कि मेरे शरीर में पसीना छूट गया।

कुछ देर बाद उन्होंने फिर चूत में डाल लिया। इस बार उन्होंने मुझे ऊपर बैठाया, लेकिन मेरे हाथ बंधे होने की वजह से मैं संतुलन नहीं बना पाई। उन्होंने मेरे निप्पलों को मुँह में लेकर काटा और चूसा। खून की बूंदें निकलीं। फिर उन्होंने मुझे दीवार के सहारे खड़ा किया, एक पैर उठाया और खड़े-खड़े चोदा। हर धक्के पर मेरी पीठ दीवार से टकराती।

अंत में उन्होंने मुझे घुटनों के बल बैठाया, मेरे मुँह में लंड ठूंसकर वीर्य छोड़ दिया। गले तक भर गया। मैंने निगलने की कोशिश की, लेकिन कुछ बाहर निकल आया। विक्रम ने मेरे चेहरे पर थप्पड़ मारा और कहा, “सब साफ कर।”
उस रात उन्होंने मुझे तीन बार लिया। बीच-बीच में मेरे शरीर पर सिगरेट की राख गिराई, मेरे अंदरूनी जाँघों पर दाँत गाड़े, और मेरे क्लिटोरिस को अपने नाखूनों से खुरचते रहे। जब वो सो गए तो मेरे हाथ अभी भी बंधे थे।

अगले दिन मौसी और रोहन लौट आए। विक्रम पूरे दिन सामान्य व्यवहार करते रहे, लेकिन जब भी मौका मिलता मेरे शरीर को छूते, मेरे कान में फुसफुसाते—“रात को तैयार रह।”

रात को सब सो गए। विक्रम ने मुझे बाहर बरामदे में बुलाया। वहाँ उन्होंने मुझे एक पुरानी कुर्सी पर बैठाया, हाथ-पैर बाँधे, और मुँह में कपड़ा ठूंस दिया। फिर उन्होंने सीमा को भी बुलाया। सीमा का चेहरा डरा हुआ था। विक्रम ने दोनों को एक साथ लिया। पहले मुझे चोदा, फिर सीमा को, फिर दोनों के मुँह में बारी-बारी से लंड घुसाया। उन्होंने हमें एक-दूसरे को चाटने को मजबूर किया। सीमा के आँसू मेरे जाँघों पर गिर रहे थे। विक्रम हँस रहे थे।

उन्होंने एक पतली रस्सी से मेरे निप्पलों को बाँधा और खींचा। दर्द से मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। फिर उन्होंने मेरे अंदर एक ठंडा लोहे का छड़ जैसा कुछ डालने की कोशिश की—मैंने जोर से सिर हिलाया तो उन्होंने रोक लिया, लेकिन धमकी दी कि अगली बार ऐसा ही होगा।
अगले तीन दिनों में विक्रम ने मुझे हर रात अलग-अलग तरीके से तोड़ा।

कभी रस्सियों से बाँधकर छत से लटकाया (हल्के में), कभी मोमबत्ती की मोम मेरे निप्पलों और चूत पर गिराई, कभी मेरे अंदर इतना जोर से धक्के मारे कि खून निकल आया। उन्होंने मुझे डॉगी स्टाइल में घंटों चोदा, मेरे बालों को घोड़े की लगाम की तरह पकड़कर खींचा। एक रात उन्होंने रोहन के सोते हुए कमरे के बाहर ही मुझे चुपचाप चोदा—मेरे मुँह पर हाथ दबाए हुए।

आखिरी रात उन्होंने कहा, “अब तू पूरी तरह मेरी गुलाम है। शहर लौटकर भी याद रखना।” उन्होंने मेरे शरीर पर अपने दाँतों और नाखूनों के निशान छोड़ दिए—गर्दन, जाँघें, स्तन, गांड।

घर लौटने के कई महीने बीत गए। काव्या अपने शहर के फ्लैट में अकेली रहती थी। दिन भर कॉलेज और पार्ट-टाइम जॉब में व्यस्त रहती, लेकिन रातें उसके लिए नरक बन जातीं। विक्रम की यादें उसके शरीर में गहरे निशान छोड़ गई थीं—गर्दन पर दाँतों के निशान धीरे-धीरे मिट गए थे, लेकिन जाँघों की अंदरूनी त्वचा पर नाखूनों के निशान अभी भी हल्के दिखते थे। कभी-कभी वह आईने के सामने खड़ी होकर उन निशानों को छूती और काँप जाती।

एक ठंडी सर्दियों की रात, करीब दो बजे, उसके फोन पर अज्ञात नंबर से मैसेज आया।
“खिड़की खोल। मैं बाहर हूँ।”
काव्या की साँसें रुक गईं। वह काँपते हाथों से पर्दा हटाकर बाहर देखा। सड़क के किनारे एक काली एसयूवी खड़ी थी। ड्राइवर वाली सीट पर विक्रम बैठे थे—दाढ़ी और लंबी, आँखें ठंडी। उन्होंने हाथ हिलाया।

डर और उस अजीब भूख ने काव्या को दरवाजा खोलने पर मजबूर कर दिया। विक्रम अंदर आए। उन्होंने दरवाजा बंद किया, चेन लगाई और बिना एक शब्द कहे काव्या के बाल पकड़कर दीवार से लगा दिया।
“तूने सोचा था सब खत्म हो गया?” उनकी आवाज धीमी लेकिन तेज धार वाली थी। “नहीं। तू मेरी संपत्ति है।”

उन्होंने काव्या की नाईटड्रेस को एक झटके में फाड़ दिया। उसके नीचे कुछ नहीं था। विक्रम ने उसके दोनों स्तनों को जोर से मसला, निप्पलों को अपनी उंगलियों में लेकर मरोड़ा जब तक काव्या की आँखों से आँसू नहीं निकल आए। फिर उन्होंने अपनी बेल्ट निकाली और काव्या के हाथों को पीठ के पीछे कसकर बाँध दिया। बेल्ट इतनी कस गई कि उसके हाथों में सुन्नपन आने लगा।

विक्रम ने उसे घसीटते हुए बेडरूम में ले गए। बिस्तर के पास एक बैग रखा था। उसमें से उन्होंने मोटी काली रस्सियाँ, एक चमड़े का कॉलर, मास्क और कई मोटे वाइब्रेटर निकाले। काव्या की आँखें फटी रह गईं।
“आज तू पूरी रात रोएगी। और कोई नहीं सुनेगा।”

उन्होंने काव्या के गले में कॉलर कस दिया। उसमें एक छोटी चेन थी जिसे उन्होंने बिस्तर के हेडबोर्ड से बाँध दिया। फिर उसकी टाँगों को फैलाकर टखनों को बिस्तर के दोनों कोनों से बाँध दिया। काव्या पूरी तरह फैली हुई, बेबस लेटी थी। विक्रम ने उसके मुँह में एक बड़ा बॉल-गैग ठूंस दिया और पट्टियाँ कस दीं। लार उसके गालों पर बहने लगी।

विक्रम ने अपनी कमीज उतारी। उनका शरीर पहले से भी ज्यादा सख्त लग रहा था। उन्होंने अपना मोटा, नसों से भरा लंड निकाला और काव्या के चेहरे के पास लाकर रगड़ने लगे। फिर अचानक उन्होंने उसके गले में कॉलर की चेन खींची और लंड को उसके मुँह के किनारे से गैग के बावजूद अंदर धकेलने की कोशिश की। काव्या घुटने लगी, लेकिन विक्रम नहीं रुके। उन्होंने उसके बाल पकड़कर सिर हिलाया और कहा, “साँस लेना सीख। तू मेरी मुँह की गांड है।”

कुछ देर बाद उन्होंने गैग हटाया। काव्या की साँसें हाँफ रही थीं। विक्रम ने तुरंत अपना लंड उसके गले तक ठूंस दिया। काव्या की आँखें लाल हो गईं, नाक से पानी बहने लगा। विक्रम ने दोनों हाथों से उसके सिर को पकड़ रखा और अपनी कमर को जोर-जोर से आगे-पीछे किया। गले की दीवारें उनके लंड से रगड़ खा रही थीं। जब काव्या के चेहरे का रंग बदलने लगा तो उन्होंने बाहर निकाला। काव्या ने जोर से खाँसी ली, थूक फर्श पर गिर गया।
“अच्छी गुलाम।” विक्रम मुस्कुराए।

फिर उन्होंने काव्या की चूत पर ध्यान दिया। वह पहले से गीली थी—डर और पुरानी आदत का मिश्रण। विक्रम ने दो उंगलियाँ अंदर घुसाईं, फिर तीन। उन्होंने तेजी से पेलना शुरू किया। काव्या की कमर उठने लगी, लेकिन रस्सियाँ उसे रोक रही थीं। विक्रम ने एक मोटा वाइब्रेटर निकाला, उसे सबसे तेज स्पीड पर चालू किया और काव्या की चूत में पूरा धकेल दिया। वाइब्रेटर अंदर घूम रहा था, दीवारों को कँपा रहा था। काव्या चीखने लगी, लेकिन विक्रम ने फिर से गैग लगा दिया।

उसी समय उन्होंने काव्या की गांड के छेद में ठंडी लुब्रिकेंट लगाई और एक पतली लेकिन लंबी धातु की छड़ अंदर घुसानी शुरू की। काव्या का शरीर तन गया। दर्द इतना तेज था कि उसकी जाँघें काँपने लगीं। विक्रम ने छड़ को अंदर-बाहर किया, फिर उसे अंदर ही छोड़ दिया और वाइब्रेटर की स्पीड बढ़ा दी।
“देख, दोनों छेद भरे हुए हैं। तू मेरी पूरी तरह भरी हुई कुतिया है।”

वे खुद काव्या के ऊपर चढ़ गए। उन्होंने वाइब्रेटर निकाला और अपना लंड एक झटके में चूत में घुसा दिया। रस्सियों की वजह से काव्या हिल नहीं सकती थी। विक्रम ने उसके कूल्हों को पकड़कर इतनी तेज गति से धक्के मारे कि बिस्तर की सिरही दीवार से टकराने लगी। हर धक्के पर उनका शरीर काव्या के शरीर से जोर से पटका। उन्होंने उसके निप्पलों को मुँह में लेकर काटा—खून की छोटी बूंदें निकलीं जिन्हें उन्होंने चाट लिया।

बीच में उन्होंने लंड बाहर निकाला, काव्या को पलटने की कोशिश की लेकिन रस्सियाँ रोक रही थीं। उन्होंने रस्सियाँ ढीली कीं, काव्या को पेट के बल लिटाया और फिर से बाँध दिया—इस बार हाथ सिर के ऊपर और टाँगें और ज्यादा फैली हुई। फिर उन्होंने अपना लंड उसकी गांड में धकेल दिया। काव्या की चीख गैग के अंदर दब गई। विक्रम ने धीरे-धीरे पूरा लंड अंदर डाला, फिर जोर-जोर से पेलने लगे। उनकी कमर की हर हरकत में काव्या की गांड की मांसपेशियाँ फैल रही थीं। उन्होंने एक हाथ से काव्या के बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और दूसरे हाथ से उसके गले पर दबाव डाला।

“तेरी मौसी को कभी पता नहीं चलेगा। तू शहर में मेरी गुलाम रहेगी। जब चाहूँगा आऊँगा।”
धक्के और क्रूर होते गए। विक्रम ने काव्या की पीठ पर थप्पड़ मारे—लाल निशान पड़ गए। फिर उन्होंने उसके कंधों को दबाकर और गहराई तक घुसना शुरू किया। काव्या की आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे, लेकिन उसके शरीर में एक अजीब कंपन भी चल रहा था।
अंत में विक्रम ने अपना लंड निकाला, काव्या को फिर से पीठ के बल किया और उसके मुँह में वीर्य छोड़ दिया। उन्होंने उसके गले को दबाए रखा जब तक उसने लगभग सब निगल नहीं लिया। बचा हुआ उन्होंने उसके चेहरे पर मल दिया।

लेकिन रात खत्म नहीं हुई थी।
विक्रम ने आधे घंटे आराम किया। काव्या अभी भी बंधी हुई लेटी थी। फिर उन्होंने फिर से शुरू किया। इस बार उन्होंने काव्या के स्तनों पर मोमबत्ती जलाकर गर्म मोम टपकाया। हर बूंद पर काव्या का शरीर उछलता। मोम ठंडी होकर सख्त हो जाती और विक्रम उसे खुरचकर फिर से गिराते। उन्होंने उसके क्लिटोरिस पर भी मोम गिराई—दर्द इतना तेज था कि काव्या की दृष्टि कुछ पल के लिए काली पड़ गई।

फिर उन्होंने एक बड़ा, काँटेदार वाइब्रेटर उसकी चूत में डाला और गांड में अपना लंड। दोनों छेद एक साथ भरे हुए। विक्रम ने लय बढ़ाई। काव्या का शरीर अब सिर्फ दर्द और जबरन सुख के बीच झूल रहा था। उसके अंदर कई बार कंपन उठे, लेकिन हर बार विक्रम रुक जाते और उसे किनारे पर छोड़ देते—जानबूझकर।

सुबह के चार बज चुके थे। विक्रम ने आखिरी बार काव्या को डॉगी पोजिशन में बाँधा, उसके बालों को लगाम की तरह पकड़ा और बिना किसी दया के घंटे भर चोदा। जब उन्होंने आखिरकार वीर्य उसकी गांड के अंदर छोड़ा तो काव्या पूरी तरह थक चुकी थी। उसका शरीर पसीने, थूक, वीर्य और मोम से सना हुआ था। रस्सियों के निशान उसके हाथ-पैरों पर गहरे पड़ चुके थे।

विक्रम ने रस्सियाँ खोलीं। काव्या गिर पड़ी। उन्होंने उसके बाल सहलाते हुए कहा, “अगली बार और सामान लाऊँगा। चेन, हुक, बिजली वाला सामान। तू तैयार रह।”
वे कपड़े पहनकर चले गए। दरवाजा बंद करते समय उन्होंने मुड़कर देखा।
“तू मेरी है, काव्या। हमेशा के लिए।”

काव्या फर्श पर लेटी रही। शरीर दर्द से काँप रहा था, लेकिन गहरी जगह पर वो वही अजीब भूख फिर से जाग रही थी—और भी तेज, और भी काली। वह जानती थी कि विक्रम वापस आएंगे। और अगली बार और ज्यादा क्रूर होंगे।
रात के अंधेरे में काव्या की आँखें खुली रहीं। शरीर तो टूट चुका था, लेकिन मन में एक सवाल घूम रहा था—अगली बार वह कितना और सह पाएगी… या फिर खुद कितना और माँग लेगी।
कहानी यहीं रुकी नहीं थी। वह तो बस नई शुरुआत थी।

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