तीन घंटे बंद गोदाम में बीस पुरुषों ने संपत्ति को बारी-बारी और एक साथ खोला। लौटकर मालिक ने हिसाब लिया और अगली रात पार्टनर व उसकी पत्नी के हवाले करने का हुक्म दे दिया।
रात के नौ बजे रुद्रक्ष ने अनन्या को एक बड़े बंगले के अंदर धकेल दिया। अंदर पाँच महिलाएँ इंतजार कर रही थीं। सब अमीर, सब ठंडी आँखों वाली। उम्र तीस से पैंतालीस के बीच। कमरे में मोमबत्तियाँ जल रही थीं। फर्श पर काली चादर बिछी थी। बीच में एक लोहे का ढांचा खड़ा था।
रुद्रक्ष ने चेन एक महिला के हाथ में थमा दी। “पूरी रात। सुबह छह बजे मैं लेने आऊँगा। चेहरा और जीभ छोड़कर बाकी सब आजाद।”
वह चला गया। दरवाजा बंद हो गया। अनन्या पाँच महिलाओं के बीच नंगी खड़ी थी। शरीर पर अंधेरे वाले कमरे के सारे निशान अभी भी साफ दिख रहे थे।
पहली महिला ने आगे बढ़कर अनन्या के बाल पकड़े और खींचकर ढांचे से बाँध दिया। हाथ ऊपर। पैर फैलाए। दूसरी महिला ने मोमबत्ती उठाई और जलता मोम अनन्या के निप्पलों पर गिराया। तेज जलन। अनन्या चिल्लाई। तीसरी ने जांघों के अंदरूनी हिस्से पर मोम गिराया। चौथी ने नितंबों पर। मोम ठंडा होकर सख्त होने लगा लेकिन जलन बनी रही।
फिर एक लंबी महिला ने तेज नाखूनों से अनन्या की पीठ कुरेदनी शुरू की। लंबी-लंबी लकीरें। खून निकल आया। दूसरी महिला ने उसी समय गाँड में तीन उंगलियाँ घुसा दीं और जोर से फैलाने लगी। तीसरी ने चूत में मुट्ठी ठूंस दी। अनन्या की चीख निकल गई। चौथी महिला ने उसका मुँह खोलकर अपनी चूत उसके चेहरे पर बैठा दी।
“चाट। साफ कर।”
अनन्या की जीभ पर तेज स्वाद और गंध फैल गई। वह चाटने लगी। इस बीच मुट्ठी और उंगलियाँ अंदर-बाहर हो रही थीं। मोम के दाग शरीर पर और बनते जा रहे थे। एक महिला ने सिगरेट जलाई और अनन्या की जांघ पर बुझा दी। मांस जलने की आवाज आई। दूसरी सिगरेट दूसरी जांघ पर।
रात भर यही सिलसिला चला। कभी मोम, कभी नाखून, कभी मुट्ठी, कभी उनकी चूत अनन्या के मुँह पर। एक महिला ने अनन्या के चेहरे पर पेशाब कर दी। गर्म धार आँखों और मुँह में चली गई। अनन्या ने निगल लिया क्योंकि बाल पकड़े हुए थे। दूसरी ने भी वही किया। शरीर पर पेशाब, मोम, खून और पानी की परत चढ़ गई।
आधी रात को उन्होंने अनन्या को फर्श पर लिटा दिया। पाँचों ने घेर लिया। एक ने मुँह में उंगलियाँ ठूंसी, दो ने दोनों छेदों में मुट्ठी डाली, एक ने निप्पल मरोड़े, एक ने बाल खींचे। अनन्या का शरीर अब पूरी तरह उनके हाथों में था। आवाज बैठ चुकी थी। सिर्फ सिसकियाँ रह गई थीं। वे बारी-बारी बदलती रहीं। कभी कोई अपनी चूत उसके मुँह पर बैठाती, कभी कोई मोमबत्ती फिर से जलाती।
सुबह के पाँच बजते-बजते अनन्या फर्श पर ढेर पड़ी थी। शरीर हिल नहीं रहा था। मोम के सख्त दाग, सिगरेट के गोल निशान, नाखूनों की गहरी लकीरें, सूजे हुए छेद। पाँचों महिलाएँ थककर सोफे पर बैठ गई थीं।
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छह बजे दरवाजा खुला। रुद्रक्ष अंदर आया। उसने अनन्या को देखा। कोई भाव नहीं। चेन ली। अनन्या को घसीटते हुए गाड़ी तक ले गया। घर पहुँचते ही शीशे वाले कमरे में बाँध दिया।
“अब बता। एक-एक महिला। एक-एक हरकत। कहाँ मोम गिराया। किसने मुट्ठी डाली। किसकी पेशाब पी। सब।”
अनन्या की आवाज पूरी तरह टूटी हुई थी। वह बताने लगी। पहली ने निप्पलों पर मोम गिराया, दूसरी ने पीठ कुरेदी, तीसरी ने मुट्ठी चूत में डाली, चौथी ने पेशाब किया… हर विवरण। रुद्रक्ष सुनता रहा।
जब वह खत्म हुई तो रुद्रक्ष ने छड़ी उठाई। पुराने निशानों पर नए वार शुरू कर दिए। खून फिर बहने लगा। फिर उसने गाँड में लंड धकेल दिया। जोर से। गहराई तक। जैसे महिलाओं के निशान मिटा रहा हो। अनन्या अब सिर्फ काँप रही थी। वह अंदर झड़ गया। फिर चूत में डालकर वहाँ भी झड़ गया। उंगलियों से पानी उसके मुँह में ठूंसा।
“निगल। उनकी और मेरी दोनों।”
अनन्या ने निगल लिया।
रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठ गया। सिगार जलाई। धुआँ उठ रहा था।
“नया नियम। आज से तू रोज़ रात सोने से पहले मेरे सामने खड़ी होकर बताएगी कि दिन भर तेरे शरीर ने किस तरह की जलन या दर्द सबसे ज्यादा याद किया—मोम की, नाखून की, मुट्ठी की या पेशाब की। झूठ बोली तो फिर से उन महिलाओं के पास दो रात के लिए भेज दूँगा।”
अनन्या फर्श पर पड़ी हांफ रही थी। शरीर जल रहा था। लेकिन अंदर वह खालीपन अब महिलाओं की रात की भूख बन चुका था।
रुद्रक्ष ने आखिरी कश लिया। आवाज और ठंडी हो गई।
“अगले हफ्ते मैं तुझे एक बंद ट्रक में नहीं, बल्कि एक खुली पिकअप में बाँध दूँगा। शहर की सड़कों पर घुमाऊँगा। लोग देखेंगे। कभी-कभी रोककर किसी अजनबी को चढ़ने दूँगा। तू गिनेगी। शाम को हिसाब देना होगा।”
अनन्या की आँखें अंधेरे में खुली रह गईं। नया डर। नई भूख। चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ महिलाओं और अंधेरे का नहीं, खुली सड़क और अजनबियों की निगाहों का भी होने वाला था।अनन्या फर्श पर पड़ी रही। शरीर पर महिलाओं वाली रात के सारे निशान धधक रहे थे—मोम के सख्त दाग, सिगरेट के गोल जले निशान, नाखूनों की गहरी लकीरें, पेशाब की सूखी परत। रुद्रक्ष की आखिरी बात कानों में गूँज रही थी—खुली पिकअप, शहर की सड़कें, अजनबी।
तीसरे दिन सुबह रुद्रक्ष ने अनन्या को नहलाया नहीं। बस कॉलर और चेन कसकर एक खुली पिकअप के पिछले हिस्से में बाँध दिया। हाथ ऊपर एक लोहे के फ्रेम से। पैर फैलाए। वजन भारी। नंगी। सूरज की रोशनी सीधे उसके शरीर पर पड़ रही थी। पुराने निशान सब साफ दिख रहे थे।पिकअप शहर की सड़कों पर निकल पड़ी। लोग रुक-रुककर देखने लगे। गाड़ियाँ साइड में आतीं। कुछ हँसते, कुछ सीटियाँ बजाते। अनन्या की गर्दन दर्द करने लगी। गिनती शुरू हुई। “एक… दो… तीन…”
दोपहर तक गिनती एक सौ पार कर चुकी थी। पिकअप कभी धीमी होती, कभी तेज। अचानक एक चौराहे पर रुकी। रुद्रक्ष ने पीछे मुड़कर देखा। एक अजनबी पुरुष खड़ा था। रुद्रक्ष ने सिर हिलाया। अजनबी पिकअप में चढ़ आया। उसने अनन्या के बाल पकड़े और अपना लंड उसके मुँह में ठूंस दिया। गले तक। जोर-जोर से पेलने लगा। लोग सड़क पर खड़े देख रहे थे। अनन्या की आँखों से पानी बह रहा था। अजनबी ने मुँह में ही झड़ दिया। फिर उतर गया। पिकअप चल पड़ी।
“एक सौ चार…”
थोड़ी देर बाद फिर रुकी। इस बार दो अजनबी चढ़े। एक ने चूत में लंड धकेला, दूसरे ने गाँड में। दोनों एक साथ पेलने लगे। पिकअप के हिलने के साथ अनन्या का शरीर और ज्यादा झूल रहा था। लोग भीड़ लगाकर देख रहे थे। दोनों ने अंदर ही झड़ा। फिर उतर गए।
“एक सौ सात… एक सौ आठ…”
दोपहर के तीन बजे पिकअप एक सुनसान से मोड़ पर रुकी। रुद्रक्ष खुद पीछे आया। छड़ी हाथ में। बिना कुछ बोले नितंबों पर वार शुरू कर दिए। हर वार के साथ अनन्या की चीख सड़क पर गूँज रही थी। खून की धारें जांघों पर बहने लगीं। बीस वार बाद उसने मुट्ठी गाँड में धकेल दी। अनन्या चिल्लाई। फिर लंड अंदर डालकर जोर से पेलने लगा। सड़क पर कुछ लोग खड़े तालियाँ बजा रहे थे। रुद्रक्ष अंदर झड़ गया। लंड निकालकर अनन्या के मुँह में ठूंस दिया।
“चाट। सबके सामने।”
अनन्या ने चाटा। रुद्रक्ष वापस ड्राइवर सीट पर बैठ गया। पिकअप चल पड़ी।
शाम के पाँच बजे तक गिनती दो सौ सत्तर पार हो चुकी थी। शरीर सुन्न पड़ने लगा था। सूरज ढल रहा था। पिकअप आखिरी बार रुकी। तीन अजनबी एक साथ चढ़े। एक ने मुँह, एक ने चूत, एक ने गाँड। तीनों एक साथ पेलने लगे। अनन्या का शरीर उनके धक्कों से काँप रहा था। लोग सड़क पर खड़े देख रहे थे। तीनों ने अंदर ही झड़ा। फिर हँसते हुए उतर गए।
“दो सौ अस्सी…”
शाम के छह बजे पिकअप घर के अंदर घुसी। रुद्रक्ष ने बंधन खोले। अनन्या ढेर हो गई। उसने उसे घसीटते हुए शीशे वाले कमरे में बाँध दिया। शरीर पर धूल, खून, अजनबियों का पानी और पुराने निशान सब मिलकर चमक रहे थे।
“गिनती बता।”
अनन्या की आवाज पूरी तरह बैठ चुकी थी। “दो सौ अट्ठासी…”
रुद्रक्ष ने सिर हिलाया। छड़ी उठाई। नए वार शुरू कर दिए। पुराने निशानों पर। खून फिर बहने लगा। फिर गाँड में लंड धकेलकर पेलने लगा। जैसे दिन भर की सड़क और अजनबियों के निशान मिटा रहा हो। अनन्या अब सिर्फ सिसक रही थी। वह अंदर झड़ गया। उंगलियों से पानी उसके मुँह में ठूंसा।
“निगल।”
अनन्या ने निगल लिया।
रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठ गया। सिगार जलाई। धुआँ उठ रहा था।
“नया नियम। आज से तू रोज़ दोपहर बारह से शाम पाँच तक उसी खुली पिकअप में बाँधी रहेगी। शहर घूमेगी। मैं कभी-कभी रोककर अजनबी चढ़ाऊँगा। तू गिनेगी। शाम को हिसाब देना होगा। गलती हुई तो अगले दिन छह घंटे की जगह आठ घंटे बाँध दूँगा।”
अनन्या फर्श पर पड़ी काँप रही थी। शरीर जल रहा था। लेकिन अंदर वह खालीपन अब खुली सड़क और अजनबियों की निगाहों की भूख बन चुका था।
रुद्रक्ष ने आखिरी कश लिया। आवाज और ठंडी हो गई।
“अगले हफ्ते मैं तुझे एक बंद गोदाम में छोड़ दूँगा। अंदर बीस पुरुष इंतजार कर रहे होंगे। तू नंगी उनके बीच होगी। मैं कीमत लूँगा। वे तीन घंटे तक तुझे जैसे चाहें इस्तेमाल करेंगे। तू सिर्फ गिनेगी। लौटकर हर स्पर्श और हर भरने का हिसाब देना होगा।”
अनन्या की आँखें अंधेरे में खुली रह गईं। नया डर। नई भूख। चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ सड़क और महिलाओं का नहीं, बीस पुरुषों वाले गोदाम का भी होने वाला था।
अनन्या फर्श पर पड़ी रही। शरीर पर खुली पिकअप वाली दिन की धूल, खून और अजनबियों का पानी सूखकर चिपक गया था। कलाईयों पर गहरे निशान। जांघें छड़ी और मुट्ठी से सूजी हुईं। रुद्रक्ष की आखिरी बात कानों में गूँज रही थी—बीस पुरुषों वाला गोदाम।
तीसरे दिन शाम को रुद्रक्ष ने अनन्या को एक पुराने बंद गोदाम के अंदर धकेल दिया। अंदर रोशनी कम थी। बीस पुरुष पहले से खड़े इंतजार कर रहे थे। अलग-अलग उम्र, अलग-अलग शरीर। सबकी निगाहें अनन्या पर टिक गईं। रुद्रक्ष ने चेन एक मोटे पुरुष के हाथ में थमा दी।
“तीन घंटे। कीमत ले ली मैंने। चेहरा और जीभ छोड़कर बाकी सब आजाद।”
वह किनारे एक कुर्सी पर बैठ गया। सिगार जलाई। सिर्फ देखने के लिए।
पहले पुरुष ने अनन्या के बाल पकड़कर खींचे और मुँह में लंड ठूंस दिया। गले तक। दूसरे ने पीछे से चूत में उंगलियाँ घुसा दीं। तीसरे ने निप्पल मरोड़े। अनन्या की आवाज दब गई। गिनती दिमाग में शुरू हो गई—एक।
फिर उसे बीच में लिटा दिया गया। एक ने मुँह, एक ने चूत, एक ने गाँड। तीनों एक साथ पेलने लगे। अनन्या का शरीर उनके धक्कों से काँप रहा था। जब वे झड़ गए तो जगह दूसरे ले लेते। कभी दो लंड एक छेद में डालने की कोशिश। कभी मुट्ठी। कभी थप्पड़। कभी बाल खींचना। खून की नई लकीरें बनने लगीं। अनन्या की गिनती बीस, तीस, चालीस तक पहुँच गई।
एक घंटे बाद पुरुषों ने उसे खंभे से बाँध दिया। हाथ ऊपर। पैर फैलाए। बारी-बारी छड़ी चलाने लगे। नितंब, जांघें, पीठ। हर वार के साथ चीख निकलती। खून बहने लगा। फिर फिर से भरना शुरू हो गया। एक के बाद एक। कभी दो, कभी तीन एक साथ। अनन्या का शरीर अब पूरी तरह उनके हाथों में था। आवाज बैठने लगी थी। सिर्फ सिसकियाँ रह गई थीं।
दो घंटे बाद वह फर्श पर ढेर पड़ी थी। पुरुषों ने उसे घेर लिया। कोई मुँह में ठूंस रहा था, कोई मुट्ठी घुमा रहा था, कोई निप्पल काट रहा था, कोई जांघों पर सिगरेट बुझा रहा था। गिनती अस्सी पार कर चुकी थी। शरीर सुन्न पड़ने लगा था। लेकिन वे रुके नहीं। तीसरा घंटा भी उसी क्रूरता से गुजरा। कभी उसे उठाकर दीवार से सटा देते, कभी मेज पर लिटा देते। हर छेद भरा जा रहा था। बार-बार।
तीन घंटे पूरे हुए। रुद्रक्ष उठा। चेन वापस ली। पुरुष संतुष्ट होकर किनारे हट गए। अनन्या फर्श पर खून, थूक, पानी और धूल में सनी पड़ी थी। शरीर हिल नहीं रहा था।
रुद्रक्ष ने उसे बालों से खींचकर खड़ा किया। गाड़ी में फर्श पर लिटाया। घर पहुँचते ही शीशे वाले कमरे में बाँध दिया। शरीर पर बीस पुरुषों के नाखूनों, दांतों, छड़ी और सिगरेट के निशान धधक रहे थे।
“अब बता। गिनती। कितनी बार। कहाँ। कैसे।”
अनन्या की आवाज पूरी तरह टूटी हुई थी। वह बताने लगी। पहले तीन ने एक साथ भरा… छड़ी कितनी बार चली… मुट्ठी किस-किस ने डाली… सिगरेट कहाँ-कहाँ बुझाई… हर विवरण। रुद्रक्ष सुनता रहा। कोई भाव नहीं।
जब वह खत्म हुई तो रुद्रक्ष ने छड़ी उठाई। पुराने निशानों पर नए वार शुरू कर दिए। खून फिर बहने लगा। फिर उसने गाँड में लंड धकेल दिया। जोर से। गहराई तक। जैसे बीस पुरुषों के निशान मिटा रहा हो। अनन्या अब सिर्फ काँप रही थी। वह अंदर झड़ गया। फिर चूत में डालकर वहाँ भी झड़ गया। उंगलियों से पानी उसके मुँह में ठूंसा।
“निगल। उनके और मेरे दोनों।”
अनन्या ने निगल लिया।
रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठ गया। सिगार जलाई। धुआँ उठ रहा था।
“नया नियम। आज से तू रोज़ रात सोने से पहले मेरे सामने खड़ी होकर बताएगी कि दिन भर तेरे शरीर के किस छेद ने सबसे ज्यादा भरने की माँग की और कितनी बार। झूठ बोली तो फिर से उसी गोदाम में चार घंटे के लिए छोड़ दूँगा।”
अनन्या फर्श पर पड़ी हांफ रही थी। शरीर जल रहा था। लेकिन अंदर वह खालीपन अब बीस पुरुषों की भीड़ की भूख बन चुका था।
रुद्रक्ष ने आखिरी कश लिया। आवाज और ठंडी हो गई।
“अगले हफ्ते मैं तुझे एक रात के लिए अपने सबसे करीबी व्यापारिक पार्टनर के पास भेज दूँगा। वह अकेला नहीं होगा। उसके साथ उसकी पत्नी और दो और पुरुष होंगे। तू उनकी रहेगी पूरी रात। वे तुझे जैसे चाहें तोड़ेंगे। सुबह मैं लेने आऊँगा। लौटकर हर पल का हिसाब देना होगा।”
अनन्या की आँखें अंधेरे में खुली रह गईं। नया डर। नई भूख। चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ गोदाम और सड़क का नहीं, पार्टनर और उसकी पत्नी वाली रात का भी होने वाला था। और अगली रात पहले से कहीं ज्यादा उलझी और गहरी होने वाली थी।
मामा की आँखों के सामने मामी की