लॉकडाउन में फँसी रिश्तेदार लड़की को रात-दर-रात तोड़ा गया। दर्द, अपमान और बेकाबू भूख ने उसे अपनी मर्जी की गुलाम बना दिया। हर मिलन पहले से ज्यादा निर्दयी।
मेरा नाम रोहित है। उम्र 24 साल। शरीर मज़बूत, कंधे चौड़े, और लौड़े का साइज़ 8.5 इंच का मोटा और नसों से भरा हुआ। मैं हर रात अन्तर्वासना जैसी साइट्स पर कहानियाँ पढ़ता था, लेकिन आज पहली बार अपनी सच्ची कहानी लिख रहा हूँ। अगर कहीं गलती हो जाए तो माफ करना।
ये कहानी उस लॉकडाउन की है जब मैं 21 साल का था। मेरी मौसी की बेटी का नाम प्रिया था। वो मुझसे तीन साल बड़ी थी। उसकी उम्र उस समय 24 साल थी। प्रिया की हाइट 5 फुट 6 इंच, शरीर 36-28-38 का, गोरा चमकदार, बड़े-बड़े गोल मम्मे, पतली कमर और भारी गांड। चेहरा इतना खूबसूरत कि कोई भी आदमी उसे देखकर पागल हो जाए। हम दोनों कानपुर में रहते थे। मेरे पिता जी का घर गोविंद नगर में था। प्रिया दिल्ली से किसी काम से आई हुई थी। अचानक पूरा देश लॉकडाउन में चला गया और वो मेरे घर फँस गई।
शुरुआत में सब सामान्य था। हम साथ खाना खाते, टीवी देखते, कभी-कभी ताश खेलते। लेकिन दिन बीतते गए तो प्रिया को अपने घर की याद सताने लगी। रातें उसके लिए लंबी हो गईं। एक रात आधी रात को वो मेरे कमरे में आई। मैं अकेला सो रहा था। उसने मेरे कंधे को हल्के से छुआ।
“रोहित… नींद नहीं आ रही। घर बहुत याद आ रहा है।”
मैंने आँखें खोलीं। अँधेरे में उसकी आकृति साफ दिख रही थी। पतला नाइटी पहना हुआ था। मम्मे साफ उभर रहे थे। मैंने बिस्तर खिसकाया।
“आ जाओ।”
वो मेरे बगल में लेट गई। कुछ देर चुप रही। फिर धीरे से बोली, “मुझे गले लगाना है।”
मैंने उसे अपनी बाँहों में खींच लिया। उसके बड़े मम्मे मेरी छाती से चिपक गए। उसकी साँसें गर्म थीं। मेरा लौड़ा तुरंत सख्त हो गया और उसकी जांघों के बीच दब गया। प्रिया सहम गई लेकिन अलग नहीं हुई। मैंने उसके बालों में हाथ फेरते हुए कहा, “अगर तुम चाहो तो और करीब आ सकती हो।”
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उसने कोई जवाब नहीं दिया, बस और कसकर चिपक गई। उस रात हम सिर्फ गले मिले। लेकिन अगली रात से खेल बदलने लगा।
दूसरी रात जब वो आई तो मैंने उसके होंठों पर चुंबन कर लिया। पहले तो उसने मना किया, “ये गलत है… हम रिश्तेदार हैं।”
मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और गले पर दाँत गड़ा दिए। “गलत है तो क्यों तुम्हारी चूत गीली हो रही है? बता।”
प्रिया का शरीर काँप उठा। मैंने हाथ उसकी जांघों के बीच डाल दिया। पैंटी पूरी भीगी हुई थी। मैंने दो उंगलियाँ अंदर धकेल दीं। वो चीखने वाली थी कि मैंने उसका मुँह अपने मुँह से बंद कर दिया। उंगलियाँ अंदर-बाहर करते हुए मैं बोला, “आज से तुम मेरी कुतिया हो। समझी?”
उसने सिर हिलाया। आँखों में आँसू थे लेकिन चूत और भी गीली हो रही थी।
उस रात मैंने उसे पूरा नंगा किया। मम्मों को मुँह में भर-भरकर चूसा, निप्पल्स को दाँतों से काटा। जब वो दर्द से कराहने लगी तो मैंने और जोर से काटा। “दर्द अच्छा लगता है ना तुम्हें?”
“हाँ… रोहित… और काटो…”
मैंने उसे बिस्तर पर पेट के बल लिटाया। गांड के दोनों गोल भागों को फैलाया और बीच की दरार में जीभ घुमाई। प्रिया की गांड साफ और गुलाबी थी। मैंने जीभ अंदर तक घुसा दी। वो चिल्लाई, “आह्ह… गंदी बात मत करो…”
मैंने उसके बाल पकड़कर सिर उठाया और गले में थप्पड़ मारा। “गंदी बात? तुम्हारी गांड चाट रहा हूँ और तुम मना कर रही हो? बोलो कि तुम मेरी गांड चाटने वाली रंडी हो।”
प्रिया रोते हुए बोली, “मैं… मैं तुम्हारी गांड चाटने वाली रंडी हूँ…”
मैंने उसके मुँह में अपना 8.5 इंच का मोटा लौड़ा ठूंस दिया। गले तक। वो घुटने के बल बैठी हुई थी। आँखों से आँसू बह रहे थे। मैंने उसके सिर को पकड़कर जोर-जोर से धक्के मारे। लार उसके मुँह से बाहर निकलकर छाती पर गिर रही थी। जब मैं झड़ने वाला था तो उसके गले में ही पूरा वीर्य उड़ेल दिया। उसने खाँसते हुए सब निगल लिया।
उसके बाद मैंने उसे चारपाई पर लिटाया। टाँगें फैलाकर उसकी चूत को देखा। बिल्कुल साफ-सुथरी, गुलाबी और चमकदार। मैंने जीभ से चाटना शुरू किया। क्लिटoris को दाँतों से हल्के से काटते हुए चाटा। जब वो काँपने लगी तो दो उंगलियाँ अंदर घुसा दीं और तीसरी उंगली उसकी गांड में डाल दी। प्रिया पागल हो गई। “रोहित… बहुत जोर से… फाड़ दो…”
मैंने वैसलीन निकाली। अपने लौड़े पर और उसकी चूत पर लगाई। फिर उसके दोनों टाँगों को अपने कंधों पर रख लिया और एक ही झटके में आधा लौड़ा अंदर घुसा दिया। प्रिया की चीख निकल गई। खून निकलने लगा। मैं रुका नहीं। दूसरा झटका और पूरा लौड़ा अंदर। उसके आँसू बह रहे थे लेकिन चूत कसकर मेरे लौड़े को दबा रही थी।
“बोलो, किसकी चूत है?”
“तुम्हारी… सिर्फ तुम्हारी…”
मैंने तेज-तेज धक्के शुरू किए। बिस्तर चरमरा रहा था। प्रिया की चीखें पूरे घर में गूंज रही थीं लेकिन लॉकडाउन में कोई सुनने वाला नहीं था। मैंने उसके गले को दबाया। साँस रुकने लगी तो छोड़ दिया। फिर से दबाया। उसकी आँखें लाल हो गईं। मम्मे ऊपर-नीचे हो रहे थे। मैंने एक मम्मे को मुँह में लेकर जोर से काटा। खून की बूंदें निकलीं। प्रिया दर्द से चीखी लेकिन उसके शरीर ने और जोर से ऐंठन मारी। वो झड़ गई। उसकी चूत से पानी की तरह रस निकल रहा था।
मैंने पोजीशन बदली। उसे कुतिया बनाकर खड़ा किया। पीछे से लौड़ा अंदर घुसाया और बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। दूसरे हाथ से उसकी गांड पर जोर-जोर के थप्पड़ मारे। लाल निशान पड़ गए। “आज तुम्हारी गांड भी लूँगा। तैयार हो?”
प्रिया डरी हुई आवाज में बोली, “नहीं… वो बहुत दर्द करेगा…”
मैंने उसके मुँह में कपड़ा ठूंस दिया और वैसलीन लगाकर गांड में उंगली घुसाई। फिर धीरे-धीरे अपना मोटा लौड़ा उसकी गांड में धकेलना शुरू किया। आधा अंदर गया तो वो तड़पने लगी। मैंने पूरा अंदर कर दिया। प्रिया की आँखों से आँसू की धारा बह रही थी। मैंने गांड में धक्के मारते हुए उसकी चूत में तीन उंगलियाँ घुमाईं। दोनों छेद एक साथ। प्रिया बेहोशी की हालत में झड़ गई।
उस रात मैंने उसे चार बार चोदा। दो बार चूत में, दो बार गांड में। बीच में उसे अपनी पेशाब पीने को मजबूर किया। उसने गले तक पिया। फिर मैंने उसके चेहरे पर थूककर कहा, “अब से हर रात यही होगा। तुम मेरी निजी रंडी हो। जब तक लॉकडाउन है, तुम मेरे बिस्तर से बाहर नहीं जाओगी।”
अगले दिन प्रिया मुश्किल से चल पा रही थी। चूत और गांड दोनों सूजी हुई थीं। मैंने बाजार से दर्द निवारक और एंटी प्रेग्नेंसी गोलियाँ लाकर दीं। फिर भी रात को फिर वही सिलसिला शुरू हो गया।
लॉकडाउन के उन पैंतालीस दिनों में मैंने प्रिया को हर तरह से तोड़ा। कभी रस्सी से बाँधकर बिस्तर से लटकाया, कभी आँखों पर पट्टी बाँधकर सिर्फ दर्द दिया। कभी उसके मम्मों पर क्लिप्स लगाए, कभी उसकी चूत में बर्फ के टुकड़े डालकर फिर गर्म लौड़े से भरा। एक रात मैंने उसे अपने पैरों के नीचे लिटाया और पेशाब कर दिया। उसने सब सहा। बल्कि माँगने लगी।
“और सख्ती करो रोहित… मुझे और तोड़ो…”
एक रात मैंने उसे आईने के सामने खड़ा किया। उसके पीछे खड़ा होकर उसकी गांड में लौड़ा घुसाया और उसके बाल पकड़कर आईने में दिखाया। “देखो अपनी हालत। मम्मे काटे हुए, गर्दन पर निशान, चूत और गांड दोनों लाल। यही तुम्हारी असली सूरत है।”
प्रिया आईने में खुद को देखकर और उत्तेजित हो गई। उसने खुद अपना हाथ पीछे करके अपनी गांड और फैलाई। “और अंदर… पूरा फाड़ दो…”
मैंने पूरा जोर लगाकर धक्के मारे। आखिर में उसकी गांड में ही झड़ गया। वीर्य बाहर निकलकर जांघों पर बह रहा था। मैंने उंगली से निकालकर उसके मुँह में ठूंस दिया।
लॉकडाउन खत्म होने के बाद भी ये खेल नहीं रुका। जब भी वो कानपुर आती या मैं दिल्ली जाता, हम घंटों बंद कमरे में बिताते। कभी होटल में, कभी उसके घर जब कोई नहीं होता। अब भी जब हम मिलते हैं तो वो खुद घुटनों के बल बैठ जाती है और कहती है, “आज फिर से अपनी कुतिया को याद दिला दो कि वो किसकी है।”
लॉकडाउन खत्म होने के बाद प्रिया दिल्ली लौट गई, लेकिन वो खाली नहीं गई। उसके शरीर पर मेरे दाँत के निशान, थप्पड़ों के निशान और चूत-गांड की सूजन साथ ले गई। मैंने उसे साफ हिदायत दी थी—“हर रात मुझे वीडियो कॉल पर अपनी चूत और गांड खोलकर दिखाना। अगर एक दिन भी छूट गया तो अगली मुलाकात में तुम्हारी गांड इतनी फाड़ूँगा कि तुम चल भी नहीं पाओगी।”
प्रिया ने सिर झुकाकर हाँ कहा था। और वो मानती भी रही। हर रात वो अपने कमरे का दरवाजा बंद करती, कैमरा ऑन करती और मेरे सामने घुटनों के बल बैठ जाती। कभी चूत में उंगलियाँ घुमाती, कभी गांड में वैसलीन लगाकर दो उंगलियाँ अंदर डालती और कहती—“रोहित… तुम्हारी कुतिया तैयार है… बताओ क्या करूँ?”
मैं उसे दूर से ही कंट्रोल करता। कभी बोलता—“निप्पल पर क्लिप लगाओ और खींचो।” कभी—“अपनी पेशाब पीकर दिखाओ।” वो सब करती। एक रात मैंने कहा—“आज अपनी गांड में मोमबत्ती डालो और जलाकर रखो जब तक मैं बोलूँ।” प्रिया ने किया। मोमबत्ती की गर्मी से उसकी गांड जलने लगी, आँसू बहने लगे, लेकिन उसने हटाया नहीं। जब मैंने अनुमति दी तब निकाली। गांड का छेद लाल और सूजा हुआ था।
तीन महीने बाद मैं दिल्ली गया। प्रिया के फ्लैट में। उसके रूममेट्स लॉकडाउन के बाद घर चले गए थे, फ्लैट खाली था। जैसे ही दरवाजा खुला, प्रिया ने मुझे देखा और खुद अपने कपड़े उतारने लगी। मैंने दरवाजा बंद किया, ताला लगाया और उसके बाल पकड़कर दीवार से टकरा दिया।
“तीन महीने हो गए। तुम्हारी गांड कितनी ढीली हो गई होगी?”
प्रिया काँपते हुए बोली—“नहीं… रोहित… मैंने रोज उंगली डाली… तुम्हारे लिए टाइट रखा…”
मैंने उसके मुँह में थूक दिया। “झूठ मत बोल। आज चेक करूँगा।”
मैंने उसे बेड पर घसीट कर लिटाया। टाँगें फैलाकर चूत देखी। अभी भी गुलाबी थी, लेकिन इस्तेमाल की हुई लग रही थी। मैंने बिना किसी तैयारी के दो उंगलियाँ एक साथ घुसा दीं। प्रिया चिल्लाई। मैंने तीसरी उंगली भी डाल दी और गांड में एक उंगली। चार उंगलियाँ एक साथ। प्रिया तड़पने लगी।
“बोल… किसकी हो?”
“तुम्हारी… सिर्फ तुम्हारी रंडी…”
मैंने उंगलियाँ निकालकर अपना 8.5 इंच का मोटा लौड़ा निकाला। पहले उसके मुँह में ठूंस दिया। गले तक। प्रिया की आँखें फटी की फटी रह गईं। मैंने सिर पकड़कर जोर-जोर से धक्के मारे। लार और आँसू उसके चेहरे पर मिल गए। जब साँस फूलने लगी तो निकाला और सीधे उसकी चूत में एक झटके में घुसा दिया।
प्रिया की चीख निकल गई। खून नहीं निकला इस बार, लेकिन दर्द साफ था। मैं रुका नहीं। पूरा लौड़ा अंदर-बाहर करता रहा। उसके दोनों मम्मों को मुट्ठी में लेकर मसलने लगा। निप्पल्स को उंगलियों से मोड़ दिया। प्रिया दर्द से रो रही थी लेकिन उसकी चूत मेरे लौड़े को कसकर चूस रही थी।
मैंने पोजीशन बदली। उसे कुतिया बनाकर खड़ा किया। बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और गांड पर जोर का थप्पड़ मारा। “आज तुम्हारी गांड लूँगा। तीन महीने बाद।”
प्रिया डरी हुई आवाज में बोली—“रोहित… प्लीज… धीरे…”
मैंने उसके मुँह में अपना अंडरवियर ठूंस दिया। वैसलीन लगाई और अपना मोटा लौड़ा उसकी गांड के छेद पर सेट किया। एक झटका। आधा अंदर। प्रिया की आँखों से आँसू की धारा बह निकली। दूसरा झटका। पूरा अंदर। मैंने उसके कूल्हों को पकड़कर जोर-जोर से धक्के मारने शुरू किए। हर धक्के के साथ उसकी गांड की मांसपेशियाँ फैल रही थीं। मैंने एक हाथ आगे बढ़ाकर उसकी चूत में तीन उंगलियाँ घुमा दीं। दोनों छेद एक साथ भरे हुए।
प्रिया बेहोशी की कगार पर थी। मैंने उसका सिर घुमाया और उसके कान में फुसफुसाया—“आज तुम्हें प्रेग्नेंट बनाऊँगा। चूत में इतना वीर्य डालूँगा कि तुम नौ महीने तक मेरे बच्चे को पालोगी।”
उसने सिर हिलाया। आँखों में डर और उत्तेजना दोनों थे। मैंने गति बढ़ा दी। बिस्तर चरमरा रहा था। प्रिया की चीखें अंडरवियर के अंदर दब रही थीं। अचानक मैंने लौड़े को गांड से निकाला और चूत में घुसा दिया। दस-बारह जोरदार धक्के और मैं उसके गर्भ में अपना पूरा वीर्य उड़ेल दिया। इतना कि बाहर निकलकर जांघों पर बहने लगा।
मैंने उसे वैसे ही छोड़ दिया। वीर्य चूत से रिस रहा था। प्रिया लेटी हुई काँप रही थी। मैं बाथरूम गया, पानी पिया और वापस आया। प्रिया अभी भी उसी पोजीशन में थी। मैंने उसके बाल पकड़कर उठाया।
“अब सफाई का समय।”
मैंने उसे बाथरूम में घसीट कर ले गया। शॉवर चालू किया। ठंडा पानी। प्रिया काँपने लगी। मैंने उसके मुँह में फिर लौड़ा ठूंस दिया और बोला—“मेरी पेशाब पी। अभी।”
प्रिया की आँखें फटी रह गईं। मैंने उसका सिर पकड़ रखा था। गर्म पेशाब उसके मुँह में भरने लगी। उसने निगलना शुरू किया। कुछ बाहर गिर गया तो मैंने थप्पड़ मारा। “सब पी। एक बूँद भी बर्बाद नहीं होगी।”
प्रिया ने सब पी लिया। उसके बाद मैंने उसे दीवार से लगाकर फिर से चोदा। इस बार खड़े-खड़े। एक टाँग ऊपर उठाकर। चूत में। फिर गांड में। दोनों जगह वीर्य भर दिया।
रात भर ये सिलसिला चला। कभी मैंने उसे रस्सी से बाँधकर छत के पंखे से लटकाया। उसके मम्मे नीचे की तरफ लटक रहे थे। मैंने नीचे खड़े होकर उसके मम्मों को मुँह में भर-भरकर काटा। फिर उसकी चूत में बर्फ के टुकड़े डाले और ऊपर से गर्म लौड़े से भरा। प्रिया पागल हो गई थी। दर्द और मजे का मिश्रण उसे और गहराई में धकेल रहा था।
सुबह चार बजे जब मैं थककर लेटा तो प्रिया मेरे सीने पर सिर रखकर लेट गई। उसकी आवाज काँप रही थी—“रोहित… मुझे और सख्ती चाहिए… मुझे और तोड़ो… मैं तुम्हारी पूरी तरह से गुलाम बनना चाहती हूँ…”
मैंने उसके बाल सहलाते हुए कहा—“अगली बार जब आऊँगा तो तुम्हें पिंजरे में बंद रखूँगा। तीन दिन। सिर्फ खाना-पानी और मेरा लौड़ा। कोई बात नहीं। सिर्फ हुक्म। तैयार हो?”
प्रिया ने आँखें बंद करके सिर हिलाया—“हाँ… मैं तैयार हूँ…”
उसके बाद की मुलाकातें और भी क्रूर होती गईं। एक बार मैंने उसे होटल के कमरे में चौबीस घंटे के लिए हाथ-पैर बाँधकर छोड़ दिया। सिर्फ एक छोटा सा छेद मुँह के लिए रखा था जहाँ से वो पानी पी सके। बीच-बीच में मैं आता, उसका इस्तेमाल करता और चला जाता। प्रिया की आँखों में अब सिर्फ समर्पण था। डर नहीं, सिर्फ भूख।
आज भी जब हम मिलते हैं तो पहला वाक्य वही होता है। प्रिया दरवाजा खोलती है, कपड़े उतारती है, घुटनों के बल बैठती है और कहती है—“मालिक… आज किस तरह तोड़ना है अपनी कुतिया को?”
और मैं हर बार कुछ नया निकालता हूँ। कभी चाबुक, कभी मोम, कभी बिजली का करंट देने वाला छोटा सा उपकरण। प्रिया की चूत और गांड अब इतनी आदी हो चुकी हैं कि सामान्य सेक्स उसे संतुष्ट नहीं करता। उसे दर्द चाहिए, अपमान चाहिए, और मेरे हाथों से पूरा टूटना चाहिए।
दोस्तों, ये कहानी यहीं खत्म नहीं होती। प्रिया अब सिर्फ मेरी रंडी नहीं, मेरी प्रॉपर्टी है। उसका शरीर, उसका मन, उसकी इज्जत—सब मेरे नाम है। और जब तक मैं चाहूँगा, ये खेल चलता रहेगा। अगली बार जब लिखूँगा तो बताऊँगा कि पिंजरे वाले तीन दिन में क्या-क्या हुआ। तब तक के लिए… अपनी कल्पनाओं को काबू में रखना।
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